Hindi Literature
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Bimal Mitra Ki Lokpriya Kahaniyan by Bimal Mitra
गुड़ की डली, सूप, चँगेरी, अरबी, नारियल इत्यादि विविध प्रकार की चीजें गाड़ी पर लदी थीं। फटिकदा उन चीजों को उतरवाने में व्यस्त थे। फिर भी बोले, ‘‘वसूली का काम कैसा चल रहा है, भाई?’’
एक पल चुप्पी साधने के बाद फिर बोले, ‘‘लगता है, प्रातः भ्रमण को निकल रहे हो?’’
‘‘नहीं’’, मैंने कहा, ‘‘नीरू भाभी की एक चिट्ठी है, पोस्ट ऑफिस में डालने जा रहा हूँ। बहुत ही जरूरी चिट्ठी है।’’
‘‘चिट्ठी! किसकी चिट्ठी बताया? छोटी बहू की!’’
फटिकदा के चेहरे का भाव जैसे आमूल परिवर्तित हो गया हो।
बोले, ‘‘बड़मातल्ला अपने माँ के पास भेज रही हैं?’’
‘‘हाँ, मगर।’’
वे बोले, ‘‘देखूँ।’’
मैंने चिट्ठी दी। दो-चार पंक्तियाँ पढ़ते ही पता नहीं, फटिकदा को क्या हुआ कि चिट्ठी को उन्होंने चिंदी-चिंदी कर दी। बोले, ‘‘इस चिट्ठी को भेजने से कोई काम नहीं होगा, भाई कुछ अन्यथा मत लेना।’’
फिर भी मेरा विस्मय दुगुना हो गया।
—इसी संग्रह से
सुप्रसिद्ध कथाकार-उपन्यासकार बिमल मित्र ने समाज, धर्म, रिवाज-परंपरा, शासन-नीति एवं सामाजिक संबंधों को अलग नजरिए से देखा-परखा है। समाज की हर समस्या को कहानी में उठाया है और यथासंभव उसका समाधान भी सुझाया है। पठनीयता एवं रोचकता से भरपूर प्रेरक कहानियाँ।
Bin Poonji Ka Dhandha by Ashwini Kumar Dube
अश्विनीकुमार दुबे हिंदी व्यंग्य के एक चिर-परिचित हस्ताक्षर हैं। उनके पास व्यंग्य का मुहावरा एवं व्यंग्यकार की प्रखर दृष्टि है, जिसके प्रयोग द्वारा वे सार्थक व्यंग्य की रचना करते हैं। उनका दृष्टिकोण सकारात्मक है। उनकी व्यंग्यात्मक रचनाओं के विषय व्यापक हैं। वे सामयिक विषयों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी मात्र कर संतुष्ट नहीं होते, अपितु एक चिंतनशील रचनाकार के रूप में उसका विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। जहाँ एक ओर अधिकांश रचनाकार राजनीतिक विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी को रचना-कर्म मान रहे हैं, वहीं अश्विनीकुमार दुबे जैसे कुछ रचनाकार हैं, जो एक दृष्टि के साथ सामयिक विसंगतियों का विश्लेषण कर उनके दूरगामी प्रभावों की ओर लक्षित कर रहे हैं। उनकी चिंता वर्तमान की वे विसंगतियाँ हैं, जो मानव-जीवन के भविष्य को अपनी अँधेरी छाया से ग्रसित करना चाहती हैं।
अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाओं में कहानी जिंदा है। वे विद्रूपताओं को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त करने में यकीन रखते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर व्यंग्य अपनी अभिव्यक्ति के साथ रोचकता उत्पन्न करता है वहीं कथा भी उत्प्रेरक का काम करती है, और संभवतः इसी कारण उनकी व्यंग्य रचनाएँ व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के संकलन मात्र होने से बच पाई हैं।
—प्रेम जनमेजय
संपादक‘व्यंग्य यात्रा’
Bindas Bandar Aur Batuni Baraat by Indu Ranchan
बिंदास बंदर और बातूनी बारात
बचपन से ही हम—मैं, मेरी बड़ी बहन और छोटा भाई—अपने नाना से, यानी अपने बाईजी से उनकी अपनी शैली में और विशेष भावुकता से बताई अकबर-बीरबल की प्रचलित कहानियों को बहुत उत्सुकता से सुनते थे। इनके अलावा उनके हुक्के की गुड़गुड़ाहट भरे कशों के साथ कई तात्कालिक मन-गढ़ी कथाओं में हम हर शाम लालसा और कशिश से लीन हो जाते। मुझे लगता है कि कहानियों की रचना में मेरी रुचि मेरे नाना की देन है।
ग्यारह साल की उमर से जब मैंने अपनी बहन और भाई को बिना पूर्व कल्पना के धारावाही ढंग से खुद-ब-खुद बहती जाती कहानियाँ बतानी शुरू कीं, तब वे हर रोज़ कहानी की अगली कड़ी का बेकली से इंतज़ार करते—ऐसा चसका लग गया था हम तीनों को! मेरी स्वाभाविक ही प्रमुख वृत्ति हँसी और दिल्लगी में थी।
अभी हाल ही में बच्चों की माँग पर मुझे खड़े पैर कहानी बुनते पा, मेरी बेटी रन्नए ने मुझे बच्चों के लिए हिंदी में कहानियाँ लिखने का सुझाव दिया। इसीलिए उसकी प्रेरणा से उपजी ‘बिंदास बंदर और बातूनी बारात’ की झाँकी साक्षात् आपके सामने है।
Birsa Kavyanjali by Vikramaditya
बिरसा की जग उठी जिजीविषा,
ललक उठी पढ़ने की,
जो पथ अनदेखा मुंडों को,
वैसा पथ गढ़ने की।
और ईश की माया ऐसी उसने जुगत लगाई,
जयपाल की शाला में हुई, उसकी शुरू पढ़ाई।
विषम घड़ी में भी मनुष्य
अपना भविष्य गढ़ता है,
पता नहीं किसी भाँति विधाता,
राह प्रकट करता है!
बड़े सवेरे उठकर बिरसा नित जाता था शाला,
बाघ, भालुओं से उसका पड़ता ही रहता पाला।
चुभते थे पग में काँटे, उठते थे ढेरों छाले,
माँ ने उन सबको मन के आँसू से धो डाले।
पुत्र कहीं हो, माँ की ममता वहाँ पहुँच जाती है,
पता नहीं किस पथ से आ वह,
उसको सहलाती है।
कौशल्या भी बहुत विकल थीं,
गए राम जब वन को,
रोती थीं वे सोच राम के,
पग की चोट-चुभन को।
माँ तो बस माँ ही होती है,
कौशल्या, मरियम या करमी,
बेटा बस बेटा होता है,
बिरसा सा गरीब या राम सा धर्मी।
जंगल का कोना-कोना तो अब उसका था साथी।
वनवासियों के सिरमौर वीर बिरसा मुंडा का संघर्षमय प्रेरणाप्रद जीवन सबके लिए अनुकरणीय है। उन्होंने अपने ‘युग का प्रश्न’ समझा था, उस युग की पीड़ा पहचानी थी और सबसे ऊपर उसने समय की नब्ज पकड़ी थी। एक सच्चा नायक इससे ज्यादा क्या करता है!
