Hindi Literature
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Maa Ka Dard Kya Vo Samjhta Hai by Arun Shourie
एक किताब उन सबके लिए, जिन्हें कष्ट और नुकसान से जूझना पड़ा।
यदि ईश्वर है, जो सबकुछ जानता है, सर्वशक्तिमान है और करुणामय भी है, तो चारों तरफ इतना असहनीय दुःख क्यों?
हमारे धार्मिक शास्त्रों में कष्ट पर सफाई में क्या कहा गया है? क्या वह सफाई जाँच में टिक पाती है?
क्या हमारा अनुभव इस बात को स्वीकार करता है कि ईश्वर है? या फिर दो शैतान— समय और संयोग उन सबका कारण है, जिनसे हमें गुजरना पड़ता है?
दुःख और कष्ट का अनुभव कर चुके अरुण शौरी ने शास्त्रों की अग्नि-परीक्षा ली और फिर हमें बताया कि क्यों अंततः उनका झुकाव बुद्ध की शिक्षा की ओर हुआ। उनकी शिक्षा में हमारे दैनिक जीवन के लिए कौन से संदेश हैं?
Maa Ka Dulaar by Sudha Murthy
माँ का दुलार
मैं उसके हस्तक्षेप से थक चुकी थी। मैं बोली, ‘ठीक है, मुझे इस बारे में सोचने दीजिए। हम बाद में बात करते हैं।’
अगले दिन उसने फिर मुझे फोन किया। ‘मैडम, हमारी फैक्टरी में लंबे लोग भी हैं। क्या मैं आपको अलग-अलग सूची भेज दूँ, ताकि आप उनके लिए अधिक कपड़ा खरीद सकें?’
‘सुनिए, मेरे पास संशोधनों के लिए समय नहीं है। मैं ऐसा नहीं कर सकती।’
‘साड़ियों और कपड़ों का रंग क्या होगा?’
‘एक ही मूल्य के कपड़ों में हम अलग-अलग रंग ले लेंगे।’
‘अरे, आप ऐसा नहीं कर सकतीं। कुछ लोगों को अपने उपहारों के रंग पसंद आ सकते हैं और कुछ को बिलकुल भी नहीं आ सकते तो वे बहुत दुःखी हो जाएँगे।’
‘ऐसा है तो मैं एक ही रंग सभी को दे दूँगी।’
‘नहीं मैडम, ऐसा मत कीजिएगा। वे सोचेंगे कि आप उन्हें एक यूनिफॉर्म दे रही हैं।’
थककर मैं बोली, ‘तो आपका क्या सुझाव है?’
—इसी पुस्तक से
—
सुप्रसिद्ध कथा-लेखिका सुधा मूर्ति की लेखनी से प्रसूत रोचक, प्रेरक एवं आह्लादित करनेवाली कथाओं का संग्रह, जो अत्यंत पठनीय है।
Maa Ki Loriyan Aur Sanskar Geet by Deenanath Sahani
लोकगीत भारतीय संगीत की आत्मा है। हमारी संस्कृति की अनूठी धरोहर है। यह शाश्वत सत्य है कि लोकगीतों में मानवीय जीवन की वह संवेदना है, जिससे हर हृदय की लडि़याँ जुड़ी हुई हैं। लोकगीतों में अतल सागर जैसी गहराई है। हर ऋतु, हर उत्सव, हर उमंग और हर रंग में गाए जाने वाले लोकगीत सहज ही हर मनुष्य को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं।
विभिन्न आंचलिक भाषाओं, बोेलियों की लोरियों और संस्कार गीतों के संग्रह करने में उसके मूल भाव और उसकी आत्मा को हूबहू प्रस्तुत किया गया है। यों भी कह सकते हैं कि ये लोरियाँ जहाँ असंख्य माताओं की भावाभिव्यक्तियाँ हैं, वहीं संस्कार गीत मनुष्य की वे परछाइयाँ हैं, जो मनुष्य की उत्पत्ति के समय से ही किसी-न-किसी रूप में संग चली आ रही हैं। हमें पहला संस्कार माँ की लोरियों से मिलता है। माँ के वात्सल्य भरे हृदय में स्वत: उपजी लोरियाँ न केवल पारिवारिक सदस्यों व नातेदारों से परिचय कराती हैं, बल्कि वनस्पतियों, नदियों, पहाड़ों, जीव-जंतुओं एवं संपूर्ण ब्रह्मांड से अपने रिश्ते को भी दरशाती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में वात्सल्य रस में पगी मीठी-मीठी लोरियाँ और संस्कार गीत समाहित हैं, जो हर आयु वर्ग के पाठकों को पसंद आएँगे।
Maa, Main Collector Ban Gaya by Rajesh Patil
