Hindi Literature
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Dr. Kalam Ke Sapanon Ka Bihar by Lalit Kumar Singh
बिहार राज्य का इतिहास अत्यंत ही प्राचीन एवं गौरवशाली रहा है। यह राज्य पूर्व ऐतिहासिक काल से ही विकसित होनेवाली संस्कृतियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है और विभिन्न युगों में इसने देश के इतिहास एवं सांस्कृतिक जीवन में अग्रणी भूमिका निभाई है।
इतना प्राचीन एवं गौरवशाली अतीत होने तथा विकास एवं उन्नति के पथ पर अग्रसर होने की सारी क्षमताएँ होते हुए भी आज यह राज्य विकसित राज्यों की श्रेणी से बाहर है।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सदा बिहार के उत्कर्ष का स्वप्न देखते रहे और इसकी संभावनाओं को साकार करने के लिए प्रेरित करते रहे।
इस पुस्तक में डॉ. कलाम ने बिहार को विकसित राज्य बनाने के लिए न सिर्फ वैज्ञानिक सोच, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की भी रूपरेखा निर्धारित की है। इसमें प्रस्तुत विचार ‘महात्मा बुद्ध के संदेश’ के सदृश्य बिहार की प्रगति के लिए वरदान हैं।
डॉ. कलाम की विभिन्न बिहार-यात्राओं के दौरान दिए गए संदेशों का संकलन है यह पुस्तक। इनसे प्रेरित होकर राज्य के सभी वर्गों के लोग एकजुट होकर विकास-कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाएँ, तो विकसित बिहार के स्वप्न को साकार करना कठिन नहीं होगा।
Dr. Rammanohar Lohiya Aur by Kanhaiya Tripathi
लोहिया ने नेहरूवियन सभ्यता का खुलकर विरोध किया और उस सभ्यता का विरोध गांधीजी ने भी किया था; लेकिन गांधी और लोहिया में फर्क यह था कि गांधी ने कभी सत्ता में आकर या जन-प्रतिनिधि के रूप में विरोध नहीं जताया और लोहिया ने सदन तक अपना विरोध दर्ज किया। हिंदी, स्त्री, जातीय असमानता और वैश्विकता पर वह खुलकर बोले और साथ ही इस बात की पुरजोर कोशिश उन्होंने की कि उसे धरातल पर लाया जाए। लोहिया का यह समाजवादी दर्शन लोहिया का जनतांत्रिक स्वप्न था; लेकिन यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उन्हें वह अवसर नहीं प्राप्त हो सका कि अपने सपनों का भारत गढ़ सकें।
Dr. Shyama Prasad Mukerjee Aur Kashmir Samasya by Ritu Kohli
डॉ श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने अपना सार्वजनिक जीवन शिक्षाविद् के रूप में आरंभ किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के वे उपकुलपति रहे। तदुपरांत उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। बंगाल की प्रांतीय राजनीति में मुस्लिम लीग की सांप्रदायिकता से टक्कर ली, हिंदू महासभा के नेता के रूप में हिंदुओं के न्यायोचित हितों और अधिकारों का समर्थन किया और कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति का विरोध किया, राष्ट्रीय स्वातंत्र्य आंदोलन में भाग लेकर भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, देश का विभाजन होने की अपरिहार्य स्थिति उत्पन्न हो जाने पर बंगाल का विभाजन करवाया और बंगाल के बड़े हिस्से को पाकिस्तान में जाने से बचा लिया। आजादी के बाद उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री के रूप में भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखी और पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं के उत्पीड़न और निष्क्रमण के मुद्दे पर नेहरू की नीतियों से असहमत होकर केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। राजनीति में कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प की आवश्यकता अनुभव कर भारतीय जनसंघ की स्थापना की। कश्मीर के प्रश्न पर डॉ. मुकर्जी ने शेख अब्दुल्ला की अलगाववादी नीतियों का विरोध किया; धारा 370 की समाप्ति तथा जम्मू-कश्मीर केभारतमेंपूर्णविलयकेलिएआंदोलनकियाऔर अपनेजीवनकाबलिदानदिया।कश्मीर काप्रश्नअभीभीअनसुलझा ही है। प्रस्तुत पुस्तक में वर्णित डॉ. मुकर्जी का कर्तृत्व इस अनसुलझे प्रश्न के समाधान की दृष्टि प्रस्तुत करता है।
Draupadi Ki Aatmakatha by Manu Sharma
द्रौपदी का चरित्र अनोखा है। पूरी दुनिया के इतिहास में उस जैसी दूसरी कोई स्त्रा् नहीं हुई। महाभारत में द्रौपदी के साथ जितना अन्याय होता दिखता है, उतना अन्याय इस महाकथा में किसी अन्य स्त्रा् के साथ नहीं हुआ। द्रौपदी संपूर्ण नारी थी। वह कार्यकुशल थी और लोकव्यवहार के साथ घर-गृहस्थी में भी पारंगत। लेकिन द्रौपदी जैसी असाधारण नारी के बीच भी एक साधारण नारी छिपी थी, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डाह जैसी समस्त नारी-सुलभ दुर्बलताएँ मौजूद थीं।
द्रौपदी का अनंत संताप उसकी ताकत थी। संघर्षों में वह हमेशा अकेली रही। पाँच पतियों की पत्नी होकर भी अकेली। प्रतापी राजा द्रुपद की बेटी, धृष्टद्युम्न की बहन, फिर भी अकेली। पर द्रौपदी के तर्क, बुद्धिमत्ता, ज्ञान और पांडित्य के आगे महाभारत के सभी पात्र लाचार नजर आते हैं। जब भी वह सवाल करती है, पूरी सभा निरुत्तर होती है।
महाभारत आज भी उतना ही प्रासंगिक और उपयोगी है, वही समस्याएँ और चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। राजसत्ता के भीतर होनेवाला षड्यंत्र हों या राजसत्ता का बेकाबू मद या फिर बिक चुकी शिक्षा व्यवस्था हो या फिर छल-कपट से मारे जाते अभिमन्यु। आज भी द्रौपदियों का अपमान हो रहा है। कर्ण नदी-नाले में रोज बह रहे हैं।
‘कृष्ण की आत्मकथा’ जैसी महती कृति के यशस्वी लेखक श्री मनु शर्मा ने महाभारत के पात्रों और घटनाओं की आज के संदर्भ में नई व्याख्या कर उपेक्षित द्रौपदी की पीड़ा और अडिगता को जीवंतता प्रदान की है। नारी की अस्मिता को सम्मान देनेवाली अत्यंत पठनीय कृति।
Drishti Nahin, Drishtikon Chahiye by Rajesh Singh, Ias
अनगिनत भारतीयों की तरह ही राजेश सिंह का भी एक सपना था। वह एक आई.ए.एस. अधिकारी बनना चाहते थे। बस एक समस्या थी—वह देख नहीं सकते थे।
यह पुस्तक पटना के एक युवा, राजेश के प्रेरणादायी सफर की कहानी है, जो प्रज्ञाचक्षु है। भारी मुश्किलों से लड़ता हुआ वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में अपनी पूरी ताकत लगा देता है। यह परीक्षा बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धात्मक है, लेकिन इसमें सफल होना कई लोगों का सपना भर रह जाता है।
लेकिन अपनी प्रबल इच्छाशक्ति, अदम्य जिजीविषा, कठिन परिश्रम, लगन और साधना ने दिव्यांग उत्साही राजेश को इस दुर्गम प्रतियोगिता में सफल होने का मार्ग प्रशस्त किया।
ऐसी प्रेरक जीवनयात्रा पाठकों के समक्ष इस भाव से प्रस्तुत है कि किसी शारीरिक अक्षमता के बावजूद व्यक्ति फौलादी इरादों के बल पर अपने सपनों को पूरा करने के लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर सकता है।
Drishtikon by Lal Krishna Advani
‘मेरा देश मेरा जीवन’ अहर्निश राष्ट्र-सेवा को समर्पित शिखर पुरुष लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा है। वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में आडवाणी अपनी प्रतिबद्धता, प्रखर चिंतन, स्पष्ट विचार और दूरगामी सोच के लिए जाने जाते हैं। वे ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ को जीवन का मूलमंत्र मानकर पिछले छह दशकों से राजनीति में सक्रिय हैं।