बिरसा मुंडा के जीवन पर खंडकाव्य के रूप में विनम्र काव्यांजलि है यह पुस्तक।
Blood Pressure Aur Swastha Jeevan by G.D. Thapar
हाई ब्लड प्रेशर को ‘ साइलेंट किलर ‘ (खामोश हत्यारा) कहा जाता है । खामोश इसलिए क्योंकि यह बहुत थोड़े लक्षण ही पैदा करता है, लेकिन अनवरत नुकसान पहुँचाता रहता है । इसके लक्षण उस वक्त सामने आते हैं जब गंभीर समस्याएँ व बीमारियों उत्पन्न हो जाती हैं और वे शरीर के प्रमुख अंगों को प्रभावित करती हैं ।
आज हाई ब्लड प्रेशर दुनिया भर में एक आम बीमारी है । वयस्क जनसंख्या का बीस प्रतिशत से भी ज्यादा या पैंसठ साल से अधिक की उम्र के लगभग साठ प्रतिशत लोग हाई ब्लड प्रेशर के शिकार हैं । ब्लड प्रेशर व इससे संबंधित समस्याओं का उचित नियंत्रण करना बहुत ही आवश्यक है ।
हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी क्यों होती है, इसके पीछे कौन-कौन से कारण हैं, उनका निदान क्या है तथा इसे नियंत्रण में कैसे रखा जा सकता है-इसपर प्रस्तुत पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गई है । यह पुस्तक आम पाठकों के लिए तो पठनीय है ही, हाई ब्लड प्रेशर के चिकित्सकों तथा चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों के लिए भी यह उपयोगी सिद्ध होगी ।
Bogi Number 2003 by Harish Naval
‘बोगी नंबर 2003’ इतिहास का वह हिस्सा है जहाँ संस्कृति, शिक्षा, जन सेवाएँ, राजनीति और समाज केविभिन्न वर्गों के कालापन से उपजी विसंगतियाँ, विडंबनाएँ और विद्रूपताएँ इस उपन्यास में रोचकतापूर्ण मनोरंजन सहित ढली हैं।
इस व्यंग्य-उपन्यास में की पीढ़ी उस राजनीतिक काल की पीढ़ी है, जब देश के नियामक रक्षक से भक्षक बनने लगे थे। बहुत से राजनेता धन जमा करने की होड़ में जुटने लगे थे और भ्रष्टाचार जीवन का मूलमंत्र बनने लगा था। ‘काले धन की बैसाखी’ शासन-कर्ताओं को अनिवार्य लगने लगी थी। इन्हीं भ्रष्ट जन का अनुकरण जीवन का व्यवहार बनने लगा था, जिससे बेईमानी का कद बढ़ रहा था। इसके अतिरिक्त इस पीढ़ी पर फिल्मों का प्रभाव बेहद रहा। विवेकानंद, स्वामी दयानंद, सुभाष, भगतसिंह, चंद्रशेखर से कहीं अधिक यह पीढ़ी फिल्मी सितारों को चाहने लगी। महात्मा गांधी तो केवल दो अक्तूबर तक सीमित रह गए, गांधी के नाम पर लूट-खसोट करनेवालों को देख यह पीढ़ी उनकी तरह तुरंत अमीर होना और अय्याशी परस्ती पसंद करने लगी थी। प्रस्तुत कृति में इसका विशद चित्रण आप प्रत्यक्ष भी और परोक्ष भी पाएँगे।
Bollywoodnama by Bhawanilal Bharatiya
बॉलीवुडनामा—भवानीलाल भारतीय
हिंदी फिल्मों का इतिहास दो वर्ष पश्चात् एक शताब्दी पुराना हो जाएगा। इस अवधि में रजतपट का वह काल भी आता है, जब मूक फिल्मों का निर्माण होता था।
इस पुस्तक में हिंदी सिने जगत् ‘बॉलीबुड’ में अपना योगदान करनेवाले विशिष्ट अभिनेताओं, अभिनेत्रियों, गायकों, संगीत-निर्देशकों तथा फिल्म निर्मात्री संस्थाओं का ऐतिहासिक मूल्यांकन किया गया है।
दादा साहब फाल्के, के.एल. सैगल, मुकेश, तलत महमूद, प्रदीप, मास्टर मदन, नूरजहाँ, देविका रानी, सुरैया, गीता दत्त, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, नौशाद, मोतीलाल आदि हिंदी सिनेमा के ऐसे स्तंभ हैं, जिनपर आज के ‘बॉलीवुड’ का मजबूत किला टिका हुआ है। इन कलाकारों के अभिनय, गायन, वादन, संगीत, निर्देशन के कारण ही हिंदी फिल्में लोकप्रिय हुईं और दर्शकों के दिलों पर राज करने लगीं।
यह पुस्तक इन महान् कलाकारों के हिंदी फिल्मों के लिए किए गए अनन्य योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का विनम्र प्रयास है। ‘बॉलीवुड’ के शैशवकाल की गौरवशाली कहानी है यह कृति।
Bolti Anubhootiyan by Mahesh Bhagchandka
बोलती अनुभूतियाँ की कविताओं के संदर्भ में साध्य का प्रश्न है, तो यहाँ यह साध्य कभी स्वयं कवि ही प्रतीत होता है, जो अपनी कविता के माध्यम से स्वयं तक पहुँचना चाहता है; इस स्थिति में ये कविताएँ आत्मसाक्षात्कार, आत्मचिंतन और आत्माभिव्यक्ति का ही दूसरा रूप लगती हैं। इस संग्रह की कुछ कविताओं में कवि का साध्य समाज और समाज का हित-चिंतन भी दिखाई देता है, यहाँ ये कविताएँ समाज-सुधारिका का बाना पहनकर लोगों के हृदय तक जाती हैं और उनके हृदय को निर्मल बनाती चलती हैं और कहीं-कहीं इस संग्रह की कविताएँ ऐसी भी हैं, जहाँ कवि का साध्य उसका वह आराध्य है, जिसे परमात्मा कहते हैं।
कविता में इतनी सादगी, इतना औदात्य, इतनी स्पष्टता, इतनी स्वच्छता, इतना आकर्षण सामान्यतः नहीं मिलता, किंतु इस संग्रह की हर कविता ने हृदय को छुआ है और केवल छुआ ही नहीं, आलोकित भी किया है। यह काम शायद तब ही हो पाता है, जब साधक बनावट से दूर किसी ऐसे वट के नीचे बैठकर तपस्या करे, जिसे आत्मचिंतन का वटवृक्ष कहते हैं, जिसे निश्छल प्रेम के वंशी-वट की संज्ञा दी जाती है, जो समाज-हित की वाट में आनेवाले किसी भी वटमार के फंदे में नहीं फँसा है और जिसे अध्यात्म की संजीवनी वटी मिल गई है। प्रभु इस संग्रह के कवि के इस रूप को ऐसा ही बना रहने दें, यही प्रार्थना है। इस संग्रह में कविताओं के साथ जो रेखांकन हैं, वे भी इतने बोलते हुए हैं, जितनी कि इस संग्रह में कवि की बोलती हुई अनुभूतियों वाली कविताएँ बोल रही हैं।—डॉ. कुँअर बेचैन
Bonsai Kahaniyan by Dr. Lata Kadambari