अत्यंत अभावग्रस्त स्थितियों से जूझकर आकाश को छूने की उड़ान भरनेवाले संघर्षमय प्रवास को ‘माँ, मैं कलेक्टर बन गया’ पुस्तक का नायक भले ही राजेश पाटील है, परंतु वह अनगिनत अभावग्रस्त युवकों का प्रतिनिधित्व करता है। एक बाल मजदूर के रूप में निरंतर संर्घषरत रहकर उसने अपने सपनों को कुचला नहीं, उन्हें खोया नहीं, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए अद्भुत जिजीविषा और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाई और कलेक्टर बन गया। उसने अपने जैसे सैकड़ों-हजारों बालकों-युवकों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
सामाजिक विषमता तथा आर्थिक विवंचनाओं से त्रस्त हजारों युवकों की सृजनशीलता मिट्टी में मिल गई, परंतु कुछ होनहार पीड़ाग्रस्त युवक ऐसे भी निकले, जिन्होंने समस्त अभावों को मात देते हुए अपने सामर्थ्य को सिद्ध कर दिया और समाज में अच्छाई की भावना निर्मित कर दी। सामान्य लोगों के बीच से ही असामान्यता का जन्म होता है, जो आस-पास के समाज में ऊर्जा तथा लगन प्रदान करती है।
यह पुस्तक हमारी ग्रामीण जनता की गरीबी, अभाव, शिक्षा के निम्न स्तर तथा संघर्ष का एक आईना है। जीवन में कुछ बनने, कुछ कर गुजरने के लिए प्रोत्साहित करनेवाली प्रेरणादायी पुस्तक।
Maanav Ki Aadhyatmik Yatra by Balvinder Kumar
इस पुस्तक में यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे एक व्यक्ति, जो सदाही अच्छेबुरे दिनों के अधीन होता है, अपने जीवन से अनेक सबक सीखता है। ऐसे कठिन दौर में हम कुछ परम प्रश्नों पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं, जैसे हम इस जगत में क्यों आए हैं? और हमारे जीवन का उद्देश्य और अर्थ क्या है? इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि पाठक उन विषयों में दिलचस्पी दिखाएँगे, जिनकी उनके जीवन में एक अहम भूमिका है। इन व्यापक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए एक व्यक्ति के आध्यात्मिक सफर को विचारों के छोटेछोटे टुकड़ों में प्रस्तुत किया गया है। जीवन चुनौतियों से भरा है। कभीकभी जब हम उतार और चढ़ाव तथा दुःख एवं कष्ट का अनुभव करते हैं तो हमें लगता है कि यह एक रोलर कोस्टर की सवारी के समान है। एक प्रकार से हम अपने जीवन की अग्नि परीक्षा का सामना तब करते हैं जब इस प्रकार के उथलपुथल और संकट से भरे क्षणों से गुजरते हैं। ऐसे समय में आध्यात्मिक अनुकूलन से हमें अपने मन को शांत करने तथा साहस, सामर्थ्य और धैर्य प्राप्त करने में मदद मिलती है, जिससे कि हम जीवन की समस्याओं को आसानी से सुलझा पाते हैं। यही समय होता है जब हम विश्वास, प्रेम, संवेदना और सहानुभूति के महत्त्वपूर्ण सबक को सीख सकते हैं। संक्षेप में कहें तो मेरे लिए आध्यात्मिकता का अर्थ यही है।
आज की भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में शांति का मार्ग अध्यात्म ही है। इसी पर चलकर मानव अपने जीवन को सुखी, संतुष्ट और सार्थक कर सकता है। यह पुस्तक आध्यात्मिकता द्वारा आनंद प्राप्त करने का व्यावहारिक रूप प्रस्तुत करती है।
Maati Ki Moorten by Shriramvriksha Benipuri
माटी की मूरतें—श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी
जब कभी आप गाँव की ओर निकले होंगे, आपने देखा होगा, किसी बड़ या पीपल के पेड़ के नीचे, चबूतरे पर कुछ मूरतें रखी हैं—माटी की मूरतें!
