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Bharat Cheen Sambandh by Arun Shourie
भारत-चीन संबंध—अरुण शौरी
भारत-चीन संबंधों में आरोहों-अवरोहों का एक लंबा इतिहास रहा है। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा लगाते हुए भी सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। इसके बाद भी चीन भारत के अनेक क्षेत्रों में लगातार अतिक्रमण करता रहा है। चीन के प्रति आत्मसमर्पण की स्थिति हमारी नीतियों के कारण ही है।
चीन के अतिक्रमण के लिए केवल सरकारी नीतियाँ ही जिम्मेदार नहीं रही हैं, अपितु इसके लिए अन्य कारक भी उत्तरदायी रहे हैं, जैसे—हमारे देश की पूर्णरूप से ध्वस्त हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था; सरकारी निकायों की अत्यधिक दुर्गति, जिसके कारण इनकी क्षमता खत्म होती जा रही है। लोगों में भौतिक साधनों के प्रति आकर्षण मीडिया और उसकी ‘जीवन-शैली पत्रकारिता’ द्वारा उत्पन्न किया जाता है—तब कौन सा देश इन परिस्थितियों में अवसर तलाश नहीं करेगा? क्या चीन नहीं करेगा?
यह पुस्तक उन भ्रांतियों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिसने पंडित नेहरू को भी भ्रमित कर दिया और जिसके फलस्वरूप देश को भारी क्षति उठानी पड़ी।
सन् 1962 की पराजय पर अब तक बहुत सा साहित्य लिखा जा चुका है; परंतु यह पुस्तक उन सबसे अलग हटकर है। इसमें केवल पंडितजी के लेखों व भाषणों के आधार पर उनकी चीन संबंधी नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है।
चीनियों द्वारा हमें सिखाए गए सबक, जो हमने नहीं सीखे, उन्हें उद्घाटित कर अंतर्मंथन और पुनर्विचार करने का मार्ग प्रशस्त करती है विद्वान् पत्रकार-अरुण शौरी की पुस्तक भारत-चीन संबंध।
Bharat Darshan by Jagram Singh
विश्व में अपने वैभव के लिए ख्यातिप्राप्त किसी भी राष्ट्र के उस वैभव की प्राप्ति के लिए किए हुए प्रयत्नों का अध्ययन ऐसे वैभव की चाह रखनेवाले सभी राष्ट्रों को बहुत बोधप्रद होता ही है। ऐसे उपलब्ध सभी अध्ययन (एक बोध) निरपवाद रूप से प्रदान करते हैं कि राष्ट्र की वैभवप्राप्ति, राष्ट्र के भाग्योदय की शिल्पकार सदा ही उस राष्ट्र की सामान्य प्रजा होती है। राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन, विचार एवं तत्त्वज्ञान, राजतंत्र और नेतागण, मान्यताएँ आदि बातें केवल सहायक ही होती हैं, जबकि सामान्य जनमानस का पुरुषार्थ ही राष्ट्र के भाग्योदय का प्रमुख माध्यम होता है।
स्व की जागृति के बिना व्यक्ति और समाज के पुरुषार्थ का उदय नहीं हो सकता है। हमें अपने राष्ट्र का भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विशेषताएँ, गौरवशाली इतिहास एवं पूर्वजों के पुरुषार्थ-समर्पण आदि का वास्तविक ज्ञान होने से ही व्यक्ति एवं समाज को विरासत में मिले संसाधन एवं क्षमताएँ वर्तमान स्थिति की कारण बनीं। अपने गुणों की परंपराओं को जानने से ही राष्ट्र के भाग्योदय का पथ तथा दृढ़तापूर्वक उस पथ पर चलकर ध्येय प्राप्त करने का संकल्प, विजिगीषा वृत्ति तथा आत्मविश्वास एवं संबल प्राप्त होता है।
‘भारत दर्शन’ ग्रंथ में देवस्तुति, नम्र निवेदन, भौगोलिक स्थिति, पुण्य स्थलों का स्मरण, प्राचीन वाङ्मय, धार्मिक पंथ एवं दर्शन, उन्नत विज्ञान, प्राचीन परंपराएँ, भुवनकोश एवं वैदिक-कालीन, रामायणकालीन, महाभारतकालीन विश्व रचना एवं संस्कृति, भारतवर्ष के दिग्विजयी राजाओं एवं राज्यों का विस्तार, संघर्षकालीन इतिहास, ध्येय समर्पित पूर्वजों का स्मरण, वर्तमान भौगोलिक परिदृश्य एवं राजनीतिक राजव्यवस्था, साथ ही अविस्मरणीय उपलब्धियाँ एवं पुनः संकल्प आदि का इस ‘भारत दर्शन’ ग्रंथ में समीचीन रूप से विवेचन उपलब्ध है।
