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Asahaj Padosi by Ram Madhav
सन् 1962 के युद्ध के पाँच दशक बाद भी भारत और चीन के संबंध असहज बने हुए हैं। राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है। बाहरी तौर पर दोनों देशों के नेता संबंध मजबूत करने की प्रतिबद्धता जाहिर करने में कभी नहीं चूकते, लेकिन दोनों ही जानते हैं कि उनके बीच एक ऐसी विशाल खाई है, जिसे पाटना कठिन है।
दूसरी सहस्राब्दी के अंत में और बीसवीं शताब्दी के मध्य में, भारत और चीन, दोनों ही स्वतंत्र सत्ता केंद्रों के रूप में दोबारा उभरे, जो अपनी तुलनात्मक आबादी और संसाधनों के बल पर आगे बढ़ने के इच्छुक हैं। इस कारण से दोनों देश एक बार फिर एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए।
चीन और भारत ने चालीस के दशक के अंत में स्वतंत्रता के बाद पूरी तरह से राजनीतिक तंत्र अपनाए। पचास के दशक में तिब्बत पर चीन के कब्जे एवं सन् 1962 के भारतचीन युद्ध ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया। सन् 1962 के युद्ध ने आग में घी का काम किया।
प्रस्तुत पुस्तक में सन् 1962 के युद्ध का इतिहास बताया गया है और अपने पड़ोसी को सही तरह से समझने में भारत की असफलता को उजागर किया गया है। भारत को अपनी इस असफलता का नुकसान लगातार उठाना पड़ रहा है, क्योंकि चीन ने युद्ध के बाद भी वही रास्ता अपना रखा है, जो उसने युद्ध के पहले अपनाया था। यह स्थापित करती है कि दोनों देश एकदूसरे के प्रचंड विरोधी बने रहेंगे और ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने असहज पड़ोसी देश चीन की सोच, रणनीति और बदमिजाजी को समझे।
Asambhav Kuchh Bhi Nahin by Ram Singh.
प्रस्तुत कहानी-संग्रह के केंद्र में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कठिनाइयों और अव्यवस्था के बीच आनंद ढूँढ़ने का प्रयास किया और अपनी जिंदगी को खूबसूरती का असली जामा पहनाया। इन्होंने शारीरिक दुर्बलताओं और कठिनाइयों से गुजरते हुए विस्मयकारी कार्य करके अपनी जिंदगी को मूल्यवान और सार्थक बनाया है। विश्व के मानचित्र में ऐसे नाम अवस्थित हैं, जिनका जीवन अजीब मोड़ों से गुजरा है। विकलांगता, निर्धनता, संघर्ष-दर-संघर्ष, तनाव या अवसाद की परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं रहीं, किंतु उन्होंने अपने मनोबल, आत्मविश्वास और साहस से विषम परिस्थितियों में अपने को ढालकर जीवन को आश्चर्यजनक आयाम दिए हैं। उनके हौसलों के आगे आदमकद आपदाएँ बौनी हो गई हैं। ऐसे लोगों ने अद्भुत कार्य किए हैं, जिनसे खुद की ही नहीं, औरों की जिंदगी में भी प्रकाश आलोकित हुआ है। अरे नौजवानो! उठो, उन महापुरुषों की जिंदगी में झाँको, उनके प्रसंगों को अपनी जिंदगी से जोड़कर अपने जीवन को सफलता के शिखर तक ले जाने का प्रयत्न करो। ‘असंभव कुछ भी नहीं’ कृति पाठकों को प्रेरित करके सफलता के पथ पर अग्रसर होने का एक माध्यम है।
Asambhav Se Sambhav Ki Ore by Tarun Pithode
यह उपन्यास एक जीवन-गाथा है। एक जीवन, जिसका कुछ हिस्सा मैंने भी अनुभव किया है और मेरा इसे अस्वीकार करने का इरादा नहीं है। हम संभावनाओं की सदी में रहते हैं, जहाँ असंभव भी अधिकतर संभव प्रतीत होता है, इसीलिए इस कहानी का जन्म हुआ, जो आज के युवाओं की क्षमताओं का बहुत अच्छा वर्णन करती है। जीवन की नवीन वास्तविकताओं से परिचित होने के दौरान मैंने कुछ समय चुराया, अधिकतर अपने परिवार के हिस्से में से और कुछ बातें लिखीं, जिन्हें मैंने अपने संघर्ष की अवधि में अनुभव किया था, संघर्ष कोई नहीं से, कुछ बनने का। उन्हीं अनुभवों को मैं आज की पीढ़ी से और कई ऐसे लोगों से बाँटना चाहता हूँ, जो संघर्ष करते हैं, उपलब्धियों से भरे जीवन का निर्माण करने के लिए और अपनी किस्मत से लड़ने के लिए।
इस उपन्यास का उद्देश्य है लोगों की मदद करना—अपने संघर्ष को कुछ आसान समझने में, दुनिया को बेहतर ढंग से जानने में, और स्वयं को धोखा खाया महसूस न करने में।
Asha Aur Vishwas : Ek Yatra by Dr. C.P. Thakur
डॉ.सी.पी. ठाकुर की ‘आशा और विश्वास : एक यात्रा’ उत्तर बिहार के एक गाँव में, एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए व्यक्ति की कहानी है। बचपन में वह अकसर बीमार रहते; हाई स्कूल में जाकर उन्हें ज्ञात हुआ कि वे कालाजार नामक रोग से पीडि़त हैं। बावजूद इसके, उन्होंने डॉक्टरी की शिक्षा प्राप्त की और लंदन और एडिनबरा, दोनों ही जगहों से एम.आर.सी.पी. परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। भारत आकर बतौर डॉक्टर एवं वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अपार ख्याति प्राप्त की। कालाजार के क्षेत्र में उनके अग्रणी शोध ने उन्हें विश्वभर में पहचान दिलाई। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया। 1984 में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और पटना से लोकसभा सांसद चुने गए। पूरी श्रद्धा और इमानदारी से वह जनसेवा में जुडे़ रहे।