संदर सृजन बिना पीड़ा के कब संभव हो पाया है, जब पीड़ा घनी हो जाती है तब उसे बरसना ही पड़ता है। लो बरस गई पीड़ा बोनसाई कहानियों के रूप में। ये कहानियाँ आपको नारी सशक्तीकरण, नारी समानता, नारी हिंसा, कन्याभ्रूण हत्या पर गहन विश्लेषण करती दिखाई देंगी। इन कहानियों में जहाँ एक ओर मानवीय संवेदना दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर समाज में दरकते रिश्तों की टूटन भी दिखाई पड़ती है। कहानियाँ लोगों के पाखंड तथा तर्ककुतर्क का स्पष्ट आईना हैं। यह बोनसाई आकार में छोटी सही, पर विचारों से लबरेज है। इन बहुरंगी और पठनीय कथाओं में लेखिका ने जीवन के छोटेछोटे, परंतु अर्थपूर्ण क्षेपकों के माध्यम से समसामयिक ज्वलंत प्रश्नों और समस्याओं को उठाकर अपने सामाजिक और मानवीय सरोकारों की आश्वस्तिकारक बानगी प्रस्तुत की है। पुस्तक में अधिकांश जगह भाषा में गहनता दिखाई देगी, पर मौका मिलते ही लेखिका ने जगहजगह हास्यव्यंग्य की शैली भी अपनाई है, जो पाठकों के मिजाज के अनुकूल है। फास्ट फूड तथा पाउच के जमाने में वक्त की कमी को देखते हुए कहानियाँ भी छोटीछोटी होनी चाहिए न! उसी का प्रयास हैं ये कहानियाँ। निश्चय ही हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए मनोरंजक एवं पठनीय।
Brahmos Ki Safalta Ke Mantra by A. Sivathanu Pillai
प्रोफेशनल को ब्रह्मोस से बहुत कुछ सीखना है—कुछ भी नामुमकिन नहीं।
इस पुस्तक में ब्रह्मोस की यात्रा का वर्णन किया गया है, जिसने भारत को तीव्रतम, उच्च, परिशुद्ध, सुपर-सोनिक क्रूज मिसाइल के साथ मिसाइल प्रौद्योगिकी का लीडर बना दिया। भारत तथा रूस द्वारा मिलकर किए गए अनूठे संयुक्त प्रयास के कारण इतने कम समय में यह उपलब्धि प्राप्त हुई। यह इस ‘अनजान मार्ग’ का पहला अनुभव है, जिससे उजागर होता है कि ‘हम ऐसा कर सकते हैं।’
इस पुस्तक में दरशाया गया है कि इस समय ‘उत्कृष्ट प्रबंधन पद्धतियों’ तथा ‘बाजार दृष्टिकोण की मनोवृत्ति’ के माध्यम से मात्र 300 मिलियन डॉलर का निवेश करके 6 बिलियन डॉलर से अधिक ऑर्डर डिलीवर किए जा चुके हैं।
यह अपनी किस्म का पहला अद्वितीय मॉडल है, जिसमें भारत-रूस ने 50.5 : 49.5 प्रतिशत पूँजी निवेश किया तथा पहली सरकारी स्वामित्व की प्राइवेट तौर पर संचालित कंपनी (जीओपीओ) बनी; इसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी लाना सुनिश्चित किया गया—परिणाम उत्पाद की समयोचित प्राप्ति! दोनों देशों के बीच सहयोग से प्रौद्योगिकी की दृष्टि से ‘अनूठी प्रगति’ (Leap Frog Effect) हुई, जिससे दोनों भागीदारों को बराबर लाभ हुआ। देश की वृद्धि/उन्नति के लिए इस सफल मॉडल का आसानी से अनुकरण (replicate) किया जा सकता है।
Braj Ke Lokgeeton Ka Yaun Manovishleshan by Dr. Ram Singh
इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति सुखमय एवं आनंदमय जीवन जीने की नैसर्गिक आकांक्षा रखता है, क्योंकि सभी प्राणी आनंद की कोख से उत्पन्न हैं। अत: वे आनंद में ही जीवित रहते हैं—‘आनन्देन जीवन्ति।’ इस आनंद की संप्राप्ति के लिए मनुष्य सतत प्रयत्नशील रहता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ हैं जिसमें काम की अहम भूमिका रहती है, क्योंकि वह सृष्टि का मूलाधार है।
काम जीवन की सनातन संचेतना है, प्रीति की रीति है और संवेगात्मक आत्मा। वात्स्यायन के अनुसार जीने की कला है। फ्रायड ने काम को मानव की जिजीविषा कहा है, उसकी संतृप्ति के बिना शरीर और मस्तिष्क में अनेक रोग हो जाते हैं। काम प्रेम की कला है, जो नर-नारी में आनंदानुभूति संपादित करती है। अलौकिक आनंद की विधायिनी है, सहवासिक क्षरण की चरम परणति, सरस और मधुसिक्त।
लोकगीत लोकजीवन की सहज और सरस अनुभूतियों, विचारों और भावनाओं की लोकवाणी में मार्मिक अभिव्यक्ति हैं। लोकगीत पारदर्शी जीवाश्म है, जिनमें लोक मानव के रीति-रिवाज, मान्यताएँ, धारणाएँ, हर्ष-विषाद तथा चिराचरति आचरण प्रतिबिंबित होते हैं। ब्रज के इन लोकगीतों में यौन मनोवृत्ति का सरस विश्लेषण है, जो न केवल पठनीय है, बल्कि मनोरंजक भी है।
Brhattar Bharat Ka Nirmata: Chandragupta Maurya by Dilip Kumar Lal
आज से लगभग 2300 वर्ष पहले मगध पर घनानंद नामक एक कुटिल और क्रूर शासक का राज्य था। वह बात-बात पर लोगों को फाँसी दे देता था। ऐसे निरंकुश शासक ने जब चाणक्य नाम के एक विद्वान् का अपमान किया तो उसने नंद को समूल नष्ट करने का प्रण ले लिया। बालक चंद्रगुप्त भी नंद का सताया हुआ था, वह भी येन-केन-प्रकारेण नंद से प्रतिशोध लेना चाहता था।
अनायास ही चाणक्य और चंद्रगुप्त की भेंट हो गई। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को कडे़ अनुशासन में रखकर अस्त्र-शस्त्र के ज्ञान के साथ राजनीति की शिक्षा भी दी। अनुकूल अवसर मिलते ही चंद्रगुप्त ने घनानंद पर हमला कर दिया और उसका समूल नाश करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
मौर्य साम्राज्य पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्चिम में अरब सागर तक फैला था। उत्तर में चंद्रगुप्त के राज्य की सीमा दक्षिणी अफगानिस्तान और ईरान तक फैली थी। उसने वृहद् भारत पर एकच्छत्र अनुकरणीय राज्य किया।
जीवन के उत्तरार्ध में अपने पुत्र बिंदुसार को राज्य सौंपकर वह कर्नाटक में श्रवणबेलगोला चला गया और एक भिक्षुक के रूप में अपना जीवन बिताया। चंद्रगुप्त मौर्य का निर्लिप्त जीवन सचमुच अनुकरणीय है।
Buffett & Graham Se Seekhen Share Market Mein by Aryaman Dalmia