भारत की प्राचीन एवं अर्वाचीन गौरवशाली परंपराओं एवं वैज्ञानिक स्वप्रमाण तथ्यों का यह सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादक ग्रंथ है। वस्तुतः भारत राष्ट्र को समझना है तो ‘भारत दर्शन’ का अध्ययन करना ही होगा।
Bharat Evam Vishva Ke Mahan Divas by Pushpa Sinha
सदियों से दुनिया भर में दिवसों का महत्त्व है। दिवस ही आदमी को कर्म में संलग्न करते हैं, जबकि रातें विश्राम और नींद के लिए होती हैं। इस तरह दिवस हमारे लिए पवित्र और पूजनीय बन जाते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक के दिवस किसी-न-किसी उद्देश्य के लिए लोगों के महान् त्याग, बलिदान और तपस्या की याद दिलाते हैं तो किन्हीं क्षेत्रों में उनके अद्भुत, चमत्कारी कार्यों की बानगी को रेखांकित करते हैं। कहीं शौर्य, खेल, स्वास्थ्य, संस्कृति, करुणा, प्रेम, भाईचारा के लिए समर्पित योगदान को याद किया जाता है, तो कहीं गुलामी की जंजीरें तोड़कर आजादी के खुले आकाश में साँस लेनेवाले देश को स्मृति के पटल पर अंकित कर उसकी याद का हर साल जश्न मनाते हैं। यहाँ तक कि देश और दुनिया को नई दिशा देने के लिए, नए समाज की रचना के लिए, नई रीतियों और परिपाटियों की शुरुआत के लिए भी इन्हें याद किया जाता है। चहुँ ओर फैली विकृतियों, विसंगतियों, अपराधों, अंधविश्वासों और कुरीतियों को दूर करने के लिए जो महान् कार्य किए गए उनकी महानता को भी हम याद करते हैं।
‘भारत एवं विश्व के महान् दिवस’ ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो देश और दुनिया के 191 महान् दिवसों की याद दिलाएगी, जिन्हें प्रत्येक वर्ष एक खास तिथि को समारोहपूर्वक मनाया जाता है।
यह पुस्तक सुधी पाठकों को हर महान् दिवस की रोमांचक जानकारी देगी। साथ ही छात्रों, शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेनेवालों, प्रवक्ताओं एवं शिक्षकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी।
Bharat Gatha by Suryakant Bali
भारत की दस हजार साल पुरानी सभ्यता के इतिहास का शिखर वक्तव्य यह है कि इसके निर्माण और विकास में युग परिवर्तन कर सकनेवाला विलक्षण और मौलिक योगदान उन समुदायों और जाति-वर्गों के प्रतिभा-संपन्न एवं तेजस्वी महाव्यक्तित्वों ने किया, जो पिछली कुछ सदियों से उपेक्षा और तिरस्कार के पात्र रहे हैं, शिक्षा-विहीन, दलित बना दिए गए हैं। किसी भी समाज के जीवन-मूल्य क्या हैं, इस संसार और ब्रह्मांड के प्रति उसकी दृष्टि कितनी तर्कपूर्ण और विज्ञान-सम्मत है, मनुष्य ही नहीं, प्राणिमात्र को, वनस्पतियों तक को वह समाज किस दष्टि से देखता है, इसका फैसला इस बात से होता है कि वह समाज स्त्री को पूरा सम्मान देता है या नहीं और कि वह समाज उपेक्षावश शूद्र या दलित बना दिए वर्गों को सिर-आँखों पर बिठाता है या नहीं, और निर्धनों के प्रति उसका दृष्टिकोण मानवीय तथा रचनात्मक है या नहीं।
