Hindi Literature
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Devendra Satyarthi Ki Lokpriya Kahaniyan by Devendra Satyarthi
हिंदी के विलक्षण यायावर साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी जितने बड़े लोकसाधक हैं, उतने ही बड़े और ऊँचे कद के कथाकार भी। पूरे बीस बरस तक लोकगीतों की तलाश में गाँवगाँव भटककर हिंदुस्तान के चप्पेचप्पे की धूल छान लेनेवाले सत्यार्थीजी के कथासाहित्य की खासी धूम रही है।
सत्यार्थीजी की कहानियों में जीवन की घुमक्कड़ी के इतने बीहड़, कठोर और दुस्साहसी अनुभव हैं कि मन उनके साथ बहता चला जाता है। उनकी कहानियों में लोकगीतों का आस्वाद और रसमाधुर्य ही नहीं, फसलों की लहलहाती गंध, खेतों की मिट्टी की खुशबू, गरीब किसानमजदूरों के लहू और पसीने की गंध, शोषण की आकुल पुकारें तथा दुःख और पीड़ाओं का सैलाब भी है। इसीलिए मंटो ने बड़ी हसरत के साथ उन्हें पत्र लिखा था—‘‘काश, मैं खुशिया होता और आपके साथसाथ यात्रा करता!’’
धरती और खानाबदोशी की गंध लिये ये स्वच्छंद कहानियाँ सिर्फ एक लोकयात्री की कहानियाँ ही हो सकती हैं, जिसने धरती को बड़ी शिद्दत से प्यार किया है और जिंदगी के नएनए रूपों की तरह अपनी कहानियों को भी नित नएनए रूपों में सामने आने के लिए खुला छोड़ दिया है। यही वजह है कि सत्यार्थीजी की कहानियाँ औरों से इतनी अलग हैं और वे बीसवीं शताब्दी के समूचे इतिहास तथा लोकजीवन को अपने आप में समोए, अपने समय के अनमोल दस्तावेज सरीखी हैं। बेशक सत्यार्थीजी की कहानियों को पढ़ना अपने समय और इतिहास की गूँजती आवाजों को सुनने की मानिंद है।
—प्रकाश मनु
Devi Devtaon Ke Rahasya by Devdutt Pattanaik
हिंदू देवी-देवताओं के नयनाभिराम और सुंदर चित्र भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा उनमें आस्था एवं भक्तिभाव की अजस्र धारा प्रवाहित कर देते हैं। पर कम ही लोग इन चित्रों में प्रदर्शित विभिन्न स्वरूपों के बारे में ज्ञान रखते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक हिंदू कलेंडर कला के इन चित्रों के रहस्यों को सुलझाने का एक सुंदर प्रयास है। इसमें बताया गया है—
गणेश सभी बाधाओं को दूर करनेवाले देवता हैं।
शेर पर सवार चामुंडा प्रकृति पर अपने प्रभुत्व का संकेत करती है।
अपनी हथेली को उठाकर देवी अपने भक्तों से कहती हैं कि डरने की जरूरत नहीं है।
गणेश का एक टूटा हुआ दाँत संयम का प्रतीक है।
भू-देवी, यानी गाय के रूप में पृथ्वी लक्ष्मी का दूसरा रूप है।
हिंदुओं की आस्था के केंद्रबिंदु देवी-देवताओं के चित्रों के माध्यम से धार्मिक नवजागरण का मार्ग प्रशस्त करती एक पठनीय पुस्तक।
Devi-Devtaon Ki Kahaniyan by Mukesh ‘Nadan’
हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की बहुत मान्यता है। घर-घर में अनेक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना अपूर्व श्रद्धा, आस्था, प्रेम और विधि-विधान से की जाती है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता भी है कि इन देवी-देवताओं की संख्या करोड़ों में है। इनके प्रति असीम भक्ति और मान्यताओं ने ही इनकी अनेक कथाओं को जन्म दिया। रामायण, गीता, उपनिषद आदि अनेक ग्रंथ और पुराणों में इन्हीं वंदनीय देवी-देवताओं की रोचक एवं मनोरंजक कथाएँ प्रचलित हैं।
प्रस्तुत पुस्तक पुराणों तथा अन्य हिंदू वाङ्मय-गं्रथों से चुनी गई ऐसी श्रेष्ठ कथाओं का संग्रह है, जो अनेक देवी-देवताओं के रहस्यमयी जीवन की घटनाओं को उजागर करती हैं।
अपने धर्म के प्रति आस्था जाग्रत् करने और इष्टदेवी-देवताओं के प्रति भक्ति में तल्लीन होने का संदेश देती पठनीय पुस्तक।
Devi-Vandana by Dr. Vinod Bala Arun
साधना में गहनता और आत्मीयता लाने के लिए परमात्मा को माँ के रूप में देखना हिंदू धर्म की एक विशेषता है। हमारे ऋषियों ने इस बात को बहुत गहराई से समझा था कि माँ के साथ संतान और संतान के साथ माँ का बड़ा आत्मीय और मजबूत संबंध है। बिना किसी छल-कपट, संशय व संकोच के बालक माँ की शरण में चला जाता है और माँ उसके सारे अपराध भुलाकर अपने गले लगा लेती है।
इसीलिए देवी माँ जे जगदंबा हैं, की आराधना का हमारे धर्म में विशेष महत्त्व है। मुख्य रूप से वर्ष में दो बार लगातार नौ रात्रियों तक पूजा, अर्चना एवं वंदन करके भक्त उनकी कृपा पाने का प्रयत्न करता है। उसे विश्वास होता है कि माँ उसके अवगुणों और अपराधों को बिसारकर उसे अपनी शरण में स्थान देंगी।
माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं। जैसे जीवन में हर एक कार्य को करने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार परमात्मा को सृजन, पालन और संहार के लिए भी शक्ति की आवश्यकता होती है। भगवती दुर्गा ही वह शक्ति हैं, जिनके सहारे परमात्मा सृष्टि का नियमन करता है।
ऐसी माँ दुर्गा की वंदना के लिए हमने ‘दुर्गा सप्तशती’ के कुछ अंशों का संकलन और संपादन किया है। आशा है इससे भक्त लाभान्वित होंगे।
Dhandhe Matram by Piyush Pandey
व्यंग्य अंततः सहारा देता है, हारे हुए आदमी को। ताव देनेवाले आदमी पर ताव खा जाता है। व्यंग्य देखता है कि धंधा क्या चल रहा है। इस लिहाज से ‘धंधे मातरम्’ एक पठनीय व्यंग्य-संग्रह है, जो सजी-धजी भाषा में नहीं है, बल्कि भाषा को नई सज-धज प्रदान करता है। पीयूष की अपनी शैली है, जिसमें वो व्यंग्य करते हैं। वर्तमान राजनीतिक माहौल में ‘अ’ से असहिष्णुता, ‘आ’ से आतंकवाद का नया ककहरा रचते हैं। यानी व्यंग्य को लेकर उनकी अलग दृष्टि है, जो पाठकों को आनंद देगी और सोचने के लिए विवश भी करेगी।
—अशोक चक्रधर
व्यंग्यकार एवं कवि
पीयूष पांडे को मैं कुछ साल से व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ। एक ब्लॉग लिखने के सिलसिले में पीयूष पांडे से मेरी मुलाकात आरंभ हुई थी और तब मुझे यह अहसास हुआ कि इनके भीतर एक व्यंग्यकार छिपा हुआ है, जो समय-समय पर बाहर आता रहता है। आजकल जब मैं इनके ट्वीट और फेसबुक पोस्ट पढ़ता हूँ तो मेरा अहसास और पुख्ता हो जाता है। पीयूष गंभीर-से-गंभीर विषय को बड़े व्यंग्यात्मक तरीके से पेश करते हैं और विषय से जुड़ी विसंगतियों और आक्रोश को बड़ी सहजता और व्यंग्यात्मक अंदाज में सामने लाते हैं। ‘धंधे मातरम्’ के लिए पीयूष को मेरी शुभकामनाएँ।
—मनोज बाजपेयी
अभिनेता
Dharam Aur Sampradayikta by Narendra Mohan
धर्म की इस विकृति व भ्रांति के साथ स्वार्थ व अहंकार इतना अधिक जुड़ गए है कि सामान्य व्यक्ति धर्म की वास्तविक अवधारणा को भूलकर इस विभाजित चेतना को ही सत्य मानने लगा है। विभाजित व स्वार्थ प्रधान चेतना से उपजे जो विभिन्न धर्म हैं उनमे से अनेक केवल अपने अहंकार, स्थार्थ व आक्रामकता के काराण ही फल-फूल रहे हैं। धर्म का आवरण लेकर अपनाई गई यह आक्रामकता ही ‘ सांप्रदायिकता’ है। इस आक्रामकता को कहीं राजनीतिक कारणों से अपनाया गया और कहीं आर्थिक कारणों से तो कहीं सामाजिक कारणों से। आज स्थिति इतनी बिगड़ी हुई है कि अपना- अपना तथाकथित धार्मिक दर्शन थोपने के लिए धनबल, छलबल व बाहुबल का खुलकर प्रयोग हो रहा है और वह भी सभ्यता व संस्कृति के नाम पर ।
धर्म का लक्ष्य है भेदजनित भ्रांति व अज्ञान का निवारण। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि यह निवारण भी वैयक्तिक स्तर पर ही अनुभूति के माध्यम से करना होगा । इस दृष्टि से भेद की सत्ता के अस्तित्व को जगत् के स्तर पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जैसेकि महासागर में लहर के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, वैसे ही विराट् चैतन्य के महासागर में भेद रूपी लहर को स्वीकार करना ही होगा; पर ध्यान रहे कि वास्तविक अस्तित्व लहर का नहीं है वरन् महासागर का है ।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने जीवन के सभी पक्षों को लेकर समाज, धर्म, देश आदि अनेक विषयों पर अपने भावों को व्यक्त किया है।
Dharamshashtra Aur Jatiyon Ka Sach by Shashi Shekhar Sharma
भारत की आर्ष-परंपरा के बारे में औपनिवेशिक काल से लेकर अब तक एक विशेष विचार का सृजन एवं पोषण किया गया है, जिसके अनुसार भारतीय समाज हजारों सालों से विभिन्न जातियों में बँटा हुआ था और ये जातियाँ एक-दूसरे को घृणा तथा हेयदृष्टि से देखती थीं। इसका कारण यह बताया गया कि ‘मनुस्मृति’ जैसी रचनाओं के कारण ही भारत में जाति प्रथा का सृजन हुआ और ऐसी रचनाओं के प्रभाव एवं दबाव के कारण ही आज तक भारत में जातियाँ प्रचलन में हैं।
अंग्रेजों को जातियों को कलुषित करने से कई लाभ थे। वे भारतीय समाज को विखंडित कर सकते थे। दूसरे, भारतीय सृजन-परंपरा के मूल स्वरूप को ही भ्रष्ट कर सकते थे। यह वैचारिक स्थिति स्वतंत्रता तक आते-आते इतनी प्रबल हो गई कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत के ऐतिहासिक लेखन एवं समाजशास्त्रीय लेखन ने औपनिवेशिक चर्चा को ही आदर्श मान उसका अंधानुकरण किया और ‘मूल रचनाओं एवं कृतियों’ तथा वास्तविक अवस्था का सांगोपांग अध्ययन करना आवश्यक ही नहीं समझा।
प्रस्तुत पुस्तक में प्राचीन भारतीय मामलों के विद्वानों के एकपक्षीय और मनपसंद विषय, मनु के सिद्धांतों पर वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करने का गंभीर प्रयास किया गया है और यह भी स्पष्ट किया गया है कि कैसे अंग्रेज विद्वानों ने धर्म को कानून तथा धर्मशास्त्र के ग्रंथों को हिंदुओं का कानून बना दिया; और कैसे यह विचार-परंपरा अभी भी बलवान है।
Dharamveer Bharti Ki Lokpriya Kahaniyan by dharamveer Bharti
‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना?’’
