Hindi Literature
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Kavyanjali by Dr. Chhanda Benarjee
कुछ कहना है
हमारा समाज और उसका परिवेश समय के साथ-साथ तेजी से बदलते सामाजिक मूल्यों के विघटन का शिकार होता जा रहा है। जीवन की परिस्थितियाँ नित-नए समीकरणों में कसती चली जा रही हैं, आपस में दूरियाँ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। आज अनेक सामाजिक विकृतियों के बीच प्रायः हम सभी नाना प्रकार के तनावों से गुजर रहे हैं, जिसे नकारा नहीं जा सकता। हमें इस सत्यता से पलायन कर इससे मुँह नहीं मोड़ लेना चाहिए, चाहे इसका परिणाम कितना भी भयानक क्यों न हो। उस परिणाम के स्वरूप को समझना होगा, उस पर सोचविचार कर न केवल उसे एक दिशा देनी होगी, बल्कि एक स्वस्थ, सुदृढ़ आकार देकर विशिष्ट भी बनाना होगा।
वास्तव में विशिष्टता के लिए कोई साँचा या परिमाप नहीं होता है। उसके लिए तो हमें जीवन की समग्रता में जीने के अर्थों पर पुनर्विचार करना होगा और इस सिद्धांत का बौद्धिक व तार्किक आकलन करने पर हमें अपने अंतर्मन में शाब्दिक अंतर्द्वद्वों का बोध हो सकेगा, जिससे देशकाल, समाज तथा अपने आस-पास के परिस्थितियों की यर्थाथता को हम महसूस कर पाएँगे।
ऐसे ही भावों को निरूपित करने का विनम्र प्रयास है ये कविताएँ।
-डॉ. छन्दा बैनर्जी
Kedarnath Aapda Ki Sachchi Kahaniyan by Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’
गत वर्ष उत्तराखंड के केदारनाथ सहित अन्य जगहों पर अतिवृष्टि के कारण आई भीषण आपदा ने उत्तराखंड की केदारघाटी को पूरी तरह तबाह कर पूरे विश्व को झकझोरकर रख दिया। देश-विदेश के हजारों-हजार श्रद्धालुओं को इस आपदा में अपनी जान गँवानी पड़ी। परिवार के परिवार इस आपदा के शिकार हो गए, कई परिवारों का तो एक भी सदस्य जिंदा नहीं रहा।
सिर्फ केदारनाथ ही नहीं अपितु बदरीनाथ, गंगोत्तरी, हेमकुंड साहिब सहित उत्तराखंड के अनेक स्थानों पर भारी तबाही हुई। शायद चारधाम की यात्रा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा, जब एक साथ चारों धामों के रास्ते बुरी तरह तहस-नहस होकर महीनों तक के लिए बंद हो गए; किंतु केदारनाथ में जन और धन दोनों प्रकार की भारी क्षति हुई, जिसकी भरपाई शायद कभी भी नहीं हो पाएगी।
आपदा को आए पूरा एक वर्ष बीत गया है। जिंदगी रुकती नहीं है, इसलिए आपदा पीडि़तों ने भी किसी तरह से खुद को सँभालकर नए ढंग से जीवन की शुरुआत कर दी है। हालाँकि उन अपनों की यादें, जो इस आपदा में सदा के लिए बिछुड़ गए हैं, भुलाई नहीं जा सकती हैं।
इस आपदा में मानवीयता के कई उजले तो कई श्याम पक्ष भी सामने आए हैं। कुछ एक घटनाओं को छोड़कर मानवीयता इस आपदा के पश्चात् एकजुट दिखी।
Keshav Ki Lokpriya Kahaniyan by Keshav
प्रसिद्ध कथाकार केशव जैसे जीवन के साधक हैं, वैसे ही भाषा के। भाषा के सिद्ध, पीर-फकीर, जहाँ भाषा उनकी चेरी है, उनका आदेश मानने को विवश, पर वह अज्ञेय या निर्मल जैसी नहीं है। केशव की कहानियों में जीवन के सभी रंग हैं, जिन्हें उन्होंने दसों अंगुलियों से पकड़ने की कोशिश की तो वे और भी खरे कथाकार बन गए। पहाड़ी जीवन के राग-रंग का कथा-संगीत गुनगुनाते किसी गायक की तरह, जिसका गाना अच्छा तो बहुत लगता है, लेकिन कोई उसे दोहरा नहीं सकता, क्योंकि यह सिद्धि गहन-गंभीर रियाज से किन्हीं-किन्हीं सर्जकों को ही नसीब होती है। केशव की रचनाओं में कोई दोहराव नहीं है, न कथ्य में, न ही भाषा में। कोई भी विचारधारा उनके कथ्य का निर्धारण नहीं करती, न ही उनकी भाषा पर स्लोगनों का कोई दुष्प्रभाव पड़ा। जीवन के बीचोबीच से वे अपने कथ्य उठाते हैं और परिवेश में घट-अघट रहे जीवन उनकी साधना से सजी-धजी भाषा में रचना का जामा पहन लेते हैं। भाषा में कोई रचाव दिखाई नहीं पड़ता, दिखाई पड़ता है तो सिर्फ उसका वैभव, एकदम पारदर्शी, जैसे थिराए हुए जल में परिवेश के बहुरंगी दृश्य— पहाड़, पेड़, परिंदे, नदी, खड््ड, खेत, सड़क, पगडंडी, मवेशी, बच्चे, स्त्रियाँ और मर्द। सब-के-सब बोलते-बतियाते, कुछ कहते, कुछ सुनते या फिर चुपचाप, संवादलीन।
Khandavdah (Krishna Ki Atmakatha -V) by Manu Sharma
खंडवा दाह
जीवन को मैंने उसकी समग्रता में जीया है। न मैंने लोभ को छोड़ा, न मोह को; न काम को, न क्रोध को; न मद को , न मत्सर को। शास्त्रों में जिनके लिए वर्जना थी, वे भी मेरे लिए वर्जित नहीं रहे। सब वंशी की तरह मेरे साथ लगे रहे। यदि इन्हें मैं छोड़ देता तो जीवन एकांगी को जाता। तब मैं यह नहीं कह पाता कि करील के कुंजों में राम रचानेवाला मैं ही हूँ और व्रज के जंगलों में गायें चरानेवाला भी मैं ही हूँ। चाणूर आदि का वधक भी मैं ही हूँ और कालिया का नाथक भी मैं ही हूँ। मेरी एक मुट्ठी में योग है और दूसरी में भोग। मैं रथी भी हूँ और सारथि भी। अर्जुन के मोह में मैं ही था और उसकी मोह-मुक्ति में भी मैं ही था।
जब मेघ दहाड़ते रहे, यमुना हाहाकार करती रही और तांडव करती प्रकृति की विभीषिका किसीको कँपा देने के लिए काफी थी, तब भी मैं अपने पूज्य पिता की गोद में किलकारी भरता रहा। तब से नियति न मुझपर पूरी तरह सदय रही, न पूरी तरह निर्दय। मेरे निकट आया हर हर्ष एक संघर्ष के साथ था।