ये मूरतें—न इनमें कोई खूबसूरती है, न रंगीनी। किंतु इन कुरूप, बदशक्ल मूरतों में भी एक चीज है, शायद उस ओर हमारा ध्यान नहीं गया, वह है जिंदगी! ये माटी की ब नी हैं, माटी पर धरी हैं; इसीलिए जिंदगी के नजदीक हैं, जिंदगी से सराबोर हैं। ये देखती हैं, सुनती हैं, खुश होती हैं; शाप देती हैं, आशीर्वाद देती हैं। खुश हुईं—संतान मिली, अच्छी फसल मिली, यात्रा में सुख मिला, मुकदमे में जीत मिली। इनकी नाराजगी—बीमार पड़ गए, महामारी फैली, फसल पर ओले गिरे, घर में आग लग गई।
ये मूरतें जिंदगी के नजदीक ही नहीं, जिंदगी में समाई हुई हैं। इसलिए जिंदगी के हर पुजारी का सिर इनके नजदीक आप-ही-आप झुक जाता है।
ये कहानियाँ नहीं, जीवनियाँ हैं! ये चलते-फिरते आदमियों के शब्दचित्र हैं। सुप्रसिद्ध लेखक श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी कहते हैं—‘मानता हूँ, कला ने उन पर पच्चीकारी की है; किंतु मैंने ऐसा नहीं होने दिया कि रंग-रंग में मूल रेखाएँ ही गायब हो जाएँ। मैं उसे अच्छा रसोइया नहीं समझता, जो इतना मसाला रख दे कि सब्जी का मूल स्वाद ही नष्ट हो जाए।’
जिंदगी के विविध रंगों को रेखांकित करतीं बेनीपुरीजी की सशक्त लेखनी से निकली रोचक, मार्मिक व संवेदनशील रेखाचित्र।
Madam Curie by Vinod Kumar Mishra
मेडम क्यूरी—विनोद कुमार मिश्र
पोलैंड के एक अति सामान्य परिवार में जनमी मैडम क्यूरी, दुनिया के श्रेष्ठतम वैज्ञानिकों में से एक अपने आप में विलक्षण प्रतिभा थीं—
• फ्रांस की प्रथम डॉक्टरेट पानेवाली महिला
• दुनिया के किसी भी भाग में भौतिकी में डॉक्टरेट पानेवाली प्रथम महिला
• सोरबोन विश्वविद्यालय की पहली महिला प्रोफेसर
• भौतिकी में नोबल पुरस्कार पानेवाली प्रथम महिला
• दूसरा नोबल पुरस्कार पानेवाली प्रथम व्यक्तित्व।
उपर्युक्त असाधारण प्रदर्शन करने-वाली मैरी क्यूरी को अत्यंत गरीबी, निरादर, अभावों का सामना करना पड़ा। खुले, खतरनाक व असुविधाजनक शेड में अपर्याप्त उपकरणों के उन्होंने दुनिया का विलक्षण तत्त्व ‘रेडियम’ खोज निकाला।
अनुसंधान ही नहीं, सादगी, दान व सेवा में भी वे प्रथम रहीं। वे एक आदर्श पुत्री, आदर्श पत्नी, आदर्श पुत्रवधू, आदर्श माता, आदर्श सास बनीं।
वे एक असाधारण शिक्षिका भी थीं। उन्होंने अनेक विद्वान् व वैज्ञानिक तैयार किए। हालाँकि उनके बाद आठ और महिलाओं को नोबल पुरस्कार मिला, पर मैडम की तुलना में अब भी कोई नहीं है। उन्होंने इस बात को भी प्रमाणित किया कि शांति-काल में वैज्ञानिक सारी दुनिया का होता है, पर युद्ध-काल में वह अपने देश का ही होता है।
विश्वास है, मैडम क्यूरी के जीवन से प्रेरणा प्राप्त युवा पीढ़ी, विशेषत: युवतियाँ विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान आदि के क्षेत्र में अपूर्व योगदान करेंगी।
Madhuchhand by Usha Shrivastav
मधुछंद—उषा श्रीवास्तव
हँसी की इन लहरों के बीच
कमल किस दुःख का खिलता है,
मानते हो जिसको तुम शील
विवशताओं में पलता है।
हृदय की उठती हुई वह आग,
फूटती अरुणाभा जैसी,
दिवस के उज्ज्वल माथे पर
तिलक की पावन आभा सी
हृदय में ही घुटकर रह गई,
बन गई मेरा चिर अभिशाप,
घेर ज्यों पुण्यों को छा जाए
किसी प्राचीन जनम का शाप।
—इसी पुस्तक से