प्रस्तुत पुस्तक आडवाणी द्वारा बड़े ही सशक्त व भावपूर्ण शब्दों में आपातकाल के समय लोकतंत्र के लिए किए गए उनके संघर्ष और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु की गई ‘राम रथयात्रा’—जो स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा जन-आंदोलन थी और जिसने पंथनिरपेक्षता के सही अर्थ और मायनों को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ी—का भी बड़ा ही सटीक विवेचन करती है। साथ ही वर्ष 1998 से 2004 तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में गृहमंत्री, फिर उपप्रधानमंत्री पद पर आडवाणी द्वारा अपने दायित्व के सफल निर्वहन पर भी प्रकाश डालती है।
इस पुस्तक ने आडवाणी की राजनीतिक सूझ-बूझ, विचारों की स्पष्टता और अद्भुत जिजीविषा को और संपुष्ट कर दिया है, जिसे उनके प्रशंसक एवं आलोचक—सभी मानते हैं।
Dukh-Mukti Ka Marg by Aacharya Mahashraman
सुपात्र को दान देना, गुरु के प्रति विनय रखना, प्राणिमात्र के प्रति दया रखना, न्यायपूर्ण आचरण करना, दूसरों के हित का विचार करना, लक्ष्मी का अभिमान नहीं करना और सज्जन पुरुषों की संगति करना सामान्य धर्म का स्वरूप है। निर्मल बुद्धिवाले व्यक्तियों को इनका पालन करना चाहिए।
त्याग धर्म है, भोग अधर्म है। संयम धर्म है, असंयम अधर्म है। धर्म अनमोल है, मूल्य से प्राप्त होनेवाला धर्म नहीं है। व्यक्ति धर्म को समझे, बुराइयों का त्याग करे, नशा छोड़े, गुस्सा छोड़े और बेईमानी को छोड़े। धर्म को समझकर पाप को छोड़नेवाला व्यक्ति दुःखमुक्त होता है और अधर्म के रास्ते पर चलनेवाला अथवा अदृष्टधर्मा व्यक्ति अपने लिए दुःख तैयार कर लेता है।
प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार के आध्यात्मिक विकास और भावोन्नति के अनेक सूत्र प्रतिपादित हैं। यह हर आयु वर्ग के पाठकों को निश्चय ही सत्पथ पर अग्रसर करने में सक्षम है।
मानवजीवन को तनावमुक्त कर सरल और आनंदमय बनाने का मार्ग प्रशस्त करती प्रीतिकर पुस्तक।
Duniya Ke Mahan Chamatkar by Mahesh Dutt Sharma
दुनिया चमत्कारों से भरी है; इनमें कुछ चमत्कार मानव-निर्मित हैं, कुछ प्राकृतिक। मनुष्य की सदा से सहज चाह रही है कि वह कुछ नया करे, कुछ नया खोजे। उसकी इसी सहज वृत्ति ने हमारी दुनिया को चमत्कारों का पिटारा बना दिया। इन चमत्कारों में मिस्र के पिरामिड, ब्राजील का क्राइस्ट दि रिडीमर, भारत का ताजमहल, रूस का क्रेमलिन, कनाडा का सी.एन. टावर, अफ्रीका के नोरोनगोरो क्रेटर एवं सेरेंगेती, ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बेरियर रीफ, संयुक्त राज्य अमेरिका का माउंट रुशमोरे इत्यादि जैसे सैकड़ों चमत्कार शामिल हैं। ये चमत्कार केवल चमत्कार भर नहीं हैं, बल्कि उस स्थान और परिवेश की कला, संस्कृति, दर्शन और भौतिक-विशेषताओं के ध्वजवाहक भी हैं। इनमें दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता है।
इन चमत्कारों के निर्माण के साथ-साथ इनके बारे में जाननेवालों की भी कमी नहीं है। जिज्ञासुओं और यायावरों की इसी जिज्ञासा पूर्ति हेतु इस पुस्तक की रचना की गई है। पुस्तक में दुनिया भर के सौ से अधिक मानव-निर्मित एवं प्राकृतिक चमत्कारों का सुरुचिपूर्ण और जीवंत विवरण दिया गया है। विवरण के साथ दिए गए चित्र पाठकों को सहज ही उस दुनिया से रूबरू करा देते हैं।
Durabhisandhi (Krishna Ki Atmakatha -Ii) by Manu Sharma
दुरभिसंधि
मेरी अस्मिता दौड़ती रही, दौड़ती रही। नियति की अँगुली पकड़कर आगे बढ़ती गई-उस क्षितिज की ओर, जहाँ धरती और आकाश मिलते हैं। नियति भी मुझे उसी ओर संकेत करती रही; पर मुझे आज तक वह स्थान नहीं मिला और शायद नहीं मिलेगा।फिर भी मैं दौड़ता रहूँगा; क्योंकि यही मेरा कर्म है। मैंने युद्ध में मोहग्रस्त अर्जुन से ही यह नहीं कहा था, अपितु जीवन में बारबार स्वयं से भी कहता रहा हूँ-‘कर्मण्येवाधिकास्ते’।
वस्तुतः क्षितिज मेरा गंजव्य नहीं, मेरे गंजव्य का आदर्श है। आदर्श कभी पाया नहीं जाता। यदि पा लिया गया तो वह आदर्श नहीं। इसीलिए न पाने की नििश्ंचतता के साथ भी कर्म में अटल आस्था ही मुझे दौड़ाए लिये जा रही है। यही मेरे जीवन की कला है। इसे लोग ‘लीला’ भी कह सकते हैं; क्योंकि वे मुझे भगवान् मानते हैं।… और भगवान का कर्म ही तो लीला है।
कृष्ण के अनगिनत आयाम हैं। दूसरे उपन्यासों में कृष्ण के किसी विशिष्ट आयाम को लिया गया है। किंतु आठ खंडों में विभक्त इस औपन्यासिक श्रृंखला ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में उकेरने का सफल प्रयास किया गया है। किसी भी भाषा में कृष्णचरित को लेकर इतने विशाल और प्रशस्त कैनवस का प्रयोग नहीं किया है।
यथार्थ कहा जाए तो ‘कृष्ण की आत्मकथा’ एक उपनिषदीय कृति है।
‘कृष्ण की आत्मकथा श्रृंखला के आठों ग्रंथ’
नारद की भविष्यवाणी
दुरभिसंधि
द्वारका की स्थापना
लाक्षागृह
खांडव दाह
राजसूय यज्ञ
संघर्ष
प्रलय
Dwandwa by Sudha Murthy
मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है? उसे ढूँढना चाहिए । अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है । इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्त से जुड़े हैं ।
जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं । तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था । बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी -सुमन का इकलौता बेटा था । लक्ष्मीपुत्र था । भारतीय था । आज वह भारत का भी नहीं है । इस भूमि का, इस देश का, इस संस्कृति का नहीं है । अब वह अमेरिकी है!
– द्वंद्व’ से
” मुझे आपसे कुछ पूछना है । अच्छा, पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता, फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?
” माँजी, एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगी? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं । जहाँ तक मेरी समझ है, मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा । न पहले थे, न अब हैं । हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे ।..
‘ तर्पण ‘ से
सुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे ।
Dwarka Ka Suryasta by Dinkar Joshi
‘ दाऊ!” बलराम के पास जाकर कृष्ण ने तनिक झुककर उनसे पूछा, ” किस सोच में डूबे हैं आप?”
” कृष्ण! प्रभासक्षेत्र के आयोजन एवं गांधारी के शाप की समयावधि के बीच.. ”
” बड़े भैया!” कृष्ण जैसे चौंक उठे, ” आप… आप.. .यह क्या कह रहे हैं?”
” माधव!” बलराम ने होंठ फड़फड़ाए ” महर्षि कश्यप के शाप को हमें विस्मृत नहीं करना चाहिए । ”
” वह मैं जानता हूँ संकर्षण! उसकी स्मृति हमें ऊर्ध्वगामी बनाए ऐसी प्रार्थना हम करें । ”
” उस प्रार्थना के लिए ही मैं इस समुद्र- तट पर योग-समाधि लेना चाहता हूँ । योग- समाधि पूर्व के इस पल में मैं तुमसे एक क्षमा-याचना करना चाहता हूँ भाई । ”
” यह आप क्या कह रहे हैं, दाऊ? आप तो मेरे ज्येष्ठ भ्राता.. ”