कृष्ण के अनगिनत आयाम हैं। दूसरे उपन्यासों में कृष्ण के किसी विशिष्ट आयाम को लिया गया है। किंतु आठ खंडों में विभक्त इस औपन्यासिक श्रृंखला ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में उकेरने का सफल प्रयास किया गया है। किसी भी भाषा में कृष्णचरित को लेकर इतने विशाल और प्रशस्त कैनवस का प्रयोग नहीं किया है।
यथार्थ कहा जाए तो ‘कृष्ण की आत्मकथा’ एक उपनिषदीय कृति है।
‘कृष्ण की आत्मकथा श्रृंखला के आठों ग्रंथ’
नारद की भविष्यवाणी
दुरभिसंधि
द्वारका की स्थापना
लाक्षागृह
खांडव दाह
राजसूय यज्ञ
संघर्ष
प्रलय
Khari-Khari by Dr. Nand Kishore Garg
नंद किशोर गर्ग की राजनीतिक एवं सामाजिक यात्रा में अनेक अविस्मरणीय पड़ाव हैं। डॉक्टर साहब का संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी किसी भी परिस्थिति से समझौता नहीं किया, बल्कि बेबाकी के साथ अपनी बात को सबके समक्ष रखा। ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को उन्होंने अपने जीवन में गहरे से आत्मसात् कर रखा है। अचानक राजनीति से संन्यास की घोषणा के बाद उन्होंने सामाजिक सेवा को अपना ज्यादा-से-ज्यादा समय देने का फैसला किया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा जो कार्य किए गए, वे दिखाते हैं कि आज के युग में शिक्षा को मुनाफे का माध्यम न बनाकर उसे सहकारिता के आधार पर संचालित करने से राष्ट्र का विकास होगा। डॉ. नंद किशोर गर्ग की जीवनगाथा में बहुत सी खट्टी-मीठी बातें हैं। सहज-सरल भाषाशैली, स्पष्टवादिता, भावनाओं का प्रवाह और आम आदमी की शब्दावली उनकी आत्मकथा को पठनीय बनाती है।
सेवा, समर्पण, सहकार और सामूहिकता के प्रति समर्पित प्रेरक व्यक्तित्व की यह आत्मकथा पाठकों को समर्पण व ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का मूलमंत्र बनाने के लिए प्रेरित करेगी।
Khatte-Meethe Se Riste by Garima Sanjay
खट्टे -मीठे से रिश्ते’ मसालेदार
घटनाओं की कहानी नहीं है, यह जिंदगी के उतार-चढ़ाव को, रिश्तों की खींचतान को कहानी का रूप देने की कोशिश है। कहानी है, रिश्तों में आनेवाले बदलावों की। रिश्तों के नाम बदलते ही उनके रूप भी बदल जाते हैं, अपेक्षाएँ बदल जाती हैं और उन अपेक्षाओं में बँधे लोगों के व्यवहार बदल जाते हैं, भावनाएँ बदल जाती हैं।
कहानी में केवल रिश्तों में होनेवाली खींचातानी को ही नहीं, बल्कि समाज की एक और खींचतान पर प्रकाश डालने का प्रयास भी किया है। वर्तमान में हम जात पाँत से तो कुछ-कुछ उबरने लगे हैं, लेकिन वर्ग-भेद अभी भी बहुत विचित्र रूप सेकायम है। कई तरह के वर्गभेदों में से एक है। नौकरी-पेशा और व्यापारी वर्ग के बीच का भेद। निष्पक्ष रूप से विचारें तो हम सभी जानते हैं कि समाज में इन दोनों ही वर्गों का योगदान महत्त्वपूर्ण है, लेकिन न जाने क्यों और कैसे अकसर इन दो वर्गों के बीच अहं का टकराव हो जाता है। कोई ऊँचे ओहदे पर गर्व करता है, तो कोई व्यापारिक साख पर।
आमतौर पर रिश्ते अचानक नहीं टूटते । वे बिखरने लगते हैं। त्रासदी यह है। । कि जिस समय इस बिखराव की शुरुआत होती है, उस समय अधिकतर लोग या तो अहं में चूर होते हैं या फिर इतने लापरवाह कि बिखराव की यह आवाज ही नहीं सुनते।
ऐसी ही भावनाओं और उनसे जनित संभावनाओं को एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है, यह ‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’।
Khatti-Meethi Prerak Kahaniyan by Sudha Murthy
इस संग्रह की कहानियों को पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे। इनमें आप पढेंगे कि एक महिला अपने घरेलू कामों के लिए एक हिजड़े को रखती है; गुंडों का एक समूह बारिश की एक भीगी रात में एक लड़की की रक्षा करता है; एक प्लास्टिक सर्जन एक मरीज का ऑपरेशन करने को इसलिए मना कर देता है, क्योंकि वह अनावश्यक काररवाई की माँग करता है; और एक लड़के की मार्मिक कहानी, जिसने सालों पहले एक बच्चा-लंगूर को निश्चित मौत के मुँह में जाने से बचाया था।
इसके साथ-साथ आप पढ़ेंगे एक ऐसी लड़की की कहानी, जिसने बंदरों के कबीले से भागने में सफलता प्राप्त की; एक खूबसूरत युवती की कहानी, जिसे तेजाब के हमले के बाद घरवालों ने स्वीकारने से मना कर दिया; एक अकेली माँ, जो बड़ी मुश्किल से एक इमारत की आग से बची; एक नवयुवती, जिसने बहुत साहस दिखाया, जब ट्रेन में उसके ऊपर हमला हुआ। आज की महिलाओं को रहम, दया या किसी भीख की जरूरत नहीं है। वे परिवर्तन की तलाश में हैं, विषम परिस्थितियों का सामना कर उनसे पार पाने की क्षमता विकसित कर रही हैं।
अपने आत्मविश्वास को जाग्रत् कर अभीष्ट को पाने की अदम्य इच्छाशक्ति अर्जित करने की प्रेरणा देता खट्टी-मीठी प्रेरक कहानियों का यह संग्रह सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए पठनीय और संग्रहणीय है।
Khetri Naresh Aur Viveakanand by Jhabarmall Sharma
खेतड़ी नरेश और विवेकानंद
बाप्पा रावल, राणा प्रताप और मीराबाई की अस्थि-मिश्रित, पुनीत बालुकामयी राजपूताने की मरुभूमि में कुछ ऐसी ज्योतिर्मयी शक्ति है कि समय-समय पर उस रक्त-रंजित स्थल में वह शक्ति लोगों के हितार्थ मानव रूप धारण किया करती है। स्वर्गीय राजा अजीतसिंह भी उस शक्ति के एक प्रतिबिंब थे। स्वामी विवेकानंद और राजा अजीतसिंह उस सृजनहार शक्ति के दो निकटतम रूप थे, जो इस संसार में उस शक्ति की प्रेरणा से आए थे और अपना कर्तव्य-पालन करके उसी में लीन हो गए।