‘‘सुई हेरानी।’’
‘‘सुई लैके का करबे?’’
‘‘कंथा सीबै!’’
‘‘कंथा सीके का करबे?’’
‘‘लकड़ी लाबै!’’
‘‘लकड़ी लाय के का करबे?’’
‘‘भात पकइबे!’’
‘‘भात पकाय के का करबे?’’
‘‘भात खाबै!’’
‘‘भात के बदले लात खाबे।’’
और इससे पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती। उसकी कुहनियाँ और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रुलाई रोकती।
बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को! मार डाला कुबड़ी को!’’
—इसी पुस्तक से
साहित्य एवं पत्रकारिता को नए प्रतिमान देनेवाले प्रसिद्ध साहित्यकार एवं संपादक श्री धर्मवीर भारती के लेखन ने सामान्य जन के हृदय को स्पर्श किया। उनकी कहानियाँ मर्मस्पर्शी, संवेदनशील तथा पठनीयता से भरपूर हैं। प्रस्तुत है उनकी ऐसी कहानियाँ, जिन्होंने पाठकों में अपार लोकप्रियता अर्जित की।
Dharma Aur Vigyan by Dr. Hariprasad Somani
भारतीय संस्कार, रीति-रिवाज, परंपराएँ, प्रथाएँ एवं धार्मिक कृत्य शास्त्रीय हैं या ऐसा कहें कि अपना धर्म और शास्त्र एक ही सिक्के के दो बाजू हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अपने ऋषियों और प्राचीन काल के निष्णात गुरुओं ने अपनी अंतरात्मा की अनंत गहराई में उतरकर चेतना का जाग्रत् आनंद लिया था। अपने अंतर्ज्ञान के अनुभव और आध्यात्मिक परंपराओं को संस्कार एवं संस्कृति के रूप में उन्होंने जनमानस में वितरित किया। परंपराएँ तो चलती जा रही हैं, किंतु इनके मूल ज्ञान और मूल आधार से हम अनभिज्ञ होते जा रहे हैं। भारतीयों को गुलामी झेलनी पड़ी। विशेष करके मुगलों के शासन काल में काफी धार्मिक अत्याचार सहने पड़े। हिंदुओं को धर्म-परिवर्तन के लिए बाध्य किया जाने लगा। इसलिए उस समय के धार्मिक गुरुओं ने अपनी संस्कृति बचाने के लिए हर कर्म को धार्मिक रूप दे दिया, जिससे धर्म के नाम पर ही सही, जो संस्कार ऋषि-मुनियों ने दिए थे, उन्हें हमारे पूर्वज अपनाकर, अपनी धरोहर मानकर, सँजोकर रखने में सफल रहे। समय के साथ इन प्रथाओं ने धार्मिक विधि का रूप ले लिया और बिना कुछ सोचे-समझे ही धर्म की आज्ञा मानकर ये रीतियाँ चलती रहीं। किंतु आज की युवा पीढ़ी हर कर्म, विधि या संस्कार को मानने से पूर्व इसके पीछे क्या कारण है, यह जानने को उत्सुक है।
हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराओं और प्रथाओं को वैज्ञानिकता के आधार पर प्रमाणित करती पठनीय पुस्तक।
Dharmakshetre Kurukshetre by Vishwas Dandekar
महाभारत पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं। यहाँ तक कि उसके पात्रों पर भी स्वतंत्र और विपुल लेखन उपलब्ध है। काव्य, महाकाव्य, उपन्यास, नाटक आदि विधाओं में रचित इन पुस्तकों में अभ्यासकों, टीकाकारों, साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से पात्रों एवं घटनाओं को रेखांकित करने का प्रयास किया है, जिसे पढ़कर जन-मानस में श्रीकृष्ण इस ‘व्यक्तिरेखा’ के विषय में एक आम धारणा बनती है, जो अंततः उन्हें ‘पूर्णावतार’ के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होती है। लेकिन वास्तव में कैसे रहे होंगे श्रीकृष्ण! क्यों जरूरी रही होगी उन्हें पांडवों के साथ मित्रता? चिंतन-मनन की कसौटी पर कितनी खरी उतरती है ‘विराट्-स्वरूप’ की अवधारणा! क्या केवल प्रेम-पत्र पढ़कर रुक्मिणी-हरण के लिए दौड़ पड़े होंगे कृष्ण द्वारका से विदर्भ के कुंडिणपुर या ‘गणतंत्र’ की सुरक्षा से संबंधित कोई राजनीतिक कारण भी रहा होगा? वे कौन से निर्णय, कार्य तथा पराक्रम थे, जिनके कारण वसुदेव देवकी-नंदन ‘कृष्ण’ कालचक्र के साथ गुरुतर होते हुए क्रमशः महापुरुष, महामानव, अवतारपुरुष और अंततः पूर्णावतार कहलाए!
‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ में प्रस्तुत है श्रीकृष्ण के महिमामंडन, चमत्कार आदि को दरकिनार करके ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजता, उनके व्यक्तित्व का तर्कसंगत विश्लेषण करता हुआ उपन्यास।
Dharmon Ki Kataar Mein Islam by Arun Bhole
इसलामी आतंकवाद की दहशत न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के विध्वंस के साथ ही सारी दुनिया में फैल गई थी। उसके कुछ समय बाद भारत में जब नृशंस गोधरा कांड और उग्र गुजरात दंगे हुए, तो लेखक देश और दुनिया के लिए दुश्चिंताओं से ग्रस्त हो गया। उसके गहन इतिहास-बोध और दीर्घकालीन राजनीतिक अनुभव के साथ घटनाओं के घात-प्रतिघात ने जिन विचारों को जन्म दिया, वे ही घनीभूत होकर ‘धर्मों की कतार में इसलाम’ नामक पुस्तक बन गई। जैसा कि पुस्तक के नाम से झलकता है, विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए यह इसलाम के स्वरूप, स्वभाव और उसकी सृजित समस्याओं पर विशेष प्रकाश डालता है।
‘धर्मों की कतार में इसलाम’ में इस बात पर बल दिया गया है कि भारतीय मूल के मुसलमानों का इतिहास सिर्फ हजार-पाँच सौ साल ही पुराना नहीं माना जाएगा, जब से वे लोग मुसलमान बनाए गए या बने थे। उन्हें अपने पूर्वकालीन पुरखों के इतिहास से भी खुद को जोड़ना चाहिए और इस अति प्राचीन देश की शानदार सभ्यता-संस्कृति पर समान रूप से गर्व करना चाहिए। वर्तमान भारत में गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी गंभीर समस्याएँ केवल मुसलिम समाज तक ही सीमित नहीं, बल्कि सारे देशवासी इनसे परेशान हैं। इसलिए मुसलमानों के लिए भी ऐसे सार्वजनिक और राष्ट्रीय महत्त्व की समस्याओं पर एक मुसलमान के बजाय एक हिंदुस्तानी के नाते विचार और यत्न करना लाभदायक होगा।
इसलाम को सही रूप में जानने-समझने के लिए एक जरूरी पुस्तक।
Dheeraj Ka Jadu by Sirshree
धीरज के जादू से जुबान, कान, आँख, नाक और हाथ सब असली खुशी पाने का साधन बन जाते हैं। बिना धीरज यही इंद्रियाँ रोग और विकार का कारण बन जाती हैं। जैसे…
जुबान – धीरज = साँप का जहर, गाली, बद्दुआ।
जुबान + धीरज = विकास की सीढ़ी, रिश्तों में मिठास
कान – धीरज = युद्ध का मैदान, शोर
कान + धीरज = सत्य श्रवण का द्वार
आँख – धीरज = माया का विज्ञापन
आँख + धीरज = करुणा की लहरों का महासागर
नाक – धीरज = डर, यम का बैल, कम साँसें
नाक + धीरज = प्राणायाम, लंबा स्वस्थ जीवन
हाथ – धीरज = पाप कर्म
हाथ + धीरज = महानिर्वाण निर्माण का साधन
धीरज में ताकत है, धीरज में जादू है। धीरज निरंतर प्रयास है, प्रहार है, जो हर मुसीबत से आपको निकाल सकता है। हर कार्य के साथ यदि धीरज जुड़ जाए तो जीवन सीधा, सहज, सरल बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि आप धीरज पाने के लिए धीरज के साथ प्रयत्नशील रहें।
कुछ नहीं करना, केवल इंतजार करना धीरज नहीं है। तो सवाल आ सकता है कि यह कैसे करें? जवाब बिल्कुल आसान है। इसके लिए आपको केवल यह पुस्तक पढ़कर इसमें दिए गए मार्गदर्शन को अपने दैनिक जीवन में उतारना है। www.watchwaitandwonder.com यानी थोड़ा देखें, थोड़ा इंतजार करें, मगर आश्चर्य के साथ!