बलराम ने कहा, ” मद्य-निषेध तो एक निमित्त था, परंतु वृष्णि वंशियों के लिए उनका सनातन गौरव अखंड रखने के लिए यह निमित्त अनिवार्य था । फिर भी हम उसे सँभाल न सके । अब इस असफलता को स्वीकार करने में कोई लज्जा या संकोच नहीं होना चाहिए । यादवों को यह गौरव प्राप्त होता रहे, इसके लिए तुमने बहुत कुछ किया; परंतु यादव उस गौरव से वंचित रहे, उस अपयश को मुझे स्वीकार करना चाहिए । समग्र यादव वंश को तो ठीक परंतु कृष्ण.. ” बलराम का कंठ रुँध गया, ” भाई, मैंने तुमसे भी छल… ”
” ऐसा मत कहिए बड़े भैया!” बलराम के एकदम निकट बैठते हुए कृष्ण ने उनके हाथ पकड़ लिये, ” हम तो निमित्त मात्र हैं । कर्मों का निर्धारण तो भवितव्य कर चुका होता है । ”
-इसी उपन्यास से
Dwarka Ki Sthapana (Krishna Ki Atmakath) by Manu Sharma
द्वारका की स्थापना
मैंने जीवन भर कभी तर्क में विश्वास नहीं किया; क्योंकि तर्क अपने विरुद्ध स्वयं खड़ा हो जाता है। वह मानव बुद्धि का परम चतुर किंतु आदर्शहीन शिशु है। उसका जन्म भी उस समय हुआ था जब सत्य और झूठ की पहली लड़ाई हुई थी। तब से वह झूठ का ही प्रवक्ता रहा है। कभी-कभी वह सत्य के पक्ष में भी खड़ा हो जाता है। केवल इसलिए कि वह सत्य से प्रतिष्ठा पाता है और झूठ से जीवन रस।
वस्तुत: सत्य को उसकी आवश्यकता भी नहीं है; सत्य तो स्वयं भाषित है, स्वयं प्रमाण है। कभी-कभी वह बादलों के घेरे में आ जाता है, तब हम उसे छिपता हुआ देखते हैं। वास्तव में यह हमारा दृष्टि भ्रम है। बादलों के छँटते ही उसकी ज्योति अपने स्थान पर स्वतः चमकती दिखाई देने लगती है।
कृष्ण के अनगिनत आयाम हैं। दूसरे उपन्यासों में कृष्ण के किसी विशिष्ट आयाम को लिया गया है। किंतु आठ खंडों में विभक्त इस औपन्यासिक श्रृंखला ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में उकेरने का सफल प्रयास किया गया है। किसी भी भाषा में कृष्णचरित को लेकर इतने विशाल और प्रशस्त कैनवस का प्रयोग नहीं किया है।
यथार्थ कहा जाए तो ‘कृष्ण की आत्मकथा’ एक उपनिषदीय कृति है।
‘कृष्ण की आत्मकथा श्रृंखला के आठों ग्रंथ’
नारद की भविष्यवाणी
दुरभिसंधि
द्वारका की स्थापना
लाक्षागृह
खांडव दाह
राजसूय यज्ञ
संघर्ष
प्रलय
Dwiteeya Vishwa Yuddha by Capt. Rajpal Singh
द्वितीय विश्वयुद्ध सन् 1939 से 1945 तक चलने वाला विश्व-स्तरीय युद्ध था। लगभग 70 देशों की थल, जल, वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मलित थीं और विश्व दो भागों में बँटा हुआ था—मित्र राष्ट्र और धरी राष्ट्र। इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह मानव इतिहास का सबसे घातक युद्ध साबित हुआ। इस महायुद्ध में 5 से 7 करोड़ लोग मारे गए। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत 1 सितंबर, 1939 को हुई मानी जाती है, जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला बोला और उसके बाद जब फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा इंग्लैंड और अन्य राष्ट्रमंडल देशों ने भी इसका अनुमोदन किया।
सन् 1944 और 1945 के दौरान अमेरिका ने कई जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी और पश्चिमी प्रशांत के कई द्वीपों में अपना कब्जा बना लिया। अमेरिका ने जापान में दो परमाणु बम गिराए—हिरोशिमा और नागासाकी की मर्मांतक घटना को विश्व शायद ही कभी भूल पाए। इसके साथ ही 15 अगस्त, 1945 को एशिया में भी द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया।
युद्धों से कभी किसी का भला नहीं हुआ। ये तो विनाश-सर्वनाश के कारण हैं। किसी भी सभ्य समाज में युद्धों का कोई स्थान नहीं है; और इन्हें किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। इस पुस्तक का उद्देश्य भी यही है कि विश्वयुद्धों की विभीषिका से सीख लेकर हम युद्धों से तौबा कर लें और ऐसी परिस्थितियाँ पैदा न होने दें, जो युद्धों का जन्म दें।
मानवीय संवेदना और मानवता को बचाए रखने का विनम्र प्रयास है यह पुस्तक।
E Squared Shreshtha Vicharon Se Safalta Payen by Pam Grout
इस छोटी सी पुस्तक में आपको लगेगा कि आपके विचारों में इतनी शक्ति है कि उसे ठोस रूप देकर आप अनंत संभावनाएँ तलाश सकते हैं। यह पुस्तक आपको पुराने, ठस्स हो चुके विचारों को परे धकेलने में सहूलियत देगी, जो आपकी सोच पर बोझ बने हुए हैं। वास्तविकता परखने के लिए भाँति-भाँति के तर्कों से भरी पुस्तकें आपने पढ़ी हैं; मगर इस पुस्तक में सरलता से प्रयुक्त किए जानेवाले नौ प्रयोग हैं, जो समय के अनुकूल आजमाए हुए हैं। इससे आपको रोजमर्रा की जिंदगी में कोई भी निर्णय लेने के समय दिमाग में पहले से स्थित विचारों को तात्कालिक वास्तविकता के हिसाब से ढालने में मदद मिलेगी। अपनी दोनों आँखों से इस आईने में झाँकने पर लगेगा कि आप अपने दिमाग को नए तारों से
जोड़ रहे हैं और पुरानी लीक की जगह नई लीक बन रही है। आपके दिमाग का मुक्त होना इस बात पर निर्भर है कि वैज्ञानिक प्रयोगों से सीखने के बाद आप किस प्रकार नई संभावनाओं के रास्ते पर खुद को ले जाते हैं।
विचारों को प्रखरता और धारदार बनाने के लिए एक आवश्यक पुस्तक।
E.V.M. (Electronic Voting Machine) by Alok Shukla
पहली सरकार के चुनाव के समय
महीनों से मेहनत करनी पड़ती थी। इस काम में कागज व समय की बरबादी बहुत होती थी। अनेक अधिकारी एवं कर्मचारी मत-पेटियाँ लेकर तैयारी में लगे रहते थे। गणना में भी अधिक समय लगता था और यह काम काफी थकाने वाला एवं ऊबाऊ था। चुनाव के समय मत-पत्रों की छपाई, मत-पत्रों एवं मत-पेटियों का वितरण, फिर उन्हें इकट्ठा करना और फिर करोड़ों मतों की गिनती करना बड़ा ही दुष्कर कार्य था।
अब ई.वी.एम. प्रणाली के माध्यम से ही चुनाव संपन्न होते हैं। अभी भी लोगों को ई.वी.एम. के बारे में सही, तथ्यात्मक और उचित जानकारी नहीं है, इसलिए वे ई.वी.एम. से संबधित निराधार बातें करते रहते हैं। ई.वी.एम. के बारे में आसपास भी गहनता से कम ही जानने को मिलता है। इस पुस्तक में ई.वी.एम. के हर बारीक पहलू को रोचक तरीके से बताया गया है। पुस्तक में जगह-जगह पर रोचक कहानियाँ भी हैं। ये कहानियाँ ई.वी.एम. एवं चुनाव प्रणाली में संतुलन बनाए रखती हैं और पाठकों को नई-नई जानकारियाँ भी प्रदान करती हैं। इस पुस्तक में आवश्यक चित्रों एवं संकेतों का प्रयोग भी किया गया है, जिससे यह पुस्तक जीवंत बन पड़ी है। इस पुस्तक को पढ़कर पाठकों को ई.वी.एम. के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिल पाएगी और इससे जुड़ी उनकी अनेक भ्रांतियाँ दूर हो जाएँगी।
Ek Anokha Ladka by Karan Johar With Poonam Saxena
करण जौहर सफलता, बेबाकीपन, हाजिरजवाबी और बेधड़क बोलने के पर्याय बन चुके हैं, जिससे कभी-कभी न चाहते हुए भी विवाद खड़ा हो जाता है और सुर्खियाँ बन जाती हैं। केजो, जिस नाम से वे मशहूर हैं, एक चहेते बॉलीवुड फिल्म निर्देशक, निर्माता और एक्टर होने के साथ ही नई प्रतिभा की खोज के लिए जाने जाते हैं। अपनी मशहूर कंपनी धर्मा प्रोडक्शंस के जरिए, उन्होंने लगातार नए मानक बनाए और फिर से लिखे गए नियमों को चुनौती दी, और अपने ही ट्रेंड तय किए। लेकिन हम जिस हस्ती को जानते हैं, उसे प्रेरित करनेवाला कौन है?