स्वामीजी ने अपने आध्यात्मिक बल से अमेरिका में वेदांत-पताका फहराकर भारतवर्ष और हिंदू जाति का गौरव बढ़ाया था। वस्तुतः स्वामीजी तरुण भारत के स्फूर्ति-स्रोत थे। अमेरिका में जाकर उन्होंने भारत के लिए जितने आंदोलन किए उतने कदाचित् किसी ने आज तक नहीं किए। इस आंदोलन में खेतड़ी-नरेश राजा अजीतसिंहजी का बड़ा योगदान था। स्वयं स्वामीजी की उक्ति है—“भारतवर्ष की उन्नति के लिए जो थोड़ा-बहुत मैंने किया है, वह खेतड़ी-नरेश के न मिलने से संभव न हो पाता।”
प्रस्तुत पुस्तक में स्वामी विवेकानंदजी द्वारा किए गए देश-हित के कार्यों में खेतड़ी-नरेश भी किस रूप में सहायक बने, उसका विस्तृत वर्णन है। समाज-कार्यों के लिए प्रोत्साहित करनेवाली एक अद्भुत कृति।
Khidki by Sheela Roy Sharma
विदेश में लंबे समय से रह रही युवती जब स्त्री के रूप में माता-पिता के घर लौटती है तो पुराने नक्श खोजती है, लेकिन अब तो उसके लिए वह खिड़की भी नहीं खुलती जिसके इंद्रधनुषी पारदर्शी शीशे कभी उसके अपने थे। हमारे सांप्रदायिक संस्कार शिक्षा और सभ्यता पर अकसर ही भारी पड़ते हैं। भाषा के महीन रेशों से बुनी जानेवाली कहानी के लिए लेखिका को मेरा साधुवाद।
—मैत्रेयी पुष्पा
शीला राय शर्मा की कहानियों का पर्यावरण सामाजिक होकर भी अधिकतर पारिवारिक है। कहानियाँ ‘सौतेली माँ’ और ‘चिल्लर बहू’ दो भिन्न वातावरण से जनमती हैं लेकिन दोनों के जीवन-मूल्य जैसे विवाह संस्था और धर्म के आधार पर संचालित हैं। इस जंजीर की कड़ी ही कहानी ‘खिड़की’ है। इसमें मनोविज्ञान की भीतरी तहों का कार्य-व्यापार है। सूक्ष्म मनोभावों का अंकन यहाँ गौरतलब है। कहन की ऐसी विशेषता भी द्रष्टव्य है जो अन्य कथा-कथन से अप्रभावित है। यही पाठ में विश्वसनीयता पैदा करता है। यह कहानीकार का अपना संवेदना, कथ्य और कहन का संसार है। यह निजता का ऐसा हस्ताक्षर है जो मौलिक है।
—लीलाधर मंडलोई
Khilkhilata Bachpan: Aadaten Aur Sanskar by Veena Srivastava
जैसे कुम्हार गीली मिट्टी से मनचाहा आकार गढ़ता है, फिर उन्हें पक्का करने के लिए भट्ठी में पकाता है, वैसे ही बच्चे भी गीली मिट्टी हैं, जिन्हें आप बेहतर व मनचाहे आकार में ढाल सकते हैं। उन्हें पक्का करने के लिए आपको भी उन्हें समय और व्यावहारिकता की भट्ठी में पकाना होगा। तभी वे मजबूत बनेंगे। यह आप पर निर्भर है कि आप गीली मिट्टी से घड़ा, सुराही, गमला बनाते हैं या सजावटी सामान। मान लीजिए, आपने सुराही बनाई, मगर व्यस्तता के चलते उसकी फिनिशिंग नहीं कर सके या चाक से उतारते समय ध्यान भटक जाए, धागा टूट जाए! तो किसी भी सूरत में बिगड़ेगा उस सुराही का ही रूप-स्वरूप। जब तक आपका ध्यान जाएगा, सुराही बिगड़े रूप में ढल चुकी होगी। बच्चे बहता पानी भी हैं। जैसे जलधारा अपना रास्ता खुद बना लेती है; जिधर भी राह मिलती है, उधर ही चल पड़ती है, वैसे ही बच्चे भी अपना रास्ता तलाश लेते हैं—सही या गलत वे नहीं जानते। बच्चों को उनका रास्ता चुनने में मदद कीजिए। बच्चों के मन में अभिभावकों के प्रति डर नहीं, बल्कि प्यार-सम्मान होना चाहिए। हमारी असली संपत्ति बच्चे ही हैं। अगर उनको सही दिशा मिल गई तो हम सबसे अमीर और खुशकिस्मत हैं। यदि वही लायक न बनें तो भले ही हमारे पास महल हो, मगर हम कंगाल से भी बदतर हैं। बच्चे आपके हैं तो जिम्मेदारी भी आपकी ही है कि उनमें बचपन से ही अच्छी आदतें और संस्कार डालें। आदतें-संस्कार कोई घुट्टी नहीं कि घोटकर पिला दें। यह शुरुआत बचपन से ही होती है, जो आपको करनी है।
बच्चों में अच्छे विचार और संस्कार पैदा करने के लिए हर माता-पिता के पढ़ने योग्य एक आवश्यक पुस्तक।
Khud Ko Heal Karne Ke 111 Mantra by Louise L. Hay
लुइस एल. हे विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशन गुरु तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रकाशन समूह ‘हे हाउस’ की संस्थापक हैं। 18 अक्तूबर, 1926 को जनमी लुइस की ‘हील योर बॉडी’, ‘द पावर इज विद इन यू’, ‘इनर विज्डम’ जैसी 20 से अधिक बेस्टसेलर पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनका विश्व की पच्चीस से अधिक भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। उन्होंने सन् 1985 में ‘हे फाउंडेशन’ नामक परमार्थ संस्था की स्थापना की।
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Khud Se Prem Karo by L Louise Hay
‘खुद से प्रेम करो’—अपनी आँखों में गहराई से देखना और एफर्मेशंस (दृढ़ वचन) दोहराना—स्वयं से प्रेम करना सीखने और दुनिया को एक सुरक्षित एवं प्रेम करने वाले स्थान के रूप में देखने के लिए सबसे प्रभावी तरीका है। प्रसिद्ध सेल्फ-हेल्फ लेखिका लुइस एल. हे लोगों को मिरर वर्क (खुद से प्रेम करो) करना तब से सिखा रही हैं, जब से वे एफर्मेशंस सिखा रही हैं। सीधे शदों में, जो कुछ भी हम कहते या सोचते हैं, वह एक एफर्मेशन है। आपकी स्वयं से की गई सभी बातें, आपके मन में चल रहे विचार एफर्मेशंस की एक धारा हैं। ये एफर्मेशंस आपके अवचेतन के लिए संदेश हैं, जो सोच और व्यवहार के अभ्यस्त तरीके स्थापित करते हैं। सकारात्मक एफर्मेशंस आपके अंदर उपचारात्मक विचार और सोच का रोपण करते हैं, जो आत्मविश्वास और आत्मसम्मान विकसित करने में तथा मानसिक शांति और आंतरिक खुशी उत्पन्न करने में आपका सहयोग करते हैं।