Dhoop Ka Tukara Tera Hai by Shikha Gupta
कविता वही है, जो अपने सारे अर्थ खोले और फिर एक मौके पर कवि चुप हो जाए और पाठक बोले। कवयित्री आत्ममुग्धा चंचल नदी की तरह लिखती हैं। वह हमारे रास्ते में आनेवाली ऐसी मुश्किलों से घबराते हुए लोगों को संबल देती हैं, जो हर मोड़ पर घबराते हुए सौ-सौ बल खाने लगते हैं। हमारे जीवन की रातें कैसे हवा के परों पर सवार होकर पँखुडि़यों की सरगम पर राग-अनुराग सुनाती हैं और फिर सोचती हैं कि किस विधि मन की बात लिखूँ! सामाजिक सरोकारों से उपजे आवेगों का कवितांतरण करने में कवयित्री देर नहीं लगातीं। गली के मोड़ पर लहराता इश्तहार देखकर वह बाजार और विज्ञापन के जहर को रोकना चाहती हैं। आधुनिक समाज में वृद्धों की उपेक्षा और अपमान देखकर उनका मन भीगता है और आँखें रिसने लगती हैं। कविता को उस अवसान के द्वार पर भी देखा जाए। शब्दों की आग को परखा जाए और उस कैनवस में इरादों की कालिख हटाकर आँखों की लाली से कुछ और ऐसा कहा जाए, जो कुंठाओं के मकड़जाल से मुक्त करे। इतिहास, पुराण, प्रकृति, हवा, प्रतीक्षा और कहना है, उसी लक्ष्मण रेखा के अंदर, जिसको हम कहते हैं-रचना-प्रक्रिया। शिखाजी की कविताओं में संबंधों के ऐसे बुने-अधबुने नाजुक रेशे हैं, जो शायद पाठकों के पास भी हों, फिर भी कवयित्री आपको आपकी ही सौगात सौंप रही है। ऐसी कविताएँ, जो पाठकों के मन-प्राण को आह्लादित करेंगी।
Dhukani Evam Anya Kahaniyan by Neeraj Neer
नीरज नीर ने कुछ ही समयावधि में एक संभावनाशील कथाकार के रूप में अपनी पुख्ता पहचान बना ली है। उनका यह पहला कथा-संग्रह इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि उनके पास कहने को भी बहुत कुछ है और कहने की भंगिमा भी। दरअसल लेखक की परख इस बात से भी होती है कि वह किन चीजों को कहाँ से देख रहा है। इस मामले में नीरज नीर की पोजिशनिंग बिल्कुल स्पष्ट है। तकरीबन सभी पात्र निम्नवर्गीय या निम्नमध्यवर्गीय हैं, जिनके हर्ष-विषाद, संबंधों के घात-प्रतिघात, सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने से उनके संघर्ष की कल्पना होती है, जैसे हर चरित्र असीम दुःख के पहाड़ को पूरी ताकत के साथ ठेलने की कोशिश कर रहा है और इस कोशिश में लहूलुहान हो रहा है। इन कहानियों में कथ्य की वैविध्यता अपने ऐश्वर्य के साथ मौजूद है। नीरज नीर की कहानियों की डिटेलिंग कभी-कभी चमत्कृत कर देती है कि लेखक अपने पात्रों के जीवन तल में कितने गहरे उतरा है और पाठक को भी हाथ पकड़कर उन गहराइयों में ले जाने को बाध्य भी करता है। नीरज नीर न तो जटिल शिल्प के आग्रही हैं और न ही अलंकृत भाषा की चकाचौंध के। बिल्कुल उनकी कहानियों के चरित्रों की तरह सादगी ही शिल्प है और जीवन की तरह प्रवाहमयी भाषा-निर्द्वंद्व, झलमल, यथानाम नीर की तरह बहती हुई।
—पंकज मित्र
सुप्रसिद्ध कथाकार
Dhyan : Kaise Aur Kyon Karen? by Sirshree
हर सुबह ईश्वर से प्रार्थना करो, ताकि आपका पूरा दिन आराम से कटे तथा हर दिन ध्यान करो, ताकि आपके साथ रहनेवाले लोगों का दिन आराम से बीते। सच्ची शांति में ही पूर्ण आराम है। कुंभकरण का आराम आलस है, रावण का आराम युद्ध की तैयारी है, लेकिन राम का आराम समाधि है। सच्चा आराम भीतर का राम है, आपके अंदर प्रकट होनेवाला स्व-अनुभव है। जब हम खुली आँखों से आराम करना सीखकर स्व-अनुभव में स्थापित होते हैं, तब उसे आरामा अवतार-मौन की मंजिल कहते हैं।
अपनी आँखें सदा खुली रखने के लिए कुछ देर आँखें बंद रखने की कला सीखें। हर रात लोग अपनी आँखें बंद करते हैं, लेकिन यह कला नहीं है। आँखें बंद करने की कला को ध्यान-सच्चा आराम कहते हैं।
दूसरों की आँखें खोलने के चक्कर में लोग अंधे बन जाते हैं। अंदर की आँखें खुलने यानी ज्ञान के अंधे की दृष्टि लौटाने के लिए ध्यान की दीक्षा-स्वदर्शन जरूरी है।
स्व का दर्शन करने, ध्यान में दीक्षित होने की इच्छा जगाने और ध्यान को अपने जीवन का हिस्सा बनाने के लिए अपनी बाहरी आँखें कुछ समय बंद रखने की तैयारी रखें, ताकि पढ़ते-पढ़ते ध्यान लग जाए, कम-से-कम आपका।
Diabetes Prashnottari by Ashok Jhingan
हालांकि डायबिटीज एक पुरानी बीमारी है, लेकिन वर्तमान समय में मानव की व्यस्त जिंदगी, औद्योगिकीकरण के कारण पैदा होनेवाले प्रदूषण एवं खान-पान पर नियंत्रण न रहने के कारण यह रोग भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में व्यापक रूप से फैल रहा है । इसके रोगियों की संख्या गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है । इस जटिल रोग की जानकारी अधिकांश लोगों को नहीं है ।
डायबिटीज के विशेषज्ञ डॉ. ए.के. झिंगन द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में लिखी इस पुस्तक में डायबिटीज रोग पर सरल व सहज भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । लेखक द्वारा विस्तृत रूप से बताया गया है कि व्यायाम, आसन, प्राणायाम, सैर, प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर आदि पद्धतियों के द्वारा डायबिटीज पर नियंत्रण किया जा सकता है। विशेष बात यह कि डायबिटीज से पीड़ित स्त्री-पुरुषों को इलाज के साथ- साथ इससे बचने के उपायों एवं सावधानियों पर विशेष जोर दिया गया है । इस विषय पर अपने आप में यह एक संपूर्ण पुस्तक है ।
डायबिटीज से पीड़ित कोई भी रोगी इस पुस्तक के माध्यम से व्यापक व विस्तृत जानकारी प्राप्त कर स्वयं ही अपना डॉक्टर बन सकता ‘है और इस रोग से दूर रहने के साथ ही अपनी चिकित्सा भी कर सकता है ।
Diabetes Upchar Ke 101 Tips by Dr. Anil Chaturvedi
प्रस्तुत पुस्तक में मधुमेह की आशंका वाले लोगों के साथ-साथ उन लोगों के भी प्रश्नों का गंभीरता से जवाब देने का प्रयास किया गया है, जो मधुमेह से पीड़ित हैं और जिनकी हालत बिगड़ती जा रही है। ये सलाहें इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ मिलकर किए गए व्यापक शोध पर आधारित हैं, ताकि ये उपयोगी, तार्किक और प्रभावशाली हो सकें। इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार लिखा गया है, क्योंकि मधुमेह पर बाजार में उपलब्ध अधिकतर पुस्तकें आयातित सामग्री पर आधारित होती हैं और भारतीय परिस्थितियों के अनुसार उनके सुझाव अपनाने में गलतफहमी होती रहती है।
मधुमेह एक स्थायी समस्या है; लेकिन प्रबुद्ध लेखक डॉ. अनिल चतुर्वेदी ने ऐसे तरीके निकाले हैं, जिनसे बड़ी सरलता से आसान उपायों के जरिए बड़ी संख्या में रोगी लाभ उठा सकें। उन्होंने तीन अलग-अलग आधारों पर मधुमेह से निपटने के तरीके खोजे हैं और इनका मिश्रण कारगर ढंग से रोग से निपटने में मददगार हो सकता है।
मधुमेह के रोग से बचाव व उपचार के अत्यंत सर्वसुलभ व सहज व्यावहारिक और कारगर 101 तरीके बतानेवाली प्रामाणिक पुस्तक।
Diary Of My Love by Deesha Sangani
अगर आपका दिल धड़कता है, तो आप अब भी सपने देख सकते हैं। अनुष्का युवा है, उत्साह और उमंग से भरी है, जिसने अपने लक्ष्य निश्चित कर लिये हैं। अपने सपनों को सच करते हुए उसने अभी-अभी कॉरपोरेट जगत् में कदम रखा है। जीवन शानदार लग रहा है।
नौकरी के पहले ही दिन आयुष की मुलाकात अनुष्का से होती है और उसमें एक तरंग सी दौड़ने लगती है। अनायास ही अनुष्का से हुई बातचीत मन में ऐसी भावनाएँ जगाती है, जिनका एहसास उसे बरसों से नहीं हुआ था।
वह एकदम परफेक्ट लगती है।
पर क्या जीवन में कुछ भी परफेक्ट होता है?
