Hindi Literature
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Congress-Mukt Bharat by Amit Bagaria
अब 80 महीने से भी अधिक का समय बीत चुका है, जब भारतीय राजनीति की ‘वयोवृद्ध पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 2014 के चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी/एनडीए के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा था। पाँच साल बाद 2019 में मोदी ने अपने नेतृत्व में बीजेपी/एनडीए को उससे भी बड़ी जीत दिलाई, भले ही कांग्रेस को इस बार कुछ अधिक सीटें मिलीं।
अगस्त 2019 में ‘इंडिया टुडे’ के सर्वे में 57.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने अंत की ओर बढ़ रही है, 71.4 प्रतिशत ने कहा कि भारतीय मतदाताओं ने निर्णायक रूप से वंशवादी राजनीति को खारिज कर दिया है, और मात्र 32.6 प्रतिशत ने कहा कि सिर्फ एक गांधी ही पार्टी को पुनर्जीवित कर सकता है। जनवरी 2020 में कराए गए ऐसे ही सर्वे में 68.2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े नेतृत्व संकट से गुजर रही है। अगस्त 2020 में 55.3 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने अंत के करीब है।
लेकिन अब तक भी 135 साल पुरानी पार्टी के पुनर्जीवित होने के संकेत नहीं दिखते। 7 अगस्त, 2020 को 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के अध्यक्ष पद समेत विभिन्न संगठनों के चुनाव कराए जाने की माँग के साथ ही नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
इतने महीने बाद भी पार्टी में नेतृत्व के संकट को दूर करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठता नहीं दिखता। ‘बागियों’ और ‘परिवार के तथाकथित वफादारों’ के बीच की दरार कांग्रेस पार्टी को लगातार डरा
रही है।
Coronakaal Ki Sachchi Kahaniyan by Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’
चारों तरफ खौफ छा गया। कुछ लोग तो दुबककर कमरों में लिहाफ के अंदर घुस गए, कुछ निडर प्रकार के लोग मोबाइल कैमरे से छिपकर वीडियो बनाने का प्रयास करने लगे।
एंबुलेंस से बाहर उतरे लोग इधर-उधर के घरों का जायजा ले ही रहे थे कि पीछे से सायरन बजाती हुई पुलिस की एक जिप्सी भी आ धमकी। जिप्सी से भी उसी प्रकार के पारदर्शी आवरण में खाकी वर्दीधारी लोग उतरे और सामने के गेट की कॉल बैल दबाई।
‘अरे मिसेज दत्ता के घर?’, हर परिवार के लोग आपस में कानाफूसी करने लगे।
‘कौन बीमार हुआ होगा?’
‘कौन होना है? वही होगी, अकेले वही तो है इस घर में!’ लोग खौफ में थे। एक-दूसरे को फोन कॉल करके पूछ रहे थे किंतु बाहर निकलकर पुलिस से या एंबुलेंस वालों से पूछने की किसी को हिम्मत न हो पा रही थी। कोरोना का खौफ इस कदर था कि मानो अगर उन्होंने थोड़ा सा भी दरवाजा खोला तो झिर्री के रास्ते ही कोरोना उनके घर के अंदर भी घुस जाएगा।
—इसी कहानी संग्रह से
देश, समाज और अपने इर्द-गिर्द घटनेवाली घटनाओं पर पैनी नजर रखनेवाले कथाकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कोरोनाकाल में घटित अनेक मार्मिक घटनाओं को अपनी कहानियों में पिरोकर कोरोना जैसी महामारी से उपजे हालातों के मध्य मानव, मानवता, मानव मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण किया है। विपरीत परिस्थितियों, कठिनाइयों और संघर्षों के बीच ये कहानियाँ मन-मस्तिष्क को धैर्य, साहस और सुकून का बोध कराती हैं।
Corporate Yogi by Dr. Arvind Lal
एक गोली ने एक की जिंदगी छीनी और तीन को तबाह कर दिया। उनमें से एक जिंदगी मेरी भी थी। ‘मेरे भाई ने मेरे पिता को गोली मार दी। मेरी माँ ने गोली की आवाज सुनी।’ करीब 1,400 किलोमीटर दूर, पुणे के आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज में, जहाँ मैं हॉस्टल में असिस्टेंट वार्डन की नौकरी करते हुए पैथोलॉजी में पोस्टग्रैजुएट कोर्स कर रहा था, टेलीफोन की घंटी बज उठी। ये 4 दिसंबर, 1977 की रात थी, जिसने मुझे हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।
—इसी पुस्तक से
यह किताब एक आध्यात्मिक साधक और आकस्मिक उद्यमी के रूप में डॉ. अरविंद लाल के सफर को दिखाती है। हिमालय की गोद में बसे हैड़ाखान नाम के एक सुदूर गाँव के संत ने अरविंद के जीवन को कैसे बदल दिया? कैसे डॉ. लाल पैथलैब्स भारत के घर-घर में मशहूर ब्रांड बन गया? अध्यात्म ने किस प्रकार एक उद्यमी के रूप में उनके विचारों को आकार दिया? क्या कर्म और आध्यात्मिकता एक-दूसरे में ढलकर कर्मयोग का रूप ले सकते हैं, जैसा कि प्राचीन धर्मग्रंथों में बताया गया है?
डॉ. लाल के जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई यह किताब उनके उद्यम, कर्मशीलता और दूरदर्शिता के साथ-साथ कर्म, जीवन और आध्यात्मिकता के अनेक प्रश्नों के उत्तर देती है।
इस पुस्तक में डॉ. लाल ने न केवल अपनी आध्यात्मिक साधना का वर्णन किया है, बल्कि कर्मयोग और जपयोग सहित, अपने गुरु हैड़ाखान बाबा की शिक्षा से भी परिचित कराया है, जो अध्यात्म की खोज करनेवालों के लिए काफी दिलचस्प होगी।
—डॉ. कर्ण सिंह
चेयरमैन, ऑरोविल फाउंडेशन
डॉ. लाल की तरह मैं भी चिकित्सा जगत से हूँ और हमारी पृष्ठभूमि के लोगों के लिए जीवित भगवान में विश्वास करना आसान नहीं होता। अपने गुरु के मार्गदर्शन में, आध्यात्मिक साधक के रूप में डॉ. लाल का विकास उल्लेखनीय है। इस देश को उन्होंने विश्वस्तरीय लैबोरेटरी डायग्नोस्टिक की जैसी सेवा उपलब्ध कराई,
वह असाधारण और प्रशंसनीय है।
—डॉ. प्रणव पंड्या, एम.डी.