इस पुस्तक के 21 सूत्र आपको सिखाएँगे—स्वयं से प्रेम करना, अपनी सेल्फ-टॉक (स्वयं से बातचीत) की निगरानी करना, अपने अतीत से मुत होना, अपने आत्मसम्मान का निर्माण करना, अपने अंदर के आलोचक को बाहर निकालना, अपने शरीर को प्रेम करना, अपना दर्द दूर करना, अपने डर पर काबू पाना, अपने संबंधों को स्वस्थ करना, तनावमुत रहना।
अपने आत्मविश्वास और जिजीविषा को जगाने के लिए एक आवश्यक पठनीय पुस्तक।
Khudgarziyan Poems by Vaishali
वैशाली, इनकी अलमारी में अंग्रेज़ी साहित्य और मास कम्यूनिकेशन की दो—दो स्नातकोत्तर उपाध्यि इठला रही थीं, तभी ढेर सारे आलेखनों और कविताओं के पन्नों ने इन्हें झुके रहना सिखाया…
पिछले एक दशक से कॉपी राइटिंग क्षेत्र में सक्रिय हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए कई सारे चुनावी और अन्य प्रचार अभियान भी लिख चुकी हैं…
विषय कोई भी हो, उसमें जान डालने की कला को इन्होंने वक्त के साथ निखारा…
प्रखर राष्ट्रवादी विचारधारा रखती हैं ये, और राष्ट्रवाद पर कई गाने और टीवी व सोशल मीडिया की फिलमे भी लिख चुकी हैं…
और हर सृजन ने इन्हें देशभक्ति का एक नया मतलब समझाया…
मघ्यमवर्गीय गुजराती परिवार में इनका जन्म हुआ…
कर्म ही र्घम इनके जीवन का मूल—मंत्र है…
इसी मंत्र ने उनको एक छोटे से शहर से राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया…
कविता लिखने की इनकी शैली मे सरलता है। हल्के—फल्के शब्दों के प्रयोग से ये अपनी बात ईमानदारी स कह जाती हैं। यही सरलता और सहजता से आगे भी लिखते रहना है, और भी बहुत कुछ सीखते रहना है…
जय हिंद…
संपर्क : shahavaishali85@gmail.com
Khushhaal Jeevan Ki Kahaniyan by J.P. Vaswani
हमारे प्राचीन ग्रंथों की कहानियाँ और महान् विभूतियाँ के जीवन में ऐसे मूल्य और सिद्धांत प्रकट होते हैं, जो हमारी भलाई और नैतिक विकास के लिए परम आवश्यक हैं। ये हमें अनोखे अनुभवों के साथ यादगार चरित्र प्रस्तुत करते हैं। फिर इन कहानियों का प्रभाव हमारे भौतिकसांसारिकआध्यात्मिक जीवन पर पड़ता है और हमारा मार्ग इनसे प्रशस्त होता है।
कहानियाँ हमें उन कालों में ले जाती हैं, जब अवतारी पुरुष और मनुष्य के रूप में ईश्वर इस धरती पर विचरण करते थे और हमारे बीच हम में से ही किसी एक की तरह जीते थे। इसीलिए उनके अनुकरणीय जीवन का अपना आधार बनाकर हम भी मानव योनि को सार्थक कर सकते हैं।
यकीनन ये कहानियाँ हम सभी के सर्वोत्तम गुणों का विकास करेंगी; जैसे— ईश्वर के प्रति आभार, हमारे साथियों के प्रति सहृदयता, औरों के प्रति क्षमा, दूसरों के साथ समझ और सहानुभूति तथा इस मानव जन्म के लक्ष्य को खोजना और उसे हासिल करना।
दादा जे.पी. वासवानी भारत के सर्वाधिक सम्मानित आध्यात्मिक विभूतियों में से एक हैं। वे प्रसिद्ध साधु वासवानी मिशन के प्रमुख संचालक हैं, जो कि एक अंतरराष्ट्रीय, लाभनिरपेक्ष, समाज कल्याण और सेवा से जुड़ा संगठन है। इसका मुख्यालय पुणे में है और दुनिया भर में इसके कई सक्रिय केंद्र हैं।
Khushhaal Va Samriddha Vishwa by A.P.J. Abdul Kalam & Srijan Pal Singh
यह पुस्तक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा उनके निकट सहयोगी सृजन पाल सिंह के प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में टिकाऊ विकास प्रणाली के विकास तथा क्रियान्वयन के ऐसे प्रमाण दिए गए हैं, जिनमें अलग परिस्थितियों में भिन्न रणनीतियाँ अपनाई गईं। यह पुस्तक वर्तमान मानव सभ्यता की चुनौतियों तथा अवसरों को समाहित करती है और दरशाती है कि किस प्रकार से विश्व के ग्रामीण लोगों की क्षमताओं के इस्तेमाल से सावधानीपूर्वक पुरा (PURA—Provision of Urban Amenities in Rural Areas) की टिकाऊ विकास प्रणाली को तैयार किया जा सकता है।
इसमें भारतीय अनुभवों को ही नमूने के तौर पर इस्तेमाल किया गया है तथा मौजूदा उदाहरणों का हवाला देकर दिखाया गया है कि किस तरह से सीमित समय में पुरा प्रणालियों के जरिए सामाजिक परिवर्तन लागू किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि विकास का पुरा मॉडल अब केंद्र तथा राज्य सरकारों समेत कई निजी एवं शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा लागू किया जा रहा है। पुरा का प्रसार विश्व के अन्य भागों में भी किया जा रहा है और अमेरिका तथा अफ्रीका के इलाकों के लिए विशिष्ट योजनाएँ बनाई जा रही हैं।
पुस्तक में इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है कि किस तरह से विभिन्न साझेदार—सरकार, निजी क्षेत्र और समुदाय—आपस में मिलकर सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में काम करते हुए खुशहाल व समृद्ध विश्व के स्वप्न को साकार किया जा सकता है।
Khushiyon Ka Desh Bhutan by Ramesh Pokhariyal ‘Nishank’
भूटान को रहस्यमय देश माना जाता है। कई सदनों, रहस्यवादियों, विद्वानों और तीर्थयात्रियों ने इसके अनेक दौरे किए हैं। इन सभी लोगों ने भूटान की भूमि और उसके लोगों को अनमोल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे विश्व में विलक्षण माना है। यहाँ की भूमि एवं यहाँ के निवासी अपनी अमूल्य आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं।