पहली बार अपनी आत्मकथा में सबकुछ खुलकर कह देनेवाले, केजो अपने बचपन की यादों को ताजा करते हैं, अपनी सिंधी माँ और पंजाबी पिता का प्रभाव, बॉलीवुड को लेकर उनके अंदर का जुनून, फिल्मों में उनका आना, आदित्य चोपड़ा, शाहरुख खान और काजोल के साथ उनकी दोस्ती, उनकी लव-लाइफ, ए.आई.बी. रोस्ट, और भी बहुत कुछ…। अपने चिरपरिचित बेबाक अंदाज में वह भारतीय सिनेमा की पल-पल बदलती तसवीर, चुनौतियों और सबक, तथा दोस्ती के साथ ही इंडस्ट्री में प्रतिद्वंद्विता के बारे में बात करते हैं। ईमानदार, दिल को छूने और गहरी बातें बतानेवाली यह पुस्तक ‘एक अनोखा लड़का’ अपनी क्षमताओं के चरम पर मौजूद एक असाधारण फिल्म निर्माता और उतने ही असाधारण इनसान की कहानी है, जो आपको दिखाते हैं कि कैसे जिएँ और सफल बनें।
Ek Aur Kunti by Vishnu Prabhakar
हिंदी कथा-साहित्य के सुप्रसिद्ध गांधीवादी रचनाकार श्री विष्णु प्रभाकर अपने पारिवारिक परिवेश से कहानी लिखने की ओर प्रवृत्त हुए बाल्यकाल में ही उन दिनों की प्रसिद्ध ‘ उन्होंने पढ़ डाली थीं । उनकी प्रथम कहानी नवंबर 1931 के ‘हिंदी मिलाप ‘ में छपी । इसका कथानक बताते हुए वे लिखते हैं-‘ परिवार का स्वामी जुआ खेलता है, शराब पीता है, उस दिन दिवाली का दिन था ।
Ek Banker Ki Romanchkari Kahani by Ajay Mohan Jain
एक BANKER की
रोमांचकारी कहानी
मैंने अपने जीवन में जेल तो क्या, एक पुलिस स्टेशन भी अंदर से नहीं देखा था। और यहाँ गेट के दूसरी ओर, एक टूटे, झुके हुए फिलिपॉज की बाँह थामे मैं जेल की ऊँची दीवारों के बीच खड़ा था। “सुरेश, प्लीज मेरी मदद करो। आई एम सिंकिंग।” फिलिपॉज अपना संतुलन खो रहा था। मैंने तुरंत उसे सँभाला और शांत करने की कोशिश की। असहायता के उस पल में मैंने उसकी आँखों में जो भय देखा वो अब भी मेरे मन में अंकित है। मैं पानी के लिए चिल्लाया पर जेल कर्मचारियों में से किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। उनके मन में किसी प्रकार की संवदेना या दया नहीं थी। हर चीज (शायद एक को छोड़कर) से निरपेक्ष वे अपने ही नियमों से चलते थे।
—इसी उपन्यास से
‘एक BANKER की रोमांचकारी कहानी’ एक ठेठ नौकरी-पेशा युवक सुरेश की कहानी है, जो बैंक में काम करता है। वह अनाड़ी और रूढ़िवादी है और जीवन के हर चरण में स्वयं को दुनिया की चाल से बेढब पाता है। शहर में आकर बसनेवाले परिवार की दूसरी पीढ़ी से संबंधित वह अभी भी शहरी तौर-तरीके पूरी तरह से नहीं अपना पाया है और कई चीजें वह अब भी अपनी समझ से बाहर पाता है।
हैदराबाद, कलकत्ता और उत्तर प्रदेश के परिवेश में रचित यह उपन्यास शहरी मध्यवर्गीय जीवन के द्वंद्व का एक सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। कहानी सुरेश के जीवन और संघर्षों का यथार्थ चित्रण करती है। क्या वह इस व्यवस्था से लड़ पाएगा या उससे समझौता कर लेगा? पाठकों के लिए कौतूहल से परिपूर्ण एक BANKER की रोमांचकारी कहानी।
Ek Bargad Ki Chhaon Mein : एक बरगद की छाँव में by Himanshu Manglik
‘एक बरगद की छाँव में’ कोई कहानी या उपन्यास नहीं है। न ही यह कविताओं का संकलन है। एक तरह से यह कृति उस बरगद को नमन है, जिसकी छत्रच्छाया में हम जीवन जीना सीखते हैं। बरगद वह होता है, जो हमें न सिर्फ छाया देता है, बल्कि हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है; जो हमें सिखलाता है कि अपनी शख्सियत बनाओ और सिद्धांतों के आधार पर ऐसे चलो कि सिर उठाकर जी सको।
ये रचनाएँ हमारे भीतर के विभिन्न पहलुओं से पाठकों का परिचय करवाएँगी— बल, साहस, करुणा, कठोरता, प्रीत, धर्मनिरपेक्षता, विश्वास, गलत के खिलाफ आवाज उठाने की क्षमता, सहनशीलता और इस तरह के कई अन्य पहलू। ये सारे पहलू हरेक व्यक्ति के भीतर छिपे होते हैं, किंतु हम उन्हें न तो समझ पाते हैं और न उन्हें पनपने देते हैं, क्योंकि हमें जैसी परवरिश मिलती है, हम वैसे ही अपने आपको ढालते हैं। हरेक माता-पिता का दायित्व है कि एक बरगद के वृक्ष के समान हमें ऐसे प्रोत्साहित करते रहें कि हम परिस्थितियों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने की क्षमता बढ़ा सकें। सही मायने में जीवन में सबसे ज्यादा अहमियत दृष्टिकोण की होती है।
आवश्यक है कि आज हर व्यक्ति एक छोटा सा बरगद बन सके। यह इस संकलन का सार है कि कैसे हम अपने भीतर की भावनाएँ जाग्रत् कर सकें और स्वयं एक बरगद बन सकें।
Ek Bharatiya Ki Japan Yatra by Risshi Raj
स्वामी विवेकानंद वर्ष 1893 में जापान गए थे। दरअसल, जब वे विश्व धार्मिक सम्मेलन में शिरकत करने शिकागो जा रहे थे तो कुछ अवधि के लिए जापान में रुके थे। उन्होंने जापान के ओसाका, क्योटो और टोक्यो शहरों का भ्रमण किया था। भारत के कई सारे भगवान् जापान में पूजे जाते हैं। भारत में कारों की क्रांति लाने वाला मारुति सुजुकी का संयुक्त उपक्रम, सुभाष चंद्र बोस जैसे महान् क्रांतिकारी के असल मूल्य को जापान ने ही पहचाना व भारत को आज़ाद करवाने के लिए उनको हर संभव सहयोग प्रदान किया। इसके अलावा अन्य क्रांतिकारी रास बिहारी बोस व नायर साहब के बारे में भी इस पुस्तक में है, जिन्होंने टोक्यो में रहते हुए भारत की आज़ादी के लिए बडे़ प्रयास किए।
सन् 1964 में बुलेट टे्रन चली, तब से लेकर 2019 आ गया और आज तक एक भी दुर्घटना नहीं हुई है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का जापान प्रेम और अब भारत में बुलेट ट्रेन को लाने की क्या तैयारी है, उस पर भी इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। दिल्ली मेट्रो के दिव्य स्वप्न को धरातल पर उतारने में जापान के सहयोग को भुलाया नहीं जा सकता। मेट्रो मैन डॉक्टर ई श्रीधरन ने भी जापान का दौरा किया था और कई सारी सुविधाओं का जायज़ा लिया था।
अगर आप जापान जाने वाले हैं या कभी जीवन में जाने का लक्ष्य रखते हैं या फिर आप इच्छुक हैं जापान की संस्कृति व कला को जानने के लिए, तो आपको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
Ek Cup Coffee by Nirmala Singh
भूमि के मन में आया कि नाश्ता बनाने के लिए मना कर दे, लेकिन फिर सोचा कि बस इसी बात पर तूफान न आ जाए। उसने व्योम की ओर मुँह करके पूछा, ‘‘क्या खाओगे—ब्रेड-आमलेट या सब्जी पराँठा?’’
‘‘यह भी कोई पूछने की बात है?’’
‘‘मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है, इसलिए पूछ रही हूँ।’’
जैसे कहीं से बू आ रही हो, गंदा सा मुँह बनाकर व्योम बोला, ‘‘तुम्हारे तो हर समय दर्द होता रहता है। बस दिनभर के कामों में सुबह का नाश्ता तो बनाती हो, उस पर भी बहाने। रहने दो, मैं खुद ही बना लूँगा।’’
भूमि उत्तर सुनकर अवाक् हो गई। क्या यह वही व्योम है, जो शहद से भी मीठी बातें उसके साथ करता था। सुबह के समय तो भूमि को बाहुपाश से छोड़ता ही नहीं था। जबरदस्ती वह उठकर घर का काम करती थी और कॉलेज जाती थी। कभी-कभी तो कहता था, ‘चलो आज हम दोनों लीव ले लेते हैं। घूमेंगे, फिरेंगे, ऐश करेंगे।’ और अब इतनी कड़वी बोली कि जहर भी पीछे छूट गया।
—इसी संग्रह से
प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ लेखक और पाठक के दिलों को पुल की भाँति जोड़ती हैं। कथानक वास्तव में प्रभावोत्पादक, विचारोत्तेजक एवं जीवन के यथार्थ के साथ-साथ कल्पना एवं संवेदना से भरपूर है।
मर्मस्पर्शी, संवेदनशील, रोचक-पठनीय कहानियों का संकलन।
Ek Din Nepal Mein by Ramesh Pokhariyal ‘Nishank’
नेपाल और भारत के संबंधों का इतिहास अत्यंत पुराना है। भारत और नेपाल के बीच हर क्षेत्र में परस्पर सहयोग और संबंध इतने बहुआयामी और व्यापक हैं कि उन्हें किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है।