प्रमुख, ऑल वर्ल्ड गायत्री परिवार
Covid-19 : Sabhyata Ka Sankat Aur Samadhan by KAILASH SATYARTHI
इस पुस्तक में मैंने कोविड-19 महामारी से उपजे ‘सभ्यता के संकट’ के कारणों, परिणामों और समाधानों की विवेचना करने का प्रयास किया है। मेरा जोर, महामारी से उपजे संकट के तात्कालिक उपायों के अलावा मुख्य रूप से स्थायी समाधानों पर है। ये समाधान करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता के सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित हैं। मैं मानता हूँ कि इन मूल्यों को व्यवहार में लाने के आसान तरीके खोजे जाने चाहिए। उपदेश और उपचार का अलग-अलग महत्त्व होता है। उपदेश आसान होते हैं और उपचार मुश्किल। कोरोना वायरस की वैक्सीन तो देर-सवेर ढूँढ़ ही ली जाएगी और इस महामारी का अंत भी हो जाएगा। लेकिन, समाज की चेतना में लगी बीमारियों को दूर करने के लिए ठीक-ठीक उपचार ढूँढ़कर उन्हें उपयुक्त ढंग से लागू करना होगा। इस पुस्तक में मैंने ऐसे ही कुछ उपचार और समाधान ढँूढ़ने का कोशिश की है।
—कैलाश सत्यार्थी
Cricket : Khel Aur Niyam by Surendra Shrivastava
आज के युग का सबसे चर्चित और लोकप्रिय खेल क्रिकेट एक बल्ले और गेंद का दलीय खेल है, जिसकी शुरुआत दक्षिणी इंग्लैंड में हुई थी। क्रिकेट के कई रूप हैं; इसका उच्चतम स्तर टेस्ट क्रिकेट है, जिसमें वर्तमान प्रमुख राष्ट्रीय टीमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, श्रीलंका, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान व बांग्लादेश हैं।
एक क्रिकेट मुकाबले में 11 खिलाड़ियों के दो दल होते हैं। इसे घास के मैदान में खेला जाता है, जिसके केंद्र में भूमि की एक समतल लंबी पट्टी होती है, जिसे पिच कहते हैं। विकेट लकड़ी से बनी होती हैं, जिसे पिच के दो सिरों पर लगाया जाता है और उसका प्रयोग एक लक्ष्य के रूप में किया जाता है। गेंदबाज क्षेत्ररक्षण टीम का एक खिलाड़ी होता है, जो गेंदबाजी के लिए एक सख्त, चमड़े की मुट्ठी के आकार की 5.5 आउंस (160 ग्राम) वजन की क्रिकेट की गेंद को एक विकेट के पास से दूसरे विकेट की ओर फेंकता है, जिसे विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी बल्लेबाज के द्वारा मारा जाता है। गेंदबाज की टीम के अन्य सदस्य मैदान में क्षेत्ररक्षक के रूप में अलग-अलग स्थितियों में खड़े रहते हैं।
खेल की अवधि के आधार पर विभिन्न नियम हैं, जो खेल में जीत, हार अनिर्णीत (ड्रॉ) या बराबरी (टाई) का निर्धारण करते हैं।
क्रिकेट को अपना कॉरियर बनाने के इच्छुक युवाओं, खिलाड़ियों एवं खेल-प्रेमियों के लिए एक उपयोगी और मार्गदर्शक पुस्तक।
Cricket Commentary Box Se by Ravi Chaturvedi
‘क्रिकेट कमेंटरी बॉक्स से’ लोकप्रिय कॉमेंटेटर, विख्यात पत्रकार, प्रतिष्ठावान लेखक और मान्य शिक्षाविद् प्रो. रवि चतुर्वेदी की एक श्रमसाध्य पुस्तक है।
पुस्तक में जहाँ रचना-कौशल है, वहीं अनुवचनित शब्द-भूमि भी है। इस पुस्तक में यह दोनों पक्ष समाहित हैं। प्रो. चतुर्वेदी ने तथ्यों और अपने अनुभवों को उचित शब्दों में ढाला है।
प्रस्तुत पुस्तक में 10 टेस्ट क्रिकेट खेलनेवाले देशों में क्रिकेट कमेंटरी के इतिहास और वहाँ के कॉमेंटेटरों के जीवन परिचय के साथ-साथ कमेंटरी कक्ष में रोचक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है। कमेंटरी विषय पर प्रकाशित बी.बी.सी. और जाने-माने कॉमेंटेटर व पत्रकार क्रिस्टोफर मार्टिन-जैंकिंस की पुस्तकों में सीमित स्तर पर विषय-लेखन है। कमेंटरी विषय अज्ञान की खाई पाटने में प्रो. चतुर्वेदी की पुस्तक सक्षम रहेगी। लेखक ने सभी टेस्ट क्रिकेट खेलनेवाले देशों के कॉमेंटेटरों और वहाँ की कमेंटरी पर विस्तार से लेखन किया है।
पुस्तक के माध्यम से एक अहम तथ्य यह उजागर हुआ है कि हिंदी क्रिकेट कमेंटरी के पदार्पण से पाकिस्तान में उर्दू, श्रीलंका में सिंहल और बँगलादेश में बँगला कमेंटरी का पथ प्रशस्त हुआ है।
पुस्तक कॉमेंटेटरों और कमेंटरी से संबंधित रोचक घटनाओं और घटनाक्रम का अनोखा संकलन है।
Cricket Ke Sitare by Ravi Chaturvedi
क्रिकेट के सितारे
‘क्रिकेट के सितारे’ प्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर एवं खेल पत्रकार रवि चतुर्वेदी की श्रमसाध्य पुस्तक अन्य पुस्तकों से भिन्न है। ‘क्रिकेट के सितारे’ भारतीय शास्त्रा्य संगीत के रागों की तरह है—पहला चरण वह है, जिसमें क्रिकेट कई दशकों में मंद-मंद एवं निश्चिंतता के साथ आगे बढ़ा है; दूसरा चरण, जो साधारण और नपा-तुला है, पचास और सत्तर के दशक की जानकारी देता है। तीसरा चरण एक लयबद्ध स्वर के समान है। ‘क्रिकेट के सितारे’ इस तरह से अपनी व्यवस्था और संरचना में भारतीय शास्त्रा्य संगीत के समान है।
प्रस्तुत पुस्तक में भारत के श्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ियों से संबंधित अनेक जानकारियाँ हैं; जिनमें महानतम बल्लेबाज सी.के. नायडू, विजय मर्चेंट, लाला अमरनाथ से लेकर सचिन तेंदुलकर तक की बल्लेबाजी का कौशल है, तो गेंदबाजों में मोहम्मद निसार, अमर सिंह से होते हुए भागवत चंद्रशेखर, हरफनमौला अमरसिंह और कपिलदेव आदि का चमत्कारी करतब है, साथ ही विकेटकीपर जनार्दन नावले से लेकर सैयद किरमानी और क्षेत्ररक्षक लालसिंह से लेकर मो. अजहरुद्दीन तक की विश्व स्तरीय प्रतिभाओं को बहुत ही सुगठित तरीके से रेखांकित किया गया है।
पुस्तक के अंत में क्रिकेट इतिहास में भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की महान् उपलब्धियों को उनकी मोहक तसवीर के साथ प्रस्तुत किया गया है। साथ ही अब तक के भारतीय क्रिकेट संसार में बने रिकॉर्ड एवं आँकड़ों को भी प्रस्तुत किया गया है।
प्रत्येक क्रिकेटप्रेमी के लिए पठनीय एक रोचक और आवश्यक पुस्तक।
Cricket Ki Rochak Baten by Ravi Chaturvedi
क्रिकेट एक गतिशील खेल है। यह रोचकता एवं रोमांचकता से परिपूर्ण है। क्रिकेट की अनिश्चितता और इसके उतार-चढ़ाव ही तो इसमें थिरकन और स्पंदन उत्पन्न कर दर्शकों को सुखद आनंद प्रदान करते हैं। कभी खिलाड़ियों के आश्चर्यजनक असाधारण प्रदर्शन से तो कभी उनके नाटकीय व अद्वितीय कारनामों से रोचकता व रोमांचकता बढ़ती ही जाती है।
वैसे तो आँकड़ों और क्रिकेट में चोली-दामन का रिश्ता है, आँकड़े खिलाड़ियों की योग्यता को संक्षेप में प्रदर्शित कर पाते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में क्रिकेटरों द्वारा अन्य खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करना, क्रिकेटर का युद्धबंदी होना, क्रिकेटरों का युद्ध में मारा जाना, विचित्र ढंग से आउट होना, कप्तानों द्वारा संयुक्त रूप से जन्मदिन का केक काटा जाना, टेस्ट मैच में पूरे पाँच दिनों तक बल्लेबाजी करना, देश एवं खिलाड़ी द्वारा पहले ही मैच में शतक लगाना, मैच की पहली गेंद पर बल्लेबाज का आउट होना, टेस्ट मैच में दोनों पारियों में ‘कॉट एंड बोल्ड’ होना और इसी तरह के अनेक रोचक तथ्य शामिल हैं। कुछ तथ्य, जो थोड़े रूखे-सूखे लग सकते हैं, उन्हें भी मजेदार किस्सों के द्वारा रोचक बनाया गया है।
रोचक खेल क्रिकेट की रोचक व रोमांचक घटनाओं और घटनाक्रमों का अद्भुत संकलन।
Dada-Dadi Ki Kahaniyon Ka Pitara by Sudha Murty
हर दिन एक कहानी
मुश्किलों के बिन जिंदगानी!