यहाँ आनेवाले अतिथि और पर्यटकों को आश्चर्य होता है कि यहाँ के जनजीवन में पारंपरिक जीवन-शैली और संस्कृति पूर्णतः विद्यमान है। आज जब पाश्चात्य संस्कृति ने हर देश में घुसपैठ कर ली है, ऐसे में भूटान ने अभी भी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों तथा परंपराओं को सहेजकर रखा है।
ऊँची पहाडि़यों और ढलानों पर पारंपरिक रूप से बुने वस्त्रों से निर्मित रंग-बिरंगे लहराते झंडे प्राकृतिक सौंदर्य को और भी नैसर्गिक रूप प्रदान करते हैं, वहीं स्थानीय लोगों द्वारा किए जानेवाले मनमोहक लोकनृत्य इस देश को विश्वपटल पर एक विलक्षण देश के रूप में स्थापित करते हैं।
भूटान के इतिहास, भूगोल, शिक्षा, संस्कृति के साथ-साथ भारत-भूटान संबंधों पर जानकारी देनेवाली एक पठनीय पुस्तक।
Khwabon Ke Khat by Tripti Bhatt
काव्य एक ऐसी विधा है, जिसमें सृजन मात्र लेखक द्वारा नहीं होता, चाहे-अनचाहे कुछ हम कविता में लिखते हैं और कुछ कविता हम में इस तरह लिख जाती है कि सब कुछ पहले जैसा नहीं रहता। कहीं-न-कहीं देखने का नज़रिया, भावनाओं की गहराई, संवेदनशीलता या कभी-कभी एक ओढ़ी हुई नकली संवेदनहीनता हम अपनी रचनाओं से उधार ले लेते हैं और कभी धीरे-धीरे ये हम में खुद को छेनी-हथौड़े की तरह तराशकर कुछ उकेर जाती हैं। एक ही कविता जब अलग-अलग पाठकों के अनुभवों के लेंस से होकर गुज़रती है तो सब आँखों को एक सी तसवीर नहीं दिखाई देती। कई बार कवि स्वयं को भी श्रोता के माध्यम से एक नई नज़र से पहचान पाता है।
एक कविता न केवल रचनाकार, अपितु श्रोता/पाठक की भी कई अनसुलझी भावनाओं में एक स्पष्टता लाती है। कुछ गहरे मानवीय सत्यों का साक्षात्कार कविता में शब्दों के माध्यम से होता है और कवि की नैतिकता भी इसमें निहित है कि इस सत्य के साक्षात्कार को सार्वजनिक करे।
Kissa Ke Moti Pari Ka by Prakash Manu
प्रकाश मनु बच्चों के चहेते कवि- कथाकार हैं, जिनकी रचनाएँ बच्चे ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं । ‘ किस्सा एक मोटी परी का ‘ उनकी बाल कहानियों का ताजा संग्रह है, जिसमें शीर्षक कथा के अलावा उनकी ‘ निक्का और तितली ‘, ‘ होमवर्क का चक्कर ‘, ‘ खुशी का जन्मदिन ‘, ‘ मखना के रंग-बिरंगे खरगोश ‘, ‘ बुद्धू का रिक्शा कमाल ‘, ‘ कितनी सुंदर है यह धरती ‘ सरीखी एक-से-एक मजेदार और रंग-बिरंगी कल्पनाओं से सजी कहानियाँ शामिल हैं ।
पुस्तक की ‘ कितनी सुंदर है यह धरती ‘, ‘ किस्सा परी और पवन चक्की का ‘ तथा ‘ किस्सा एक मोटी परी का ‘ कहानियों में खुशदिल परियों की उपस्थिति सबको लुभा लेती है । इसलिए भी कि ये परियों कुछ निराली ही हैं, जिन्हें धरती की सुंदरता और यहाँ के सीधे-सरल इनसानों से बेइंतहा प्यार है । बार-बार वे उड़कर धरती की ओर आती हैं और यहाँ के बच्चों से दोस्ती करके घुमक्कड़ी और उछल-कूद करती हैं । बच्चों सरीखी इन नटखट परियों के अलावा कहीं समझदार चिडियाँ तो कहीं दयालु बौने बच्चों को मुसीबत में देखकर उनकी मदद करते हैं । और आखिर इन कहानियों से निकलकर वे बच्चों के दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए नक्श हो जाते हैं ।
सच तो यह है कि ‘ किस्सा एक मोटी परी का ‘ पुस्तक बच्चों के लिए एक-से-एक लुभावनी और दिलचस्प कहानियों का गुलदस्ता है । बच्चे इन्हें पढ़ेंगे, रीझेंगे, खिल-खिल हँसेंगे और अपने दोस्तों को भी ये रसपूर्ण और मजेदार कहानियाँ सुनाए बिना नहीं रहेंगे ।
Kitni Maayen Hain Meri by Archana Painuly
माँ एक सुखद अनुभूति व कोमल भाव है, जहाँ समस्त प्रेम शुरू होते हैं और परिणति को प्राप्त होते हैं। इस भाव को शब्दों में बाँध पाना असंभव सा है। इस संकलन के केंद्र में माँ है—सृष्टि की अद्वितीय कृति! मातृत्व एक विशेष अनुभव है और माँ एक अनोखी कहानी, जिसके आदि-अंत का कोई छोर नहीं। माँ की गहराई, माँ की व्यापकता को मापना सरल नहीं है, क्योंकि माँ शब्द में ही संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है। भारतीय संस्कृति में जननी एवं जन्मभूमि दोनों को ही माँ का स्थान दिया गया है। इन दोनों के बिना देह-रचना संभव नहीं। इनको समकक्ष रखते हुए भगवान् श्रीराम के मुख से निकला—‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’
‘कितनी माँएँ हैं मेरी’ कहानी संकलन माँ के बहुआयामी रूप को साकार करने का एक प्रयास है। माँ, सौतेली माँ, बिनब्याही माँ और धाय माँ की परंपरागत परिधि से आगे बढ़कर आज के युग में माँ के कई नए रूप— फोस्टर मदर, अडॉप्टेड मदर, सरोगेट मदर, सिंगल मदर, गे मदर…आकार ले चुके हैं।
संकलन की लगभग सभी माँएँ लेखिका के संपर्क में आई हैं और उसके अनुभव का हिस्सा रही हैं। परिस्थितियों की उठा-पटक के बीच उलझे घटनाक्रम में माँ किस प्रकार अस्तित्वमान रहती है, यही बात इस संकलन की कहानियों का प्राणतत्त्व है।
विभिन्न कालखंडों और विभिन्न स्थानों से जुड़ी कुल 12 कहानियों में माँ आपके सम्मुख है। माँ के विविध रूपों को मूर्त करने की यह कोशिश कितनी सफल हुई है, इसका निर्णय पाठक के हाथों में है।
Krantidrishta Shyamji Krishna Verma by M A Sameer
