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Adbhut Ganitajna Srinivas Ramanujan by N K Govil / Bhudev Sharma
अद्भुत गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जीवन और कृतित्व दोनों से परिचय प्राप्त करना किसी को भी मानव प्रतिभा की संभावनाओं के संबंध में चमत्कृत करने के लिए पर्याप्त है। गणित के क्षेत्र में विश्व में कदाचित् ही कोई व्यक्ति रामानुजन के नाम से अपरिचित होगा।
रामानुजन का गणित का कार्य सरल नहीं माना जाता है। कुछ गणितज्ञ तो उनके सूत्रों को अत्यंत जटिल मानते हैं। वे हिंदी के माध्यम से उन सूत्रों को प्रस्तुत करके अपने आपको एक बड़ी चुनौती में खरा उतरने का दावा नहीं करते हैं।
विश्व की विभिन्न भाषाओं में उनके जीवन पर आधारित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं, किंतु हिंदी-भाषी पाठकों के लिए रोचक शैली में लिखित यह जानकारीपरक पुस्तक रामानुजन के जीवन को तथा उनके विश्व-विख्यात कृतित्व को प्रस्तुत करने की एक कसौटी है।
पुस्तक में आरंभ के अध्यायों में रामानुजन के जीवन तथा परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है तथा भारतीय संस्कृति एवं परंपरा पर उनकी मान्यताओं को स्थान दिया गया है। प्रथम भाग में कहीं-कहीं गणित के कुछ उद्धरण आए हैं, जिनका उल्लेख करना आवश्यक था। बाद के अध्यायों में उनके द्वारा किए गए गणित के कार्य का संक्षिप्त, रोचक व ज्ञानप्रद प्रस्तुतीकरण है।
विश्वास है, प्रस्तुत पुस्तक पढ़कर पाठकगण श्रीनिवास रामानुजन के कृतित्व से न केवल परिचित होंगे, बल्कि प्रेरणा भी ग्रहण करेंगे।
Adbhut Prem Ki Vichitra Katha by Ashwini Bhatnagar
डैनी अमीरों का नौशा बनकर दूर कहीं चमकते सितारे से उठी झंकार के साथ बह गया था। झंकार खत्म नहीं हुई थी, पर उसका बहना ठहर गया था। उसके पैर जम रहे थे और हालाँकि दूर सितारे की सदा उसके जेहन में अब भी गूँज रही थी, पर उसकी कंपन अब महसूस नहीं हो रही थी।
डैनी ने गिरिजा को बेहद चाहा था। उसका साथ पाकर उसे लगा था कि दुनिया में उससे बड़ा खुशनसीब कोई नहीं था। वह गिरिजा में घुला जा रहा था, पर बुलावा उसको खींचे लिये जा रहा था। गिरिजा उसका हाथ पकड़कर अपने पास बैठा सकती थी, पर उसने हाथ को धीरे-धीरे छूटने दिया था। वह एक ऐसा ख्वाब थी, जो हकीकत के छोर को छूते ही सहम गई थी; पर जब तक वह हकीकत और अफसाने के बीच थी, उसने डैनी को अपने मखमली आगोश में बेपनाह रोमांच दिया था।
सच्चे प्रेम को एक अलग, विशिष्ट और विचित्र ढंग से रेखांकित करता अत्यंत पठनीय उपन्यास।
Adbhut Sannyasi by Rajeev Sharma
यह गाथा है एक निस्पृह योगी की, चिरंजीवी तपस्वी की, कठिनतम कर्तव्यरत निर्विकार पुरुषार्थी की, अपराजेय योद्धा की।
वे आवेशावतार नहीं थे, न ही अंशावतार। क्रोधावतार कहकर उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता।