यह वर्ष 2020 की बात है, जब बच्चे घरों में कैद होकर रह गए; क्योंकि नोवेल कोरोना वायरस भारत में आ धमका है। पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो चुका है, और इस बढ़ते संकट के बीच अज्जा और अज्जी अपने पोते-पोतियों और कमलु अज्जी का शिग्गाँव स्थित अपने घर में स्वागत करते हैं।
मास्क सिलने से लेकर, घर के काम में हाथ बँटाने और श्रमिकों के लिए खाना तैयार करने से लेकर कालातीत कहानियों में खो जाने तक बच्चों के लिए लॉकडाउन का समय यादगार बन जाता है, जब वे देवी-देवताओं, राजाओं, राजकुमारों, साँपों, जादुई फलियों, चोरों, साम्राज्यों और महलों की दिलचस्प दुनिया में कदम रखते हैं। दादा-दादी की सुनाई अनगिनत कहानियाँ उनके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं, जिनसे बच्चे दुनियादारी को लेकर पहले से कहीं अधिक दयालु और समझदार हो जाते हैं।
भारत की लोकप्रिय लेखिका सुधा मूर्ति आपके लिए नैतिक गुणों से भरी ‘दादा-दादी की कहानियों का पिटारा’ का ऐसा संग्रह लेकर आई हैं, जिसे उन्होंने लॉकडाउन के दौरान बड़े प्यार से सँजोया है, ताकि नन्हे-मुन्ने पाठकों को सुकून मिले और वे दूसरों की देखरेख तथा उनके साथ चीजों को साझा करने के चमत्कार का अनुभव प्राप्त कर सकें। उनकी चिर-परिचित शैली में बेहतरीन ढंग से बुनी गई पुस्तक को आप पढ़ने लगें तो उसे छोड़ने का मन नहीं करेगा और यह हर बच्चे के बुकशेल्फ के लिए एक आवश्यकता तो
है ही!
Dadi Amma Kahen Kahani by Sudha Murthy
दादी-अम्मा कहें कहानी—सुधा मूर्ति
ईश्वर ने अभी-अभी इस पृथ्वी की रचना की थी। उन्होंने एक कदम पीछे हटकर उसे मुग्ध होकर देखा। उन्होंने मनुष्यों, जानवरों, पेड़-पौधों व समुद्रों की रचना की थी और वह रहने के लिए एक अद्भुत स्थान लगता था। परंतु किसी चीज की कमी थी। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने छह भाइयों—दिन, रात, गरमी, सर्दी, बारिश और वायु—को बुलाया। उन्होंने छह भाइयों से नीचे धरती पर जाने और वहाँ के प्राणियों को एक सुखद व समृद्ध जीवन जीने में मदद करने का निर्देश दिया—‘तुम्हें पृथ्वी पर रहनेवाले प्राणियों के लिए आहार उपजाने में उनकी मदद करनी होगी, ताकि वे आनंदपूर्वक रह सकें। मैंने समय को दो भागों में बाँट दिया है—24 घंटे और 365 दिन। तुम्हें समय के इन भागों को आपस में बाँटना होगा, ताकि पृथ्वी के लोगों को वह सब मिल सके, जिसकी उन्हें जरूरत है।’
—इसी पुस्तक से
प्रख्यात लेखिका सुधा मूर्ति की दादी की भूमिका से उपजी ये कहानियाँ बच्चों, माता-पिता, दादा-दादी—यानी तीन पीढ़ियों के आपसी संबंधों को समझाती हैं; परिवार को प्यार के बंधन में बाँधने का काम करती हैं और बालपन के पंख लगाकर आसमान छूने को प्रेरित करती हैं।
Dadi Janki : Manav Seva Ke Sau Varsh by Liz Hodgkinson
यह पुस्तक विश्वप्रसिद्ध आध्यात्मिक संस्था ‘ब्रह्माकुमारी’ की शिक्षाओं को भारत से बाहर प्रसारित करने में और ब्रह्माकुमारी को एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक आंदोलन के रूप में स्थापित करने के लिए पूज्य दादी जानकी की अद्भुत उपलब्धियों पर केंद्रित है। यह कोई आधिकारिक आत्मकथा नहीं है, बल्कि तीस वर्षों की मित्रता पर आधारित एक स्नेहपूर्ण व्यक्तिगत विवरण है। प्रख्यात लेखिका लिज हॉजकिंसन विशेष रूप से दादी की प्रबल इच्छाशक्ति, जनकल्याण-दृष्टि तथा महिलाओं के सशक्तीकरण के उनके उत्साह की प्रबल समर्थक हैं। यह पुस्तक दादी की दूसरों के अंदर छुपी प्रतिभाओं और गुणों को बाहर निकाल लेने की क्षमता को भी रेखांकित करती है। लिज का यह विवरण ब्रह्माकुमारियों से जुड़े अनेक ऐसे लोगों की कहानियों पर आधारित है, जिन्होंने दादी के साथ रहकर काम और अध्ययन किया है।
मानवता को समर्पित श्रद्धेय दादी जानकी के त्यागपूर्ण और प्रेरक जीवन की अंतर्यात्रा है यह कृति।
Dalit Chintan by Shri Ashok Pradhan
बाबा साहब जैसे महान् व्यक्तित्व ने समाज में एक जागरण पैदा किया। लोगों को झकझोरा। उनकी अंतरचेतना में व्यवस्था को बदलने का हौसला दिया। उनके प्रयास से ही देश से अस्पृश्यता समाप्त हुई।
—अटल बिहारी वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के आदर्श का मूल तत्त्व है शांति और सामाजिक भाईचारा। उन्होंने जीवनभर गरीबों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया।
—नरेंद्र मोदी
भारत के प्रधानमंत्री
बाबा साहब ने जीवन भर देश की एकता और अखंडता के साथ दलित, शोषित और उत्पीडि़त वर्ग के कल्याण के लिए समाज में जागृति की अलख जगाकर समरसता का भाव स्थापित करने का प्रयास किया।
—अमित शाह
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ ये मूल तत्त्व हैं। मैं समझता हूँ आर्थिक दृष्टि से किसी भी सरकार के लिए इस दायरे के बाहर जाने का कोई कारण ही नहीं बनता है। आज हम रिजर्व बैंक की कल्पना करते हैं। देश आजाद नहीं हुआ था, तब बाबा साहब अंबेडकर ने अपने thesis में भारत में रिजर्व बैंक की कल्पना की थी। आज हम federal sector की बात करते हैं, फाइनेंस कमीशन राज्य की माँग रहती है, इतना पैसा कौन देगा, इतना पैसा कौन देगा, कौन राज्य कैसे क्रम में चलेगा। देश आजाद होने से पहले बाबा साहब अंबेडकर ने यह विचार रखा था फाइनेंस कमीशन का और संपत्ति का बँटवारा केंद्र और राज्य के बीच कैसे हो—इसका गहराई से उन्होंने चिंतन किया था और उन्हीं विचारों के प्रकाश में आज यह फाइनेंस कमीशन, चाहे RBI हो, ऐसे अनेक institutions हैं।
—नरेंद्र मोदी
इस पुस्तक में संकलित माननीय प्रधानमंत्री के भाषण का अंश।
Dalit Sahitya : Nai Chunautiyan by Ramshankar Katheria
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में, जब इतिहास के अंत की घोषणा की जा रही है, स्मृतियों के ध्वस का नारा उछाला जा रहा है, सामाजिक सरोकारों का विकेंद्रीकरण हो रहा है—ऐसे में यदि दलित साहित्य सीमित और संकीर्ण होता जाएगा, तो वह बाबा साहब भीमराव के आदर्शों के एकदम विपरीत होगा।
बाबा भीमराव साहित्य को तरक्की का आधार मानते थे, वहीं साहित्यकारों का महत्त्व भी उनकी दृष्टि में सम्मानजनक था। आज दलित साहित्य जिस प्रकार अपनी समस्याओं और स्वार्थों तक सीमित हो गया है, उससे बाबा साहब कदापि सहमत नहीं हो सकते थे। वे न केवल दलितों को, अपितु दलित साहित्य को संपूर्ण विश्व के दलितों और शोषितों से जोड़ना चाहते थे।
इस दृष्टि से दलित साहित्य को न केवल अपनी सर्जनात्मक क्षमता को वैश्विक स्तर पर सिद्ध करना होगा, बल्कि संपूर्ण दलित एवं शोषित समाज को दूसरे दलित एवं शोषितों को नवजागरण के लिए प्रेरित करना होगा। प्रस्तुत पुस्तक इसी प्रयास की शृंखला में एक कड़ी है, जो दलित साहित्य में पेश आनेवाली चुनौतियों एवं कठिनाइयों का दिग्दर्शन कराती है।
Dalit-Muslim Rajneetik Gathjod by Dr. Bizay Sonkar Shashtri