यह पुस्तक निवेश के उन मूलभूत सिद्धांतों को, वास्तविक उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करती है, जिन्हें वैज्ञानिक निवेश की पद्धति के जनक, बेंजामिन ग्राहम ने प्रतिप्रदित किया है। इसमें उन साधारण, किंतु बेहद कारगर दिशा-निर्देशों का भी विश्लेषण किया गया है, जिन्हें अपनाते हुए उनके सबसे मेधावी छात्र वॉरेन बफे ने निवेश की दुनिया की चुनौतियों को पार कर दुनिया के तीन सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक बनने का सफर तय किया। इसका भी वर्णन किया गया है कि विस्तृत विश्लेषण, स्वतंत्र सोच और अनुशासन की मदद से कैसे लाभ हासिल किया जा सकता है, तथा कैसे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए बाजार के रुझानों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। भारतीय बाजारों के सफलतम निवेशकों का भी उदाहरण के तौर पर इसमें जिक्र है—असाधारण रूप से सफल और क्रिस कैपिटल के संस्थापक आशीष धवन, मॉर्गन स्टेनले में इमर्जिंग मार्केट्स के पूर्व प्रमुख माधव धर; चैतन्य डालमिया, जिनकी स्वयं की कंपनी का प्रदर्शन तमाम दूसरी निधियों के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर है, और संजय बख्शी, जो मूल्य निवेश की शिक्षा देते हैं तथा भारत के लिए एक विशिष्ट कोष भी चलाते हैं। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि निवेशकों ने किस प्रकार ग्राहम और बफे के तरीकों को अपनाया और तर्कसंगत सोच के साथ असाधारण लाभ कमाया है।
Bujha Charag Hoon by Shailja Narhari
उसके हाथों में हाथ था लेकिन
दिल ही दिल में हज़ार डर आए
—शैलजा नरहरि
वरिष्ठ ग़ज़लकार श्री नरहरि अमरोहवी जी की जीवनसंगिनी शैलजा नरहरि ने नारी-जीवन के द्वंद्व और पीड़ा को अपनी ग़ज़लों की विषयवस्तु बनाया। शैलजा नरहरि जी ’90 के दशक तक देश के विभिन्न मंचों पर खूब सक्रिय और चर्चित रहीं। मंचों पर बढ़ती हुई फूहड़ता से खिन्न होकर धीरे-धीरे उन्होंने ख़ुद को मंचों से अलग कर लिया और पूर्णकालिक साहित्य-सृजन में व्यस्त हो गईं। एक धीर-गंभीर शायरा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप, उनकी क़रीब 400 ग़ज़लों में से कुछ चुनिंदा ग़ज़लों का चयन और संपादन करके मैंने यह संग्रह सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है।
मुझे विश्वास है कि पाठकों को ग़ज़लों का यह संग्रह पसंद आएगा।
—दीक्षित दनकौरी
दिल्ली
मो. : 9899172697
मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि ‘ग़ज़ल कुंभ 2020’ में इस बार वरिष्ठ शायरा (स्व.) शैलजा नरहरि जी की चुनिंदा ग़ज़लों का पहला ग़ज़ल-संग्रह प्रख्यात ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी जी के संपादन में प्रकाशित हो रहा है।
बुझा चरा़ग हूँ अब मेरी ज़िंदगी क्या है
कोई न मुझसे ये पूछे कि रौशनी क्या है
*****
मेरे बिकने का ज़िक्र जायज़ है
मेरे माथे पे मेरे दाम लिखो
जैसे मार्मिक शे’रों के माध्यम से मानवीय मन, विशेषकर नारी-मन के दर्द और द्वंद्व को व्यक्त करनेवाली उस दिवंगत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि।
दीक्षित दनकौरी जी को इस श्रमसाध्य नेक काम के लिए साधुवाद, कि उन्होंने एक और अच्छी शायरा के कलाम से ग़ज़ल-प्रेमी पाठकों को रू-ब-रू कराया।
‘ग़ज़ल कुभ 2020’ के सफल और सार्थक आयोजन के लिए शुभकामनाओं के साथ नववर्ष 2020 की हार्दिक बधाई एवं मंगलकामना।
—बसंत चौधरी
1 जनवरी, 2020
Bundelkhand Chitrawali by Ambika Prasad Divya
‘बुंदेलखंड चित्रावली’ इतिहास, कला और संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण समन्वय ग्रंथ है। इसमें बुंदेलखंड से संबंधित 101 विभूतियों, राजा-महाराजाओं और महारानियों के चित्र हैं तथा उन सभी का संक्षिप्त इतिहास भी वर्णित है। बुंदेलखंड की धरती ने इतने युद्ध देखे हैं, जितने भारत के किसी अन्य भू-भाग ने शायद ही देखे हों। इन युद्धों ने इतना रोमांचक और अद््भुत इतिहास गढ़ा, इस कारण चित्रों को प्रस्तुत किया जाना अत्यंत आवश्यक था। यह कार्य कोई सक्षम चित्रकार, इतिहासकार और एक विद्वान् ही कर सकता था। दिव्यजी ने यह कर दिखाया। इस महत्त्वपूर्ण कार्य में हजारों मील की यात्राएँ शामिल हैं। वर्षों की तपस्या और साधना है। बुंदेलखंड के इतिहास, कला और संस्कृति को समेटकर एक स्थान पर लाना दुस्तर कार्य था।
बुंदेलखंड के संदर्भ में इस प्रकार का यह पहला ग्रंथ है। इसके प्रकाशन से बुंदेलखंड के अद््भुत इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ेगा और बुंदेलखंड के अछूते, अनावृत इतिहास संदर्भों की जानकारी भी पाठकों को प्राप्त होगी।
विद्यार्थी, शोधार्थी ही नहीं, इतिहास, कला और संस्कृति-प्रेमियों के लिए एक कालजयी कृति।
Bundelkhand Ke Agradoot by Rakesh Kumar Agrawal
आज हर क्षेत्र में इज्जत, शोहरत और पैसा है लेकिन अतीत में ऐसा नहीं था। फिर भी ऐसे समय में भी कुछ लोगों ने साहित्य, कला और खेल के क्षेत्र में पूर्ण निष्ठा से जी-जान लगाकर काम किया। यह उनका जुनून समझ लें या उनकी लगन, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी आखिरी साँस तक मिट्टी के लगाव को वृद्ध नहीं होने दिया।
आजकल सोशल मीडिया और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जमाने में कोई भी बात या खबर बिजली की रफ्तार से फैलती है। लेकिन हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में कैसे बुंदेलखंड के अग्रदूतों—मुंशी प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, बाबू केदारनाथ अग्रवाल, वृंदावनलाल वर्मा, हॉकी के जादूगर दद्दा ध्यानचंद, बाबू श्यामलाल ‘इंदीवर’, महारानी लक्ष्मीबाई, मिर्जा गालिब, रायप्रवीण और मस्तानी ने अपनी यशकीर्ति की पताका पूरी दुनिया में फहराई होगी?