नेपाल हमारा निकटतम पड़ोसी है। दुनिया के नक्शे में भारत और नेपाल भले ही अलग-अलग देश हों, किंतु भौगोलिक स्वरूप की समानता के साथ-साथ रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, तीज त्योहार तथा दर्शन-चिंतन से लेकर मठ-मंदिर और तीर्थ-पर्व सब एक जैसे ही हैं। एक ओर धर्म और संप्रदाय को लेकर दोनों राष्ट्रों की उदारता एक जैसी है, वहीं दोनों ही देशों के सर्वमान्य आराध्य देव शिव हैं।
पूरी दुनिया में भारत व नेपाल ही ऐसे देश हैं, जिनके बीच आवाजाही में कोई भी रोक-टोक नहीं है। दोनों देशों के मध्य अनादिकाल से रोटी-बेटी का रिश्ता निर्बाध रूप से जारी है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत-नेपाल दो तन, एक मन हैं।
Ek Dm Ki Diary by Mohan Lal Roy
प्रस्तुत पुस्तक में एक सफल व्यक्ति की प्रकृति तथा क्षेत्रीय स्तर पर सरकारी व्यवस्थाओं पर रोशनी डाली गई है। इसमें कतिपय रोमांचकारी घटनाएँ हैं, कई दिलचस्प वारदातें हैं और कई रोचक दृष्टांत भी, जो आम और खास पाठकों को आकर्षित कर सकते हैं। वे लोग और वे अफसाने अनदेखी के लायक नहीं हैं।
इन घटनाओं के दृष्टांत सरकार और उच्चाधिकारियों के लिए आँकड़ों के रूप में उपयोगी होंगे, जिससे सारतत्त्व निकालकर वे अपने अनुदेशों में डालकर कार्यपालकों, दंडाधिकारियों एवं पुलिस पदाधिकारियों को उपयोगी दिशानिर्देश परिचालित कर सकते हैं। जिन अधिकारियों के कंधों पर विधिव्यवस्था का दायित्व सौंपा जाता है, उनके लिए इन घटनाओं के दृष्टांत सोपान के रूप में उपयोगी हो सकते हैं। लेखक का अनुभव और विश्वास है कि विधिव्यवस्था के कर्तव्यनिर्वाह में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी—यदि ध्यान से पढ़ा जाए एवं तदनुसार अमल किया जाए। अतीत की अवघट घटनाएँ सुनहरे भविष्य की प्रेरणास्रोत होती हैं।
आम पाठकों के लिए यह पुस्तक सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का रास्ता दिखलानेवाली है। कतिपय बातें रोमांचक घटनाओं से परिपूर्ण हैं। अस्तु, पढ़नेसुनने में मनोरंजक भी लगेंगी।
Ek Kadam Hazar Afsane by Partha Sarthi Sen Sharma
दुनिया के सभी बड़े शहरों के व्यक्तित्व में कई पहलू होते हैं और वे केवल उसी पहलू को प्रकट करते हैं, जिन्हें एक दर्शक या यात्री देखना चाहता है। इक्कीसवीं सदी में यात्रा करने का अर्थ सिर्फ चेक-इन करना, सेल्फीज पोस्ट करना या हैशटैग्स के साथ स्टेटस मैसेज लिखना नहीं है। आज इसका अर्थ है—उन स्थानों पर जाना, जिनके बारे में आपने सिर्फ पढ़ा होता है, फिल्मों में देखा होता है या सुना होता है; किसी लैंडमार्क (सीमा चिह्न) पर खड़े होकर कुछ असाधारण महसूस करना, पुरानी यादों को ताजा करना और कुछ नई यादें बनाना।
‘एक कदम हजार अफसाने’ सिर्फ स्मारकों और परिदृश्यों के बारे में एक यात्रा-वृत्तांत ही नहीं है। यह सिर्फ लंदन, पेरिस और रोम जैसे प्रसिद्ध शहरों के बारे में नहीं है, बल्कि अंग्रेजी ग्रामीण इलाके के किसी गाँव की सड़क पर अकेले टहलने के बारे में, गंगा में एक शांत नौका-विहार और अनजान गंतव्यों तक की लंबी ट्रेन-यात्राओं के बारे में भी है। यह बार्सिलोना के एक कैफे में कॉफी की चुस्की लेने के साथ-साथ भारत के किसी दूर-दराज के भूले-बिसरे रेलवे स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय का मजा लेने के बारे में भी है।
पार्थ सारथी सेन शर्मा ने दुनिया भर में और साथ ही अपनी मातृभूमि में यात्रा करते हुए सभी घटनाओं, विचारों, स्मृतियों, संस्मरणों और भावनाओं का एक जटिल केलिडोस्कोप तैयार किया है, जो अंततः शब्दों में क्रिस्टलीकृत होकर विभिन्न स्थानों का एक अद्वितीय परिप्रेक्ष्य देता है—ब्रिटेन, कॉण्टिनेंटल यूरोप, तुर्की, मोरक्को और बेशक भारत के।
Ek Lekhak Ki Atmakatha by R. S. Kelkar
‘‘देर हो गई सर, पर बात यह थी कि मेरे एक दोस्त ने किसी का खून कर दिया था और पुलिस उसके पीछे थी। माँ से छिपाकर बड़ी मुश्किल से मैंने उसे पनाह दी, इसलिए देर हो गई।’’ इतनी बात कहकर वह चला गया और मैं सन्न रह गया। दोपहर बाद मैंने उसे बुलाकर बिलकुल शांति से कहा, ‘‘राकेश!’’
‘‘जी!’’
‘‘जानते हो मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है?’’
‘‘जी नहीं!’’
‘‘मेरी बात को शांति से सुनो, इसी में तुम्हारी भलाई है।’’
‘‘जी!’’
‘‘तुम एक अच्छे घर के लड़के हो। घर में माँ-बाप और घरवाली है और एक बच्चा भी।’’
‘‘हूँ।’’
‘‘इन सबके प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, जो तुम नहीं कर रहे हो। तुम सिगरेट पीते हो और सुना है कि शराब भी पीते हो और जुआ खेलते हो। आज पता चला कि तुम खूनियों को पनाह भी देते हो।’’
—इसी पुस्तक से
Ek Mulakat Thatha Anya Kahania by Subha Sharma
अपनी पहली पुस्तक ‘एक मुलाकात तथा अन्य कहानियाँ’ में लेखक और सिविल पदाधिकारी शुभा सर्मा ने जीवन के भिन्नभिन्न वर्णनात्मक पहलुओं की जाँचपरख तटस्थता, सूक्ष्मता एवं संवेदना के साथ करने का सफल प्रयास किया है। विषयों की विविधता में विकासशील एवं उन्नत बाजार, शहरी व्यवस्था से लेकर ग्रामीण उड़ीसा के भीतरी परिदृश्य और लोकसंघर्ष तथा गहरे सामाजिक असंतोष के क्षेत्रों तक को शामिल किया गया है। वर्णनपद्धति ऐसी, जो चिंतित गृहणियों, अति कल्पनाशील किशोरकिशोरियों और जीवन की सांध्य वेला से गुजर रहे पुरुष एवं स्त्रियों को माला के मनकोें की भाँति एक तार में पिरोते हुए आगे बढ़ती है। एक तरफ दीपांकर की कहानी है, जिसे असम की बहुत याद आती है और जो वापस आने के लिए ललक रहा है, लेकिन लौटने के बाद खुद को अपने ही देश में अजनबी पाता है और दूसरी तरफ उस खूबसूरत उमा की कहानी है, जिसकी रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी जाती है और जो न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। अगर अरुण पितृ सुलभ स्नेह के लिए तरस रहा है तो शिखा सामाजिक रीतिरिवाज का विरोध करती है। इन कहानियों के पात्रों में सभी तरह के लोग हैं, जिनसे हर रोज बस में, मेट्रो पर आमनासामना होता है और जिन्हें देखकर समाज की छवि उभरती है, जैसे दर्पण में अपना ही प्रतिबिंब। प्रत्येक कहानी के शिल्प में रचनात्मक संतुलन की अद्भुत सच्चाई स्पष्ट झलकती है। कुल मिलाकर यह कहानीसंग्रह भारत की वास्तविकताओं तथा विरोधाभास को एक घुमाव के साथ सजीव करता प्रतीत होता है। एकएक कहानी अत्यंत रोचक और पठनीय बन पड़ी है।
Ek Oonchi Udaan by Seetha And Sharad Gupta
द एस्कॉर्ट्स ग्रुप भारत के जाने-माने औद्योगिक घरानों में से एक है। इसने अपने पचहत्तर वर्षों के इतिहास में कई दुरूह असफलताओं का सामना किया। सन् 1944 में एच.पी. नंदा ने लाहौर में एस्कॉर्ट्स की स्थापना की, जिसे विभाजन का शिकार होना पड़ा। यह फिर से अपने पैरों पर खड़ी हुई, दिल्ली के निकट फरीदाबाद में अपना निर्माण बेस तैयार किया। आनेवाले वर्षों में यह फोर्ड, जे.सी.बी. और यामहा जैसे शीर्षस्थ वैश्विक खिलाडि़यों से जुड़ी। 80 के दशक में इसकी ‘राजदूत बाइक्स’ ने हलचल मचा दी थी, परंतु वही दशक ब्रिटेन के टाइकून स्वराज पॉल की ओर से टेकओवर करने की साजिश का भी साक्षी रहा, जो कंपनी के जीवन में किसी स्तब्धकारी प्रसंग से कम न था। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद राजन नंदा ने अनेक पहलों के साथ व्यवसाय की बागडोर सँभाली। वे एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट और टेलीफोनी बिजनेस के साथ सेवा क्षेत्र में आगे आए। परंतु कुछ गलत कदम उठाने के कारण ग्रुप को इन क्षेत्रों से बाहर आना पड़ा। एक समय पर वित्तीय संकट इतना अधिक हो गया था कि बिजली के बिलों का भुगतान न हो पाने के कारण कार्यालय की बिजली काट दी गई थी।