‘दलित-मुसलिम एकता’ का भ्रम उत्पन्न करके वास्तव में कुछ नेता आज देश में राजनीतिक आधार पर अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु गठजोड़ बना रहे हैं। एकता एवं गठबंधन तो सामाजिक एवं राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सकारात्मक क्रियाकलाप के अंतर्गत आता है, किंतु गठजोड़ तो नीति या विचारधारा को ताक पर रखकर सत्ता की भूख मिटाने के लिए किया जाता है। ऐसे में इस प्रकार के गठजोड़ से समाज एवं देश टूटता है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर का मानना था कि अवसरवादी गठजोड़ नहीं, बल्कि समाज के उन्नति के लिए एकता आवश्यक है। राजनीतिक गठजोड़ समान विचारधारा एवं समान कार्यक्रम पर नहीं, अपितु स्वार्थ एवं अनीति पर आधारित सोच से सत्ता की भूख मिटाने का एक साधन है। बुनियादी रूप से डॉ. आंबेडकर दलित-मुसलिम गठजोड़ के विरुद्ध थे। प्रस्तुत पुस्तक में दलित-मुसलिम गठजोड़ पर डॉ. आंबेडकर के विचारों का विस्तृत उल्लेख दिया जा रहा है। इस पुस्तक के माध्यम से डॉ. आंबेडकर के विचारों के आलोक में दलित-मुसलिम गठजोड़ का वास्तविक चेहरा भी सामने आएगा।
‘दलित-मुसलिम राजनीतिक गठजोड़’ नामक इस पुस्तक में स्वार्थपूर्ण राजनीति पर महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, पंडित नेहरू एवं अन्यान्य नेताओं के विचारों को पढ़ा एवं समझा जा सकेगा। समाज में शुचिता तथा एकता भाव पर आधारित एक सुसंगठित समाज-रचना की दिशा में राजनीतिक योगदान ही इस पुस्तक का लक्ष्य है।
Daliton Ke Utthan Mein Babu Jagjivan Ram Ka Yogdan by Dr. Md. Khurshid Alam
बाबू जगजीवन राम का चरित्र यकीनन बहुत विराट् था। उन्होंने दलित उत्थान तथा देश की आजादी एवं राजनीति में अहम योगदान दिया। एक दलित नेता होने के नाते उनका नाम आते ही लोग उनकी तुलना डॉ. भीमराव आंबेडकर से करने लगते हैं, जबकि बाबू जगजीवन राम के बारे में बात करते वक्त उनके व्यक्तित्व को अलग से देखने की जरूरत है। इसकी एक वजह तो यही है कि जहाँ आंबेडकर एक सिद्धांतकार थे, तो वहीं यह नहीं भूलना चाहिए कि बाबू जगजीवन राम कुशल प्रशासक और व्यावहारिक व्यक्ति। इसलिए इन दोनों का काम अपनी-अपनी जगह अलग है। आंबेडकर ने जहाँ संविधान निर्माण और आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया तो जगजीवन राम का योगदान आजादी की लड़ाई के बाद देश के प्रशासन में भी अहम है। उन्हें सन् 1948 के बाद जो भी विभाग मिला, अगर उनके काम को देखें तो वह उल्लेखनीय है।
इस पुस्तक में उनके जन्म से लेकर अभाव भरे जीवन के साथ-साथ उनकी राजनीति और देश की आजादी में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला
गया है।
अत्यंत सरल और सुबोध शैली में लिखित यह पुस्तक अन्य जीवनियों की तरह बोझिल नहीं होती, वरन् सरस भी बनी रहती है और बाबू जगजीवन राम के विराट् व्यक्तित्व को रेखांकित कर उन्हें प्रेरणापुरुष बनाती है।
Damodar Datta Dikshit Ki Lokpriya Kahaniyan by Damodar Datta Dikshit
‘दामोदर दत्त दीक्षित की लोकप्रिय कहानियाँ’ आज के भारतीय उप-महाद्वीप की प्रामाणिक तसवीर प्रस्तुत करती है। कहानियों से गुजरते हुए अनुभव होता है कि लेखक दबे-कुचले वर्ग, वंचितों और शोषितों की व्यथा-कथा से संवेदनात्मक स्तर पर गहराई से जुड़ा है। ग्रामीण और नगरीय जीवन के यथार्थ का साक्षात्कार कराती इन कहानियों में जन सामान्य की विषमताओं, विसंगतियों, विरूपताओं, विभीषिकाओं और विवशताओं तथा सत्ता-व्यवस्था के द्वारा किए जा रहे शोषण, उत्पीड़न, उनके क्रूर आचरण और निष्ठुरता के विविध आयामों को उजागर किया गया है।
कहानियों का वैविध्य विस्मित करता है। प्रत्येक कहानी अपने स्वरूप में, अपने प्रकार में पृथक् है। कहानियों में वस्तु और भाव की समरसता है और भाषा तथा शिल्प का अनुकूल संयोजन है। लेखक ने अपने व्यापक अनुभव, संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति कौशल से अत्यंत लोकप्रिय कहानियाँ दी हैं, इसमें संदेह नहीं।
Dampatya Ki Dhoop-Chhanha by Mridula Sinha
दांपत्य के 60 वर्ष पूरे हुए। यात्रा समाप्त नहीं हुई हैं। शुरुआत में चार वर्ष सिर्फ हम दोनों थे। मैं विद्यार्थी, वे प्रोफेसर। प्रथम दो वर्ष हम लोग साथ नहीं रहते थे। प्रारंभ में उनका कॉलेज पश्चिम बंगाल में, मैं मुजफ्फरपुर में दो वर्ष के बाद ये 1960 के दिसंबर से मुजफ्फरपुर रामदयालु सिंह कॉलेज में पढ़ाने लगे। गणेश (सेवक) के सहयोग से श्री गणेश हुआ हमारे चौकाचुल्हे का। बोलने और सुनने में छह दशक बहुत लंबा लगता है। 60 वर्ष छह दशक से दस गुणा ।स्मृति को लंबा फैलाव देना होता हैं।
स्मृतियों को कागज पर उतारने के पूर्व बहुत मुश्किल लगता था, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, बड़ी सहजता से लेखनी उन पलों को उकेरती गई, जिन्हें मैंने मनमस्तिष्क में सँवार रखा था। प्रकाशक को भेजने के पूर्व स्वयं पढ़ने बैठी तो ऐसा लगा कि पलों में बीत गए 60 वर्ष ।
ऐसा भी नहीं कि इनकी सारी बातेंव्यवहार मुझे अच्छे ही लगते रहे। आदत बन गई थीं चुप रह जाने की। कुछ देर बाद ही शांत मन से विश्लेषण करती। तब तक अपना गुस्सा भी शांत हो जाया करता था। कैसी जोड़ी रब ने बनाई थी। एक आत्मविश्वास से लबालब भरा हुआ, दूसरी ने आत्मविश्वास लाने में 60 वर्ष बिता दिया। अब भी अपने पर पूर्ण विश्वास नहीं।
पति-पत्नी के बीच विचारों और व्यवहारों का भी घोल हो जाता हैं। कुछ दिनों बाद छाँटना मुश्किल कि कौन सा विचार किसका हैं। यही तो दांपत्य हैं। यहीं रूप हैं। अर्धनारीश्वर का।
भारतीय संस्कृति में सौ वर्ष की आयु माने जानेवाले मनुष्य जीवन के आविर्भाव से लेकर अवसान तक के समय में सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गई है। यों तो संस्कारों में विवाह का स्थान पंद्रहवें संस्कार के स्थान पर आता है, इसके पूर्व के चौदह संस्कारों की गणना सही मायने में जीवन की तैयारी के संस्कार हैं। इसलिए कि विवाह की आयु (शास्त्रों के अनुसार 25 वर्ष) तक पहुँचते-पहुँचते युवक और युवतियों के शरीर, मन और बुद्धि परिपक्व होते हैं। वे विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर अपने सांसारिक जीवन को आगे बढ़ाते हैं।
वैवाहिक जीवन के संचालक तत्वों पर गहराई से विचार करते हुए लेखिका के मन में दांपत्य की तुलना दलहन (मूग, चना, अरहर, मटर, मसूर) के एक दाने से करना शतप्रतिशत उचित लगा। दलहन के दाने के ऊपर जो छिलका (आवरण) हैं, वही अंदर के दो दलों को बाँधकर रखता हैं। जब तक वह आवरण हैं, तभी तक दोनों दल आपस में संबद्ध रहते हैं। उनमें जीवनीशक्ति होती हैं। वे एक से अनेक हो ही सकते हैं, उनमें उच्च विचारों की भी उत्पत्ति और संवर्धन होता हैं। ज्योंही छिलका (दांपत्य) अलग कर दिया जाता है, उनकी उर्वराशक्ति समाप्त हो जाती है। दलहन के दाने अंकुरित भी नहीं हो सकते और पति-पत्नी अपनी पारिवारिकसामाजिक जिम्मेदारियाँ भलीभाँति पूरी नहीं कर सकते।
प्रेम, स्नेह, पारस्परिकता, समन्वय, निष्ठा, समर्पण, विश्वास जैसे तत्वों से जीवन के अटूट बंधन ‘दांपत्य’ को अभिसिंचित किया जा सकता है। सफल दांपत्य जीवन के गुरुमंत्र बताती पठनीय कृति ।