हर क्षेत्र का अपना एक एवरेस्ट होता है। स्टार और सुपरस्टार केवल सिनेमा में ही नहीं होते। वर्तमान समय में हर क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों के पास अकूत संपत्तियाँ हैं। लेकिन उन लोगों के कला प्रेम का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता जिन्होंने जिंदगी के उतार-चढ़ाव और फाकाकशी के चलते भी अपने कर्म से समझौता नहीं किया। इसलिए लेखक को अपनी जन्मभूमि बुंदेलखंड के ये अग्रदूत मिथकीय पात्रों से बिल्कुल भी कम नहीं लगते।
बुंदेलखंड की प्रमुख महान् विभूतियों को एक पुस्तक में सहेजने का यह पहला अभिनव प्रयास है। निश्चित तौर पर छात्रों, शोधार्थियों एवं अन्य पाठकों को यह पुस्तक लाभान्वित करेगी।
Bureaucrats Aur Jharkhand by Anuj Kumar Sinha
यह पुस्तक अनुभवी और जिम्मेवार पदों पर काम कर चुके अधिकारियों द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इन लेखों में अधिकांश लेख झारखंड या देश के आई.ए.एस.-आई.पी.एस. अफसरों द्वारा लिखे गए हैं। ये सारे लेख ‘प्रभात खबर’ में समय-समय पर प्रकाशित हुए हैं। कोई भी राज्य तब तरक्की करता है, जब सरकार और ब्यूरोक्रेट्स अपना-अपना काम ढंग से करते हैं, दोनों में तालमेल रहता है। सरकारें नीतियाँ बनाती हैं, निर्णय लेती हैं और ब्यूरोक्रेट्स उन्हें लागू करते हैं। कई बार सत्ता-ब्यूरोक्रेट्स में तालमेल गड़बड़ाता है। आरोप-प्रत्यारोप में समय निकल जाता है। जब झारखंड के नवनिर्माण की बात आई, तो राजनीतिज्ञों (यहाँ सरकार) ने अपने तरीके से काम किया। अफसरों की अपनी सोच थी कि कैसे राज्य विकसित हो सकता है। ‘प्रभात खबर’ ने प्रयास किया था कि झारखंड कैसे विकसित होगा, विकास का मॉडल क्या होगा, इस पर अधिकारी भी खुलकर बोलें और लिखें भी। तब आई.ए.एस.-आई.पी.एस. अफसरों ने हिम्मत कर अपनी बात लेखों के माध्यम से रखी थी। लेख लिखनेवालों में ब्यूरोक्रेट रह चुके तब के राज्यपाल प्रभात कुमार और वेद मारवाह भी थे। ये महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं, जो झारखंड को समझने में सहायक साबित होंगे। इनमें कई ऐसे अफसरों के लेख या इंटरव्यू हैं, जो बाद में झारखंड के मुख्य सचिव या डी.जी.पी. भी बने। इन लेखों का मकसद एक था—सिस्टम को और अच्छा करके झारखंड को आगे ले जाना। यह सिर्फ लेख नहीं, भविष्य का रोडमैप भी था, इसलिए ये लेख भविष्य में योजना बनाते समय भी बहुत काम आएँगे।
Business Karna Apane Paise Bina by Dr. Suresh Haware
व्यापार में बाधाएँ व रुकावटें तो आती ही हैं। इनसे डरना नहीं, बल्कि इनका स्वागत करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं से हमारी वास्तविक क्षमता की परीक्षा होती है। इसलिए इन्हें बुराई में अच्छाई मानना चाहिए। रुकावटें कई तरह की हो सकती हैं, जैसे आर्थिक, कानूनी, उत्पाद संबंधी, टैक्स संबंधी, कर्मचारी और प्रबंधन से संबंधित। हर समस्या का हल है, हमें बस उसे खोजना होता है।
अंत में, हमें इस कहावत को ध्यान में रखना होगा, ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ अर्थात् हम जो कुछ भी हासिल करना चाहते हैं, वह इसी भौतिक शरीर के द्वारा संभव है। अतः हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति सदा सचेत रहना चाहिए, जैसे यदि किसी प्रोजेक्ट में गिरावट आती है तो नुकसान बढ़ता है, मुनाफा घट जाता है, ऐसा ही हमारे स्वास्थ्य के साथ होता है। अतः अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखकर व्यापारी लंबी पारी खेल सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक शासकों, सरकारी अधिकारियों, समाज और अन्य लोगों को व्यापार व व्यापारियों के संबंध में एक सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करेगी, क्योंकि इस पुस्तक में विशेष रूप से कहा गया है कि व्यापारी देश की संपत्ति के सर्जक हैं, अर्थात् वे राष्ट्रीय संपदा के निर्माणकर्ता हैं।
लेखक के लंबे अनुभव से जनित यह पुस्तक नए उद्यमियों और बिजनेसमैन को पूँजी का सही निवेश और उपयोग करने का व्यावहारिक मार्ग बताती है और सफलता प्राप्त करने के गुरुमंत्र भी।
Byomkesh Bakshi Ki Rahasyamayi Kahaniyan by Saradindu Bandyopadhyay
सारदेंदु बंद्योपाध्याय की विशिष्टता उनके जासूसी लेखन के अतिरिक्त उनकी अद्वितीय लेखन-शैली के साथ-साथ उनके चरित्रों का सूक्ष्म जीवंत चित्रण है। बीसवीं सदी के प्रारंभ के बंगाल में लेखक और पाठक समान रूप से अपराध और जासूसी साहित्य को नीची निगाहों से देखते थे। सारदेंदु बंद्योपाध्याय ने पहली बार उस लेखन को सम्मानीय स्थान दिलाया। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनके पूर्व के लेखक पंचकोरी दे और दिनेंद्र कुमार अंग्रेजी के जासूसी लेखक आर्थर कोनान, डोएल, एडगर एलन पो, जी.के. चेस्टरसन तथा अगाथा क्रिस्टी से प्रभावित होकर लिखते थे, जबकि सारदेंदु के चरित्र और स्थान अन्य जासूसी उपन्यासों के विपरीत, भारतीय मूल और स्थल के परिवेश में जीते हैं। उनके लेखन का विनोदी स्वभाव पाठक को अनायास कथा के दौरान गुदगुदाता रहता है। ब्योमकेश का साहित्य न केवल अभूतपूर्व जासूसी साहित्य है बल्कि सभी समय और काल में, समाज के सभी वर्गों के युवाओं और वृद्धों में समान रूप से सदैव लोकप्रिय बना रहा है। पाठक इन रहस्य भरी कहानियों को उनके जीवंत लेखन के लिए, अंत जानने के बावजूद, बार-बार पढ़ने के लिए लालायित रहता है। किसी भी लोकप्रिय साहित्य में यह एक अद्वितीय उपलब्धि मानी जाती है और यही उपलब्धि सारदेंदु के ब्योमकेश बक्शी साहित्य को सत्यजीत राय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘फेलूदा के कारनामे’ के समान हमारे समय के ‘क्लासिक’ का स्थान दिलाती है।
Cancer Karan Aur Bachav by Dr. J.L.Agrawal
कैंसर : कारण और बचाव
कैंसर का नाम सुनते ही आँखों के सामने मृत्यु तांडव करती नजर आती है। यह एक ऐसा भयंकर रोग है जिसका नाम लेते भी मन काँप जाता है। आज विश्व में रोगों के कारण हो रही मौतों में कैंसर एक प्रमुख कारण है। कैंसर स्त्रा्-पुरुष, बाल-वृद्ध किसी को भी हो सकता है। यह कई प्रकार का होता है, जैसे—मुख कैंसर, गर्भाशय कैंसर, त्वचा कैंसर, आँतों का कैंसर, स्तन कैंसर, जीभ का कैंसर आदि।