चार साल बाद जब दोनों फिर से मिलते हैं, तो उनके दिल टूट चुके होते हैं और प्यार करने की इच्छा खत्म हो चुकी है। दोनों एक-दूसरे के दिल का दर्द दूर करते हैं और अपने-अपने सपनों को सच करने में मदद करते हैं। आखिर में जब दोनों अपने और एक-दूसरे के लिए जीने लगते हैं, तब जिंदगी एक क्रूर खेल खेलती है।
अनुष्का की डायरी ही उसकी सच्ची साथी है, जिसके पन्नों में ऐसे राज दफन हैं, जिन्हें कोई कभी नहीं जान पाएगा। आइए, भावनाओं के इस उतार-चढ़ाव भरे सफर में आयुष और अनुष्का के साथ चलें तथा उन रहस्यों को जानें, जिन्हें अनुष्का ने ‘डायरी ऑफ माई लव’ में दफन कर रखा है।
Diet Doctor by Ishi Khosla
‘डाइट डॉक्टर’ आपको वजन घटाने की इस यात्रा के सभी चरणों से ले जाती है और वह सारी जानकारी देती है, जो कोई अनुभवी पोषण विज्ञानी आपके मामले की जाँच करते हुए, आपके लिए डाइट प्लान करने में प्रयुक्त करता। इस पुस्तक का दर्शन यही है कि आप भोजन व अपने शरीर पर उसके प्रभावों को समझें और फिर स्वयं को स्वस्थ खानपान की ओर जाने के लिए प्रशिक्षित करें, तो यहाँ आपको विज्ञान की जानकारी भी मिलेगी, जिसे आप आसानी से समझ सकेंगे। अपनी डाइट की योजना बनाने का पहला चरण यही है कि आप तथ्यों को जानें और यह पुस्तक आपको वह सब बताती है, जो आपको जानना चाहिए।
यदि आप आसानी से वैज्ञानिकता के आधार पर अपना वजन घटाना चाहते हैं तो यह पुस्तक ‘आपका डाइट डॉक्टर’ अवश्य पढ़ें। उसके आधार पर आप अपनी डाइट प्लान कर सकते हैं कि नाश्ता, लंच और डिनर में आपको क्या-कितना खाना है। इसमें दी गई स्वादिष्ट व्यंजन विधियाँ आपको खाने का भरपूर आनंद तो देंगी, पर आपके वजन को नियंत्रण में रखेंगी।
डाइट कंट्रोल द्वारा वेट कंट्रोल के व्यावहारिक गुर बताती प्रसिद्ध न्यूट्रिशनिस्ट इशी खोसला की पठनीय पुस्तक।
Digital India by Ajay Kumar
नई तकनीक आती है तो पुरानी तकनीक उसके सामने टिक नहीं पाती। बाबर की सेना बंदूक लेकर आई तो भारत के सैनिक लाठी-भाला लेकर उनके सामने नहीं टिक सके। अंग्रेज तोप लेकर आए तो मुगलों की बंदूक उनके सामने नहीं टिक सकी। नई तकनीक के सामने पुरानी तकनीक पर आधारित रोजगार भी खतरे में पड़ जाते हैं।
प्रारंभ में भारत में कंप्यूटर का काफी विरोध हुआ। कहा गया कि इससे रोजगार घटेंगे, लेकिन कंप्यूटर तमाम नए तरह के रोजगार पैदा करने का साधन बना। यह सही है कि पुरानी तकनीक आधारित रोजगारों को बचाने की मुहिम दुनिया भर में चलती रहती है। अकसर सरकारें भी ऐसी कोशिशों में लगी रहती हैं लेकिन इसका नतीजा अकसर अर्थव्यवस्था पर बोझ बनकर सामने आता है।
डिजिटल दुनिया हर पल और हर दिन बदल रही है। इससे जुड़े संदर्भ, डाटा और सूचनाएँ कभी भी पुरानी पड़ सकती हैं। इसलिए पुस्तक में दिए गए संदर्भ, डाटा और सूचनाओं को बदलते संकेतक के रूप में देखा जाना चाहिए।
डिजिटल तकनीक आधारित कंप्यूटर और मोबाइल समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के साथ जीवनशैली को भी तेजी से बदल रहे हैं। इस बदलाव से आम और खास सभी प्रभावित हैं। बदलाव की इसी गति और प्रवृत्ति को इस पुस्तक में देखने की कोशिश की गई है, जो सुहृद पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
Dil Raazi Ishqbaazi by Anuj Tiwari
क्या जिंदगी के नियमों और शर्तों के बाद भी आप उसे आसानी से गुजार सकते हैं? या उसकी वैधानिक चेतावनियों के बावजूद खुलकर सपने देख सकते हैं और उसे पूरी तरह जी सकते हैं?
यह उपन्यास एक ऐसी युवा जोड़ी की कहानी है जो मानती है कि जीवन में कोई रिप्ले या रिवाइंड बटन नहीं होता।
अनुज ने कभी सोचा भी नहीं था कि उस जिंदादिल पाखी के लिए उसके एहसास एक दिन उसकी कल्पना से परे परवान चढ़ेंगे जो प्यार में यकीन तक नहीं करती थी। अभी सबकुछ ठीक होता दिख रहा था कि हमेशा की तरह जिंदगी उनके मंसूबों पर पानी फेरने लगती है। आसान शब्दों में यह कहानी हमें परिवार, भरोसा, समर्पण और दोस्ती के महत्त्व को बताती है।
‘किसी से प्यार करना मुश्किल नहीं, मगर सच्चा साहस सदा के लिए उसका हो जाने में है।’
Dilli Chalo by Renu Saini
माँ भारत के सपूत नेताजी सुभाषचंद्र बोस का दिव्य व्यतित्व एक दीपक नहीं, बल्कि एक सूरज बनकर हम सबके जीवन को प्रकाशमान कर रहा है। उन्होंने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा व अस्तित्व को देश पर न्योछावर करने का प्रण कर लिया था। अनेक अत्याचार और बाधाओं के बावजूद उन्होंने अपने आप को कमजोर नहीं पड़ने दिया, बल्कि अपनी अद्भुत जिजीविषा का परिचय देकर अपनी अप्रतिम संगठन शति का परिचय दिया। सुभाषचंद्र बोस के जीवन का केवल एक लक्ष्य था—आजादी। उन्होंने हर एक भारतीय से कहा, ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’ सुभाषचंद्र बोस बड़े-से-बड़े जोखिम से टकर लेते थे, योंकि वे इस बात को जानते थे कि बिना जोखिम की सफलता ऐसी विजय की तरह है, जिसमें गौरव न हो।
सुभाषचंद्र बोस के अचल विश्वास और कार्यों ने संपूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था। उस समय सुभाषचंद्र बोस का अस्तित्व ही ब्रिटिशों के लिए खतरे की घंटी बन गया था। उन्हें ज्ञात हो गया था कि सुभाषचंद्र बोस अब भारत में उनके साम्राज्य को अधिक दिनों तक न रहने देंगे; और हुआ भी यही। सुभाषचंद्र बोस ने अपना संपूर्ण जीवन भारतमाता के चरणों में समर्पित कर दिया।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रेरणाप्रद जीवन, उनकी दूरदर्शिता, संगठनात्मक कौशल व कूटनीति को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत करती है यह पठनीय पुस्तक।
Dinosaur by Vinod Kumar Mishra
डायनासोर—विनोद कुमार मिश्र
संसार के विलुप्त प्राणी डायनासोर के बारे में अब तक की गई खोजें दरशाती हैं कि पृथ्वी पर अलग-अलग प्रकार के प्राणियों का आधिपत्य रहा है। प्रकृति के कोप की विभिन्न मुद्राएँ भी सामने आई हैं—उल्काओं का गिरना, समुद्री तल का कभी ऊपर आ जाना तो कभी नीचे चला जाना, भयानक बाढ़, सुनामी आदि। डायनासोर अकेले प्राणी नहीं हैं, जो विलुप्त हुए। ऐसे और भी प्राणी होंगे। आगे होनेवाले अनुसंधानों में उनके बारे में भी अद्भुतजानकारियों का पिटारा खुलेगा।
डायनासोर पर अनुसंधान अभी चल रहा है। आगे इसमें और रोचक मोड़ आएँगे। अब तक के अनुसंधानों पर आधारित हिंदी में यह सचित्र पुस्तक पाठकों की इससे संबंधित जानकारी में पर्याप्त वृद्धि करेगी।
अभी भी डायनासोर के नए-नए जीवाश्म तलाशे जा रहे हैं। उन पर नई-नई मान्यताएँ सामने आ रही हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि हिंदी में संभवत: यह इस विषय पर पहली पुस्तक तो है, पर अंतिम नहीं है।
बच्चों ही नहीं, सभी आयु वर्ग के पाठकों में डायनासोर के बारे में जानने की अधिक जिज्ञासा रहती है। आशा है, यह पुस्तक अपने इस उद्देश्य को अवश्य पूरा करेगी।
Dishaheen by Suryabala
दिशाहीन—सूर्यबाला
सर ‘करेक्ट’ बोलकर होंठों के कोनों में हलके से मुसकराते हुए ब्लैकबोर्ड की ओर मुड़ गए, लेकिन बोलने के साथ ही जबरदस्ती दबाई जानेवाली हँसी का धीमा फौवारा पीछे से छूटा था। यह मेरे द्वारा अंग्रेजी शब्दों के कस्बाई उच्चारण पर था। दबे शब्दों में मेरे उच्चारण की नकल की जा रही थी—जैसे नॉट को नाट, स्केल को इस्केल आदि।
क्लास से उठकर जाते हुए एक लड़के से दूसरे को कहते सुना, ‘चील-गोजा।’ मैं एकाएक तिलमिलाता हुआ उस ग्रुप के पास पहुँच गया—‘आप लोग ‘चीलगोजा’ किसे कह रहे थे?’