तब से अब तक कंपनी ने निखिल नंदा के नेतृत्व में उल्लेखनीय प्रदर्शन कर शानदार वापसी की है। एग्री-मशीनरी, निर्माण और रेलवे उपकरण के क्षेत्रों में भारी सफलता के साथ एस्कॉर्ट्स ने 2019 में अपने उच्चतम लाभ दर्ज किए, जो 400 करोड़ का कर चुकाने के बाद हुए थे। अब यह इनोवेशन विद्युत् विकास, ऑटोनोमस और हाइब्रिड टैक्टर्स व ट्रैक्सी (किसानों के लिए उबर) जैसी सेवाओं का नेतृत्व कर रही है।
‘एक ऊँची उड़ान’ नामक पुस्तक बताती है कि यह सब कैसे संभव हुआ। श्रेष्ठ व्यावसायिक अभ्यास अपनाए गए, सही लोगों को उचित भूमिका दी गई, डीलरों, सप्लायरों और ग्राहक-किसानों के साथ संबंधों पर कार्य किया गया। यह व्यवसाय प्रबंधन का आँखें खोल देनेवाला एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें इस क्षेत्र से जुड़े लोगों, पेशेवरों व प्रबंधन छात्रों के लिए कई सबक छिपे हैं, ताकि वे समझ सकें कि कैसे सबकी चहेती विशिष्ट भारतीय कंपनी को पुनर्जीवित कर इसे सफलता की एक ऊँची उड़ान दी गई।
Ek Paheli Pyaar Ki by Arvind Parashar
नील एक लीडिंग ब्रांड कंपनी में सीनियर एग्जीक्यूटिव है और उसकी पत्नी गौरी एक डेंटिस्ट है, जो अपना क्लीनिक चलाती है। दोनों एक-दूसरे को बेपनाह मोहब्बत करते हैं। वे गुरुग्राम के पॉश इलाके में आरामदायक जीवनयापन कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे नील की फिटनेस प्रशिक्षिका श्रीन्या उनके जीवन में मुसीबतें खड़ी करना चाहती है।
दृष्टि एक टी.वी. न्यूज़ एंकर और पत्रकार के रूप में कार्यरत है, जबकि उसका पति सोमेश एक सीनियर पुलिस अफसर है। वे अपनी रोज़ाना की जिंदगी से बोर हो चुके हैं, पर जब उनकी मुलाकात क्यूबा में नील और उसके दोस्तों से होती है, तो सभी की जिंदगियाँ एकदम से बदलनी शुरू हो जाती हैं। उनके जीवन में मानसिक स्थिरता और पागलपन का तड़का लगाने का काम उनकी हास्यास्पद और रहस्यमय मित्र मंडली—टॉम, जेरी, जेम्स, मैहर और अंतरिक्षा—करती है।
ये कठिनाइयाँ तब और भयानक रूप ले लेती हैं, जब दृष्टि का अपहरण हो जाता है और नील को इसके लिए फँसा दिया जाता है। गौरी को कुछ कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है और वह नील से दूर हो जाती है। पर क्या यही सच है या फिर कुछ और, जिसे सुनकर पैरों तले की जमीन खिसक जाए? यही प्यार की पहेली सुलझाएगी यह पुस्तक।
Ek Pita Ki Janmakatha by Madhav Joshi
माधव जोशी कूची, ब्रश और रंगों के अनुपम शिल्पी हैं। अब तक उनकी रेखाएँ बोलती थीं। शब्दों के जरिए उनका हिंदी में यह पहला चमत्कार है। वे रेखाओं से चित्र बनाते हैं। पर यह किताब उनकी सृजन कूची का शब्दचित्र है। ‘एक पिता की जन्मकथा’ नामक यह किताब उनकी गहन संवेदनाओं का सजल विस्तार है।
इस उपन्यास का विषय नया और शैली प्रयोगात्मक है। कथा पति-पत्नी के परस्पर संबंधों की नई बुनियाद तो डालती ही है, साथ ही कहानी की परंपरागत लीक को भी तोड़ती है। ‘एक पिता की जन्मकथा’ लेखक का जिया और भोगा हुआ यथार्थ है, जिसे उसने भावना के शब्द दिए हैं। गर्भ से पहले संतान के साथ एक ‘पति’ नौ महीनों में कैसे ‘पिता’ में तब्दील हो जाता है। यह कथा ऐसी ही संवेदनाओं का सजीव और भावनात्मक चित्रण है। इसे पढ़कर किसी को भी लगेगा कि यह तो मेरी कथा है, मेरा यथार्थ है। उपन्यास के किरदार पाठकों से निरंतर संवाद करते हैं और उन्हें बाँधे रखते हैं।
इस उपन्यास की दूसरी भाषा इसके रेखाचित्र हैं, जो हमें उस कालावधि के दृश्य-परिदृश्य का बोध कराते हैं। कथा-साहित्य में रेखाओं का ऐसा प्रयोग कम ही देखने को मिलता है, जहाँ चित्र भी शब्द हो जाते हों।
‘एक पिता की जन्मकथा’ हिंदी कथा-साहित्य में अभिनव प्रयोग है। पति और पत्नी के बीच रिश्तों के बदलाव की यह कथा स्मृतियों का सजीव लेखा-जोखा तो है ही, एक अनमोल खजाना भी है, जिसमें आप बाप-बेटी और पति-पत्नी के आपसी रिश्तों के खूबसूरत जेवर को उसकी स्वर्णिम आभा के साथ देख सकते हैं।
—हेमंत शर्मा
Ek Prem Kahani Aisi Bhi by Sudeep Nagarkar
कभी-कभी प्यार महज आँखों का धोखा होता है। कभी-कभी यह आपकी जिंदगी का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। जब हर किसी पर यह बुखार चढ़ा है कि सोशल मीडिया पर क्या ट्रेंड कर रहा है, तब रघु किताबों में खोया है। उसके लिए तो प्यार करने का खयाल भी किताबों तक ही सिमटा है। फिर एक दिन उसकी मुलाकात रूही से होती है। करीब आ रहे छात्र-संगठन के चुनावों के दौरान उनका प्यार परवान चढ़ रहा था कि रघु एक ऐसी मुश्किल में फँस जाता है, जिससे निकलना उसके लिए असंभव सा हो जाता है। उसके जिगरी दोस्तों ने उसे बाहर निकालने का एक प्लान बनाया, लेकिन उसकी मुसीबत और बढ़ गई।
क्या रघु सही-सलामत निकल पाएगा या कैंपस की राजनीति का तूफान उसे उड़ा ले जाएगा?
सामाजिक-राजनीतिक दाँव-पेंच में उलझी पृष्ठभूमि पर आधारित सुदीप की यह नई पुस्तक रिश्तों के स्याह पहलू, सत्ता की भूख और रसूखदारों के पाखंड की परतें उधेड़ती है।
Ek Sainik Ka Atmachintan by A.K. Vidyarthi
आत्मचिंतन शब्द आत्मा से जुड़ा हुआ है, चिंतन वही करता है, जिसकी चेतना और संवेदना जीवित है या जिसकी आत्मा के सरोकार समाज से जुड़े हैं। एक विद्यार्थी, जो स्वयं एक भूतपूर्व सैनिक है, उसने बेबाक तरीके से अपने अनुभव साझा किए हैं। इस युग में एक सैनिक ही है, जो अपने प्राण देना जानता है और जो प्राण देना जानता है, उसी में सच्ची आत्मा निवास करती है। अतः पुस्तक में भोगे हुए यथार्थ का आत्मचिंतन है, यहाँ कपोल कल्पना नहीं, ठोस धरातल पर जमीनी हकीकत का वर्णन है।
पुस्तक में मानवीय मूल्यों के ताजा गुलाब की सी खुशबू आती है। यदि आप चेतना-संपन्न हैं तो निश्चित ही यह किताब आपको अपनी ओर खींचेगी, आपकी सोच को पैनी धार देगी ही, अपने कर्तव्यबोध का आभास कराते हुए ईमानदार नागरिक की जिम्मेदार भूमिका के लिए तैयार करेगी।
एक फौजी का जीवन-संघर्ष ठीक उस किसान की तरह है, जो पसीना बहाकर, धरती का सीना चीरकर बीज बोता है और आसमान को देखकर बरसात की प्रतीक्षा करता है। ऐसे ही फौजी भाई अपने रक्त की बूँदों से सरहदों को सींचते हैं, ताकि देश की फुलवारी भरी-भरी रहे।
हर युवा, चेतना-संपन्न नागरिक तथा जिज्ञासु विद्यार्थी को ए.के. विद्यार्थीजी की यह अनमोल कृति एक बार अवश्य पढ़नी चाहिए।
Ek Sannyasi : Ek Nartaki by Shankari Prasad Basu
इसके बाद यह प्रस्ताव पारित किया गया— ‘‘यहाँ बहुधा यह कहा गया और मैं भी यह कहता रहा हूँ कि हम लोगों ने विगत सत्रह दिनों में जैसा आयोजन देखा है ऐसा अब इस पीढ़ी को तो उनके जीवनकाल में पुनः देखने का अवसर नहीं प्राप्त होगा; पर जिस प्रकार के उत्साह व शक्ति का संचार इस सम्मेलन ने किया है, लोग दूसरे धर्म-सम्मेलन के स्वप्न देखने लगे हैं, जो इससे भी अधिक भव्य व लोकप्रिय होगा। मैंने अपनी बुद्धि लगाई है कि अगले धर्म-सम्मेलन के लिए उचित स्थान कौन सा हो। जब मैं अपने अत्यंत नम्र जापानी भाइयों को देखता हूँ तो मेरा मन कहता है कि पैसिफिक महासागर की शांति में स्थित टोकियो शहर में अगला धर्म-सम्मेलन किया जाए, पर मैं आधे रास्ते रुकने की बजाय सोचता हूँ कि अंग्रेजी शासन के अधीन भारतवर्ष में यह सम्मेलन हो। पहले मैंने बंबई शहर के लिए सोचा, फिर सोचा कि कलकत्ता अधिक उपयुक्त रहेगा, पर फिर मेरा मन गंगा के तट की प्राचीन नगरी वाराणसी पर जाकर स्थिर हो गया, ताकि भारत के सबसे अधिक पवित्र स्थल पर ही हम मिलें।
‘‘अब यह भव्य सम्मेलन कब होगा? हम आज यह निश्चय कर विदा ले रहे हैं कि बीसवीं सदी में अगला भव्य सम्मेलन वाराणसी में होगा तथा इसकी अध्यक्षता भी जॉन हेनरी बरोज ही करेंगे।’’
—इसी पुस्तक से