इसमें सकारात्मक पहलू यह है कि मनु से नैमिषारण्य तक विकसित हुए इस देश ने, थोड़ा बल देकर कहना होगा कि इस देश के हर वर्ग ने ऐसे हर योगदान को परम सम्मान देकर शिरोधार्य किया है। ये सभी, कवष ऐलूष हों या अगस्त्य, शंबूक हों या पिप्पलाद, वाल्मीकि हों या उद्दालक, सूर्या सावित्री हों या गार्गी वाचक्नवी, शबरी हों या हनुमान, महिदास ऐतरेय हों या अथर्वा, वेदव्यास हों या सत्यकाम जाबाल, विदुर हों या एकलव्य या फिर हों महामति सूत—ये सभी कभी उन वर्गों के नहीं रहे, जिन्हें बड़ा या प्रिविलेज्ड वर्ग कहा जा सकता हो। इनको, वसिष्ठ, विश्वामित्र और परशुराम के इन सहधर्मियों को इतिहास से निकाल दीजिए
तो क्या बचता है हमारी सभ्यता में? युगनिर्माता, सभ्यतानिर्माता, राष्ट्रनिर्माता इन महाव्यक्तित्वों ने, संत रैदास, मीराबाई और महात्मा फुले के इन पूर्वनामधेयों ने उन जीवनमूल्यों व धर्म का विकास किया, जिसको आप एक ही नाम दे सकते हैं—सनातन धर्म।
Bharat Hum Sabka by Amarjeet Sinha
भारत आज संसार की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुकी है। यह निश्चय ही एक बड़ी उपलब्धि है। पर इसके साथ ही चौंकाने वाले कुछ आँकड़े भी हैं, जैसे सबसे अधिक गरीबों का देश—अनुमानत: 30 करोड़; साक्षरता भयानक रूप से कम—2011 में करीब 27 करोड़ लोग निरक्षर; स्वास्थ्य के मोर्चे पर विश्व के 40 प्रतिशत कुपोषित बच्चों का घर है भारत।
अमरजीत सिन्हा, जो सामाजिक विकास के अध्येता रहे हैं और जिन्होंने सर्वशिक्षा अभियान एवं राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, ने इस पुस्तक में एक आर्थिक स्वप्न भी प्रस्तावित किया है—एक ऐसे भारत का, जो अपने सवा अरब से भी अधिक लोगों की क्षमताओं का संपूर्ण विकास कर, उनका पूरा उपयोग कर सफलता के नए शिखर छू सके।
वे मुख्य मुद्दों कुपोषण, स्वास्थ्य, कल्याण, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, गरीबों के लिए आजीविका और देश भर में लगातार शहरों के विकास की पड़ताल करते हैं। राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के परे, यह पुस्तक उन मुद्दों को प्रस्तुत करती है, जो वास्तव में उसका आधार बनाते हैं, जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं।
Bharat Ka Dalit-Vimarsh by Suryakant Bali
दलित हिंदू ही हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत के पिछड़ा, आदि यानी सभी मध्यम जातियाँ हिंदू हैं और ठीक वैसे ही जैसे भारत की सभी सवर्ण जातियाँ हिंदू ही हैं। भारत के हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। वे किसी भी आधार पर हिंदू से अलग, पृथक् कुछ भी नहीं हैं, फिर वह आधार चाहे भारत के जीवन-दर्शन का हो, भारत की अपनी विचारधारा का हो या भारत के इतिहास का हो, भारत के समाज का हो, भारत की संपूर्ण संस्कृति का हो। इस समग्र विचार-प्रस्तुति का अध्ययन होना ही चाहिए। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के आह्वान का सम्मान करते हुए सारा भारत, जिसमें हमारे जैसे लिखने-पढ़ने वाले लोग भी यकीनन शामिल हैं, अब उस वर्ग को ‘दलित’ कहता है, जिसे वैदिक काल से ‘शूद्र’ कहा जाता रहा है। प्राचीन काल से शूद्र तिरस्कार के, उपेक्षा के या अवमानना के शिकार कभी नहीं रहे। हमारे द्वारा दिया जा रहा यह निष्कर्ष हमारी इसी पुस्तक में प्रस्तुत किए गए शोध और तज्जन्य विचारधारा पर आधारित है। इस विचारधारा को हमने अपनी ही पुस्तकों ‘भारतगाथा’ और ‘भारत की राजनीति का उत्तरायण’ में विस्तार से तर्क और प्रमाणों के साथ देश के सामने रख दिया है। दलितों का पूर्व नामधेय