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Aavishkaar evam khoj
ham apane aas-paas jidhar bhee najar daalate hain, kautoohal se bharapoor udanatashtaron se judee huee vastuen dikhaee padatee hain jinake bina aaj sukhamay jeevan kee kalpana karana hamaare lie mushkil hai. lekin kisee bhee vastu ka sevheekaran karana aasaan nahin hota hai balki isake peechhe avishnanak kee drdh ichchhaashakti aur navoday kee or adamy laalasa chhipee hotee hai. prastut pustak ke liye jab hamane dainik jeevan ke upayog mein aane vaalee in vastuon ka chunaav karana shuroo kiya to hamaare liye aisa karana kathin ho gaya, kyonki aisee vastuon kee soochee kaaphee lambee hai. kaaphee soch vichaar karane ke baad hamane vigyaan ke kuchh chune hue kuchh sevaneeshents ke saath-saath khaady padaarthaaen aur saamaajik aavashyakataon se jude mahattvapoorn upachaar jaise – eks-re, maeekro kemikal avan, pijja, bargar, poteto chips, taiª phik laeet, jel, aadi. tadibiyar aadi ke avinaashakon kee kahaanee bade hee aakarshak andaaj men chitronen sahit prastut kee gaee hai. prastut pustak chhaatron aur aam lekhon ke gyaan mein vrddhi karane ke saath-saath unhen tejasveekaran aur vigyaan ke prati utsaahit karatee hai. pramukh visheshshataen- vaigyaanik utthaan khaady suraksha khel sambandhee abhibhaashan
Ab Hamen Badalna Hoga by N. Raghuraman
विगत वर्षों में हमारे अधिकतर आई.टी. कार्यालय निश्चित स्थान पर 9 से 5 के परंपरागत काम के ढर्रे से काफी आगे निकलकर मोबाइल वर्क प्लेस और सुविधानुसार समय तक पहुँच गए हैं। रिक्रूटमेंट और परफॉर्मेंस रेटिंग स्वचालित हो चुके हैं। हाजिरी मोबाइल या हस्तचालित उपकरणों के जरिए होने लगी है। अगर 10 सालों में हम निश्चित स्थान के कार्यस्थल से चलते-फिरते कार्यस्थल तक का सफर तय कर चुके हैं तो कल्पना कीजिए, अगले पाँच सालों में और क्या हो जाएगा! बड़ी कंपनियाँ नई कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा महसूस करने लगी हैं और नई कंपनियाँ कुछ बड़ी सड़कों या मॉल की खुदरा दुकानों की तरह खुल रही हैं। जागने से सोने तक का सबकुछ बदलने ही वाला है और अगर हम इस बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे तो प्रतिस्पर्धा में टिक पाना हमारे लिए कठिन होगा। अत: ऐसे परिवेश में हमें अपने आपको बदलना होगा। क्यों और कैसे बदलना होगा—यह इस पुस्तक में बताया गया है।
बदलाव के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और सही सोच विकसित करनेवाली एक व्यावहारिक पुस्तक।
Abhav by Vishnu Prabhakar
हिंदी कथा-साहित्य के सुप्रसिद्ध गांधीवादी रचनाकार श्री विष्णु प्रभाकर अपने पारिवारिक परिवेश से कहानी लिखने की ओर प्रवत्त हुए। बाल्यकाल में ही उन दिनों की प्रसिद्ध रचनाएँ उन्होंने पढ़ डाली थीं।
उनकी प्रथम कहानी नवंबर १९३१ के ‘हिंदी मिलाप’ में छपी। इसका कथानक बताते हुए वे लिखते हैं, ‘परिवार का स्वामी जुआ खेलता है, शराब पीता है, उस दिन दीवाली का दिन था। घर का मालिक जुए में सबकुछ लुटाकर शराब के नशे में धुत्त दरवाजे पर आकर गिरता है। घर के भीतर अंधकार है। बच्चे तरस रहे हैं कि पिताजी आएँ और मिठाई लाएँ। माँ एक ओर असहाय मूकदर्शक बनकर सबकुछ देख रही है। यही कुछ थी वह मेरी पहली कहानी।’
सन् १९५४ में प्रकाशित उनकी कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ काफी लोकप्रिय हुई। लेखक का मानना है कि जितनी प्रसिद्धि उन्हें इस कहानी से मिली, उतनी चर्चित पुस्तक ‘आवारा मसीहा’ से भी नहीं मिली।
श्री विष्णुजी की कहानियों पर आर्यसमाज, प्रगतिवाद और समाजवाद का गहरा प्रभाव है। पर अपनी कहानियों के व्यापक फलक के मद्देनजर उनका मानना है कि ‘मैं न आदर्शों से बँधा हूँ, न सिद्धांतों से। बस, भोगे हुए यथार्थ की पृष्ठभूमि में उस उदात्त की खोज में चलता आ रहा हूँ।…झूठ का सहारा मैंने कभी नहीं लिया।’
उदात्त, यथार्थ और सच के धरातल पर उकेरी उनकी संपूर्ण कहानियाँ हम पाठकों की सुविधा के लिए आठ खंडों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ये कहानियाँ मनोरंजक तो हैं ही, नव पीढ़ी को आशावादी बनानेवाली, प्रेरणादायी और जीवनोन्मुख भी हैं।