भारत को आजाद कराने में अनेक देशभक्तों ने आत्मबलिदान किया। उनमें श्यामजी कृष्ण वर्मा भी एक थे, जो लंबे समय तक गुमनाम बने रहे। उन्होंने अपनी मृत्यु के समय कहा था, ‘मेरी अस्थियाँ भारत में तभी ले जाई जाएँ, जब वह अंग्रेजों का गुलाम भारत न होकर हमारा आजाद भारत हो चुका हो।’ उनकी यह अभिलाषा भारत की आजादी के 55 वर्ष बाद श्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरी हुई।
श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्तूबर, 1857 को गुजरात में कच्छ के मांडली गाँव में हुआ। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान् तथा ऑक्सफोर्ड से एम.ए. और बैरिस्टर की उपाधियाँ प्राप्त करनेवाले पहले भारतीय थे। वे कुछ समय तक ऑक्सफोर्ड में संस्कृत के प्रोफेसर भी रहे।
सन् 1905 में लॉर्ड कर्जन की ज्यादतियों के विरुद्ध उन्होंने क्रांतिकारी छात्रों को लेकर ‘इंडियन होम रूल सोसाइटी’ की स्थापना की। भारत की आजादी के समग्र संघर्ष हेतु सन् 1905 में ही उन्होंने इंग्लैंड में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की। जब अंग्रेज सरकार ने वहाँ पहरा बिठा दिया तो वे स्विट्जरलैंड चले गए और वहाँ से ‘दि इंडियन सोशिओलॉजिस्ट’ मासिक में अपनी लेखनी से आजादी के आंदोलन को धार देने लगे।
31 मार्च, 1933 को जेनेवा के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 73 साल तक उनकी अस्थियाँ स्विट्जरलैंड के एक संग्रहालय में मुक्ति के इंतजार में छटपटाती रह्वहीं।
Krantikari Kosh – I by Shrikrishna Saral
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :विद्वान् और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।
पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
Krantikari Kosh – Ii by Shrikrishna Saral
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :विद्वान् और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।
पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
Krantikari Kosh – Iv by Shrikrishna Saral
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :विद्वान् और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।
पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
Krantikari Kosh – V by Shrikrishna Saral
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :विद्वान् और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।
पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
Krantikari Kosh -Iii by Shrikrishna Saral
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :विद्वान् और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।
पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
Krantinayak Bipin Chandra Pal by M.I. Rajasvi
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की नींव तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभानेवाली लाल-बाल-पाल की तिकड़ी में से एक बिपिनचंद्र पाल राष्ट्रवादी नेता होने के साथ-साथ शिक्षक, पत्रकार, लेखक और एक प्रखर वक्ता भी थे। उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक माना जाता है। लाल-बाल-पाल की इस तिकड़ी ने सन् 1905 में बंगाल-विभाजन के विरोध में ब्रिटिश शासन के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन किया।
उन्होंने महसूस किया कि विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो रही है और यहाँ तक कि लोगों का काम-काज भी छिन रहा है, अतः अपने आंदोलन में उन्होंने इस विचार को भी सामने रखा। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ‘गरम धड़े’ के अभ्युदय को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे आंदोलन को एक नई दिशा मिली और भारतीय जनमानस में जागरूकता बढ़ी।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महर्षि अरविंद के खिलाफ गवाही देने से इनकार करने पर बिपिनचंद्र पाल को छह महीने की सजा हुई। जीवन भर राष्ट्र-हित के लिए काम करनेवाले बिपिनचंद्र पाल 20 मई, 1932 को भारत माँ के चरणों में अपना सर्वस्व त्यागकर परलोक सिधार गए।
Krishna by Yugeshwar
‘ इन खुले केशों को देखो । मेरे ये केश दुःशासन के रक्त की प्रतीक्षा में खुले हैं । दुःशासन के रक्त से इनका श्रृंगार संभव है । मेरे पति भीम की ओर देखो । वे दुःशासन का रक्त पीने के लिए अपनी जिह्वा को आश्वासन देते आ रहे हैं । दुःशासन के तप्त रक्त से ही वे मेरे खुले केशों को बाँधेंगे ।
” मेरी केश नागिन दुःशासन का रक्त पीना चाहती है । मैं प्रतिहिंसा की अग्नि में तेरह वर्षों तक जलती रही हूँ । प्रतिहिंसा के कारण ही जीवन धारण किए हूँ; वरना जिस दिन सभा में दुःशासन ने मेरे केश खींचे थे, मैं उसी दिन प्राणों का विसर्जन कर देती । मैं जानती थी कि जिसके पाँच वीर पति हैं, श्रीकृष्ण जैसे सखा हैं, उसे आत्महत्या का पाप करने की आवश्यकता नहीं । आज तुम्हें और महाराज युधिष्ठिर को दुर्योधन से समझौता करते देख मुझे निराशा होती है । क्या इसी समझौते के लिए मैं वन-वन भटकती रही? नीच कीचक का पद-प्रहार सहा? रानी सुदेष्णा की दासी बनी? तुम लोगों का यह समझौता प्रस्ताव मेरी उपेक्षा है, मेरे साथ अन्याय है, नारी जाति के प्रति अपमान की स्वीकृति है । अन्यायी कौरवों से समझौता कर तुम अन्याय को मान्यता दोगे, धर्म का नाश और आसुरी शक्ति की वृद्धि करोगे, साधुता को निराश और पीड़ित करोगे ।. .राजा युधिष्ठिर राजा हैं, वे अपनी सहनशीलता रखें, मैं कुछ नहीं कहती; किंतु तुम तो धर्म- विरोधियों के नाश के लिए ही पृथ्वी पर आए हो । क्या तुम अपने आगमन को भुला देना चाहते हो? पाँच या पचास गाँव लेकर तुम और राजा युधिष्ठिर संतुष्ट हो सकते हैं, किंतु काल-नागिन जैसे मेरे इन केशों को संतोष नहीं हो सकता । मुझे इतना दुःख कभी नहीं हुआ था जितना आज तुम्हारे इस…”