Asha Ka Savera by Barack Obama
बराक ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही पूरे विश्व में एक आशावाद का संचार हो गया। इसका कारण था समाज के हर अंग के प्रति उनका चिंतन और सोच। उनकी मान्यता है कि प्रत्येक बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए-और यह केवल एक हवाई वादा बनकर ही नहीं रह जाना चाहिए; सभी बच्चे कॉलेज की पढ़ाई करने में भी सक्षम होने चाहिए चाहे उनके माता-पिता धनाड्यन हों। वे सुरक्षा चाहते हैं-अपराधियों और आतंकवादियों से। वे चाहते थे स्वच्छ वायु स्वच्छ जल और अपने बच्चों के साथ कुछ समय बिताना। और जब वे बूढ़े हो जाएँ तो गरिमा व सम्मान के साथ सेवानिवृत्त हो सकें।
भूमंडलीकरण और विस्मयकारी प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों, गलाकाट राजनीति और अनवरत सांस्कृतिक युद्धों के इस युग में सर्वसम्मति बनाकर और मिल-जुलकर काम करने से ही समस्याओं का समाधान होगा। सरकारें हर समस्या हल नहीं कर सकतीं। परंतु अपनी प्राथमिकताओं को थोड़ा सा बदलकर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रत्येक बच्चे को जीवन में आगे बढ़ने का उचित अवसर मिले, ताकि वह उन चुनौतियों का सामना कर सके, जो एक राष्ट्र के रूप में हम सभी के सामने खड़ी हैं। समाज के सभी वर्गों के बीच सामंजस्य बिठाकर अभाव और कमियों को दूर करने के लिए आशावाद का संचार करनेवाली कृति है उगशा का सवेरा।
Ashok Chakra Vijeta by rashmi
भारत पराक्रमियों का देश है। प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक हमारे शूरवीरों की अनेक पराक्रम-गाथाएँ प्रचलित हैं। हमारा प्राचीन इतिहास पराक्रम की गाथाओं से भरा पड़ा है। देश पर जब-जब संकट की घटाएँ गहराईं, तब-तब युवा पराक्रम अपना शौर्य दिखाता नजर आया। भारतवर्ष अपने इन्हीं युवाओं के कारण सदैव से विश्व-पटल पर अनुकरणीय उदाहरण बनकर खड़ा रहा है। देश ने जब भी अपने युवाओं को पुकारा, वे देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को दौड़े चले आए। युवा आज भी अपनी जान पर खेलकर राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।
‘अशोक चक्र’ शांति के समय अभूतपूर्व वीरता के प्रदर्शन हेतु प्रदान किया जाता है। 27 जनवरी, 1967 को ‘अशोक चक्र’ नामित किया गया। पहले इसका नाम ‘अशोक चक्र वर्ग 1’ रखा गया था। यह भी गणतंत्र दिवस पर प्रतिष्ठित किया गया, किंतु 15 अगस्त, 1947 से ही मान्य हुआ। यह पुस्तक अशोक चक्र से विभूषित पराक्रमी वीरों-हुतात्माओं का पुण्य-स्मरण कराती है।
हर भारतीय के लिए पठनीय पुस्तक, जो राष्ट्रभक्ति-राष्ट्रसेवा का महती भाव उत्पन्न करेगी।
Ashramavani
Spiritual articles based on Hindu religion and Sri Ramakrishna-Vivekananda literature.
Ashtavakra Geeta by Swami Prakhar Pragyanand
अष्टावक्र गीता
भारतीय पौराणिक साहित्य-भंडार में एक-से-एक अप्रतिम बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। अष्टावक्र गीता अध्यात्म का शिरोमणि ग्रंथ है। इसकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से नहीं की जा सकती।
अष्टावक्रजी बुद्धपुरुष थे, जिनका नाम अध्यात्म-जगत् में आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि जब वे अपनी माता के गर्भ में थे, उस समय उनके पिताजी वेद-पाठ कर रहे थे, तब उन्होंने गर्भ से ही पिता को टोक दिया था—‘शास्त्रों में ज्ञान कहाँ है? ज्ञान तो स्वयं के भीतर है! सत्य शास्त्रों में नहीं, स्वयं में है।’ यह सुनकर पिता ने गर्भस्थ शिशु को शाप दे दिया, ‘तू आठ अंगों से टेढ़ा-मेढ़ा एवं कुरूप होगा।’ इसीलिए उनका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा।
‘अष्टावक्र गीता’ में अष्टावक्रजी के एक-से-एक अनूठे वक्तव्य हैं। ये कोई सैद्धांतिक वक्तव्य नहीं हैं, बल्कि प्रयोगसिद्ध वैज्ञानिक सत्य हैं, जिनको उन्हेंने विदेह जनक पर प्रयोग करके सत्य सिद्ध कर दिखाया था। राजा जनक ने बारह वर्षीय अष्टावक्रजी को अपने सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर शिष्य-भाव से अपनी जिज्ञासाओं का शमन कराया। यही शंका-समाधान अष्टावक्र संवाद रूप में ‘अष्टावक्र गीता’ में समाहित है।
ज्ञान-पिपासु एवं अध्यात्म-जिज्ञासु पाठकों के लिए एक श्रेष्ठ, पठनीय एवं संग्रहणीय आध्यात्मिक ग्रंथ।