Dastak by Vinod Bandhu
विनोद बंधु ईमानदारी और पारदर्शिता से ओत-प्रोत कुछ प्रामाणिक पत्रकारों में से एक हैं। ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में सन् 2012 से 2015 के बीच उन्होंने अपने साप्ताहिक कॉलम ‘दस्तक’ में अनेकानेक विषयों पर लिखा था, जो राजसत्ता के लिए चेतावनी देनेवाले और नागरिक समाज के लिए आँख खोलनेवाले होते थे। चूँकि दैनिक हिंदुस्तान बिहार में सर्वाधिक बिकनेवाला अखबार है, इसलिए उनके कॉलम का सरकार पर अकसर निर्णायक प्रभाव होता था। फलतः सरकार अपनी कमियों को दुरुस्त ही नहीं करती थी, बल्कि अपने शासन-तंत्र को भी एक काम करनेवाले राज्य के ढाँचे में बदलने की कोशिश करती थी। ‘दस्तक’ अपनेपन की भावना के साथ बिहार का प्रचार-प्रसार करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था। ऐसे समय में जब राज्य में उप-राष्ट्रीयता की भावना लगभग अनुपस्थित थी, उसको मजबूत करने में ‘दस्तक’ की गंभीर भूमिका रही। उप-राष्ट्रीयता कोई गुप्त एजेंडा नहीं है। इसे मजबूत करने के लिए ज्वलंत सामाजिक मुद्दों के प्रति चिंतित होना जरूरी है। ऐसे मुद्दे उनके कॉलम में निखरकर आते थे। ‘दस्तक’ में बिहार के बजट या अन्य आर्थिक मुद्दों पर ही बारीकी से चर्चा नहीं होती थी, बल्कि उसमें राज्य को ‘विशेष श्रेणी’ का दर्जा दिलाने के लिए एक जुझारू प्रयास दिखता था। ‘दस्तक’ सरकार के लिए कोई थपकी नहीं थी। यह नागरिक समाज के लिए महत्त्वपूर्ण सुझाव था। यह एक ऐसा उत्प्रेरक माध्यम था, जिसने अनेक बहस-मुबाहिसे पैदा किए। सोशल मीडिया के दौर में, जब वास्तविकता को समझना मुश्किल है, ‘दस्तक’ ने राज्य के सबसे महत्त्वपूर्ण दौर में सामाजिक आलोड़न पैदा करने में पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई।
—शैवाल गुप्ता
Dastak Khayalon Ki by Ashish Agrawal ‘Vajood’
रोज़ सुबह से रात और रात से सुबह के दौरान तमाम तरह के खयाल हमारे दिल और दिमा़ग पर दस्तक देते हैं, तमाम तरह की घटनाओं और अनुभवों से होकर हम सभी गुज़रते हैं, कुछ अच्छा होता है, कुछ बुरा, कभी सह लिया जाता है तो कभी मन करता है कुछ बदल दें, कभी हम चुप रह जाते हैं तो कभी लगता है कहना ज़रूरी है। अब बात ये आती है कि जब कहना ज़रूरी हो तो सुनने वाला भी मिल ही जाए, यह हमेशा मुमकिन तो नहीं और बात दिल ही में रह जाए तो ऐसे में दिल पर बोझ बढ़ जाता है।
एक दिन यूँ ही उँगलियों ने मोबाइल की स्क्रीन पर चहल़कदमी करते हुए ट्विटर तक पहुँचा दिया, वहाँ लोगों को अपनी बात दुनिया के सामने रखते हुए देखा तो लगा, यह जगह अपने लिए भी एक ज़रिया हो सकती है दिल को हल्का करने का। तो लिखना शुरू किया ‘वजूद’ नाम से। शुरुआत में एक-दो वाह भी मिल जातीं तो लगता कि शायद बात ठीक-ठाक तरह से सामने वाले तक पहुँच गई, व़क्त के साथ महसूस हुआ कि ये वाह तारी़फ से ज़्यादा इस बात का इशारा है कि जो बात मैं कह रहा हूँ, यह बात पढ़ने वाले के दिल की ही बात थी, जिसे सिर्फ ल़फ्ज़ों में ढालने का काम मैंने कर दिया, और इस तरह मेरे साथ ही शायद पढ़ने वालों के दिल को भी राहत मिलती रही। बात को और बेहतर ढंग से कहने की हमेशा कोशिश करता रहा, जो कि अब भी जारी है, लोगों के प्यार की बदौलत हौसला और पसंद करने वालों की तादाद दिनों-दिन बढ़ती गई, जिसका मैं हमेशा शुक्रगुज़ार रहूँगा।
Dawamukt Chikitsa by Muni Kishan Lal Ji
स्वास्थ्य मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही अपने जीवन को व्यवस्थित रख सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की स्वस्थ रहने की इच्छा होती है। इसके लिए पुरुषार्थ करने तथा प्रयोग करते रहने की नितांत आवश्यकता होती है। वर्तमान के इस व्यस्त जीवन में स्वस्थ व्यक्ति ही सफलता की मंजिल प्रा?त कर सकता है। व्यक्ति के लिए स्वस्थ रहने के लिए ध्यान, साधना, आसन एवं प्राणायाम करना आवश्यक होता है। इनके माध्यम से व्रत अपने जीवन में गुणात्मक परिवर्तन कर सकता है। व्यक्ति अपने जीवन में उत्साह, उल्लास, प्रसन्नता तथा आनंद की अनुभूति कर सकता है। मुद्रा हमारे मनोभावों को विकसित करती है। इसके लिए श्वास के सही प्रयोग का प्रशिक्षण प्रा?त करना आवश्यक है। इसके द्वारा ही जीवन में सकारात्मक चिंतन का विकास किया जा सकता है। यह चिंतन मानव जीवन की सफलता तथा सार्थकता के लिए परमावश्यक होता है। स्वास्थ्यप्रेम पाठकों के लिए पठनीय एवं बेहद उपयोगी पुस्तक।
Dear Zindagi by Rajesh Gupta
Dear ज़िंदगी—ज़िंदगी का ऐहतराम करती मेरी पहली किताब पेश है आप सबके सामने। इसमें ज़िंदगी की दी हुई खुशियों
का जश्न भी शामिल है और इसके दिए गमों की शि़कायत भी। अगर इस किताब को चंद अल़्फाज़ों में निचोड़ना हो तो शायद कुछ
यों होगा—
यह चंद स़फहों की किताब है
मेरे कुछ महीनों का हिसाब है
फलस़फे ज़िंदगी के हैं इसमें
ये मेरे ख़्वाहिशों के ख़्वाब हैं
गमे तनहाई मिला है इश़्क से
पर यादों का स़फर लाजवाब है
जुदाई लाज़मी है इस स़फर में
वक़्त को रिश्तों का जवाब है
मैं नहीं जानता कि मैं कोई शायर हूँ, कवि हूँ या नहीं और इस बात का दावा भी नहीं करना चाहूँगा। मैं तो बस एक आम सोच रखने वाला मामूली इंसान हूँ, जिसे न तो लिखने की सोहबत मिली है, न ही विरासत। इस किताब की रचनाएँ बस मेरी संवेदनाएँ हैं, जो खुद-ब-खुद लफ्ज़ों में तब्दील हो गई हैं। ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं को मेरी नज़र से देखने की कोशिश मात्र है। ज़िंदगी को जो भी थोड़ा- बहुत देखा, परखा या समझा है, वही लिखकर आपके समक्ष प्रस्तुत किया है। संभवतः वही संवेदनाएँ आपको भी छू जाएँ और आप स्वयं से इसको जोड़ पाएँ।
इस किताब के प्रकाशन से बेहद खुशी है, आ़िखरकार ये मेरी पहली किताब है, पर साथ-ही-साथ एक डर भी सताता है कि क्या यह आपकी उम्मीदों की कसौटी पर खरी उतरेगी, पर इस डर से लड़ने के सिवा और कोई उपाय भी नहीं है। उम्मीद है, आपको मेरी ये किताब और इसकी रचनाएँ पसंद आएँ।
Deendayal Upadhayaya : Kritatva Evam Vichar by Mahesh Chandra Sharma