आज तक पृथ्वी पर उनके शौर्य की झलक है, वह उनकी साक्षात् उपस्थिति में कितनी प्रभावी रही होगी। वे उस भृगुकुल के भूषण थे, जिसकी महिमा का विस्तार पवित्र नदियों और समुद्रों, पर्वतों और गहन वनों में विद्यमान असंख्य आश्रमों में ही नहीं संपूर्ण त्रैलोक्य में था, भगवान् विष्णु के वक्षस्थल से लेकर हिमगिरि में भृगु शिखर तक। मदांध सत्ता की कुटिलता के विरुद्ध जनप्रतिरोध का प्रबलतम स्वर हैं परशुराम। आजकल के कथित लोकतंत्रों के जन्म के युगों पूर्व वे तंत्र पर लोक के प्रभावी नियंत्रण के अधिष्ठाता हैं। यदि भारतीय चेतना यूरोपीय प्रभुत्व की बंधक न हुई होती तो स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के लिए मानवीय संघर्ष की गाथा परशुराम से प्रारंभ हुई होती; कथित फ्रांसीसी क्रांति से नहीं।
वे कोरे योद्धा नहीं थे। उन्होंने साधारण मनुष्यों को शास्त्र और शस्त्र दोनों सौंपकर वह सामर्थ्य दिया कि वे स्वयं अभ्युदय और निःश्रेयस पा सकें।
उनकी अद्भुत जीवनगाथा हमारे युग को भी स्वमंगल से सर्वमंगल और अराज से स्वराज हेतु प्रेरित कर सके, यही इस कृति का पावन प्रयोजन है।
Adhi Duniya Ki Poori Patrakarita by Mangla Anuja
हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा में
विविध भूमिकाओं में महिलाओं की सहभागिता स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ़ती गई है। महिला पत्रकारिता का आरंभ महिलाओं को आदर्श माँ और आदर्श पत्नी बनाने की समझाइश भरे आलेखन के साथ हुआ। परंतु जैसे-जैसे समय बढ़ता और बदलता गया वैसे-वैसे समसामयिक संदर्भो से महिला पत्रकारिता जुड़ती गई। कोई विषय, कोई क्षेत्र उससे अछूता नहीं रहा। आज महिला पत्रकारिता उस मोड़ पर पहुँच गई है, जहाँ वह अपेक्षा करती है कि हम समाज में अपनी योग्यता, प्रतिभा, दक्षता, लगन और कृतित्व के बलबूते समान महत्त्व और अवसरों की अधिकारी हों। जरूरत इस बात की है कि महिला पत्रकारों को किन्हीं खास चौहद्दियों में न समेटकर कार्यक्षेत्र का विशाल फलक सहज उपलब्ध हो। मूल तत्त्व यह कि पत्रकारों के बीच ऐसी किसी विभाजक रेखा का कोई औचित्य नहीं होता, जिसे महिला पत्रकार अथवा पुरुष पत्रकार के रूप में चिह्नित किया जाए।
महिला पत्रकारिता पर एकाग्र पहला विशद विवेचन।
Adhiktam Safalata by Napoleon Hill
डॉ. नेपोलियन हिल के लेखन को जानने के बाद यह जानना आसान हो जाता है कि ज्यूडिथ विलियमसन ने जीवन की संपदाओं से भरपूर पुस्तक के लिए ‘अधिकतम सफलता’ नाम यों चुना? डॉ. हिल ने तेरह वर्ष की अल्पायु में, दक्षिण-पश्चिम वर्जीनिया के पर्वतों पर रहते हुए अपना लेखन आरंभ किया और आनेवाले सात दशकों तक अपनी लेखन प्रतिभा का शानदार परिचय दिया। उन्होंने अपने प्रमुख लेखन में जिन व्यतियों पर अध्ययन और शोध किया, मानो उनके जीवन में से सोना प्राप्त करने के लिए खदानें खोद दीं। उनके प्रमुख कार्यों में ‘लॉ ऑफ ससेस और थिंक ऐंड ग्रो रिच’ को शामिल कर सकते हैं। उनके संपूर्ण लेखन से उनके पाठकों ने यह अनमोल विरासत पाई।
अगर आप ‘नेपोलियन हिल : अधिकतम सफलता’ में सुश्री विलियमसन द्वारा दिए गए लेखों को पढ़ेंगे तो निश्चित रूप से इनका लाभ पा सकेंगे। इनमें से कुछ नियम आपकी सफलता की यात्रा में काम आनेवाले हैं। अगर आपको पूरी पुस्तक को पढ़कर लगे कि आपके गुणों में किसी एक गुण विशेष, जैसे लोच आदि की कमी आ रही है तो आपको उस अध्याय को एक बार फिर से पूरी तरह पढ़ना चाहिए, ताकि आप अपने व्यवहार में वांछित बदलाव ला सकें और आप भी सोने की इस खदान से अपने लिए संपदा चुन सकें। अधिकतम सफलता के लिए प्रेरित करने वाली एक पठनीय पुस्तक।