उषा की कविताएँ आत्मपरक हैं। इनमें समर्पण है, कोई गहरी टीस है, आकुल मन की पुकार है और प्रतिभा के अनुरूप प्राप्य न मिल पाने की कुंठा भी है। उषा ने विचार-प्रधान कुछ मुक्तक भी लिखे हैं। काश, उषा ने बी.ए. और एम.ए. में हिंदी ली होती।
अनुजावत् अपनी प्रिय शिष्या उषा को मेरा स्नेहाशीष है कि वह पूर्ण स्वस्थ रहकर कम-से-कम एक और कविता संग्रह हिंदी जगत् को दे सके। मुझे विश्वास है कि पाठकों की ओर से इस मौन साधिका को प्रोत्साहन मिलेगा।
—डॉ. रमानाथ त्रिपाठी की भूमिका से
Madhya Pradesh Ki Vikas Gatha by Shivraj Singh Chouhan
‘बढ़ता प्रदेश : मध्य प्रदेश’ श्री शिवराज सिंह चौहान के चुनिंदा भाषणों का एक संकलन है। राजनीति में भाषण मानो पर्यायवाची जैसा ही है। आजादी के पहले से ही भाषणों ने समाज को राजनीति के दर्शन कराए। आज भी भाषण से ही जनता नेता को पहचानती है, जानती है, समझती है। कई-कई भाषणों से नेता की सोच, उसके क्रियाकलाप, उस नेता की तासीर की अभिव्यक्ति होती है।
मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजजी के बारे में उनकी यह सोच कैसे बदल सकती है? कैसे उनकी वह तासीर बदल सकती है? जब वे मुख्यमंत्री बने तब से लेकर अब तक के उनके भाषण सुने, पढे़ जाएँ तो लगता है कि जनता के प्रति प्रतिबद्धता, सामाजिक सरोकार और मध्य प्रदेश का विकास उनका जीवनोद्देश्य रहा है।
‘वन ग्रामों का उत्थान’ और ‘यथा नाम तथा काम’ भाषण को हम पढ़ें तो लगता है कि एक साधारण सा दुबला-पतला व्यक्ति कैसे एक साथ पूरे समाज को आत्मसात् करके एक विकसित मध्य प्रदेश का निर्माण करने चला है। लेकिन ऐसा उन्होंने बखूबी कर दिखाया है।
‘मध्य प्रदेश की विकास गाथा’ कृति मध्य प्रदेश के विकास की गौरव-गाथा प्रस्तुत करती है। यह मध्य प्रदेश के विकास के राष्ट्रीय फलक पर उभरने का आईना है।
—प्रभात झा
Mafia Zindabad by Harish Naval
हरीश नवल बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं। वे पेशे से प्राध्यापक, संस्कारों से व्यंग्यकार, रुचि से पत्रकार और निष्ठा से सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्हें साहित्य-संस्कार परिवार से विरासत में मिले हैं। उनकी शालीनता व शिष्टता उनके साहित्य व व्यक्तित्व का वैशिष्ट्य है, जो प्रस्तुत संकलन में भी देखने को मिलता है।
शैलीपरक दृष्टि से जितनी विविधता हरीश नवल की व्यंग्य रचनाओं में है, उतनी समकालीन व्यंग्य-जगत् में अन्यत्र दुर्लभ है। इन्हें सर्वाधिक प्रिय है मुहावरा शैली। मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रचुर प्रयोग इनकी व्यंग्य भाषा को एक मौलिक भंगिमा देता है। लेखक ने पुराने मुहावरों को आधुनिकता में रूपांतरित कर उनकी व्यंग्यात्मक धार तेज कर दी है। नवल की व्यंग्य भाषा की विशिष्ट प्रवृत्ति है ‘शब्द क्रीड़ा’। भिन्न स्रोतीय शब्दों का समन्वय कर नए प्रयोग उल्लेखनीय हैं। भाषा विषयक सर्वग्राह्यता ने इनकी व्यंग्य भाषा की व्यंजना शक्ति को सहज ही समृद्ध कर दिया है। अप्रस्तुत विधान के अंतर्गत उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति, विरोधाभास, मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय आदि के प्रयोग ने इनकी व्यंग्यभाषा के सौंदर्य को द्विगुणित कर दिया है। संश्लिष्ट बिंब विधान ने उनकी रचनाओं को सहज संप्रेष्णीयता से भर दिया है। ऐतिहासिक, पौराणिक, प्रतीक प्रयोगों ने व्यंग्यभाषा को सांकेतिकता एवं सूक्ष्मता प्रदान की है।