ग्रुप थोड़ा चौंका, फिर एक लड़का ढिठाई से बोला—चीलगोजा, वो-वो एक ड्राइफ्रूट होता न—उसी को।’
‘चुप रहिए!’ मेरा सारा चेहरा अपमान से दहक रहा था—‘मैं आप लोगों की तरह शान-शौकतवाला अंग्रेज नहीं, गँवार हूँ पर इतना पागल नहीं हूँ।’
‘पागल? कौन आपको पागल कहता है? एक लड़का पुचकारता हुआ पास आ गया—आप तो खाली-पीली में गुस्सा करता—चीलगोजा सच्ची में ड्राइफ्रूट, ओ—क्या कहते हैं मदर टंग में बोल न।’ उसने दूसरे लड़कों को धकियाया।
‘जानता हूँ।’ मैं बात काटकर बोला, ‘इतनी अंग्रेजी मैं भी जानता हूँ—यह भी जानता हूँ कि अपने देश की हिंदी या कोई भी भाषा आप गलत बोलेंगे तो न आपको शर्म आएगी, न सुननेवाले को, लेकिन अगर कोई अंग्रेजी गलत बोल दे तो आप सरेआम मजाक उड़ाने से नहीं चूकते। आप जैसे भारतीय…।’
—इसी संकलन से
बाजार और व्यावसायिकता के सारे दबावों से मुक्त होकर एकनिष्ठ भाव से कलम चलानेवाली सूर्यबाला की ‘दिशाहीन’ कहानी की प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की विडंबना पर बहुत सारे मार्मिक सवाल उठाती हैं।
Dishom Guru Shibu Soren by Anuj Kumar Sinha
शिबू सोरेन यानी गुरुजी यानी दिशोम गुरु झारखंड आंदोलन और झारखंड के सबसे बड़े आदिवासी नेता रहे हैं। उन्होंने झारखंड राज्य के लिए 40 साल से ज्यादा संघर्ष किया। अधिकांश समय जंगलों में रहकर संघर्ष में काटा, आदिवासियों को महाजनों के चंगुल से मुक्ति दिलाई। लेकिन देश उनके इस संघर्ष को नहीं जानता। युवा पीढ़ी को तो पुराने शिबू सोरेन के बारे में जानकारी ही नहीं है। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि देश-दुनिया का परिचय असली शिबू सोरेन से कराया जाए। इसलिए इस पुस्तक में उन घटनाओं और संघर्ष को प्रमुखता से उठाया गया है, जिसे लोग नहीं जानते हैं। पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन कैसे आंदोलन में कूदे, कैसे वे कई बार मौत के मुँह से जाने से बचे, कैसे उन्होंने पारसनाथ की पहाडि़यों की तलहटी में बसे गाँवों में अपना ठिकाना बनाकर आदिवासियों को एकजुट किया— यह सारी जानकारी इस पुस्तक में है। आपातकाल के बाद समर्पण कर जंगल से बाहर आना, जेल जाना, वहाँ से निकलकर बाद में इंदिरा गांधी से मुलाकात करने तक की जानकारी इस पुस्तक में है। शिबू सोरेन के पुराने साथियों को खोज-खोजकर उनसे बात करके जानकारी हासिल की गई। उनके राजनीतिक जीवन का भी विस्तार से जिक्र है। शिबू सोरेन के स्वभाव, उनकी जीवन शैली आदि की भी चर्चा पुस्तक में है। शिबू सोरेन ने कैसे और कब-कब चुनाव लड़ा, कब मंत्री-मुख्यमंत्री बने, कैसे वे संकट में भी फँसे, कैसे वे इससे उबरे, इन सभी बातें की चर्चा पुस्तक में है। इस पुस्तक को पढ़ने से शिबू सोरेन की पूरी जिंदगी, उनके संघर्ष आदि की संपूर्ण जानकारी पाठक को मिल जाए, ऐसा प्रयास रहा है। पुस्तक में कुछ रोमांचक और दुर्लभ तसवीरें इसकी रोचकता को और बढ़ाती है।
Divya Manav Banane Ki Kunji by Bhartendu Prakash Sinhal
यदि जीवन को सार्थक बनाना है, तो जीना सीखना होगा। जब हमें जीना है, तो हमें कर्मशील होना होगा। जब हमें कर्म करना अनिवार्य है, तो हमें हर क्षण अपना रास्ता चुनना होगा। रास्ता कौन सा चुना जाए, उसे आँकने के लिए हमारे पास, हमारे अंतःकरण में कुछ मापदंडों का होना अनिवार्य है कि किन-किन बातों को, किन-किन चीजों को, किन-किन लोगों को हम महत्त्व देते हैं और किनको हम कम महत्त्व देते हैं अथवा कौन हमारे लिए बिल्कुल ही महत्त्वहीन है।
कुछ मौलिक मूल्यों का अंकन करके, उनको अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना ही पड़ेगा। उन मूल्यों को सहजने से ही जीवन रसमय बनेगा, परम सुख का अनुभव होगा तथा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह होगी कि उन मूल्यों को निर्धारित करने के उपरांत अपने दैनिक जीवन में कब, कहाँ, कैसे, क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इसका तत्काल निर्णय लेने की एक अद्भुत क्षमता अपने अंदर विकसित हो जाएगी। यदि उन मूल्यों को, प्रलोभन, भय अथवा आलस्य के कारण छोड़ देते हैं, तो सारा जीवन ही सारहीन, निर्मूल सा बनकर रह जाता है, एक बोझ सा हो जाता है, जिसे ढोना स्वयं में एक अजीब समस्या बन जाती है।
—इसी पुस्तक से
इस पुस्तक में जीवन को संस्कारवान बनाने और उसे सही दिशा में ले जाने के जिन सूत्रों की आवश्यक्ता है, उनका बहुत व्यावहारिक विश्लेषण किया है। लेखक के व्यापक अनुभव से निःसृत इस पुस्तक के विचार मौलिक और आसानी से समझ में आनेवाले हैं।
जीवन को सफल व सार्थक बनाने की प्रैक्टिकल हैंडबुक है यह कृति।
Divya Sambandhon Ka Mahattva by Aruna Ladva
संबंधों को हम किस प्रकार को निभाते हैं, इस विषय को गहराई से व्यक्त करती है यह पुस्तक। क्या हम उनके प्रति मददगार और उदार हैं या स्वार्थवश केवल लाभ उठाते हैं? किस प्रकार हम अपने संबंधों में संतुष्ट और परिणामदर्शी बन सकते हैं? क्या होता है, जब बातें हमारे मुताबिक नहीं होतीं या समस्याओं से हमारा सामना होता है?
जैसे ही मैंने जीवन और संबंधों के प्रति इस पद्धति का अभ्यास किया तो मैंने महसूस किया कि अब मैं दूसरों को कम दोषी ठहराती थी और अपनी प्रतिक्रियाओं व भावनाओं को और भी कारगर तरीके से सँभाल पाती थी। ऐसा करने से छोटी उम्र से ही एक आत्मविश्वास और आंतरिक ज्ञान की भावना पैदा हुई।
यह पुस्तक किसी भी प्रकार से निश्चित मार्ग-प्रदर्शक नहीं है; बल्कि यह मेरे कुछ विचारों, अवलोकनों और अनुभवों का संकलन है, जो मेरी व्यक्तिगत यात्रा में एकत्र हुए हैं। संभवतः इनमें से कुछ आपको अपने जीवन से संबंधित प्रतीत होंगे।
Diwaswapna by Gijubhai
इसी बीच प्रधानाध्यापक एकाएक आए और मुझे टोका, ‘‘देखिए, यहाँ पास में कोई खेल नहीं खेला जा सकता। चाहो, तो दूर उस मैदान में चले जाइए। यहाँ दूसरों को तकलीफ होती है।’’
मैं लड़कों को लेकर मैदान में पहुँचा।
लड़के तो बे-लगाम घोड़ों की तरह उछल-कूद मचा रहे थे। ‘‘खेल! खेल! हाँ, भैया खेल!’’
मैंने कहा, ‘‘कौन सा खेल खेलोगे?’’
