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Bhaktiyog by Swami Vivekananda
निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को ‘भक्तियोग’ कहते हैं। इस खोज का आरंभ, मध्य और अंत प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मत्तता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति को देनेवाली होती है। ‘भक्तिसूत्र’ में नारदजी कहते हैं, ‘‘भगवान्् के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेमपात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए संतुष्ट हो जाता है। इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएँ घर किए रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता। भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है, क्योंकि इन सबका एक न एक लक्ष्य है ही, पर भक्ति स्वयं ही साध्य और साधन-स्वरूप है।’’ —(नारदभक्तिसूत्र)
Bharat 2020 Aur Uske Baad by A P J Abdul Kalam , Y.S. Rajan
परिवर्तन का समय अभी है। विकल्प स्पष्ट और भयानक है। अगर हम वर्तमान ढर्रे पर ही चलते रहे तो विश्व के अन्य लोग हमसे आगे निकल जाएँगे। गरीबी व बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ जाएगी, जो हमारे समाज को अंतर्विस्फोट की ओर ले जाएगी। और अगर हम बदलाव लाएँगे तो हम वास्तविक प्रगति कर पाएँगे—गरीबी से समृद्धि की ओर, गतिरोध से तीव्र विकास की ओर।’
भारत अभी भी एक दशक के भीतर ही विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है। ‘भारत 2020 और उसके बाद’ नामक यह पुस्तक इस रूपांतरण के लिए एक पूरी कार्ययोजना प्रदान करती है।
Bharat Aur Europeeya Sangh : Ek Antrang Drishtikon by Bhaswati Mukherjee
एक प्रचलित मान्यता के मुताबिक भारत-यूरोपीय संघ के संबंध को ब्रिटिश प्रिज्म के जरिए बेहतर ढंग से देखा जा सकता है। यह मान्यता भारत में सिकंदर के आगमन और रोमन साम्राज्य के भारत के साथ व्यापार जैसे ऐतिहासिक प्रमाण को नजरअंदाज करती है। हाल के समय में सांस्कृतिक शख्सियत सत्यजित रे कहीं और के बजाय पेरिस में ज्यादा मशहूर हैं। यूरोपीय संघ के साथ भारत का व्यापार, विशेष रूप से रक्षा संबंधी सामानों के मामले में चैनल के इर्द-गिर्द के देशों में ही नहीं, एक हद तक पूरे महादेश में फैला हुआ है।
ब्रेक्सिट अब उस ब्रिटिश प्रिज्म को हटा लेनेवाला है। एक ताजा और कई मायनों में भारत-यूरोपीय संघ का एक नया संबंध उभरकर आने वाला है। भास्वती मुखर्जी की पुस्तक ‘भारत और यूरोपीय संघ : एक अंतरंग दृष्टिकोण’ बहुत ही सामयिक है। यह अतीत की रूपरेखा को पेश करती है, तमाम जटिलताओं के बीच संबंधों की वर्तमान स्थिति की व्याख्या करती है और भविष्यवाणी भी करती है। यह बहुत ही सफल माने जाने वाले पेशेवर द्वारा एक वस्तुपरक आकलन है, जो अतीत के संबंधों की समस्याओं पर नजर डालते हुए भारत-यूरोपीय संघ के अधिक सुदृढ़ भविष्य के मद्देनजर व्यावहारिक कदम भी है।
एक बेहतर धाराप्रवाहिका के साथ लिखा गया ‘भारत और यूरोपीय संघ : एक अंतरंग दृष्टिकोण’ के शब्दचित्र आकर्षित करते हैं, जो इसे अनूठा और निश्चित रूप से पढ़े जानेवाला बनाते हैं।
Bharat Bhagya Vidhata by Dr. Apj Abdul Kalam
2014 में भारत में 16वीं लोकसभा का चुनाव हुआ। देशभर के मतदाताओं ने शासन और चुनावों से जुडे़ मुद्दों पर बहस की। यह पुस्तक ऐसे व्यक्ति ने लिखी है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति को बहुत निकट से देखा है। यह पुस्तक ऐसा वैचारिक कथन है, जो हर नागरिक को पढ़ना और समझना चाहिए।
भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीविद्, शिक्षक और विचारक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने देशभर का गहन दौरा किया है और करीब 1 करोड़ 70 लाख नौजवान भारतीयों से बात की है। उन्होंने अपने विस्तृत अनुभव और ब्योरों की बारीक जानकारी के आधार पर शासन के विभिन्न आयामों पर चर्चा की है और भारत के लिए एक विजन दिया है, जिसे साकार करने के लिए हर भारतीय ईमानदार और नैतिक रूप से श्रेष्ठ बने तथा कड़ा परिश्रम करे, ताकि हम विकसित भारत का लक्ष्य हासिल कर सकें।
डॉ. कलाम ने भ्रष्टाचार, शासन और जवाबदेही के मुद्दों केव्यावहारिक और चरणबद्ध समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। आशावादी, प्रगतिशील और सकारात्मक सोच के साथ उन्होंने ऐसे भारत का स्वप्न देखा है, जो हर नागरिक के समग्र विकास से ही हासिल हो सकता है। इसमें विकास की समयबद्ध कार्ययोजना बताई गई है, जिसे हर नागरिक को आत्मसात् करना चाहिए। इससे वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल सोच-समझ एवं विश्लेषणात्मक ढंग से करके भारत में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।