आधुनिक व्यंग्यकारों में शैली की विविधता के जितने प्रयोग हरीश नवल ने किए हैं, उतने वर्तमान व्यंग्य साहित्य में नहीं हैं। शिष्ट भाषायुक्त विविध शैलियों में सूक्ष्म और सौम्य सृजन हरीश नवल के व्यंग्य साहित्य की नवलता है।
—डॉ. मधुसूदन पाटिल
संपादक ‘व्यंग्य विविधा’
Mahabharat : Ek Darshan by Dr. Dinkar Joshi
महाभारत केवल रत्नों की ही खान नहीं है, असंख्य प्रश्नों की भी खान है। इस महाग्रंथ की कई घटनाएँ और कई कथानक सामान्य पाठक को ही नहीं, अध्ययनशील सुधीजनों को भी ‘यह ऐसा क्यों’ जैसे प्रश्न के साथ उलझा देते हैं। ऐसे अनेक प्रश्न/जिज्ञासाएँ चुनकर इस पुस्तक में संकलित की गई हैं और यथासंभव शुद्ध मन-भावना के साथ उनके निदान/ समाधान का प्रयास किया गया है। इस चर्चा का प्रधान केंद्र वर्तमान संदर्भ रहा है, यह इस ग्रंथ की विशेषता है।
वैसे तो महाभारत की अन्य वैश्विक धर्मग्रंथों के साथ तुलना नहीं कर सकते, क्योंकि महाभारत किसी विशेष धर्म का ग्रंथ नहीं है। महाभारत मानव व्यवहार का शाश्वत ग्रंथ है और सच कहा जाए तो विश्व के सभी धर्मों का निचोड़ है। धर्मसंकट का व्यावहारिक हल सुझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘हे अर्जुन, धर्म और सत्य का पालन उत्तम है, किंतु इस तत्त्व के आचरण का यथार्थ स्वरूप जानना अत्यंत कठिन है।’’
सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, जीवन-मृत्यु, पाप-पुण्य, इत्यादि द्वंद्वों को कथानकों और घटनाओं के माध्यम से इस ग्रंथ में निर्दिष्ट किया गया है।
महाभारत के वैशिष्ट्य और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता तथा व्यावहारिकता पर प्रकाश डालती पठनीय पुस्तक।
Mahabharat Ka Dharmasankat by Suryakant Bali
आर्थिक समृद्धि और टेक्नोलॉजी के वैभव के साथ समाज में मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण में लाजमी बदलाव आता है। यानी जिन्हें हम सामाजिक मूल्य कहते हैं, सामाजिक मर्यादाएँ मानते हैं, मानवीय आदर्श भी कह देते हैं, अर्थ और टेक्नोलॉजी के वैभव से परिपूर्ण समाज में ऐसे मूल्यों, ऐसे आदर्शों और ऐसी मर्यादाओं के प्रति आग्रह में निर्णायक कमी आती है। इस कमी से आज का अमेरिका ध्वस्त हो रहा है, पश्चिमी यूरोप इसी कमी से त्रस्त हो रहा है तो वैसा बनने को आतुर अपना भारत इस कमी की संभावना से भयग्रस्त हो रहा है। महाभारत कालीन समाज के हमारे 5,000 वर्ष पहले के पूर्वज आर्थिक समृद्धि और टेक्नोलॉजिकल वैभव की विपुलता से पैदा हुई इसी मूल्य-विहीनता और मर्यादा-भंग से ग्रस्त, त्रस्त और ध्वस्त रहे तो इसे आप अस्वाभाविक कैसे मान सकते हैं? मूल्यों और मर्यादाओं की हीनता के परिणामस्वरूप समाज तनावों की जिस कोख का निर्माण खुद अपने लिए कर लेता है, उस कोख में से महाभारत जैसा महाभयानक महासंग्राम ही जन्म ले सकता था। यह पुस्तक उस महाभारत कालीन समाज पर, उसके तनावों पर और नए व्यक्तित्व की खोज की उस समय के समाज की कोशिशों पर ही एक आलेख॒है।
संदेश यह भी है कि आज हम ह्यह्यतरह के जिन तनावों को झेल रहे हैं, उनसे पार पाने के लिए क्या हम वैसी ही गहरी कोशिशें कर रहे हैं जैसी कोशिशें हमारे महाभारतकालीन पूर्वजों ने की थीं?