एक बोला, ‘‘खो-खो।’’
दूसरा बोला, ‘‘नहीं, कबड्डी।’’
तीसरा कहने लगा, ‘‘नहीं, शेर और पिंजड़े का खेल।’’
चौथा बोला, ‘‘तो हम नहीं खेलते।’’
पाँचवाँ बोला, ‘‘रहने दो इसे, हम तो खेलेंगे।’’
मैंने लड़कों की ये बिगड़ी आदतें देखीं।
मैं बोला, ‘‘देखो भई, हम तो खेलने आए हैं। ‘नहीं’ और ‘हाँ ’ और ‘नहीं खेलते,’ और ‘खेलते हैं,’ करना हो तो चलो, वापस कक्षा में चलें।’’
लड़के बोले, ‘‘नहीं जी, हम तो खेलना चाहते हैं।’’
—इसी पुस्तक से
बाल-मनोविज्ञान और शैक्षिक विचारों को कथा शैली में प्रस्तुत करनेवाले अप्रतिम लेखक गिजुभाई के अध्यापकीय जीवन के अनुभव का सार है यह—‘दिवास्वप्न’।
Diya Nahin To Kya Jiya by N. Raghuraman
बाद में कबीरधाम में मैं 18 वर्षीय ललित यादु से मिला, जो पूरी तरह हिंदी भाषी आबादी के हिसाब से अच्छी अंग्रेजी लिख-बोल लेते हैं। उनके पिता पान की दुकान चलाते हैं और उनके परिवार की आय 150 रुपए प्रतिदिन है। ललित बीए दूसरे वर्ष के छात्र हैं, उनका भाई बीएड कर रहा है और बहन 11वीं में पढ़ती है। वे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में डाटा मॉनिटरिंग असिस्टेंट के रूप में अंशकालिक काम भी करते हैं और हर माह 5 हजार रुपए कमा लेते हैं। वे यूपीएससी परीक्षा की भी तैयारी कर रहे हैं। शाम को वे गरीब बच्चों को सारे विषय निःशुल्क पढ़ाते हैं। चूँकि वे सरकारी स्कूल से पढ़े हैं, जहाँ कई विषयों के लिए अध्यापक नहीं हैं तो उन्हें लगता है कि अपने इलाके के लिए बच्चों की यह कठिनाई दूर करना उनका काम है। वे रोज अपनी बहन और कुछ खास मित्रों के साथ इंग्लिश बोलते हैं, ताकि इस विदेशी भाषा में महारत हासिल हो जाए। उनमें बहुत आत्मविश्वास है और मानते हैं कि वे जीवन में इसलिए आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे अन्य छात्रों को आगे बढ़ने में मदद करते हैं।
—इसी पुस्तक से
सुप्रसिद्ध लेखक एन. रघुरामन की ऐसी तात्कालिक और समसामयिक घटनाओं के प्रसंग लेकर लिखी गई प्रेरक और उत्प्रेरित करनेवाली पुस्तक।
Doctor Mein Kya Karuin by Dr. Binda Singh
तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों को अपना वजूद बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। जीवन की महत्त्वाकांक्षाएँ उफान पर हैं। माता-पिता की बच्चों से और बच्चों की माता-पिता से उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं। पारिवारिक रिश्तों में भावनात्मक सहयोग एवं प्यार की कमी आ गई है। पति-पत्नी के संबंधों में अहं आ गया है। सात जन्मों का रिश्ता सात दिनों का होने लगा है। तलाक की घटनाएँ बढ़ गई हैं। युवा वर्ग एवं किशोर दिग्भ्रमित हो रहे हैं। मानसिक तनाव एवं आत्महत्या की घटनाओं ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया है। भले ही हम इंटरनेट की दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन व्यावहारिक दुनिया से कटते जा रहे हैं। नकारात्मक मनोभाव हमारे मन में घर करते जा रहे हैं। बच्चे, किशोर, युवा, बुजुर्ग सभी के व्यवहार में आक्रामकता आ गई है। धैर्य कम हो गया है। हर व्यक्ति किसी-न-किसी तरह मानसिक रूप से परेशान है। प्रस्तुत पुस्तक में इन बातों को ध्यान में रखकर सरल भाषा में बच्चों, किशोरों, युवा एवं बुजुर्ग को जागरूक करने की कोशिश की गई है कि वे खुद को इतना मजबूत रखें कि छोटी-छोटी परेशानियाँ उन्हें विचलित न कर सकें।
मनोविकारों और मनोरोगों को दूर कर जीवन में सकारात्मक भाव जाग्रत् कर जीने का आनंद उठाने की राह दिखाती पठनीय पुस्तक।
Dogri-Kashmiri Ki Lokpriya Kahaniyan by Gauri Shankar Raina
इस पुस्तक में संकलित विशिष्ट प्रकार रकी डोगरी तथा कश्मीरी कहानियाँ जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र में रहनेवाले लोगों के जीवन, मर्यादाओं, रीतियों और सुख-दुःख का विश्वसनीय चित्रण प्रस्तुत करती हैं । इन कहानियों में आदमी के उस विश्वास की, जो उसे जीवन में चलते रहने की प्रेरणा देता है, जो चित्त को जन्म-मरण और अपने-पराए के प्रश्न से अलग उसकी बेबसी का रहस्य समझने में मदद करता है, अनुगूंज सुनाई देती है।
महासुख की कल्पना करता हुआ व्यक्ति अपने अतीत को कुछ-कुछ सँजोए रखने की कोशिश में निरंतर संघर्षमय रहते हुए भी अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक परंपराओं का कारक है। वही मनुष्य इधर-उधर इन कथाओं में प्रकट होता है।
प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखकों द्वारा रचित डोगरी-कश्मीरी की इन कहानियों के पात्र अपनी जिज्ञासाओं के साथ प्रस्तुत होते हैं तथा अपनी यात्रा की एक मंजिल पाते नजर आते हैं। चाहे वेद राही, पद्मा सचदेव, ओम गोस्वामी, हरिकृष्ण कौल, रतनलाल शांत या अन्य किसी चर्चित लेखक की कहानी हो, जो इस संकलन में शामिल है, पात्रों के अनुभवों और यथार्थों को कथा के स्वभाव के अनुरूप प्रस्तुत करती है तथा इन लेखकों को मोपांसा, चेखव या हेमिंग्वे के समकक्ष खड़ा करती है।
Doha-Vallari by Dinesh Chandra Awasthi
तुम मेरी जिंदगी हो—गोपी,
गोपेचा, गोपेश, गोपीनाथ,
गोपाल राव, गोपाल स्वामी, गोपू।
यह गोपी नाम के एक कुत्ते और उसे गोद लेने वाले प्यारे परिवार की कहानी है। इस किताब में बताया गया है कि कैसे जल्द ही गोपी सफेद फर वाले छोटे से पिल्ले से एक युवा कुत्ते में बदल जाता है। वह अपनी दुनिया से अच्छी तरह परिचित है। उसके आस-पास रहने वाले लोग उसका नाम पुकारें, इससे पहले ही वह उनके मन की बात समझ जाता है।
सुधा मूर्ति की अनूठी शैली में लिखी यह साधारण सी कहानी एक कुत्ते के नजरिए से प्रस्तुत की गई है, जो हमें बताती है कि पालतू जानवर अपने प्यार, समर्पण और असीमित प्यार के कारण ही इतने खास बन जाते हैं।
सुधा मूर्ति की यह पुस्तक हर उम्र के लोगों के लिए है, क्योंकि गोपी बच्चों के साथ-साथ बड़ों के दिलों को भी अपने प्यार से भर देता है।
‘गोपी की डायरी’ बच्चों के लिए लिखी तीन पुस्तकों की शृंखला है।
इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘घर आना’ है।
Dollar Bahoo by Sudha Murthy
श्रीमती सुधा मूर्ति जी कन्नड़ भाषा की लोकप्रिय और प्रतिष्ठित लेखिका हैं । हिंदी में प्रकाशित आपका पहला उपन्यास ‘ महाश्वेता ‘ काफी लोकप्रिय सिद्ध हुआ है । दूसरा उपन्यास ‘ डॉलर बहू ‘ भी इसी प्रकार हिंदी का कंठाभरण बनेगा, ऐसी आशा है ।
शामण्णा जी शिक्षक हैं, जो साधारण परिवार के हैं । गौरम्मा उनकी धर्मप्राण धर्मपत्नी हैं । इनके दो पुत्र हुए-चंद्रशेखर और गिरीश । एक पुत्री भी है सुरभि । चंद्रशेखर को विनुता से प्रेम हो गया, पर उसे अमेरिका जाना पड़ा । इसी बीच छोटे भाई गिरीश से विनुता का विवाह हो जाता है । चंद्रशेखर का विवाह धनाढ्य घर की बेटी जमुना से हुआ । वे दोनों अमेरिका में ही रहने लगे । जमुना को डॉलर से प्रेम था । गौरम्मा भी सर्वगुण- संपन्न विनुता की अपेक्षा जमुना को डॉलर के कारण अधिक चाहती थी ।
फिर गौरम्मा अपने बेटे और बहू के पास अमेरिका चली जाती है । बहुत दिनों तक वहाँ रहने पर गौरम्मा को अपनी डॉलर बहू और डॉलर-प्रेम से नफरत हो जाती है और वह भारत लौट आती है । अब वह विनुता को महत्त्व देना चाहती है, पर गिरीश और विनुता, दोनों घर छोड़कर अलग शहर में रहने लगे थे । इस प्रकार गौरम्मा के लिए यह कहावत चरितार्थ होती है-‘ माया मिली, न राम ‘ ।
भारत लौटकर गौरम्मा कहती है, ‘ मुझे न वह स्वर्ग चाहिए न वह सुख! हमारा वतन सुंदर है; हमारा गाँव है अच्छा !’. .मुझे तो विनुता की याद सता रही है । ‘
इस उपन्यास में भारतीय अस्मिता और स्वाभिमान का पुनरुत्थान है । अमेरिका और डॉलर के चाकचिक्य से निभ्रांति इस उपन्यास का केंद्रीय बिंदु है । चरित्रांकण की मार्मिकता और शिल्प का सौष्ठव इस उपन्यास के अतिरिक्त आकर्षण हैं ।
Door Ke Trol Suhane by Ashutosh Ujjwal
पिछले कई साल से देश वाकई बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है। बहुत सारी अजीबो-गरीब चीजें हुई हैं। नोटबंदी हुई, बीफ बैन हुआ, जस्टिन बीबर आया, जी.एस.टी. आया, स्मॉग आया, प्लास्टिक के चावल आए, फेक न्यूज आई, सर्जिकल स्ट्राइक आई, बिप्लब देब आए और बहुत कुछ आया। उसी सिलसिले में हादसे की तरह यह किताब भी आ गई। इसको आने में देर इसलिए हुई, क्योंकि ऊपर की बाकी सारी चीजों को अपने पन्नों के कंधों पर उठाने की जिम्मेदारी इसी की थी। तो हर खासो आम को ताकीद की जाती है कि वे भावनाओं और भाव-भंगिमाओं के साथ पुस्तक का पाठ करें। इस किताब को लिखने में खुद को छोड़कर किसी भी इनसान, जानवर, पक्षी, कीट-पतंगे को नुकसान नहीं पहुँचाया गया है। भाषा का इतना ज्यादा ध्यान रखा गया है कि इसे आप परिवार के साथ बैठकर पढ़ सकते हैं। रिश्तेदार को गिफ्ट कर सकते हैं। इसके कोई साइड इफेक्ट्स नहीं हैं। हाँ, अभी तक यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड की बेस्ट किताब घोषित नहीं किया है और हम चाहेंगे भी नहीं कि यूनेस्को ऐसी फेक न्यूज को अपनी लिखा-पढ़ी में स्थान दे। किताब में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि फैक्ट्स पूरे सही हों और गप्प पूरी तरह से गप्प, अगर इनमें से कुछ भी मिसिंग लगे या कुछ कहने-सुनने का मन हो तो लेखक को सोशल मीडिया पर खोजकर सिर्फ तारीफ करें। क्योंकि सोशल मीडिया पर गंदगी फैलाने से हमारे प्रधानमंत्री ने मना किया है।
Doordarshi Bharat Ka Swaroop by Engineer Arun Kumar Jain