दीनदयाल उपाध्याय का जीवन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारतीय जनसंघ के साथ एकात्म था। भारतीय जनसंघ उनकी निर्णायक भूमिका व नेतृत्व के कारण भारतीय राजनीति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल बना। दीनदयाल उपाध्याय संविधानवाद को धर्मराज्य के रूप में स्वीकार करते थे। वे मिश्रित किंवा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के आलोचक थे। भारत की एक महान् संस्कृति है। भारत की राष्ट्रीयता एकात्म है, उसकी पहचान मजहबी या राजनीतिक नहीं वरन् भूसांस्कृतिक है। वे संघात्मक शासन के विरोधी तथा विकेंद्रीकृत एकात्मशासन के पक्षधर थे। वे भारत की राजनीतिक व्यवस्था में पाश्चात्य अवधारणाओं के आरोपण के विरुद्ध थे, मौलिकता व भारतीयता के प्रतिपादक थे। वे राजनीति को जीवन का सर्वस्व माननेवाली विचारधारा को गलत मानते थे। दीनदयाल अर्थनीति के प्रखर अध्येता थे। वे उपभोगवादी (पूँजीवाद) एवं सरकारवादी (साम्यवाद) आर्थिक मानव की पाश्चात्य कल्पना को अमानवीय मानते थे। वे उत्पादन में वृद्धि, उपभोग में संयम तथा वितरण में समता के पक्षधर थे। उन्होंने ‘अदेव मातृका कृषि’ व ‘अपर मात्रिक उद्योग’ का विचार प्रस्तुत किया। उनके चिंतन का प्रतिफलन ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में हुआ, जो एक संपूर्ण जीवनदर्शन है। यह व्यक्ति एवं समाज को विभक्त नहीं करता; शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा के घनीभूत सुख की चिंता करता है तथा विराट् पुरुष के धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष—इन चतुर्पुरुषार्थों की संकलित साधना करता है। दीनदयाल उपाध्याय एकात्मता व पूरकता के लिए प्रकृति साक्षी रूप में प्रस्तुत करते थे। वे एकांगी अथवा खंड दृष्टि नहीं वरन् समग्रता के दृष्टिपथ के राही थे।
Deendayal Upadhyaya Ki Prerak Kahaniyan by Renu Saini
समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उन्नयन को ही राष्ट्र-निर्माण का मुख्य ध्येय माननेवाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय सादगी एवं प्रभावी व्यक्तित्व की प्रतिमूर्ति थे, लेकिन अपने दिव्य गुणों से वे दिव्य और अद्भुत बन गए। प्रत्येक व्यक्ति उनका सान्निध्य पाकर स्वयं को धन्य समझता था। वे किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं लौटाते थे। अपने प्रखर और तीव्र मस्तिष्क का प्रयोग कर हर व्यक्ति की समस्या का हल ढूँढ़ने का प्रयास करते थे। हर व्यक्ति उनका ऋणी था। ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, साहस और नेतृत्व के गुण उनमें कूट-कूटकर भरे थे। वे अपने इन गुणों के माध्यम से ही हर व्यक्ति के हृदय में अपना एक विशेष स्थान बना पाए।
राष्ट्र की एकता-अखंडता उनके लिए सर्वोपरि रही और इसी के लिए वे अनवरत कर्मशील रहे। अपने छोटे, परंतु यशस्वी जीवन में उन्होंने सामूहिकता, संगठन-कौशल और राष्ट्रभाव के जो अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किए, वे न केवल वर्तमान वरन् भविष्य की पीढि़यों का भी मार्ग प्रशस्त करेंगे।
माँ भारती के अमर सपूत पं. दीनदयाल उपाध्याय के प्रेरणाप्रद जीवन की ये छोटी-छोटी कहानियाँ जीवन में कुछ बड़ा करने का मार्ग प्रशस्त करेंगी, ऐसा हमारा अटल विश्वास है।
Deepshikha by Santosh Shailja
‘दीपशिखा’ केवल निबंध-संग्रह नहीं, अपितु जीवन के विविध रूपों को उजागर करनेवाली रचना है। इसमें समसामयिक व सामाजिक प्रश्न हैं और परिवार एवं संस्कृति से संबंधित विषय भी। सुप्रसिद्ध लेखिका संतोष शैलजा के संवेदनशील हृदय ने उन सभी प्रश्नों के समाधान ढूँढ़ने का प्रयास किया है। इनके अलावा प्रकृति एवं सौंदर्य के साथ सांस्कृतिक विषय भी इन निबंधों में सहज प्रवेश पा गए हैं और कुछ संस्मरण भी हैं, जो यादगार बन गए हैं।
अपने पति शान्ता कुमार के साथ भारत-भ्रमण के अधिकांश अवसरों पर देश के विभिन्न भागों में प्रकृति के सान्निध्य से प्राप्त सुखद आभास की परिणति भी बहुत से लेखों के रूप में हो गई है।
सहज मन की सहज अभिव्यक्ति एवं मनोरंजन से भरपूर हैं ये निबंध।
Deepshikha Sa Jeevan Hai by Jai Shankar Mishra
प्रस्तुत कविता-संग्रह ‘दीपशिखा सा जीवन है’ श्री जयशंकर मिश्र की काव्य-यात्रा का षष्ठम सोपान है। इसमें कुल 56 नवीन रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं। इससे पूर्व की रचनाएँ ‘यह धूप-छाँव, यह आकर्षण’, ‘हो हिमालय नया, अब हो गंगा नई’, ‘चाँद सिरहाने रख’, ‘बाँह खोलो, उड़ो मुक्त आकाश में’ एवं ‘बस यही स्वप्न, बस यही लगन’ हिंदी साहित्य-जगत् में अत्यधिक रुचि, उल्लास एवं गंभीरता के साथ स्वीकार की गई हैं।
श्री मिश्र की कविताओं में भाषा की सहजता, सरलता एवं सुगमता के साथ ही अंतर्निहित पारिवारिक एवं सामाजिक समरसता की महत्ता, युग-मंगल की कामना, जीवन के उद्देश्यों के प्रति सतत चिंतन तथा परिवेश की विविध जटिलताओं के बावजूद मानव जीवन को सौंदर्यमय एवं शिवमय बनाने की बलवती भावना रचनाकार को एक विशिष्ट पहचान देती है। अनेक रचनाओं में प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के प्रति रचनाकार की संवेदनशीलता तथा तादात्म्य स्थापित करने का रुझान भी प्रतिबिंबित होता है।
वर्तमान कविता-संग्रह के प्रति डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के निम्न उद्गार महत्त्वपूर्ण हैं—
‘‘मैंने श्री जयशंकर मिश्र की कविताएँ पढ़ीं। ये एक संवेदनशील चित्त की भावाभिव्यक्तियाँ हैं, जो सागर के, प्रकृति के, परिवेश और परिवार के संबंध में हैं। कविता अपने बुनियादी रूप में कवि की भावाभिव्यक्ति ही होती है। मिश्रजी ने अपनी रागात्मक संवेदनाओं को छंदोबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है, जिनमें उनकी स्मृति और प्रीति, वेदना और उल्लास तथा आशा और मंगलकामना व्यक्त हुई है। आशा है, पाठक इनका स्वागत करेंगे।’’
Deerghtama by Abid Surti
सूर्यकांत बाली का यह उपन्यास वैदिक प्रेमकथा पर आधारित है। वैदिक काल के कथानकों को उपन्यासों के माध्यम से पाठकों तक सशक्त और अत्यंत आकर्षक शैली में पहुँचाने वाले श्री बाली हिंदी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं के पहले उपन्यासकार के रूप में उभरकर हमारे सामने आए हैं। प्रस्तुत उपन्यास महत्त्वपूर्ण वैदिक कवि ‘दीर्घतमा’ पर आधारित है। दीर्घतमा जन्मांध थे; लेकिन प्रकृति ने उनके इस अभाव की पूर्ति उन्हें तीव्र प्रतिभाशाली और संवेदनशील कवि बनाकर की थी। जन्म से पूर्व ही पिता और फिर शीघ्र ही माँ का देहांत हो जाने से वे अकेले पड़ गए। दीर्घतमा के काव्य में माँ और पिता की भावुक तलाश का मार्मिक चित्रण मिलता है। अनेक स्त्रियों ने दीर्घतमा से प्रेम किया, जिसका पुराणों में कई बार बड़ी ही लच्छेदार शैली में वर्णन मिल जाता है। पर प्रेयसियों से भरपूर जीवन में भी दीर्घतमा की अपनी माँ की ममता की तलाश बुझी नहीं और उसी तलाश में उनके काव्य का सौंदर्य और गहराई बढ़ने लगी। दुष्यंत-शकुंतला के पुत्र और हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट् भरत के समकालीन दीर्घतमा आंगिरस कुल के थे। बड़े ही पुराने समय से इस कुल के संबंध वैशाली राजवंश से थे। वैशाली राजवंश भारत के पूर्व में राज करता था, जिसने उस नदी के किनारे अपनी राजधानी बनाई, जिसे आज हम गंडक नदी के नाम से जानते हैं।
दीर्घतमा की जीवनगाथा को जिन परंपराओं के जरिए आज तक सँजोकर रखा है, प्रेम और दार्शनिकता से भरपूर उसी जीवनगाथा पर यह उपन्यास आधारित है, जिसमें वैदिक काल के आश्रमों, राजमहलों और सामान्य जीवनशैली को बड़े ही सजीव तरीके से पाठकों के समक्ष रख दिया गया है।
Deewali Ke Nanhe Mehaman by Prakash Manu