Mahabharat Ki Madhavi by Smt. Mamta Mehrotra
स्त्री की पहचान स्वयं उस युग में शून्य थी, क्योंकि माधवी के पिता ययाति गालव की गुरुदक्षिणा के लिए उसे गालव के सुपुर्द कर देते हैं और उसकी इच्छा जानने का यत्न भी नहीं करते हैं। वह निरीह वस्तु सी गालव के पीछे तीन राजाओं को पुत्ररत्न की प्राप्ति कराती है। फिर गालव उसे अपने गुरु विश्वामित्र के सुपुर्द कर देता है, जो यह जानकर बड़ा दुःखी होता है कि माधवी से उसे चार पुत्ररत्न की प्राप्ति हो सकती थी और गालाव के भूलवश वह उससे वंचित रह गया।
माधवी स्वयंवर नहीं करती है अपितु संन्यास ग्रहण कर लेती है। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि नारियाँ भी आसानी से तप और संयम का रास्ता चुनकर अपना इहलोक एवं परलोक सँवारती थीं।
ययाति को अंत में अपनी पुत्री एवं नातियों के तप और सत्कर्मों की जरूरत पड़ती है।
अतः मैं माधवी के पुत्र ‘माधवी पुत्रों’ के नाम से जाते जाते थे, जबकि उनके पिता अन्य दिशाओं के नरेश थे या फिर गुरु। आज स्त्री को कहाँ यह अधिकार है कि उसके बच्चे माँ के नाम से जाने जाएँ।
इस पूरे घटनाक्रम को जब हम उस काल एवं दर्शन में रखते हैं तो पाते हैं कि स्त्री-पुरुष के संबंधों में एक खुलापन था एवं स्त्री शायद भोग्या ही नहीं थी अपितु अपने वजूद के साथ समाज में अपने आप को स्थापित करती थी।
Mahabharatt Ke Patra-1 by Jagatnarayan Dwivedi
महाभारत के पात्र—जगतनारायण द्विवेदी
महाभारत भारतीय वाङ्मय का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें पारिवारिक-सामाजिक संबंधों का अत्यंत हृदयग्राही चित्रण है। महाभारत के विभिन्न विषयों एवं कथाओं को आधार बनाकर साहित्य की विभिन्न विधाओं—काव्य, नाटक, उपन्यास, एकांकी आदि—में इसे अभिव्यक्ति प्रदान करने का भरसक प्रयत्न हुआ है; परंतु महाभारत के विभिन्न पात्रों की प्रामाणिक एवं सर्वांगीण विवेचना कम ही हुई है।
दो खंडों के इस ग्रंथ ‘महाभारत के पात्र’ में इसी अभाव की पूर्ति की गई है। पूर्ण रूप से मूल को आधार बनाकर शोधपरक विधि से पात्रों का चरित्रांकन किया गया है। प्रथम भाग में महाभारत के प्रमुख सात पात्रों—अर्जुन, भीम, द्रोण, भीष्म, अश्वत्थामा, कर्ण एवं अभिमन्यु का चरित्र-चित्रण है तथा दूसरे भाग में धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच, दुर्योधन, कृप, शल्य, धृतराष्ट्र, श्रीकृष्ण, विदुर, कृष्णद्वैपायन व्यास, द्रौपदी, कुंती, गांधारी, सुभद्रा तथा उत्तरा का चरित्र-चित्रण है।
ग्रंथ की भाषा और शैली अत्यंत सरल एवं सुबोध है, जिससे पाठकगण विषय का पूरा लाभ उठा सकें। एक ओर जहाँ यह ग्रंथ विद्वज्जनों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी है, वहीं सामान्य जन के लिए भी तुष्टिदायक एवं ज्ञानपरक है।
Mahabharatt Ke Patra-2 by Jagatnarayan Dwivedi
महाभारत के पात्र—जगतनारायण द्विवेदी