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से भारत की बागडोर सँभाली है, तब से पूरे देश में इस बात की चर्चा है कि उनके आने के बाद देश में क्या बदलाव आया है? शासन-प्रशासन में कितना परिवर्तन देखने को मिल रहा है तथा लोगों की मानसिकता में किस तरह का बदलाव देखने को मिल रहा है? यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उनकी सरकार का ईमानदारी एवं निष्पक्षता के साथ विश्लेषण किया जाए तो निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि पूरे देश में एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण हुआ है।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों में भरोसा जगाया है। अब लोगों को लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र विश्वगुरु का दर्जा पुनः प्राप्त कर सकता है। जितनी भी जन-कल्याणकारी योजनाएँ लागू हो रही हैं, वे जाति-धर्म एवं क्षेत्रीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर ‘सबका साथ, सबका विकास’ के लिए संकल्पित हैं।
सशक्त-सबल-समर्थ भारत का स्वप्न साकार करने को संकल्पित शासन-प्रणाली का व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत करती एक पठनीय पुस्तक।
‘‘पहले हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न Coloured था, फिर हमारे 11 अशोक रोड मुख्यालय के सचिव अरुण जैन, जो इंजीनियर हैं, वो भी नया-नया अच्छा सोचते हैं, उन्होंने मुझे सुझाया कि हमें Colour Symbol से बाहर आना चाहिए। हमारा चुनाव चिह्न सिंपल ब्लैक एवं व्हाइट होना चाहिए। हमने चुनाव आयोग को लिखा और उन्होंने मान्यता दी। एक बात तो ये है और इसका Credit देना है तो मैं इसका सारा श्रेय अरुण जैन को दूँगा।’’
—नरेंद्र मोदी
Doraha Tatha Anya Kahaniyan by Mamta Mehrotra
कहानियाँ भी शायद हम इनसानी जीवन की तरह हैं। बहुत-कुछ बोल देना चाहती हैं। बस हमें उन्हें सुनने, गढ़ने और महसूस करने की क्षमता होनी चाहिए। कहानी-लेखन का साफल्य तब है, जब पात्र सजीव होकर पाठक से बातचीत करना चाहते हैं। कुछ पात्र आनंदित करते हैं, तो कुछ अंदर तक बहुत गहरे झकझोर देते हैं। कहानियाँ कितनी बार बहुत-कुछ सीख देकर चली जाती हैं और हम विस्मित-से खड़े रह जाते हैं।
कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है, मानो कितने स्वप्न ऐसे ही टूट जाते हैं। उन टूटते हुए स्वप्नों की पुकार, मानो सजीव होकर अनेक कहानियों का केंद्रबिंदु बन जाती हैं। नीर नैन में भटका कहानियों का सृजन करना, एक बेहद संवेदनशील प्रक्रिया है, जिससे हर बार गुजरना अंतःस्थल को परम सृजनकर्ता से जोड़ देता है।
Dr Lohia Aur Unka Jeevan-Darshan by Mukul Kumar
डॉ. राममनोहर लोहिया सही मायने में समाजवादी नेता थे, जो समाज के सबसे कमजोर तबके के व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा में लाकर उसका विकास करने के हिमायती थे। अपने प्रखर चिंतन और विचारशीलता के कारण उनको खूब सम्मान प्राप्त था।
सामान्यत: लोहिया के चिंतक-स्वरूप को पिछड़ी व दबी जातियों को आगे लाने वाले उनके चिंतन तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि विश्व सरकार की अवधारणा, मार्क्स के बाद अर्थशास्त्र और एशियाई देशों में क्रांति के अवरुद्ध होने के कारकों पर लोहिया उसी प्रबलता से विचार करते हैं। मुकुल लिखते हैं—’लोहिया की मुख्य स्थापना पूँजीवादी देशों के मजदूरों और औपनिवेशिक मजदूरों की स्थिति में अंतर को लेकर है। लोहिया की इस स्थापना से गुजरने के बाद ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा भावनात्मक लगने लगता है।’
प्रस्तुत पुस्तक डॉ. लोहिया के बहुआयामी चिंतक-स्वरूप को सहज भाषा में सामने रखती है। नई पीढ़ी के लिए इस पुस्तक से गुजरना उसे एक वैचारिक नवोन्मेष देगा।
Dr. Ambedkar : Aayaam Darshan by Kishor Makwana
भीमराव रामजी आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता एवं करोड़ों शोषित-पीडि़त भारतीयों के मसीहा ही नहीं थे, वे अग्रणी समाज-सुधारक, श्रेष्ठ विचारक, तत्त्वचिंतक, अर्थशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, पत्रकार, धर्म के ज्ञाता, कानून एवं नीति निर्माता और महान् राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने समाज और राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। सामाजिक समता और बंधुता के आधार पर एक नूतन भारत के निर्माण की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व एक विराट् सागर और कृतित्व उत्तुंग हिमालय जैसा था।
विगत अनेक वर्षों से वैचारिक अस्पृश्यता और राजनीतिक स्वार्थ के लगातार बढ़ते जा रहे विस्तार ने हमारे जिन राष्ट्रनायकों के बारे में अनेक भ्रांतियुक्त धारणाओं को जनमानस में मजबूत करने का दूषित प्रयत्न किया है, उनमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर प्रमुख हैं। उन्हें किसी जाति या वर्ग विशेष अथवा दल विशेष तक सीमित कर दिए जाने के कारण सामाजिक समता-समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता की भी अपूरणीय क्षति हो रही है। इस दृष्टि से चार खंडों में उनका व्यक्तित्व-कृतित्व वर्णित है : खंड एक—‘जीवन दर्शन’, खंड दो—‘व्यक्ति दर्शन’, खंड तीन—‘आयाम दर्शन’ और खंड चार ‘राष्ट्र दर्शन’। डॉ. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को समग्रता में प्रस्तुत करने वाला एक ऐसा अनन्य दस्तावेज है, जो उनके बारे में फैले या फैलाए गए सारे भ्रमों का निवारण करने में तो समर्थ है ही, साथ ही उन्हें एक चरम कोटि के दृष्टापुरुष तथा राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्थापित करने में भी पूर्णतः सक्षम है।
Dr. Ambedkar : Jeevan Darshan by Kishor Makwana
भीमराव रामजी आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता एवं करोड़ों शोषित-पीडि़त भारतीयों के मसीहा ही नहीं थे, वे अग्रणी समाज-सुधारक, श्रेष्ठ विचारक, तत्त्वचिंतक, अर्थशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, पत्रकार, धर्म के ज्ञाता, कानून एवं नीति निर्माता और महान् राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने समाज और राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। सामाजिक समता और बंधुता के आधार पर एक नूतन भारत के निर्माण की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व एक विराट् सागर और कृतित्व उत्तुंग हिमालय जैसा था।
विगत अनेक वर्षों से वैचारिक अस्पृश्यता और राजनीतिक स्वार्थ के लगातार बढ़ते जा रहे विस्तार ने हमारे जिन राष्ट्रनायकों के बारे में अनेक भ्रांतियुक्त धारणाओं को जनमानस में मजबूत करने का दूषित प्रयत्न किया है, उनमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर प्रमुख हैं। उन्हें किसी जाति या वर्ग विशेष अथवा दल विशेष तक सीमित कर दिए जाने के कारण सामाजिक समता-समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता की भी अपूरणीय क्षति हो रही है। इस दृष्टि से चार
खंडों में उनका व्यक्तित्व-कृतित्व वर्णित है : खंड एक—‘जीवन दर्शन’, खंड दो—‘व्यक्ति दर्शन’, खंड तीन—‘आयाम दर्शन’ और खंड चार ‘राष्ट्र दर्शन’। डॉ. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को समग्रता में प्रस्तुत करने वाला एक ऐसा अनन्य दस्तावेज है, जो उनके बारे में फैले या फैलाए गए सारे भ्रमों का निवारण करने में तो समर्थ है ही, साथ ही उन्हें एक चरम कोटि के दृष्टापुरुष तथा राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्थापित करने में भी पूर्णतः सक्षम है।
Dr. Ambedkar Atmakatha Evam Jansamvad by Dr. Narendra Jadhav
हर व्यक्ति का अपना जीवनदर्शन होना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति के पास ऐसा मानक होना चाहिए, जिससे वह अपने चरित्र को माप सके। यह दर्शन कुछ और नहीं, चरित्र मापने का एक मानक है। सकारात्मक रूप से मेरे सामाजिक दर्शन को मात्र तीन शब्दों में बतलाया जा सकता है :स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व। मेरे दर्शन का आधार धर्म में है, राजनीति विज्ञान में नहीं। मैंने इसे महात्मा बुद्ध के उपदेशों से लिया है। उन्हें मैं अपना गुरु मानता हूँ। उनके दर्शन में स्वतंत्रता तथा समानता का अपना एक स्थान है; लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि असीमित स्वतंत्रता समानता को नष्ट कर देती है तथा पूर्ण समानता से स्वतंत्रता का हनन होता है।
—इसी पुस्तक से
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एक राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें मात्र दलित नेता कहना, उनकी विद्वत्ता, जनआंदोलनों, सरकार में उनकी भूमिका के साथ न्याय नहीं होगा। युगों पुरानी जाति आधारित अन्यायपूर्ण और भेदभावकारी समाज में सामाजिक समानता और सांस्कृतिक एकता के जरिए लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का उनका व्यापक दृष्टिकोण जगजाहिर है। मानवाधिकारों के राष्ट्रवादी और साहसी नेता के रूप में उनके भाषणों में आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को जगाने के लिए उनके जीवनपर्यंत समर्पण की झलक मिलती है।
प्रखर मानववादी डॉ. आंबेडकर के संपूर्ण जीवनदर्शन और प्रेरणाप्रद व्यक्तित्व का दिग्दर्शन कराते उनके भाषणों का पठनीय संकलन।
Dr. Ambedkar Rajneeti, Dharm Aur Samvidhan Vichar by Narendra Jadhav