इनमें कुछ प्रकार अत्यंत भयंकर हैं तो कुछ साध्य भी हैं। उचित खान-पान, रहन-सहन एवं प्रकृति से निकटता इस रोग से बचाव में काफी हद तक कारगर है। प्रस्तुत पुस्तक में कैंसर रोग के होनेवाले कारणों पर विस्तृत दृष्टि डाली गई है तथा इसके बचाव पक्ष पर सकारात्मक एवं सार्थक जानकारियाँ दी गई हैं। हमारा खान-पान एवं रहन-सहन कैसा हो तथा किस प्रकार के वातावरण से बचना चाहिए—इस संबंध में विशिष्ट जानकारी दी गई है।
वरिष्ठ चिकित्सक एवं विद्वान् लेखक का कहना है—‘इस रोग से बचाव के लिए बहुत कुछ हमारे अपने हाथ में है।’ वह ‘बहुत कुछ’ क्या है, इसे प्रस्तुत पुस्तक को पढ़कर ही जाना जा सकता है।
यह पुस्तक कैंसर रोगियों, चिकित्सकों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों तथा सभी स्तर के पाठकों हेतु उपयोगी सिद्ध होगी।
Cancer Ki Raat, Asha Ki Subah by Dr. Meenu Walia
कैंसर रोग से ग्रस्त होने की पहली जानकारी जिस समय किसी स्त्री/पुरुष को मिलती है, उसके लिए उस दिन को भुला पाना संभव नहीं होता। लगभग हर किसी के लिए यह जीवन को बदल देनेवाला क्षण होता है।
प्रसिद्ध कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनू वालिया की यह पुस्तक जीवन में वापसी करने और पहले की ही तरह आपको आपके पैरों पर फिर से खड़ा करने में किसी मार्गदर्शक की तरह सहायता करने की क्षमता रखती है। लेखिका कहती हैं, ‘‘मैं ऐसे कई लोगों से मिल चुकी हूँ, उन्हें रोग का पता चलने के दिन रोते देखा है, पर इसके साथ ही इलाज पूरा होने पर उनके खुशी के आँसू भी देखे हैं। यह हिचकोले खाती उन भावनाओं की एक अभिव्यक्ति है, जिनकी मैं गवाह रह चुकी हूँ और उन मरीजों से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस किया है। हम सब अपनी गलतियों से सीखते हैं, लेकिन बुद्धिमान वही होते हैं, जो दूसरों की गलतियों से सबक लेते हैं। यह पुस्तक इलाज के दौरान पैदा होनेवाली भ्रांतियों, भय, सामाजिक लांछन को दूर करने का एक विनम्र प्रयास है। साथ ही, यह भी बताती है कि अंततः परिस्थितियों से कैसे मुकाबला करें और एक विजेता बन जाएँ।’’
कैंसर के भयावह रोग से ग्रस्त होने के बावजूद उसके उपचार के दौरान ‘करणीय-अकरणीय’ (dos & dont’s) बतानेवाली एक व्यावहारिक पुस्तक। यह आपको संबल देगी, आपको इस विपत्तिकाल से पार निकलने में सक्षम बनाएगी।
Cancer Par Vijay Kaise Prapta Karen by Vrinda Sitaram
कैंसर का नाम सुनते ही साक्षात् मृत्यु नजर आने लगती है। यह एक ऐसा रोग माना जाता है, जो लाइलाज और अत्यंत कष्टकर होता है। इसके संबंध में फैली तमाम भ्रांतियों से न केवल रोगी बल्कि उसके परिजन, मित्रजन व संबंधी भी अज्ञात भय में जीते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में कैंसर विशेषज्ञ लेखिका डॉ. वृंदा सीताराम ने लीक से हटकर कैंसर से जूझने, उसे पराजित करने के लिए कुछ अलग ही तथ्य, व्यवहार एवं विधियाँ सुझाई हैं। पुस्तक कैंसर के मरीजों, उनके परिजनों व मित्रों को इस रोग को सहज और खेल-भावना से लेने की सोच अपनाने तथा विकसित करने की सलाह देती है—एकदम व्यावहारिक व वस्तुपरक।
अत्यंत उपयोगी पुस्तक जो कैंसर-पीड़ितों के लिए सच्चा साथी और मित्र साबित होगी।
Career Mein Safalta Ke 21 Mantra by Brian Tracy
यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, जो अपनी आजीविका या अपने कॅरियर को शिखर पर ले जाना चाहते हैं। अगर आप समझते हैं कि आपको आज जितना मिल रहा है, उससे कहीं अधिक पाने की योग्यता आप रखते हैं, तो शायद आप सही हैं। यह पुस्तक आपको दिखाएगी कि आप अपनी योग्यता का सही मूल्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ आपके लिए
21 सूत्रों पर आधारित व्यावहारिक एवं प्रामाणिक तकनीकों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। इन तकनीकों को यदि आप सही ढंग से अपनाते हैं और इन पर अमल करना आरंभ कर देते हैं तो किसी भी कंपनी या नौकरी में आप एक के बाद एक सीढि़याँ चढ़ते चले जा सकते हैं और तेजी से आगे बढ़ते रह सकते हैं।
इस पुस्तक का एक ही केंद्र-बिंदु है—कॅरियर में सफलता। दूसरे शब्दों में, कॅरियर को सफल बनाना। इस पुस्तक में वर्णित इक्कीस बहुमूल्य सुझावों का एकमात्र उद्देश्य आपके द्वारा अपने लिए चुने गए क्षेत्र में सफलता का उत्कर्ष पाना है।
सफलता के द्वार खोलनेवाली अत्यंत पठनीय पुस्तक।
Cartoonon Mein Gandhi by Shivanand Kamade
कार्टूनों में गांधी
महात्मा गांधी विश्व की महान् हस्ती थे। वे जीवन के प्रति संघर्ष करनेवाले एक अद्वितीय योद्धा थे। उनके व्यक्तित्व की विराटता, दृढ़ निश्चयात्मकता, रहस्यवादी सहजता, उत्कट संघर्षशीलता ने भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर के तत्कालीन प्रख्यात व्यंग्य चित्रकारों को अपनी ओर आकृष्ट किया। स्वयं गांधीजी ने भी अपने व्यंग्य चित्रों में गहरी रुचि दिखाई।
प्रस्तुत पुस्तक गांधीजी पर केंद्रित व्यंग्य चित्रों का हिंदी में पहला संकलन है। इसमें भारत सहित विश्व के अनेक सुप्रसिद्ध एवं महान् व्यंग्य चित्रकारों के कार्टून चित्र संकलित हैं, जो भारत की तत्कालीन राजनीति, समाज-व्यवस्था एवं देश की अंतर्बाह्य परिस्थितियों को अपने अलग ही रोचक व आनंदप्रद अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।
Case No. 56 by Chandrashekar Nagawaram
‘‘सुरागों से आपराधिक मामले की गुत्थी सुलझ जाती है। अपराधी कोई-न-कोई सुराग जरूर छोड़ते हैं।’’
किशोर की हत्या के मामले को सुलझाने के लिए तेज-तर्रार इंस्पेक्टर जेम्स और युवा डिटेक्टिव अमर सागर एक साथ आते हैं, जो एक जाने-माने कारोबारी हर्ष शिंदे का मैनेजर था। कई सुरागों का सिरा खोलकर भी उन्हें हल नहीं मिलता, जबकि परिस्थितियों से लगने लगता है कि यह एक हादसा है और केस बंद कर देना चाहिए।