महाभारत भारतीय वाङ्मय का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें पारिवारिक-सामाजिक संबंधों का अत्यंत हृदयग्राही चित्रण है। महाभारत के विभिन्न विषयों एवं कथाओं को आधार बनाकर साहित्य की विभिन्न विधाओं—काव्य, नाटक, उपन्यास, एकांकी आदि—में इसे अभिव्यक्ति प्रदान करने का भरसक प्रयत्न हुआ है; परंतु महाभारत के विभिन्न पात्रों की प्रामाणिक एवं सर्वांगीण विवेचना कम ही हुई है।
दो खंडों के इस ग्रंथ ‘महाभारत के पात्र’ में इसी अभाव की पूर्ति की गई है। पूर्ण रूप से मूल को आधार बनाकर शोधपरक विधि से पात्रों का चरित्रांकन किया गया है। प्रथम भाग में महाभारत के प्रमुख सात पात्रों—अर्जुन, भीम, द्रोण, भीष्म, अश्वत्थामा, कर्ण एवं अभिमन्यु का चरित्र-चित्रण है तथा दूसरे भाग में धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच, दुर्योधन, कृप, शल्य, धृतराष्ट्र, श्रीकृष्ण, विदुर, कृष्णद्वैपायन व्यास, द्रौपदी, कुंती, गांधारी, सुभद्रा तथा उत्तरा का चरित्र-चित्रण है।
ग्रंथ की भाषा और शैली अत्यंत सरल एवं सुबोध है, जिससे पाठकगण विषय का पूरा लाभ उठा सकें। एक ओर जहाँ यह ग्रंथ विद्वज्जनों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी है, वहीं सामान्य जन के लिए भी तुष्टिदायक एवं ज्ञानपरक है।
Mahabharatt Ki Kahaniyan by Harish Sharma
महाभारत की कहानियाँ
‘महाभारत’ संसार के विशालतम ग्रंथों में एक है। यह महर्षि वेदव्यास की अनुपम रचना है। इसकी महत्ता के कारण इसे ‘पंचम वेद’ भी कहा गया है। यह ग्रंथ भारतीय जन-मानस के मन-प्राण में बसा हुआ है। इसके आदर्श स्त्री-पुरुष पात्र सदियों से भारतीय जन-जीवन को प्रभावित करते रहे हैं।
आज की व्यस्ततम दिनचर्या में विस्तृत कलेवरवाले इस ग्रंथ का पारायण कर इसे आत्मसात् कर पाना आसान नहीं है, फिर इसे समझना बच्चों के लिए तो और भी कठिन है। अत: महाभारत की कथा को सुपाठ्य एवं रोचक बनाने के लिए इसकी घटनाओं को अलग-अलग कथा के रूप में अत्यंत सरल व रोचक भाषा में लिखा गया है।
पुस्तक में दी गई कहानियों का वर्णन एवं घटनाएँ अति रोचक, रोमांचक, जिज्ञासापूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देनेवाली हैं।
विश्वास है, इन कहानियों को पढ़कर बाल-पाठक ही नहीं, सामान्य जन भी आनंदित होंगे। साथ ही महान् पौराणिक आदर्शों, सदाचारों एवं सद्गुणों को आत्मसात् करेंगे।
Mahakrantikari Mangal Pandey by Dinkar Kumar
कलकत्ता के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना के सिपाही नंबर 1446 का नाम मंगल पांडे। भारत के पहले स्वातंत्र्य समर की ज्वाला सन् 1857 में उन्हीं के प्रयासों से धधकी।
दरअसल 20 मार्च, 1857 को सैनिकों को नए प्रकार के कारतूस दिए गए। उन कारतूसों को मुँह में दाँतों से दबाकर खोला जाता था। वे गाय और सूअर की चरबी से चिकने किए गए थे, ताकि हिंदू और मुसलिम सैनिक धर्म के प्रति अनुराग छोड़कर धर्मविमुख हों। 29 मार्च को मंगल पांडे ने कारतूसों को मुँह से खोलने की उच्चाधिकारियों की आज्ञा मानने से इनकार कर दिया। सेना ने भी उनका साथ दिया। लेकिन ब्रिटिश उच्चाधिकारियों ने छलबलपूर्वक उन्हें बंदी बना लिया और आठ दिन बाद ही 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी। उनकी फाँसी की खबर ने देश भर में चिनगारी का काम किया और मेरठ छावनी से निकला विप्लव पूरे उत्तर भारत में फैल गया, जो स्वातंत्र्य समर के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इसने मंगल पांडे का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा दिया।