शूद्र था। जाहिर है कि इसका अर्थ खराब कर दिया गया। पर सभी शूद्र उसी वर्ण-व्यवस्था का, ‘चातुर्वर्ण्य’ का हिस्सा थे, जिस वर्ण-व्यवस्था का हिस्सा वे तमाम ऋषि, कवि, साहित्यकार, मंत्रकार, उपनिषद्कार, पुराणकार और लेखक थे, जिनमें स्त्री और पुरुष, सभी शामिल रहे, जिन्होंने वैदिक मंत्रों की रचना ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, सभी वर्णों के विचारवान् लोगों ने की; रामायण, महाभारत, पुराण जैसे कथा ग्रंथ लिखे; ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषद् साहित्य तथा समस्त निगम साहित्य की रचना की। ब्राह्मणों ने भी की और शूद्रों ने भी की। स्त्रियों ने की और पुरुषों ने भी की। सभी ने की।
दलितों के सम्मान और गरिमा की पुनर्स्थापना करने का पवित्र ध्येय लिये अत्यंत पठनीय समाजोपयोगी कृति।
भारत के हिंदू समाज में आए इन विविध परिवर्तनों और परिवर्तन ला सकनेवाले अभियानों-आंदोलनों के परिणामस्वरूप देश में जो नया वातावरण बना है, जो पुनर्जाग्रत समाज उभरकर सामने आया है, जो नया हिंदू समाज बना है, उस पृष्ठभूमि में, इस सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य में हिंदू उठान और इसलिए पूरे भारत में आए दलित उठान, उसका मर्म और परिणाम समझ में आना कठिन नहीं। भारत चूँकि हिंदू राष्ट्र है, वह न तो इसलामी देश है और न ही क्रिश्चियन देश है, और भारत कभी इसलामी राष्ट्र या क्रिश्चियन राष्ट्र बन भी नहीं सकता, इसलिए भारत में दलित विमर्श, दलित समाज का स्वरूप और दलितों के उठान में इस अपने हिंदू समाज की, भारत के हिंदू राष्ट्र होने के सत्य की अवहेलना कर ही नहीं सकते। भारत का हिंदू आगे बढ़ेगा तो भारत का दलित भी आगे बढ़ेगा और भारत का दलित आगे बढ़ेगा, तो भारत का हिंदू भी आगे बढ़ेगा। उसे वैसा लक्ष्य पाने में भारत का हिंदू राष्ट्र होना ही अंततोगत्वा अपनी एक निर्णायक भूमिका निभाएगा।
Bharat Ka Nav-Nirman by Suresh Rungata
छह विभिन्न शीर्षकों में विभक्त प्रस्तुत पुस्तक ‘भारत का नव निर्माण’ सुरेश रूँगटा द्वारा समयसमय पर विभिन्न पत्रों में लिखे गए सारगर्भित लेखों का संकलन है। इन आलेखों में पिछले तीनचार वर्षों के दौरान राज्य के अलावा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए बुनियादी एवं सुधारवादी परिवर्तनों का विस्तार से विवरण है। ज्वलंत विषयों तथा घटनाओं, खासकर आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समस्याओं पर आधिकारिक ढंग से गहन एवं निष्पक्ष चिंतन और विवेचन के साथ उसके उचित समाधान के तर्कसम्मत सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।
मूल रूप से पुस्तक का आलोच्य विषय है—भारत का पुनरुत्थान—भौतिक एवं बौद्धिक स्तरों पर। भारत एवं हिंदुत्व के विरुद्ध फैलाई जा रही भ्रांति एवं अनर्गल प्रवादों का परदाफाश करके रूँगटाजी ने लोकोपयोगी काम किया है। कृषिसमस्या, भूमिअधिग्रहण, पर्यावरण की रक्षा, खाद्यसुरक्षा, गरीबों की बैंक तक पहुँच एवं कालेधन और भ्रष्टाचार की विदाई के अलावा विकास के पैमाने की विकृति और नैतिकता से बढ़ती हुई दूरी आदि से संबंधित लेख भी पुस्तक में संकलित हैं। निस्संशय सामयिक विषयों पर तटस्थ भाव से विवेचन पुस्तक की सार्थकता है।
भारत के नवनिर्माण तथा स्वर्णिमउज्ज्वल भविष्य के लिए जिस मनःस्थिति और कार्यकलापों की आज आवश्यकता
है, उनपर केंद्रित हैं इस पुस्तक के
पठनीय लेख।