इस पुस्तक में एक फ्रांसीसी नर्तकी एमा काल्वे पर स्वामी विवेकानंद के प्रभाव की चर्चा है। इस अभिनेत्री ने कठोर संघर्ष कर नृत्य-नाटिका के क्षेत्र में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। अपार संपत्ति कमाई तथा बेहिसाब खर्च भी किया। एक सुंदर महल खरीदा। एकमात्र पुत्री शिकागो में जलकर मर गई, जब वह प्रेक्षागार में नृत्य कर रही थी। काल्वे यह आघात सहन न कर पाई, उसने आत्महत्या का असफल प्रयास किया। ऐसे घोर संकट के समय भारी अपराध-बोध से ग्रस्त वह स्वामी विवेकानंद से मिली। उन्होंने उसे शांति दी। उसे कर्मपथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वह स्वामीजी की भक्त बन गई। काल्वे पुनः अपने नृत्य-क्षेत्र में लौट आई। विश्व-भ्रमण किया। अमेरिका, हवाना आदि स्थानों में खूब ख्याति प्राप्त की।
काल्वे स्वामीजी पर पुस्तक लिखना चाहती थी, पर गाँव के पादरी ने कहा कि यदि काले लोगों के अध्यात्म की प्रशंसा करोगी तो मृत्यु के उपरांत तुम्हें गिरिजाघर में दफनाया नहीं जा सकेगा। अपनी वृद्धावस्था में वह बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद की समाधि पर प्रणाम करने आई तो भावविह्वल हो गई। यह महान् अभिनेत्री अपने गाँव में बयासी वर्ष की आयु में महासमाधि को
प्राप्त हुई।
इतिहास की एक अद्भुत घटना। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी कैसे स्वामीजी की कृपा पा सकी और जीवन-पर्यंत उन्हें अपना मार्गदर्शक मानती रही। विस्मय और रोमांच से भरपूर एक पठनीय कृति।
Ek Senadhyaksh Ki Atmakatha by J.J. Singh
जोगिंदर जसवंत सिंह अपने परिवार के तीसरी पीढ़ी के सैनिक रहे, जिनकी उम्र एनडीए में भरती होते समय मात्र पंद्रह वर्ष थी। जनरल जे.जे. सिंह भारत के प्रथम सिख सेनाध्यक्ष बने। उनकी तैनाती ऑपरेशनवाले इलाकों में कुछ ज्यादा ही हुई, जिसमें उन्होंने अपना अनुपम योगदान दिया। देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में उग्रवादियों को जंगल तक खदेड़ा, दूसरी तरफ कश्मीर में उन्होंने आतंकवादियों की गोलियों का सामना किया। 1991-93 के बीच कश्मीर में ब्रिगेड कमांडर के रूप में उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई और गाँववालों को यह समझाना शुरू किया कि कैसे आतंकवादी उन्हें राह से भटकाने का काम कर रहे हैं। सेनाध्यक्ष का पद सँभालने (2005-07) के बाद उन्होंने ‘लोहे की मुट्ठी और मखमल के दस्ताने’ की नीति अपनाई।
इस दिलचस्प पुस्तक में जनरल सिंह ने बताया है कि सरकार के सर्वोच्च स्तर पर देश की सुरक्षा से जुड़े फैसले किस प्रकार किए जाते हैं, चाहे वह सियाचिन का मामला हो, युद्ध (कारगिल) का या फिर सीमा पर भारी तादाद में फौज का जमावड़ा (ऑपरेशन पराक्रम) करना हो।
सैन्य जीवन को पूरी जिंदादिली से जीने और उसके भरपूर आकर्षण तथा रोमांच का सजीव वर्णन करने के साथ ही जनरल सिंह ने पाकिस्तान और चीन से मिलने वाली चुनौतियों, आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद के खतरे, सैनिक कूटनीति का महत्त्व, और तेजी से बदलते विश्व में सैन्य बलों के अग्रसर रहने के रास्ते आदि अहम और गंभीर मुद्दों का बहुत सुंदर मूल्यांकन तथा विवेचन किया है।
‘जीतने के लिए लड़ो’ के ध्येय के साथ उन्होंने मुश्किलों का धैर्य के साथ सामना किया और इस बात का ध्यान रखा कि उनके अधीन सैनिकों को कुशल नेतृत्व मिले तथा वे हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहें।
Ek Shaam Parivar Ke Naam by Vijayshankar Mehta
आनेवाले 20 वर्षों में भारत दुनिया के विकसित देशों में होगा; लेकिन इसी के साथ चिंता भी होती है कि हमारे पास जब सबकुछ होगा तो कहीं हम परिवार से हाथ न धो बैठें।
आज टूटन व बिखराव की ध्वनि परिवारों से निकलने लगी है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम जानें कि परिवार कैसे बचाए जाएँ। लेखक ने अपनी कथाओं में इसी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है और यह पुस्तक भी इसी भाव को समर्पित है।
‘एक शाम परिवार के नाम’ लेखक का एक व्याख्यान है, जिसे खूब सुना जाता है। इस पुस्तक में उसी व्याख्यान के अंश समाहित हैं। हनुमानजी महाराज परिवार के देवता हैं, अतः जीवन उन्हीं के आसपास बीतता है। लेखक का कहना है कि मैं ‘हनुमान चालीसा’ ओढ़ता हूँ, बिछाता हूँ।
परिवार में माधुर्य, पारस्परिकता, प्रेमभाव और एकात्मता जाग्रत् करनेवाली प्रेरक पुस्तक।
Ek Super Hero Ki Shandar Kahani by Priya Kumar
ओ.पी. मुंजाल 1986 से दुनिया में साइकिल की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी हीरो साइकिल के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक हैं। वह प्रथम पीढ़ी के एक ऐसे उद्यमी हैं, जिन्होंने शून्य से अपना व्यवसाय शुरू किया। अपनी स्कूली शिक्षा के बाद वे पारिवारिक व्यापार में शामिल हो गए और साइकिल के विभिन्न कलपुरजोंके निर्माण के लिए एक इकाई स्थापित करने में तत्काल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कि वर्तमान ‘हीरो’ उद्यम की नींव भी बनी।
पंजाब सरकार के राजकीय कोष में अधिकतम टैक्स जमा करने का श्रेय उन्हें जाता है। राज्य के विकास में अप्रतिम योगदान करने के लिए उन्हें ‘सम्मानपत्र’ से विभूषित किया जा चुका है। सामाजिक और औद्योगिक क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए देश की अनेक संस्थाओं द्वारा
उन्हें विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
Ek Surgeon Ka Chintan by V.N. Shrikhande
यह छोटे से शहर में रहनेवाले एक बच्चे की दिलचस्प और प्रेरणादायी कहानी है, जिसे पढ़ाई में औसत माना जाता था। उसे भाषण-दोष की समस्या थी, फिर भी वह भारत का एक जाना-माना सर्जन और प्रेरक वक्ता बन गया।
यह आत्मचरित्र है डॉ. विनायक नागेश श्रीखंडे का जो अपने छात्रों के चहेते और उन हजारों मरीजों की श्रद्धा के पात्र हैं, जिनका कष्ट वे उपचार के मानवीय तरीके से हर लिया करते हैं।
इंग्लैंड में उनका अकादमिक प्रदर्शन इतना उत्कृष्ट और शल्य कौशल इतना प्रभावशाली था कि 1960 में ही उन्हें विदेश में एक अच्छे कॅरियर का अवसर मिल गया था। हालाँकि, उनके पिता ने उनसे कहा कि वह भारत लौट आएँ और अपनी मातृभूमि के बीमार लोगों की सेवा करें। वे चाहते थे कि उनका पुत्र एक साधारण मनुष्य का असाधारण सर्जन बने।
डॉ. श्रीखंडे को एक ऐसे युग में प्रशिक्षित किया गया, जब शल्य क्रिया एक सेवा थी, न कि एक उद्योग, जहाँ लाभ कमाने की मंशा होती है। उनका कॅरियर इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे व्यावसायिक उन्नति के साथ ही नैतिक मूल्यों, करुणा तथा जरूरतमंद और दबे-कुचले लोगों की देखभाल कर भी सफलता के शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
डॉ. श्रीखंडे द्वारा प्रशिक्षित अनेक छात्रों ने भारत तथा विदेश में नैतिक व्यावसायिक व्यक्तियों के रूप में अपनी पहचान बनाई, तथा उनसे जो कुछ भी सीखा, उसके लिए वे उनका आभार जताते हैं।
Ek Teacher Ki Diary by Bhavna Shekhar
भारत में शिक्षा कभी पेशा नहीं थी, किंतु आज शिक्षा का बाजारीकरण देश के समक्ष बड़ी चुनौती है। आज शिक्षक व्यवसायी है और छात्र उपभोक्ता। इनके बीच भावनात्मक संबंध नगण्य होता जा रहा है।
‘एक टीचर की डायरी’ आज के माहौल में शिक्षक और छात्र के बीच पनप रही दूरी को पाटने का एक प्रयास है। टीचर के प्रति छात्र की डूबती आस को थामने की ईमानदार कोशिश है। इसे पढ़कर तीन बातें जेहन में आएँगी : एक—प्रकृति टीचर बनाने की प्रक्रिया स्वतः करती है; दूसरी—टीचर को ‘वज्रादपि कठोराणि, मृदुनि कुसुमादपि’ होना होता है एवं तीसरी—शिक्षक सदा शिक्षक होता है, यानी अग जग में शिक्षक।