-इसी उपन्यास से
Krishna Kahen Geetasaar by Deokinandan Gautam
महायुद्ध के शंखनाद और जुझारू वाद्यों के तुमुलघोष के उभयपक्षीय युद्धाकांक्षी स्वजनों को निहारते अर्जुन के मनोजगत् एवं प्रश्नों के समाधान हेतु भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा जीवन-ग्रंथ गीता का विकास हुआ। शांतिकाल के सामान्य नागरिक की मनोभूमि के सवालों के लिए गीता को अध्येता के विकास के अनुरूप पुनर्कथन के रूप में समेकित करते हुए बताने की आवश्यकता पूरी करने के लिए ‘कृष्ण कहें गीतासार’ पाठकों के लिए प्रस्तुत की जा रही है। इसमें मूल गीता के क्रम को नए पाठक के हिसाब से पुनर्व्यवस्थित किया गया है। प्रयास यह किया गया है कि वह अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन कर सके और गंतव्य के बारे में सुचिंतित मंतव्य की दृष्टि बनाकर सार्थक जीवन संपादन कर सके। अध्याय भी उसी तरह गढे़ गए हैं। सामग्री को अध्याय की भावना के अनुरूप सजाया गया है। सर्वकल्याणी ‘गीता’ को सामान्य पाठकों के लिए सरल-सुबोध भाषा में प्रस्तुत करने का महती प्रयास है यह पुस्तक।
Krishnam Vande Jagadgurum by Dinkar Joshi
कृष्ण विचलित नहीं हुए । अपने खुद के वचन की यथार्थता मानो सहजभाव से प्रकट होती है । नाश तो सहज कर्म है । यादव तो अति समर्थ है; फिर कृष्ण- बलराम जैसे प्रचंड व्यक्तियों से रक्षित हैं- उनका सहज नाश किस प्रकार हो? उनका नाश कोई बाह्य शक्ति तो कर ही नहीं सकती । कृष्ण इस सत्य को समझते हैं और इसलिए माता गांधारी के शाप के समय केवल कृष्ण हँसते हैं । हँसकर कहते हैं – ‘ माता! आपका शाप आशीर्वाद मानकर स्वीकार करता हूँ; कारण, यादवों का सामर्थ्य उनका अपना नाश करे, यही योग्य है । उनको दूसरा कोई परास्त नहीं कर सकता । ‘ कृष्ण का यह दर्शन यादव परिवार के नाश की घटना के समय देखने योग्य है । अति सामर्थ्य विवेक का त्याग कर देता है और विवेकहीन मनुष्य को जो कालभाव सहज रीति से प्राप्त न हो, तो जो परिणाम आए वही तो खरी दुर्गति है । कृष्ण इस शाप को आशीर्वाद मानकर स्वीकार करते हैं । इसमें ही रहस्य समाया हुआ है ।
-इसी पुस्तक से
न केवल भारतीय साहित्य में अपितु समग्र विश्व साहित्य में श्रीकृष्ण जैसा अनूठा व्यक्तित्व कहीं पर उपलब्ध नहीं है । संसार में लोकोत्तर प्रतिभाएँ अगण्य हैं; परंतु पूर्ण पुरुषोत्तम तो श्रीकृष्ण के अलावा अन्य कोई नहीं है । श्रीकृष्ण के किसी निश्चित रूप का दर्शन करना असंभव है । बाल कृष्ण से लेकर योगेश्वर कृष्ण तक इनके विभिन्न स्वरूप हैं । प्रस्तुत पुस्तक में श्रीकृष्ण के चरित्र को बौद्धिक स्तर से समझने का प्रयास किया गया है ।
विश्वास है, पाठकों को यह प्रयास पसंद आएगा ।
Kritaghn by Ramesh Pokhariyal Nishank
व्यक्ति में जब समाज के लिए कुछ कर गुजरने की ललक उठती है तो वह बिना किसी की चिंता किए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है। लेकिन हमारे ही समाज का एक तबका ऐसा भी है, जो हर चीज के प्रति हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखता है। खासकर अच्छा करनेवालों के मार्ग पर अनेक तरह की बाधाएँ खड़ी करके उन्हें विचलित करता रहता है। अंबुज के साथ भी ऐसा ही हुआ, उसको उसके लक्ष्य से भटकाने के लिए दुश्मनों द्वारा ही नहीं बल्कि खुद उसकी संस्था के ही कर्मियों द्वारा अनेक कुचक्र रचे गए।
सच्चाई और सत्कर्म के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति को कई बार अँधेरी सुरंगों से भी गुजरना होता है, तब ऐसा लगता है कि यह रास्ता शायद उचित नहीं है, लेकिन अँधेरी सुरंग के पार सुहानी सुबह की स्वर्णिम रश्मियाँ अपना प्रकाश बिखेरे रहती हैं।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की सशक्त लेखनी का एक और मील का पत्थर है यह उपन्यास ‘कृतघ्न’, जो समाज के अच्छे और बुरे, दोनों पहलुओं को उजागर करती तथा टूटतेबिखरते और फिर जुड़ते रिश्तों की बानगी देता है।
Kshama Karne Ki Alaukik Shakti by J.P. Vaswani
क्रोध, विद्वेष और असंतोष विनाशकारी तथा आत्म-पराजयकारी हैं। हम दूसरों के विरुद्ध इन नकारात्मक भावनाओं का वहन करते हैं; लेकिन वास्तव में ये हमारे जीवन को विषाक्त कर देती हैं। जब हम अपनी प्रतिक्रियाओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं, हम यह विश्वास करते हैं कि वे हमारी नकारात्मक भावनाओं के लिए उत्तरदायी हैं, तब वास्तव में हम अपने स्वयं के जीवन पर से ही नियंत्रण त्याग रहे होते हैं। क्षमा अच्छाइयों, प्रेम और करुणा जाग्रत् कर हमारी अपनी क्षमताओं के प्रति हमें जागरूक बनाकर हमारे आत्म-विश्वास को बढ़ाती है। क्षमा हमें अपने स्वयं और दूसरों के साथ शांति से रहने के लिए सक्षम बनाती है और भावनात्मक संघर्ष से स्वतंत्र करती है। क्षमा हमारे जीवन को रूपांतरित कर सकती है, इसे और अधिक शांत, अर्थवान और रचनात्मक बना सकती है।