प्रकाश मनु बच्चों के चहेते लेखक हैं, जिनकी कविता, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास बच्चे ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं और एक बार पढ़ने के बाद उनकी जादुई लेखनी के प्रभाव को कभी भूल नहीं पाते। कभी वे उनके साथ हँसते-खिलखिलाते और चहकते हैं तो कभी किसी मार्मिक प्रसंग की भावना में बहते हुए किसी और ही दुनिया में पहुँच जाते हैं।
‘दीवाली के नन्हे मेहमान’ प्रकाश मनु की बाल और किशोर पाठकों के लिए लिखी गई बड़ी ही रोचक और रसपूर्ण कहानियों का संग्रह है। ये ऐसी बाल कहानियाँ हैं, जिनमें बचपन का हर रंग, हर अंदाज है और नटखटपन से भरी कौतुकपूर्ण छवियाँ भी, जो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी मुग्ध करती हैं। इनमें बच्चे हैं, उनके सुख-दुःख और सपने भी; और मनुजी ने मानो खुद बच्चा बनकर ही इन्हें बालमन की गहरी संवेदना के साथ लिखा है। इन कहानियों को पढ़ते हुए बच्चे अपने आसपास की दुनिया के दुःख-तकलीफों और समस्याओं में भी साझीदार होते हैं और एक सुंदर दुनिया बनाने में अपनी छोटी सी, लेकिन सार्थक भूमिका निभाते नजर आते हैं।
बरसों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे प्रकाश मनु की ताजा कहानियों के इस संग्रह में किस्सागोई के तमाम रंग हैं। संग्रह की हर कहानी में बचपन की एक अलग दुनिया, अलग दास्तान है! इनमें मस्ती है और नटखटपन भी। इसीलिए ये कहानियाँ बच्चों को अपने दोस्त सरीखी लगेंगी। एक बार पढ़ने के बाद वे इन्हें कभी भूलेंगे नहीं और हमेशा एक बहुमूल्य उपहार की तरह सँजोकर रखेंगे।
Delhi Ko Poorna Rajya Ka Darza? by S.K. Sharma
संविधान निर्माताओं को इसमें कोई संशय नहीं था और वे स्पष्ट थे कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की संकल्पना तब तक अव्यावहारिक है जब तक कि दिल्ली भारत संघ की राजधानी और केंद्र सरकार का मुख्यालय है।
संविधान निर्माताओं द्वारा प्रकट किए गए एकमत वाले विचारों के बावजूद एवं संकीर्ण निहित स्वार्थों हेतु स्थानीय स्तर पर कुछ राजनीतिक दलों ने हमारे राष्ट्रीय प्रतिरूपों के बुद्धिमत्तापूर्ण विजन के प्रतिकूल समय-समय पर पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग जारी रखी है।
दिल्ली के मतदाताओं के विजन, बुद्धि और दूरदर्शिता का अभिवादन, जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में इस माँग के हिमायतियों को लोकसभा में एक भी सीट न देकर पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे को खारिज कर दिया।
इस विषय पर यह एक ऐसी पुस्तक है, जो अनेक रहस्यों को खोलती है। अतः इसका अध्ययन पाठकों का ज्ञानवर्धक करेगा।
Delhi Sarkar Ke Sansadiya Sachivon Ka Sach by S.K. Sharma
लेखक की पूर्व में प्रकाशित पुस्तक, जिसका शीर्षक था ‘दिल्ली सरकार की शक्तियाँ और सीमाएँ : तथ्य और भ्रम’ में किए गए खुलासों के कारण ही राजधानी के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द हो गई थी।
लेखक का दावा है कि इस पुस्तक में किए गए खुलासे दिल्ली की राजनीति में खलबली मचाएँगे, पाठकों को बार-बार चौंकाएँगे, विधानसभा के पदाधिकारियों, अधिकारियों एवं विधायकों के एक वर्ग की रातों की नींद उड़ाएँगे, संविधान को ठेंगा दिखाकर सरकार में मंत्री स्तर की अवैध नियुक्तियाँ करनेवालों को अपनी गलती पर शर्म महसूस कराएँगे, अगले चंद दिनों में राजधानी की नीरस खबरों में कुछ चटपटापन लाएँगे तथा महज सूत्रों के हवाले से खबर देनेवाले मीडिया को अपने सूचना-तंत्र को और अधिक पैना बनाने का एहसास कराएँगे।
ऐसा होना इसलिए तय है, क्योंकि किए गए खुलासों का आधार कोई सूत्र नहीं, बल्कि वे प्रामाणिक तथ्य एवं दस्तावेज हैं, जिन्हें निर्वाचन आयोग द्वारा कोड़ा फटकारने पर दिल्ली सरकार को दबी हुई फाइलों से बाहर निकालने पर मजबूर होना पड़ा है।
Dene Ka Anand by bill Clinton
देने का आनंद
प्रस्तुत पुस्तक ‘देने का आनंद’ बिल क्लिंटन का विश्व समुदाय के प्रति मानव-सेवा का आह्वान है। यह एक प्रेरणादायी पुस्तक है, जो विश्व में बदलाव लाने के लिए हर क्षेत्र के व्यक्ति को प्रेरणा देती है—चाहे वह विशिष्ट व्यक्ति हो या आम। सर्वप्रथम, इस पुस्तक में कंपनियों, संगठनों तथा व्यक्तियों द्वारा समस्याओं के समाधान और अपने आस-पास से लेकर समूचे विश्व तक लोगों का जीवन बचाने की दिशा में किए जा रहे असाधारण और नवीन प्रयासों की जानकारी दी गई है।
इस पुस्तक में श्री क्लिंटन ने कुछ गंभीर एवं जटिल विषयों पर अपनी गहन व व्यापक दृष्टि डाली है। उन्होंने उस नन्ही लड़की की भूरि-भूरि प्रशंसा की है, जिसने ‘बीच’ से गंदगी, कूड़ा-करकट हटाया। वहीं ऐसे अरब-खरबपतियों की भी सराहना की है, जो छात्रवृत्ति के लिए धनराशि देते हैं तथा गरीब देशों को माइक्रो-क्रेडिट ऋण देते हैं। इस पुस्तक में दान के विभिन्न स्वरूपों को उजागर किया गया है। इनमें क्लिंटन ने परोपकार एवं मानव-सेवा की अनेक कथाओं को वर्णित किया है। अधिकांश कथाओं को सुखांत दरशाया गया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति समय या धन का दान दे, मदद करे, तो हम एक शानदार और खुशहाल दुनिया का निर्माण कर सकते हैं।
क्लिंटन कहते हैं—“हर किसी में कुछ-न-कुछ देने की क्षमता होती है। मुझे आशा है कि इस पुस्तक में वर्णित चरित्रों तथा कथाओं-उपकथाओं से जन-मानस की अंतरात्मा का विकास होगा। इसकी विषय-वस्तु पाठकों के हृदयों को छू लेगी।”
पुस्तक का सार है कि नागरिकों की सक्रियता और सेवाभाव द्वारा विश्व को सहजता से बदला जा सकता है।
Deng Xiaoping Aur China Ki Sanskritik Kranti by Deng Rong
चीन मूल रूप से एक कृषिप्रधान विशाल साम्राज्यवादी देश रहा है, जिसमें गिने-चुने धनाढ्य जमींदार परिवारों का वर्चस्व था। उन्होंने आबादी के बड़े हिस्से पर राज किया, जिसमें मुख्य रूप से बंधुआ मजदूर और काश्तकार किसान थे। धनाढ्य वर्ग का नियंत्रण सरकार, सेना, न्यायपालिका से लेकर कानून लागू करनेवाली इकाइयों तक, हर स्तर पर था।
यह पुस्तक चीन की सरजमीं के शानदार लोगों के जीवन के सभी आयामों का अद्भुत प्रस्तुतिकरण है— चीनी लोगों की जिंदगी का वह पहलू जो इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों के बंधनों में बँधा कठिन-से-कठिन दौर में भी जीवंत बना रहता है। माओमाओ ने सन् 1966 से सन् 1976 के बीच हुई सांस्कृतिक क्रांति के दौरान अपने पिता के जीवन में घटी घटनाओं को एक पुस्तक के स्वरूप में पिरोकर पेश किया है।
Denpa Tibet Ki Diary by Neerja Madhav
तिब्बत की सांस्कृतिक मृत्यु पर भारत चुप नहीं रह सकता। पूरा विश्व मानवाधिकार हनन के प्रश्न पर मौन नहीं रह सकता। ये दोनों ही बिंदु तिब्बत आंदोलन को बल प्रदान करते हैं। भारत सरकार क्या सोचती है, यदि इस प्रश्न को एक ओर रख दिया जाए तो इतना स्पष्ट है कि पूरा हिंदुस्तान यह सोचता है कि तिब्बत की स्वतंत्रता की लड़ाई उनकी अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई के समान है। यदि सन् 1947 के पूर्व उन्हें आजादी एवं लोकतंत्र चाहिए था, तो क्या कारण है कि वह आजादी और लोकतंत्र आज तिब्बत के लोगों को नहीं मिलना चाहिए?