नित नए रचनात्मक प्रयोग विद्यार्थियों को शिक्षक से गहरे जुड़ने का जरिया बनते हैं। आज बालकों के दिमाग में पैदायशी स्पीड का इंजन फिट है, उन्हें कक्षा की चारदीवारी में बाँधकर रखना कोई खेल नहीं, फिर घर का वातावरण प्रतिकूल हो, तब शिक्षक का दायित्व बढ़ जाता है। आज के छात्र तरह-तरह के मानसिक दबाव, फ्रस्ट्रेशन, डिप्रेशन के शिकार हैं। ऐसे में टीचर का ‘हीलिंग टच’ इन बच्चों का जीवन बदल सकता है। पुस्तक में किशोर मन की उलझन सुलझाने के कई प्रसंग हैं। छात्रों को मानव धर्म के साथ प्रकृति प्रेम तथा जीव-जंतु से लगाव का संदेश यह डायरी बखूबी देती है।
इस विधा की सख्त जरूरत है। भावना शेखर की यह कथा डायरी नायाब कृति है, जो शिक्षाजगत् से जुड़े हर व्यक्ति के लिए पठनीय और अनुकरणीय है।
—उषा किरण खान
Ek Vaigyanik Ki Aatmakatha by C.N.R. Rao
‘एक वैज्ञानिककी आत्मकथा’ (ए लाइफ इन साइंस) पुस्तक में प्रोफेसर सी.एन.आर. राव इस विषय में अपनी यात्रा की चर्चा के साथ ही हमें यह बहुमूल्य ज्ञान देते हैं कि एक महान् वैज्ञानिक बनने के लिए क्या करना पड़ता है। यह पुस्तक उनके शुरुआती जीवन तथा उन मुश्किलों के बारे में बताती है, जिनका सामना उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में अपने सपनों को पूरा करने के प्रयास में करना पड़ा। प्रो. राव स्वतंत्रता पश्चात् के भारत के सबसे विशिष्ट, समर्पित और व्यापक सम्मान पानेवाले एक वैज्ञानिक के जीवन की अनूठी झलक दिखाते हैं। वे अतीत और वर्तमान के प्रमुख वैज्ञानिकों की भी चर्चा करते हैं, जिनसे उन्हें प्रेरणा मिली।
प्रो. राव इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक संकल्प की चर्चा भी विस्तार से करते हैं। वे ऐसे युवाओं को अनमोल सुझाव देते हैं, जो विज्ञान के क्षेत्र में जीवन जीना चाहते हैं और उन अपरिहार्य रुकावटों से निपटने के रास्ते भी सुझाते हैं, जो उत्कृष्टता प्राप्त करने के दौरान पैदा होती हैं।
Ekada Bharatvarshe by Hemant Sharma
हेमंत भाई की प्रतिभा अद्भुत है। दैनिक अनौपचारिक दिल्लगी-ठिठोलीवाली वाचिक किस्सागोई से लेकर सारगर्भित नाविक के तीर जैसी पैनी धारदार संपादकीय टिप्पणियों तक वे श्रोता और पाठक को मंत्रमुग्ध रखते हैं। उनका गद्य, सहज-सरस ही नहीं, असाधारण रूप से मर्मस्पर्शी होने के कारण पाठक से बड़ी आसानी से आत्मीय रिश्ता बुनता है। हमारा विश्वास है कि 21वीं सदी की ये बोधकथाएँ पाठक को कठिन समय में दुःख सहने की शक्ति और अच्छे समय में सुख के साझे की सन्मति प्रदान करेंगी।
—पुष्पेश पंत
ये कथाएँ संस्कृति के कैप्सूल हैं। समय के साथ-साथ कहानियों का स्वरूप बदलता रहता है, किंतु उनमें अंतर्निहित भावना सदा जीवित रहती है। हेमंतजी धरती से उगे हैं, उनके लिए मिट्टी से जुड़ा सत्य बहुत अर्थ रखता है, जिसकी गंध आप इस संकलन में लगातार अनुभव करते हैं। उन्होंने इन कथाओं को प्रस्तुत करके बड़ा उपकार किया है। उनके लिए जो प्रेरणादायक रहा है, उसे प्रदीप्त रखने का यह कार्य प्रशंसा योग्य है।
—प्रसून जोशी
इन कहानियों का भावार्थ हमारे वर्तमान समय के साथ जुड़ रहा है। महान् साहित्य की यही विशेषता है कि वह अपने समकालीन संदर्भों से जुड़कर एक नए रूप में सामने आता है, नया अर्थ-वैभव देता है, जो हमें समझने और जीने की शक्ति प्रदान करता है। इस कारण ये कहानियाँ आज अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इनको आज अधिक पढ़ा जाना चाहिए।
—असगर वजाहत
Ekatma Bharat Ka Sankalp by Devesh Khandelwal
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के इतिहास में अनेक महान् विभूतियों को मात्र इस कारण भुला दिया गया, क्योंकि वे नेहरूवादी राजनीति का हिस्सा नहीं थीं अथवा उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद के मॉडल को भारतीयता के अनुकूल नहीं पाया था। इन महापुरुषों को भारत के समृद्ध इतिहास पर गर्व था। वे जीवनपर्यंत उसकी गौरवशाली प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के प्रयत्न करते रहे। भारत की अखंडता उनके लिए सर्वोपरि थी और इसे स्थायी रखने के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन्हीं में से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी बीसवीं शताब्दी के अभूतपूर्व राजनीतिज्ञ थे।
‘एकीकृत भारत का संकल्प’ 1946-1953 तक जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में उठे प्रश्नों का संपूर्ण समाधान है। इसके प्रत्युत्तर में तत्कालीन सरकार ने डॉ. मुखर्जी को सांप्रदायिक और फासीवाद घोषित कर दिया, क्योंकि इस राज्य के लिए अपनाई गई नीतियों के वे समर्थक नहीं थे। ये नीतियाँ वास्तव में कभी भारत के हित में नहीं थीं। हालाँकि, डॉ. मुखर्जी का कहना था कि संपूर्ण भारत में समान संविधान, एक ध्वज, एक प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति होना चाहिए। यह पुस्तक केंद्र की नेहरू सरकार और राज्य की अब्दुल्ला सरकार की विफलताओं को सामने लाती है, जिन्होंने राज्य में गतिरोध पैदा किया। साथ ही यह डॉ. मुखर्जी के तर्कों पर गहन और निष्पक्ष अध्ययन प्रस्तुत करती है।
भारत माँ के अमर सपूत डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के संघर्ष, शौर्य और ‘एकात्म भारत’ के उनके संकल्प को रेखांकित करती पठनीय पुस्तक।
Ekatma Manavvaad by Deendayal Upadhyay
दीनदयाल उपाध्याय प्रणीत एकात्म मानववाद के संदर्भ में एक चर्चा होती रहती है कि यह ‘वाद’ है या ‘दर्शन’? ‘वाद’ पाश्चात्य परंपरा का वाहक है, जबकि ‘दर्शन’ भारतीय परंपरा का। ‘एकात्म मानव’ का विचार तत्त्वतः भारतीय विचार है, अतः इसे ‘दर्शन’ कहना चाहिए, कुछ लोगों का यह आग्रह रहता है, जो गलत नहीं है। मा. नानाजी देशमुख ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ में ‘दर्शन’ शब्द का ही प्रयोग करते थे।
यह बात ठीक होते हुए भी यह तथ्य है कि दीनदयाल उपाध्याय ने अपने बौद्धिक वर्गों में तथा ‘सिद्धांत एवं नीति’ प्रलेख में इसे ‘एकात्म मानववाद’ कहा है। मुंबई में जो उनके चार भाषण हुए, उनमें भी ‘एकात्म मानववाद’ शब्दपद का ही उपयोग है। पाश्चात्य चिंतन की पृष्ठभूमि में दीनदयालजी ने इस विचार का विवेचन किया है। व्यक्तिवाद व समाजवाद को उन्होंने पृष्ठभूमि में वर्णित किया है, अतः ‘एकात्म मानववाद’ भी एकदम संगत शब्द प्रयोग है। यथा रुचि ‘वाद या दर्शन’ दोनों का ही प्रयोग किया जा सकता है, यह कोई विवाद का मुद्दा नहीं है।
Ekatma Manavvad Ke Praneta Pt Deen Dayal Upadhyay by Amarjeet Singh
एकात्म मानववाद’ के प्रणेता
पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म
25 सितंबर, 1916 को मथुरा जिले के छोटे से गाँव नगला चंद्रभान में हुआ था। अत्यंत अल्पायु में माँ-पिता का साया उनके सिर से उठ गया और उनके मामाओं ने उन्हें पाला-पोसा। उपाध्यायजी ने पिलानी, आगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी.एससी., बी.टी. करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की। छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हो गए थे। अतः कॉलेज छोड़ने के तुरंत बाद वे संघ के प्रचारक बन गए। सन् 1951 में अखिल भारतीय जनसंघ का निर्माण होने पर वे उसके संगठन मंत्री तथा 1953 में जनसंघ के महामंत्री निर्वाचित हुए। कालीकट अधिवेशन (दिसंबर 1967) में वे जनसंघ के अध्यक्ष बनाए गए। दीनदयालजी का चिंतन व सोच समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उन्नयन कर उसे समाज की मुख्यधारा में लाना था। विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अद्भुत गुणों के स्वामी भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ बावन साल की उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए।
तपस्वी राष्ट्रसाधक पं. दीनदयाल उपाध्याय की प्रेरणाप्रद प्रामाणिक जीवनी।