अमर बेचैन हो उठता है और जाँच को आगे बढ़ाता है, क्योंकि उसे लगता है कि यह एक मर्डर है। जब पेचीदगी सच्चाई पर हावी होने लगती है, तब परिवार का हर एक शख्स शक के दायरे में आता है। क्या अमर उन सुरागों में छिपे मायने देख पाएगा? क्या कातिल शिंदे परिवार का ही कोई सदस्य है? क्या अमर की धारणा उसे केस को सुलझाने में मदद करेगी या वह इसमें उलझकर रह जाएगा? सुरागों से आपराधिक मामलों की गुत्थी सुलझ जाती है। अपराधी कोई-न-कोई सुराग जरूर छोड़ते हैं। लेकिन केस नं. 56 ऐसी बातों को फिजूल साबित करने पर आमादा है।
चलिए जाँच के उस सफर पर, जिसमें दोनों कुछ अविश्वसनीय तथ्यों से परदा उठाते हैं।
Chaitanya Mahaprabhu by Rachna Bhola Yamini
चैतन्य महाप्रभु का बचपन का नाम विश्वंभर था। उनका जन्म चंद्रग्रहण के दिन हुआ था। लोग चंद्रग्रहण के शाप के निवारणार्थ धर्मकर्म, मंत्र आह्वान, ओ३म् आदि जपतप में जुटे हुए थे। शायद इस धार्मिक प्रभाव के कारण ही चैतन्य बचपन से ही कृष्णप्रेम और जपतप में जुट गए। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बालक उच्च कोटि का संत बनेगा और अपने भक्तों को संसारसागर से तार देगा।
बचपन से ही चैतन्य कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अपने अकाट्य तर्कों से स्थानीय पंडितों को दर्शन और अध्यात्म चर्चा में धराशायी कर दिया था। बाद में वैष्णव दीक्षा लेने के पश्चात् चैतन्य दार्शनिक चर्चा के प्रति उदासीन हो गए। उन्होंने कृष्ण नामकीर्तन आरंभ कर दिया। चैतन्य ने कलियुग में भक्तियोग को मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग बताया है।
उनकी लोकप्रियता से खिन्न होकर एक बार एक पंडित ने उन्हें शाप देते हुए कहा, ‘तुम सारी भौतिक सुविधाओं से वंचित हो जाओ।’ यह सुनकर चैतन्य खुशी से नाचने लगे। मातापिता ने उन्हें घरगृहस्थी की ओर मोड़ने के लिए उनका विवाह भी कर दिया, लेकिन उन्होंने गृह त्याग दिया, अब सारी दुनिया ही उनका घर थी।
भगवान् कृष्ण के अनन्य उपासक, आध्यात्मिक ज्ञान की चरम स्थिति को प्राप्त हुए चैतन्य प्रभु की ईश्वरभक्ति की सरस जीवनगाथा जो पाठक को भक्ति की पुण्यसलिला में सराबोर कर देगी।
Chakra Se Charkhe Tak by Dinkar Joshi
चक्र से चरखे तक
कृष्ण करुणा का साक्षात् रूप हैं और गांधी प्रेम का एक अनोखा आकार। गांधी का जीवन सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया है। कृष्ण का जीवन सत्य की प्राप्ति के बाद का आचरण है। कृष्ण का जीवन-ध्येय धर्म की संस्थापना था और गांधी का जीवन-ध्येय सत्य की प्राप्ति था।
इन दोनों विरल व्यक्तित्वों के जीवन का परीक्षण करने के पश्चात्, उनके कर्मो की मीमांसा करने के पश्चात् क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि वे दोनों अपने-अपने उद्देश्य में सफल हुए?
सीने पर हाथ रखकर इसे कह पाना दुष्कार है।…और फिर भी देश या दुनिया को, और शायद समूची मानव जाति का निर्वहन कृष्ण और गांधी के बिना न कभी हुआ है, न होने वाला है।
कृष्ण और गांधी दोनों तो ऐसे प्रतीक हैं जिनके स्पर्श के बिना मानव जाति का बच पाना असंभव है। मनुष्य जाति का यह सद्भाग्य रहा है कि ऐसे प्रतीक समय-समय पर उसे प्राप्त होते रहे हैं।
जिस पल मनुष्य जाति ऐसे प्रतीक पैदा करने की क्षमता गँवा देगी, वह इतिहास का अंतिम पल होगा।
Chakravarty Samrat Ashok by Rachna Bhola Yamini
इतिहास में सम्राट् अशोक को दो चीजों के लिए याद किया जाता है—एक, कलिंग के युद्ध के लिए और दूसरा, भारत के बाहर की दुनिया में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए। अपने आरंभिक दिनों में अशोक बहुत क्रूर राजा था। अपने निष्कंटक राज्य के लिए उसने अपने सौतेले भाइयों को मरवा दिया था। उसके इन क्रूर कारनामों के कारण उसे ‘चंड अशोक’ कहा जाने लगा था। उसने एक के बाद एक राज्य जीता और साम्राज्यवाद की अपनी महत्त्वाकांक्षा को सींचता रहा। उसका राज्य भारत के पार दक्षिण एशिया और पर्शिया तक को छूने लगा।
आखिर कलिंग का युद्ध हुआ। इसमें भी अशोक को जीत मिली। लेकिन इस युद्ध में दोनों पक्षों के एक-एक लाख लोग मारे गए और इससे भी ज्यादा बेघर हो गए। कलिंग युद्ध में हुए महाविनाश से विचलित हो गया। उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उसने जनकल्याण के कार्य आरंभ कर दिए और राजसी भोग-विलास का परित्याग कर दिया। उसने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।
सम्राट् अशोक के शौर्य, युद्धकौशल विजय अभियानों और दानव से मानव बनने की मार्मिक कथा प्रस्तुत करनेवाली एक पठनीय पुस्तक।
Chalen Gaon Ki Ore by M.D. Mishra ‘Anand’
कहानियाँ अंतर्मन की वेदनाओं, समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वास और अन्याय तथा राग-द्वेष को उजागर करते हुए सचेत करती हैं, सही मार्ग प्रशस्त करती हैं। हमारा देश कृषि प्रधान और ग्रामों का समूह है। इसमें निवास करनेवाला वर्ग प्रारंभ से ही शोषित रहा है। किसानों की स्थिति दयनीय रही और आज भी है। पहले से ग्राम्य जीवन में बहुत बदलाव आए हैं। किसानों और खेतिहर मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए शासन द्वारा अनेक योजनाएँ चलाकर उनके उत्थान के प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु बुनियादी परिवर्तन नहीं हो पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि नीचे से ऊपर शासन और प्रशासन जिन भावनाओं के साथ योजनाएँ बनाते हैं, उनका क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। लालची और भ्रष्ट लोगों की जो शृंखला बनी हुई है, उसको तोड़ पाना कठिन हो रहा है। वे प्रत्येक मार्ग में अवरोध और अड़ंगे लगाने के विकल्प ढूँढ़ लेते हैं। तू डाल-डाल, मैं पात-पात—इसी साँप-सीढ़ी के खेल में कृषक, मजदूर तथा असहाय वर्ग फँसे हुए हैं। उनके द्वारा भोगे जा रहे यथार्थ का चित्रण ग्राम्य जीवन की इन कहानियों में समाहित है।
ग्रामीण परिवेश और देहात में किसान एवं आम जन को होने वाली कठिनाइयों, विसंगतियों, ज्यादतियों एवं उत्पीड़न को कहानियों के माध्यम से सामने लानेवाला यह कहानी-संग्रह ‘चलें गाँव की ओर’ रोचक-मनोरंजक तो है ही, पाठकों के मन को उद्वेलित करनेवाला भी है।