विस्तारवादी चीन का अस्तित्व शेष दुनिया के लिए खतरा है। जो देश इस खतरे को समझेंगे, वे आपस में मिलेंगे। चीन टूटेगा और तिब्बत को आजादी भी मिलेगी। बफर स्टेट के रूप में तिब्बत सदियों से भारत का अच्छा पड़ोसी रहा है। तिब्बत की स्वतंत्रता के बाद विश्व भर में शांति, भाईचारा और अध्यात्म को शक्ति मिलेगी। अहिंसा और शांति मानव मात्र के विकास के लिए जरूरी है। तिब्बत की स्वतंत्रता से इन्हें बल मिलेगा।
—इसी उपन्यास से
तिब्बत-अस्मिता के जलते सवाल पर अपने लेखन से चर्चा में आई सिद्धि-संपन्न लेखिका नीरजा माधव की ताजा औपन्यासिक कृति ‘देनपा : तिब्बत की डायरी’। तिब्बती समाज की संघर्षगाथा का युगीन दस्तावेज, जो सुरक्षित रहेगा सदियों तक तेन्ग्यूर की तरह।
Desh-Videshon Ki Rashtriya Vichardharayen by Dr. Ashok Modak, Prof. Prabhakar Nanakar, Prof. Narayan Gune
सामयिक राष्ट्रीय विचारधारा का प्रभाव राष्ट्र के इतिहास में कैसा महत्त्वपूर्ण रहता है, यह इस पुस्तक का मुख्य विषय है। पुस्तक का विभाजन छह भागों में किया है। पहले भाग में विचारधारा और राष्ट्रीय विचारधारा की संकल्पना, अर्थ तथा विशेषता स्पष्ट की गई है। दूसरे भाग में सामयिक राष्ट्रीय विचारधारा के प्रभाव के संदर्भ में जापान, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, पूर्व-यूरोपीय राष्ट्र, मध्य-एशियन राष्ट्र, टर्की आदि देशों के इतिहास की चर्चा है। तीसरे भाग में भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा और भारतीय संविधान का विवरण है। चौथे भाग में राष्ट्रीय विचारधारा के संवर्धन हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कांग्रेस, अनेक संप्रदायों, विविध मंदिरों और तीर्थ स्थानों के प्रयास का लेखा-जोखा प्रस्तुत है। भाग पाँच में राजकीय विचारधारा, उनके स्वतंत्रता के बाद किए हुए कार्य का और उनके सामने स्थित चुनौतियों का विवरण है। छठे भाग में सामयिक राष्ट्रीय विचारधारा की एकात्म शक्ति ही राष्ट्र की सभी समस्याओं का हल निकाल सकती है, इस सत्य का निरूपण किया है।
विश्व प्रसिद्ध शास्त्रज्ञ पद्मभूषण डॉ. विजय भटकर ने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है—भारतीय संस्कृति शाश्वत है। इसी भारतीय संस्कृति से भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा का निर्माण हुआ है। देश के सभी स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा का अध्ययन होना आवश्यक है। इस अध्ययन को गति प्रदान करने के लिए इस पुस्तक का उपयोग हो सकता है। सभी नागरिकों को राष्ट्रीय विचारधारा की समन्वयी शक्ति का प्रभाव किस प्रकार हो सकता है, इसकी जानकारी इस पुस्तक द्वारा अवश्य प्राप्त होगी।
Desh, Samaj Aur Sanskriti by Dr. Chandar Sonane
चंदर सोनाने की इस पुस्तक के लेख अखबार में लिखे गए नियमित स्तंभ का हिस्सा रहे हैं। अखबार के लिए नियमित लिखना एक कठिन और चुनौती भरा काम है। नित नया और विचारोत्तजक लिखना दायित्व और विवशता दोनों हैं। चंदर सोनाने ने इसके लिए बहुत श्रम किया है। अपने लेखन को रोचक बनाने के साथ ही चंदर ने उसे सामाजिक सरोकारों से भी जोड़ा है, चाहे वे स्थानीय मुद्दे हों या अखिल भारतीय या विश्व समाज के, उन्हें उसी दायित्व-बोध के साथ सहजता से लिखा है।
चंदर के ये लेख महज एक शहर या देश के बदलाव के संकेत नहीं हैं, बल्कि साथ ही मीडिया और उसकी भाषा के बदलाव पर भी परोक्ष केंद्रित होते हैं। समाज में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, सूचना और संचार माध्यम उसे किस तरह प्रभावित कर रहे हैं; साथ ही इन सबके नकारात्मक प्रभाव की समझ के साथ ये लेख अपने समय और समाज को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विश्लेषणों की जरूरत पर स्पेस भी बनाते हैं।
इन लेखों में स्थानीयता की झलक के साथ समूचे सामाजिक, सांस्कृतिक, और राजनीतिक परिवेश की विसंगतियों की झलक भी है।
Deshbhakti Ke Pavan Teerth by Rishi Raj
यह पुस्तक समावेश है यात्रा-वृत्तांत और वीरों से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों का, जिसमें लेखक ने प्रयास किया है कि वे अत्यंत रोचक तरीके से आज की पीढ़ी को हमारे देश के स्वर्णिम इतिहास से अवगत करवाएँ। इस पुस्तक की शुरुआत 1857 की क्रांति से जुड़े स्थानों जैसे की बैरकपुर (पश्चिम बंगाल), वेल्लोर (तमिलनाडु) और मेरठ से की गई, जहाँ से आजादी की लौ प्रज्वलित हुई थी। भारत में इन जगहों के इतिहास पर तो आपको कई पुस्तकें मिल जाएँगी, पर यात्रा-वृत्तांत के साथ इतिहास के इस अनूठे मेल पर ऐसी पुस्तक शायद पहली बार प्रकाशित हो रही है।
लेखक पाठक को 1857 के क्रांति स्थलों से लेकर 1999 के कारगिल युद्ध से जुड़े स्थानों पर लेकर गए हैं। इसके अलावा सेल्लुलर जेल, हुसैनीवाला, सियाचिन और जलियावाला बाग पर भी अध्याय हैं।
इस पुस्तक के द्वारा लेखक ने हमारे देशभक्त और जांबाज सैनिकों और देश के लिए अपना सर्वस्व लुटानेवाले अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। लेखक का प्रयास है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और वीरों की अमर गाथा और उनसे जुड़े स्थानों का ज्ञान आज की युवा पीढ़ी तक पहुँचाया जाए, ताकि उनमें देश में राष्ट्रघाती ताकतें, जो समय-समय पर सिर उठाती रहती हैं, उनका दमन करने की शक्ति मिले और देशभक्ति की लौ को तीव्र गति से प्रज्वलित किया जा सके।
भारत माँ के वीर सपूतों का पुण्य-स्मरण कर उनके प्रति विनम्र आदरांजलि है यह पुस्तक।