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Aalim Sir Ki English Class by Aalim
अंग्रेज़ी शब्दों के उच्चारण के मामले में आलिम सर एक जाना-माना नाम है। उनका कॉलम ‘ज़बान सँभाल के’ सन् 2004 में नवभारत टाइम्स, दिल्ली में प्रकाशित होना शुरू हुआ और बहुत जल्दी का़फी लोकप्रिय हो गया। उसके बाद पाठकों की माँग पर वह कई बार रिपीट भी हुआ।
आलिम सर का अंग्रेज़ी पढ़ाने का ढंग निराला है। हल्के-फुल्के अंदाज़ में वह अंग्रेज़ी उच्चारण के जटिल-से-जटिल नियम चुटकी बजाते समझा देते हैं। उनका मानना है कि यदि पाठक अंग्रेज़ी उच्चारण के सात नियम समझ जाए तो वह 80 प्रतिशत अंग्रेज़ी शब्दों के उच्चारण का ़खुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। हल्का-भारी का नियम उनकी अनोखी खोज है, जिसमें उन्होंने हिंदी व्याकरण के बहुत आसान से नियम के आधार पर अंग्रेज़ी उच्चारण का बेसिक ़फंडा समझाया है। हिंदी के पाठकों के लिए यह बहुत उपयोगी साबित हुआ है।
इस पुस्तक में आलिम सर ने अपनी पुरानी क्लासों को संशोधित-संवर्धित रूप में प्रस्तुत किया है। हर क्लास के अंत में उसका सार और अभ्यास भी जोड़ा गया है, जो कि अ़खबार में छपे कॉलम में नहीं था।
अंग्रेज़ी भाषा को सहज-सरल ढंग से सीखने में सहायक एक अत्यंत उपयोगी पुस्तक।
Aalochna
A leading literary magazine of Hindi Intellects and critics. More events, information and daily updates on various literary occasion on a different culture and much more on these magazines…..
Aam Aadmee Magazine
Aam Aadmee is a social magazine that contains the latest news updates about the nation representing all that revolves around a common man.
Aam Aadmi Aur Loktantra by B S Shekhawat
आम आदमी और लोकतंत्र
अब हमें यह भी जान लेना चाहिए कि लोकतंत्र का पाँचवाँ स्तंभ भी है, जिसे गरीब आदमी कहा जाता है। यह स्तंभ ऐसा शक्तिशाली स्तंभ है, जो सत्ता को बदल डालता है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि चुनाव में विजय और पराजय यह सब तो चलता रहता है। कुछ कहते हैं, हम काम तो बहुत करते हैं, पर फिर भी हार जाते हैं। लेकिन उनके पराजित होने का कारण ही यही है कि जनता में एक वर्ग ऐसा है, जो यह मानता है कि यदि उसे प्रत्यक्ष में कोई लाभ होगा, उसकी गरीबी मिटेगी तभी उसे विश्वास होगा कि लोकतंत्र क्या है, कानून क्या है और प्रशासन क्या है। वह केवल भाषण से संतुष्ट नहीं होनेवाला है। वह संतुष्ट तभी होगा जब उसके पेट में प्रतिदिन आराम से दो रोटी पहुँच सकेगी। यदि वह संतुष्ट नहीं होगा तो असंतोष बढ़ेगा और यदि असंतोष बढ़ेगा तो लोकतंत्र के प्रति उसकी जो आस्था है, उसमें शनै:-शनै: कमी आती जाएगी—और जिस दिन ऐसे लोगों का संगठन बन गया तो कैसी स्थिति पैदा होगी, उसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।
—इसी पुस्तक से
Aana Mere Ghar by Tulsi Devi Tiwari
अरे ! ये क्या हुआ?”
“क्या हुआ सोना-मोना को ? ये खून से लथ-पथ कैसे हो गईं?” पापा-मम्मी सिर पटक-पटककर रो रहे हैं। अपनी पोतियों के लिए। हमारा तो वंशनाश हो गया भगवान् ! हमारी बहू अब कभी माँ नहीं बन सकती। सोचा था, दोनों पोतियों को देखकर जी लेंगे, सत्यानाश हो उस ट्रक वाले का, जिसने इनकी ऑटो को टक्कर मार दी। अब हम क्या करें भगवान्, किसके सहारे जिएँ?” मम्मी को रोते उसने पहली बार देखा था। | बड़ी कड़क औरत हैं, आँसुओं की इतनी मजाल कहाँ कि उनकी पलकों की देहरी लाँघ जाएँ। वह रोना चाहती थी अपनी सोना-मोना के लिए, किंतु कंठ से आवाज । नहीं निकल रही थी। उसने पूरा जोर लगाया “हाय मेरी बच्चियाँऽ! अब मैं किसके लिए जिऊँगी? मुझे उठा ले भगवान् !” उसने अपने हाथों से कसकर अपना गला दबाने का प्रयास किया। किंतु कुछ न हो सका।“सोना-मोना के लिए तो इतना रो रही है और जिसे गर्भ में ही मार दिया उसका क्या ? ले भोग बेटी को मारने की सजा। अब इस जन्म में तुझे कोई माँ नहीं कहेगा।” एक पहचानी सी आवाज गूंजी थी उसके कानों में, “हाँ! मैंने पाप तो बहुत बड़ा किया, परंतु इसमें इनका क्या दोष? मुझे क्षमा कर दो, हे ईश्वर ! मेरी सोना-मोना को मेरे पापों की सजा मत दो, उन्हें जीवनदान दे दो!”
-इसी संग्रह से
बदलते भारतीय समाज में पैदा हो रही नई चुनौतियों और विसंगतियों को पुरजोर ढंग से उठाकर उनका समाधान बतानेवाली प्रेरक, मनोरंजक एवं उद्वेलित कर देनेवाली पठनीय कहानियाँ
Aangan Ki Gauraiya by Mukti Shahdeo
आज बचपन के गलियारे में झाँकती हुई ठीक-ठीक जान पाती हूँ कि मार खाकर घंटों रोनेवाली वह लापरवाह लड़की हर वक्त जिस सपनीली दुनिया में जीती थी, वहाँ की एकमात्र सहचरी बहुत सालों तक घर-आँगन में फुदकने वाली गौरैया ही थी। जीवन की कठिन या क्रूरतम सच्चाइयाँ हमें तोड़ती-मरोड़ती हैं और बदल देती हैं। बाहर की दुनिया में हम सामान्य बने रहकर चलते रहते हैं। आज सोचती हूँ, ठीक इसी टूटन के समानांतर जीवन की ये सच्चाइयाँ हमें बहुत ही पुख्ता डोर से बाँधती, जोड़ती और बनाती भी रहती हैं, एकदम परिपक्व। अचानक ऐसी ही परिस्थितियों के बीच मैंने खुद को लापरवाही की दुनिया से अलग जिम्मेदारी से भरपूर सख्त जमीन पर खड़ा पाया। बाहर की यात्रा निस्संदेह बहुत कठिन थी, पर भीतर जो यात्रा चल रही थी, वह बहुत सुकून देने वाली थी। मनचाहे रंगों से सजाकर मैंने उस भीतरी यात्रा को भरपूर जीना, किशोरावस्था में ही सीख लिया था, जो आज भी कायम है। जब भी बाहर की ऊबड़-खाबड़ परिस्थितियों से कदम लड़खड़ाते, अंदर स्वतः प्रवहमान शब्द मेरी गलबहियाँ थामे रहते।
—इसी पुस्तक से