Chalo Aaj Mil Kar Naya Kal Banayen by Smt. Kusum Vir
इस कविता संग्रह में देशप्रेम, प्रेम, प्रकृति तथा दार्शनिक व सामाजिक तथा अन्य विषयों पर कविताएँ सम्मिलित हैं। देश-प्रेम की कविताओं में कवयित्री न केवल भारत के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है बल्कि भारत के गौरव को पुन: जीवित करने की ओर मिलकर नया कल बनाने के लिए प्रेरित करती है। प्रेम पर लिखी कविताओं में मिलन तथा विरह दोनों का अच्छा वर्णन है।
‘संध्या सिदूर लुटाती है’ कविता में रवि तथा संध्या को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति पर अच्छी कविताएँ हैं। इन कवताओं में कवयित्री प्रकृति से प्राप्त उपहारों की प्रशंसा करती है और प्रकृति से सीख लेने को प्रेरित करती है। दार्शनिक कविताओं में कवयित्री भौतिक वस्तुओं से अधिक संस्कारों को महत्त्व देती है और आत्मबोध के लिए प्रेरित करती है। सामाजिक विषयों में बाल-शोषण, नारी-शक्ति, महिला-भ्रूण हत्या आदि पर सशक्त कविताएँ हैं।
भाषा की दृष्टि से कविताओं में विविधता है। एक ओर कुछ कविताएँ जयशंकर ‘प्रसाद’ की शैली की याद दिलाती हैं तो दूसरी ओर कुछ कविताओं, जैसे—‘क्यों याद आई आज’ में उर्दू शब्दों का बाहुल्य है। पुस्तक रोचक, पठनीय और संग्रहणीय है। मैं हिंदी साहित्य जगत में कुसुम वीर जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
—डॉ. दिनेश श्रीवास्तव
संपादक, ‘हिंदी-पुष्प’
मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया
Chalo Karen Bharat Ki Sair by Narayan Bhakta
चलो, करें भारत की सैर
घूमना-फिरना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देशाटन हमेशा से ज्ञानार्जन का सशक्त माध्यम रहा है। आज पर्यटन एक उद्योग का दर्जा हासिल कर चुका है। पर्यटन की दृष्टि से हमारे देश में अनेक अनोखी चीजें, दर्शनीय स्थल, ऐतिहासिक दुर्ग, भव्य एवं प्राचीन महल तथा आध्यात्मिक तीर्थस्थल हैं। दुनिया के सात अजूबों में एक, प्रेम का प्रतीक ताजमहल भारत का प्रतीक बन गया है। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सरकार पर्यटन को खूब प्रोत्साहन दे रही है।
प्रस्तुत पुस्तक धरती के स्वर्ग कश्मीर से लेकर अंडमान, गोवा, पांडिचेरी, खजुराहो, मांडू, कुल्लू घाटी, कोणार्क, उद्यानों-झीलों के नगर उदयपुर, प्रयागराज, घाटों की नगरी बनारस, सैलानियों का स्वर्ग राजगीर, कालिदास की नगरी उज्जैन, ऐलिफेंटा की गुफाएँ तथा हसीन वादियों का घर दार्जिलिंग आदि स्थलों की रोमांचक और रमणीय सैर कराती है। प्रत्येक स्थल की सांगोपांग जानकारी उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ दी गई है। पुस्तक में विषयवस्तु इस प्रकार से सँजोई गई है कि पढ़ते समय देश भर की रमणीकता और भव्यता पाठक के सामने साकार हो जाती है और मनोहारी दृश्य मानस-पटल पर जीवंत हो जाते हैं।
यह पुस्तक जहाँ सुधी पाठकों को भारत की सैर कराएगी, वहीं बहूपयोगी जानकारी से उनका ज्ञानवर्द्धन भी करेगी।
Champaran Andolan 1917 by Ashutosh Partheshwar
चंपारन की संघर्ष-कथा जिस प्रकार राजकुमार शुक्ल के बिना पूरी नहीं हो सकती, उसी प्रकार ‘प्रताप’ के बिना भी पूरी नहीं हो सकती। ‘प्रताप’ ही वह पत्र है, जिसने पहली बार मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ कहा था।
4 जनवरी, 1915 के अंक में ‘प्रताप’ ने चंपारन की पीड़ा सुनाते हुए कहा, ‘‘देश के एक भाग के सीधे-सादे शांतिप्रिय आदमियों की यह हालत है। विदेशों में भारतवासियों पर जो अत्याचार हुआ या हो रहा है, वह इस अत्याचार के मुकाबले में अधिक नहीं है।…बाहर के अत्याचार की जड़ उखाड़ फेंकने से घर के इस अँधेरे को दूर करना अधिक हितकर है। निःसंदेह जो अपनी सहायता आप नहीं करता, उसकी सहायता मनुष्य तो दूर रहा, परमात्मा भी नहीं करता। बिहार में क्रियाशीलता की कमी है, पर हम इस बात को कदापि नहीं भूल सकते कि च्यूँटी में भी दम है और बहुत तंग किए जाने पर वह काट खाती है।’’
महेश्वर प्रसाद के ‘बिहारी’ पत्र से विदा होने के पश्चात् चंपारन के दुःख को देश-दुनिया को सुनाने का दायित्व ‘प्रताप’ ने सँभाल लिया। ‘प्रताप’ को गांधी अपने सिद्धांत, व्यवहार, करुणा एवं परदुःखकातरता के लिए ‘प्रिय’ थे तो ‘चंपारन’ अपनी ‘ट्रेजडी’ के कारण।
इस पुस्तक में ‘प्रताप’, ‘अभ्युदय’, ‘भारतमित्र’, ‘द बिहार हेराल्ड’, ‘हितवाद’, ‘पायोनियर’ जैसे पत्रों में प्रकाशित चंपारन से संबंधित समाचार-रिपोर्ट आदि संकलित हैं। चंपारन की अंतर्कथा को प्रामाणिकता से समझने के लिए यह प्राथमिक स्रोत है। निस्संदेह, भारतीय इतिहास के इस महत्त्वपूर्ण अध्याय को पढ़ने-समझने के लिए ‘चंपारन आंदोलन 1917’ एक पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है।
Chanakya Ke Management Sootra by Mamta Jha
चाणक्य कूटनीतिज्ञ होने के साथसाथ एक अर्थशास्त्री भी थे। उनके ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में एक राज्य के आदर्श अर्थतंत्र का विशद विवरण है और उसी में राजशाही के संविधान की रूपरेखा भी है। शायद विश्व में चाणक्य का ‘अर्थशास्त्र’ विधिविधानपूर्वक लिखा गया राज्य का पहला संविधान है।
चाणक्य ने राजनीति को अर्थ दिया, कूटनीति का समावेश किया, दाँवपेंच के गुर सिखाए, समाज को एक दिशा दिखाई तथा नागरिकों को आचारसंहिता दी। टुकड़ों में बँटे देश को एक विशाल साम्राज्य बनाया तथा सिकंदर के विश्वविजय के सपने को भारत में ही दफना दिया और एक साधारण व्यक्ति को राह से उठाकर मगध का सम्राट् बनाकर देश की समृद्धि में श्रीवृद्धि की।
चाणक्य विश्व के प्रथम मैनेजमेंट गुरु थे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में कुशल प्रबंधन का रास्ता दिखाया। उनके बताए सूत्रों और जीवनमंत्रों के आधार पर आज भी कैसे अपने जीवन का सही प्रबंधन करके हम सफल हो सकते हैं, इसी बात को इस पुस्तक के जरिए बताने का प्रयास किया गया है। शासन, राज्य, परिवार, समाज, वित्त, सुरक्षा—सभी विषयों पर प्रस्तुत हैं महान् आचार्य चाणक्य के मैनेजमेंट सूत्र, जो आपकोे जीवन के संघर्षों से जूझने की शक्ति प्रदान करेंगे।