पूज्य दादा वासवानी के अमृत वचन और उनके स्वयं के दीर्घ जीवन का अमूल्य खजाना इस पुस्तक में संकलित है, जिसके अध्ययन से हम क्षमा जैसे दैवी गुण को अपने जीवन में उतारकर आत्मविकास कर पाएँगे, सफल हो पाएँगे।
Kuchh Alpa Viraam by Sachchidanand Joshi
‘कुछ अल्प विराम’ को साहित्य की किसी एक विधा के खाँचे में डालकर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह विधाओं की परिधि को तोड़कर जिंदगी की सच्चाई से सीधा संबंध जोड़ती है। इसमें जीवन के उन सभी छोटे-बड़े प्रसंगों को इकट्ठा करने की कोशिश की है, जो गुदगुदाते हैं, हँसाते हैं, रुलाते हैं, कभी हल्की सी चपत लगाते हैं और कभी चिकोटी काट लेते हैं। सबकुछ उतना ही जितना जरूरी है, हमें हमारी असमय नींद या तंद्रा से जगाने के लिए काफी है। कभी लघुकथा के माध्यम से, तो कभी किस्से के माध्यम से और कभी-कभी संस्मरण के माध्यम से। जरूरी नहीं कि जिंदगी का हर सबक, हर समय किसी भारी भरकम शास्त्रीय किताब से ही सीखा जाए। जिंदगी के छोटे से प्रसंग भी कई बार बड़ा सबक सिखा जाते हैं। ऐसे ही प्रसंगों को जो हमारे जीवन में अल्प विराम की तरह हैं, बेहद सरल भाषा और सहज शैली में सँजोकर प्रस्तुत करने की कोशिश है, ‘कुछ अल्प विराम’।
Kuchh Bola Gaya, Kuchh Likha Gaya by Subhah Mishra
इस पुस्तक में संगृहीत निबंध दरअसल पारंपरिक निबंधों की संरचना से विद्रोह करते हैं, खासकर ललित निबंधों की मृतप्राय देह से प्रेत जगाने की कोशिश तो ये बिल्कुल ही नहीं हैं। इन निबंधों के सहारे न सिर्फ हमारे समाज, संस्कृति और पूरे समय की पड़ताल की जितनी कोशिश है, उतनी ही उसे नए संदर्भों में देखने-परखने की ललक भी है।
इस पुस्तक के अधिकांश निबंध आज के जीवन-यथार्थ को उसके समूचे अर्थ-संदर्भों में प्रकट करते हैं। साथ ही समय की जटिलता और उसकी व्याख्या की अनिवार्यता में संवाद की स्थिति भी निर्मित करने का ये विवेकपूर्ण साहस और प्रयास हैं।
1947 से लेकर आज तक सत्ता और उसके सलाहकारों की भूमिका में उतरे उतावले बुद्धिजीवियों ने इन सबको अप्रासंगिक घोषित करने के लिए भाषा के खिलवाड़ से संस्कृति को सत्ता का हिस्सा बनाने के लिए बहुत ही श्रम के साथ नए मुहावरे गढ़े। ये निबंध इन चालाकियों को भी अनावृत करते हैं। इन निबंधों को पढ़ना अपने समय से संवाद है।
—भालचंद्र जोशी
Kuchh Suni Kuchh Ansuni Kahaniyan by Surya Sinha
लेखक का कहना है कि इन कहानियों ने उन्हें एक मित्र की तरह दिलासा दी, हिम्मत बढ़ाई, मन में नई उम्मीदें जगाईं, नए रास्ते सुझाए और नया दृष्टिकोण दिया। इसके साये में उन्होंने अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन होते देखा। इन कहानियों ने फिल्म व धारावाहिक एडिटर सूर्या सिन्हा को एक लेखक, मानव प्रशिक्षक एवं प्रेरक बनाकर दुनिया के केनवास पर उतार दिया। एक प्रकार से इन कहानियों की बदौलत उनका नया अवतार दुनिया के सामने आया।
‘विश्व बंधुत्व’ और ‘सर्वजन हिताय’ की भावना ने उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि क्यों न उनके जैसे निराश, हताश और अपनों से धोखा खाए दूसरे लोगों को भी इन कहानियों की असीम शक्ति से अवगत कराएँ। अत: जन्म हुआ एक पुस्तक ‘कहानियाँ बोलती हैं’ का, जो उनकी सफलतम पुस्तकों में से एक है।
आशा है, इस पुस्तक की रोशनी में समाज के उन युवाओं को दिशा मिलेगी, प्रेरणा मिलेगी, जो विभिन्न कारणों से हताश और निराश हो चुके हैं। यह केवल एक पुस्तक ही नहीं है बल्कि जीवन को नई दिशा देने का एक माध्यम भी है।
Kuda Dhan by Deepak Chauasia
…कूड़ा-कबाड़ जैसी कोई चीज इस दुनिया में है ही नहीं। अगर कुछ कूड़ा-कबाड़ है तो हमारी सोच के चलते। या है कि हम जिन चीजों के इस्तेमाल के बारे में सोच नहीं पाते, उसे बेकार समझ लेते हैं, कूड़ा समझ लेते हैं। हमें उनका इस्तेमाल करना नहीं पता, इसलिए उन चीजों को फेंकना शुरू कर देते हैं।
आज बहुत कम लोग हैं, जो दवा-दारू की खाली शीशियाँ और बोतलें फेंकते हैं। लोहे और धातुओं से बने सामान अगर खराब भी हो जाएँ तो ज्यादातर लोग उसे कूड़ेदान में नहीं फेंकते। नालों में नहीं फेंकते। यों? योंकि सबको शीशे और धातुओं की कीमत का अंदाजा है। जिन्हें ज्यादा नहीं पता, वे भी जानते हैं कि कबाड़ी वाला शीशी-बोतल और लोहा-लकड़ अच्छे दाम पर खरीद लेता है। लेकिन ऐसा हम पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलों, बाल या घरेलू कचरे के बारे में नहीं सोचते, योंकि हमें पता ही नहीं कि इनका भी बहुत कुछ इस्तेमाल हो सकता है।
यह इनसानी फितरत का मामला है। हर कोई आसान काम करना चाहता है, जिसमें जोखिम न हो, जबकि हर कोई यह ज्ञान भी बाँटता रहता है कि ‘नो रिस्क, नो गेन’। प्लास्टिक कचरे से पेट्रोल-डीजल बनाने में भी यही मानसिकता आड़े आ रही है। तकनीक मौजूद है, लेकिन उस तकनीक का इस्तेमाल करने का इरादा नदारद है।
यह पुस्तक ‘वेस्ट टु वैल्थ’ यानी कूड़े से धन अर्जित करने के व्यावहारिक तरीके बताती है।