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के एक प्रमुख हस्ताक्षर की प्रेरणाप्रद जीवनगाथा, जो अन्याय और दमन के प्रतिकार का मार्ग प्रशस्त करती है।
Mahalon Mein Vanvas by Aruna Mukim
‘महलों में वनवास’ एक व्यापक उपन्यासिका है। इसकी प्रभावशीलता को एक नया आयाम देती है—इसमें निहित अर्थवत्ता। इसका कथा-विस्तार पुरातन है; फिर भी यह समकालीन संदर्भ में पूर्णरूपेण समीचीन है। इसकी नायिका ‘उर्मिला’ की विरह-वेदना हर पाठक को उद्वेलित कर देगी।
स्त्री-पुरुषों के संबंध पर चर्चा आदिकाल से होती रही है। नारी के शोषण को अकसर हमारा समाज कर्तव्यों की दुहाई देकर दरकिनार कर देता है। उसके भीतर हमें मिलता है केवल स्वार्थों का एक दल-दल। हर युग में पुरुष ने नारी के ऊपर अनेक प्रकार की वर्जनाओं को थोपा है और उसके अधिकारों की पूरी तरह अवहेलना की है।
रामायण की उर्मिला पूरी तरह शोषिता है। एक राजकुमारी होते हुए भी वह अपने पति द्वारा एक हीन एवं नीरस जीवन जीने के लिए बाध्य कर दी जाती है। उसके लिए उसका महल एक मरुस्थल बन जाता है। एक प्रेमिका के रूप में वह हार जाती है; उसके भीतर की कोमल भावनाएँ ठिठुरकर जड़ हो जाती हैं।
इस उपन्यास में बहुत कुशलता से दिखाया गया है कि नायिका उर्मिला अंततः अपने सामाजिक लक्ष्य में सफल होती है, पर एक प्रेमिका के रूप में वह कुंठित ही रह जाती है।
समकालीन जीवन में भी यह सत्य समाज में पूरी तरह विद्यमान है। यह उपन्यास बहुत रोचक एवं सारगर्भित है। विश्वास है कि हिंदी के पाठकगण इस रोचक और सारगर्भित कृति का स्वागत करेंगे।
Mahamana Pt. Madan Mohan Malviya by Manju ‘Mann’
ईश्वरभक्ति और देशभक्ति पं. मदन मोहन मालवीय के जीवन के दो मूलमंत्र थे। इन दोनों का उत्कृष्ट संश्लेषण, ईश्वर-भक्ति का देशभक्ति में अवतरण तथा देशभक्ति की ईश्वरभक्ति में परिपक्वता उनके व्यक्तित्व के विशिष्ट गुण थे। उनकी धारणा थी कि मनुष्य के पशुत्व को ईश्वरत्व में परिणत करना ही धर्म है। मनुष्यत्व का विकास ही ईश्वरत्व और ईश्वर है तथा निष्काम भाव से प्राणिमात्र की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।
वे सार्वजनिक कार्यों के लिए जीवन भर साधन जुटाते रहे और ‘भिक्षुकों में राजकुमार’ कहलाए। वे महान् देशभक्त, सात्त्विक जीवन जीनेवाले मनीषी, जनसाधारण के सेवक, करुणा, सद्भावना और दया की मूर्ति, विदग्ध और उच्चकोटि के वक्ता, प्राणिमात्र से प्रेम करनेवाले, शील के पर्याय, ललितकलाओं के प्रेमी और आहार-विहार में सरलता एवं सात्त्विकता के प्रतीक॒थे।
समाजसेवा, धर्मपरायणता, सेवाभाव, परोपकार और धर्मजागरण के प्रतिरूप महामना मालवीयजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का दिग्दर्शन कराती अत्यंत प्रेरणाप्रद पठनीय पुस्तक।