भारत में लोकतंत्र है या नहीं है, सच क्या है? जब तक लोकतंत्र को गणराज्य से जोड़ने या लोकतंत्र को संसदीय सरकार से जोड़ने से पैदा हुई गलत फहमी दूर नहीं हो जाती, इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा सकता। भारतीय समाज व्यक्तियों से नहीं बना है। यह असंख्य जातियों के संग्रहण से बना है, जिनकी अलगअलग जीवनशैली है और जिनका कोई साझा अनुभव नहीं है तथा न ही आपस में लगाव या सहानुभूति है। इस तथ्य को देखते हुए इस बिंदु पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। समाज में जातिव्यवस्था समाज में उन आदर्शों की स्थापना तथा लोकतंत्र की राह में अवरोध है।
—इसी संग्रह से
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एक राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें मात्र दलित नेता कहना, उनकी विद्वत्ता, जनआंदोलनों, सरकार में उनकी भूमिका के साथ न्याय नहीं होगा। युगों पुरानी जाति आधारित अन्यायपूर्ण और भेदभावकारी समाज में सामाजिक समानता और सांस्कृतिक एकता के जरिए लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का उनका व्यापक दृष्टिकोण जगजाहिर है। मानवाधिकारों के राष्ट्रवादी और साहसी नेता के रूप में उनके भाषणों में आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को जगाने के लिए उनके जीवनपर्यंत समर्पण की झलक मिलती है। लोकतंत्र के प्रबल हिमायती डॉ. भीमराव आंबेडकर के लोकतंत्र, राजसत्ता तथा शासनप्रशासन के विषय में दिए पथप्रदर्शन करनेवाले भाषणों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकलन।
Dr. Ambedkar_Rashtra Darshan by kishor Makwana
भीमराव रामजी आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता एवं करोड़ों शोषित-पीडि़त भारतीयों के मसीहा ही नहीं थे, वे अग्रणी समाज-सुधारक, श्रेष्ठ विचारक, तत्त्वचिंतक, अर्थशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, पत्रकार, धर्म के ज्ञाता, कानून एवं नीति निर्माता और महान् राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने समाज और राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। सामाजिक समता और बंधुता के आधार पर एक नूतन भारत के निर्माण की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व एक विराट् सागर और कृतित्व उत्तुंग हिमालय जैसा था।
विगत अनेक वर्षों से वैचारिक अस्पृश्यता और राजनीतिक स्वार्थ के लगातार बढ़ते जा रहे विस्तार ने हमारे जिन राष्ट्रनायकों के बारे में अनेक भ्रांतियुक्त धारणाओं को जनमानस में मजबूत करने का दूषित प्रयत्न किया है, उनमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर प्रमुख हैं। उन्हें किसी जाति या वर्ग विशेष अथवा दल विशेष तक सीमित कर दिए जाने के कारण सामाजिक समता-समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता की भी अपूरणीय क्षति हो रही है। इस दृष्टि से चार
खंडों में उनका व्यक्तित्व-कृतित्व वर्णित है : खंड एक—‘जीवन दर्शन’, खंड दो—‘व्यक्ति दर्शन’, खंड तीन—‘आयाम दर्शन’ और खंड चार ‘राष्ट्र दर्शन’। डॉ. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को समग्रता में प्रस्तुत करने वाला एक ऐसा अनन्य दस्तावेज है, जो उनके बारे में फैले या फैलाए गए सारे भ्रमों का निवारण करने में तो समर्थ है ही, साथ ही उन्हें एक चरम कोटि के दृष्टापुरुष तथा राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्थापित करने में भी पूर्णतः सक्षम है।
Dr. Ambedkar: Vyakti Darshan by Kishor Makwana
भीमराव रामजी आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता एवं करोड़ों शोषित-पीडि़त भारतीयों के मसीहा ही नहीं थे, वे अग्रणी समाज-सुधारक, श्रेष्ठ विचारक, तत्त्वचिंतक, अर्थशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, पत्रकार, धर्म के ज्ञाता, कानून एवं नीति निर्माता और महान् राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने समाज और राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। सामाजिक समता और बंधुता के आधार पर एक नूतन भारत के निर्माण की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व एक विराट् सागर और कृतित्व उत्तुंग हिमालय जैसा था।
विगत अनेक वर्षों से वैचारिक अस्पृश्यता और राजनीतिक स्वार्थ के लगातार बढ़ते जा रहे विस्तार ने हमारे जिन राष्ट्रनायकों के बारे में अनेक भ्रांतियुक्त धारणाओं को जनमानस में मजबूत करने का दूषित प्रयत्न किया है, उनमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर प्रमुख हैं। उन्हें किसी जाति या वर्ग विशेष अथवा दल विशेष तक सीमित कर दिए जाने के कारण सामाजिक समता-समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता की भी अपूरणीय क्षति हो रही है। इस दृष्टि से चार
खंडों में उनका व्यक्तित्व-कृतित्व वर्णित है : खंड एक—‘जीवन दर्शन’, खंड दो—‘व्यक्ति दर्शन’, खंड तीन— ‘आयाम दर्शन’ और खंड चार ‘राष्ट्र दर्शन’। डॉ. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को समग्रता में प्रस्तुत करने वाला एक ऐसा अनन्य दस्तावेज है, जो उनके बारे में फैले या फैलाए गए सारे भ्रमों का निवारण करने में तो समर्थ है ही, साथ ही उन्हें एक चरम कोटि के दृष्टापुरुष तथा राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्थापित करने में भी पूर्णतः सक्षम है।
Dr. Hedgewar-Shri Guruji Prashnottari by Mahesh Dutt Sharma
विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अपने सामने बचपन से ही एक उच्चतम ध्येय रखकर काम करते रहे। संघ-कार्य का जैसे-जैसे विस्तार हुआ, समाज में देशभक्ति, आत्मविश्वास, एकता की भावना और राष्ट्रीय गौरव-बोध जैसे गुणों की वृद्धि हुई है। डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्र-निर्माण के लिए कटिबद्ध असंख्य जीवनदानी विभूतियों को प्रेरित किया, जिनकी साधना और तपस्या की नींव पर खड़ा संघ वैश्विक स्तर पर सेवा-संस्कृति-जागरण के महती कार्य कर रहा है।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ ने लगभग 33 वर्ष तक संघ प्रमुख के नाते न केवल संघ को वैचारिक आधार प्रदान किया, उसके संविधान का निर्माण कराया, उसका देश भर में विस्तार किया, पूरे देश में संघ शाखाओं को फैलाया, बल्कि इस दौरान देश विभाजन, भारत की आजादी, गांधी-हत्या, भारत-पाकिस्तान के बीच तीन-तीन युद्ध (कश्मीर सहित) एवं चीन द्वारा भारत पर आक्रमण जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के भी वे साक्षी बने और उस इतिहास के निर्माण में लगातार हस्तक्षेप भी किया।
प्रस्तुत पुस्तक में दोनों सरसंघचालकों के जन्म से लेकर उनके महापरिनिर्वाण तक की समूची विकास-यात्रा रोचक प्रश्नोत्तर रूप में दी गई है, जो भारत के इतिहास को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है।
Dr. Kalam : Prerna Ki Udaan by Dr. Unnat Pandit
ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, विचारक, दाशर्निक और शिक्षक के रूप में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने प्रत्येक भारतीय को सदैव प्रेरित किया है। उनके जीवन, कॅरियर और लेखन ने कोटि-कोटि भारतीयों का मार्गदर्शन किया है, उन्हें प्रोत्साहित किया है। वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन हर भारतीय के हृदय में हमेशा उनका स्थान रहेगा। वे समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर हमारे मन में सदैव ज्ञान की ज्योति जलाते रहेंगे।
प्रस्तुत पुस्तक ‘डॉ. कलाम : प्रेरणा की उड़ान’ उनके सहज-सरल, अनुकरणीय जीवन का एक विशद् विवेचन करती है। इस पुस्तक का उद्देश्य भारत के सर्वांगीण विकास के डॉ. कलाम के स्वप्न को साकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति जाग्रत् कराना है, ताकि भारत के छात्र-युवा-आमजन प्रेरणा ले सकें।
यह पुस्तक पढ़कर छात्रों को भारतीय रक्षा और अनुसंधान विकास में एरोनॉटिकल इंजीनियर, मिसाइल इंजीनियरिंग, उपग्रह प्रक्षेपण यान तकनीक के क्षेत्र में डॉ. कलाम के अनगिनत योगदानों के विषय में और ज्यादा जानने का अवसर मिलेगा। स्वप्न देखकर उन्हें साकार करने की क्षमता प्राप्त करने की उड़ान भरने में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।
Dr. Kalam Guru Gyan by Srijan Pal Singh
डॉ. कलाम को देश के युवाओं में अगाध विश्वास था। वे देश के कल्याण को लेकर इस कदर चिंतित रहते थे कि अपने जीवन के आखिरी दो घंटे उन्होंने आतंक और संसद् की काररवाई ठप होने के खतरों पर चर्चा करते हुए बिताए थे। अपने आखिरी क्षणों में भी उनका भरोसा कायम था कि युवा, खास तौर पर छात्र तमाम पीड़ादायी मुद्दों के समाधान लेकर देश के लिए आगे आएँगे। नई पीढ़ी के प्रज्वलित मस्तिष्क के प्रति उनका विश्वास हमेशा बना रहा, जिसे वे धरती पर सबसे बहुमूल्य उपहार मानते आए थे।
मुझे इस महान् आत्मा के साथ बेहद करीब से काम करने का मौका मिला। लोगों के लिए भले वे मिसाइलमैन रहे हों, मेरे लिए वो हमेशा ‘स्माइलमैन’ ही रहेंगे। दुनिया ने उन्हें अंतरिक्ष विज्ञानी के तौर पर देखा, जिसने उपग्रहों को धरती के चारों ओर घूमते हुए देखा। मैंने उन्हें एक महान् आत्मा के तौर पर देखा, जिसने लोगों को सपने देखने का उपहार दिया—सपने और उनको सच करने का साहस प्रदान किया। दुनिया ने मात्र उनके कामों को देखा, जबकि मैं खुशकिस्मत रहा कि मुझे उनके भावनात्मक हिस्से का भी गवाह बनने का मौका मिला। वे एक वैज्ञानिक, संत, लेखक, शिक्षक, कवि और दार्शनिक थे, सब मिलाकर वे स्नेह और बुद्धिमत्ता का एक पुंज थे।
आइए, अब मैं आपको एक हैरतअंगेज सफर पर ले चलता हूँ—एक ऐसा सफर, जिस पर चलते हुए मैंने डॉ. कलाम से काफी कुछ सीखा।