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Antariksh Ki Kahani, Antariksh Yatriyon Ki Zubani by Kali Shankar
अंतरिक्ष की कहानी अंतरिक्ष यात्रियों की जुबानी—काली शंकर
अंतरिक्ष अन्वेषण और अंतरिक्ष में जाकर विभिन्न प्रकार के कार्य करना, अंतरिक्ष से पृथ्वी अवलोकन इत्यादि बातें एक सामान्य व्यक्ति के लिए स्वप्न ही लगती हैं। अंतरिक्ष के नाम से ही एक रोमांच पैदा हो जाता है—कैसी होगी वह दुनिया, कैसे वहाँ जाया जाएगा, कैसे रहा जाएगा, खान-पान, दैनंदिन कार्य और सबसे ऊपर—वहाँ रहकर प्रयोग करना, खोज करना—एक सनसनाहट सी अनुभव करवा देता है।
‘अंतरिक्ष की कहानी, अंतरिक्ष यात्रियों की जुबानी’ में अंतरिक्ष यात्रियों ने अपनी शिक्षा के विषय में तथा शिक्षा के दौरान हुई आर्थिक परेशानियों का जिक्र किया है। स्पेस शटल की प्रथम महिला कमांडर के पिता उसे पढ़ाना चाहते थे; लेकिन उनके पास बेटी को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। बेटी ने छोटी-छोटी नौकरी करके शिक्षा के लिए धन अर्जित किया। जॉन ग्लेन एक प्लंबर के बेटे थे; सभी स्पेस शटलों से यात्रा कर चुके विख्यात सर्जन डॉ. स्टोरी मुसाग्रेव एक किसान के बेटे थे। लेकिन जीवन का यह सत्य है कि प्रतिभा पैसे की मोहताज नहीं होती। अभावों में जीवन जीने के बावजूद ये लोग विश्वविख्यात अंतरिक्ष यात्री बने।
इसमें अंतरिक्ष अन्वेषण के विभिन्न पहलुओं के बारे में अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा विस्तार से तथा रोचक-प्रश्नोत्तर शैली में बताया गया है, जो ज्ञानपरक तो है ही, रोमांचपूर्ण भी है।
अंतरिक्ष की रोचक जानकारियों से भरपूर पठनीय पुस्तक।
Antariksha Mein Jeevan by Kali Shankar
अंतरिक्ष में रहना आसान नहीं है। कपड़े धोना और खाना-पीना अंतरिक्ष की भारहीनता में बहुत जटिल प्रक्रियाएँ बन जाती हैं। छोटे-से-छोटा कार्य भी अंतरिक्ष में, जहाँ पर सभी चीजें भारहीन होकर तैर रही हों, चुनौतीपूर्ण बन जाता है। प्रस्तुत पुस्तक में, अंतरिक्ष में जीवन के विभिन्न पहलुओं-भोजन, शयन, स्पेस सूट, स्पेस वॉक, तैरना, व्यायाम इत्यादि को विस्तृत रूप में चित्रों के माध्यम से समझाया गया है। अंतरिक्ष में जीवन-शैली के ऊपर एक प्रश्नोत्तरी भी प्रस्तुत की गई है, जिसके उत्तर अंतरिक्ष में जा चुके अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष विशेषज्ञों द्वारा दिए गए हैं। विश्वास है, यह पुस्तक विद्यार्थियों, अंतरिक्ष विज्ञान में रूचि रखनेवाले पाठकों एवं सामान्य जन के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
Antarrashtriya Atankvad by Vinod Sehgal
अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने स्थापित तथ्यों की सरल गलियों के परे जाकर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की बड़ी ही कष्टकारी झलक दिखाई है, युद्धों की बदलती प्रवृत्ति को उजागर करते हुए आतंकवादी कृत्यों से संबंधित विषमता के तत्त्व से निपटने के संबंध में वह एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं और बताते हैं कि किस प्रकार कई वैकल्पिक रणनीतियों को उपेक्षित करते राष्ट्रीय प्रतिक्रिया प्रारूप, अब भी प्रतिशोधात्मक क्षमता के अभाव तथा प्रतिशोधात्मक अति विनाशकारी क्षमता के बीच मँडराते हैं।
ऐसे क्षेत्र को खँगालते हुए, जिस पर इस विषय पर लिखनेवाले विद्वानों तथा विशेषज्ञों ने शायद ही पहले कभी ध्यान दिया है, जनरल सहगल का नवीन दृष्टिकोण, खासकर इन विषयों पर, उनके मतों में देखा जा सकता है—
पारिभाषिक गतिरोध समाप्त करना, जिससे राष्ट्रों के समूह हिचकिचाते हैं।
इराक से परे देखना।
आत्मघाती हमलों का बचाव सोचना।
अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के संकट से निपटने के लिए भावी योजनाएँ ।
यह पुस्तक सुबोध्य तरीके से उजागर करती है कि विश्व-प्रभुत्व के लिए सभ्यता संबंधी चालबाजी सैमुअल हटिंगटन की प्रसिद्ध प्राक्कल्पना के अस्तित्व में आने से काफी पहले आरंभ हो चुकी थी। जनरल सहगल की पुस्तक ‘अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद’ आतंकवाद के संबंध में संयुक्त राष्ट्र, सरकारों, कूटनीतिज्ञों, विद्वानों, नीति- निर्धारक समूहों, सैन्य तथा इंटेलिजेंस विशेषज्ञों और आम जनता के दृष्टिकोणों पर प्रभाव डालेगी।
Antarrashtriya Mudra Kosh (Icwa) by V. Srinivas
भारत के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा भारत के आर्थिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण पलों का व्यावहारिक विश्लेषण और भावी वैश्विक संकट के समाधान का निर्णय कर सकनेवाले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में बहुपक्षीयता का भविष्य।
यह पुस्तक वी. श्रीनिवास भारत सरकार के विशिष्ट अपर सचिव, कार्यकारी निदेशक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व सलाहकार और भारत के वित्तमंत्री के निजी सचिव द्वारा 17 माह के शोध और साक्षात्कार के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंधों की अनेक बड़ी घटनाओं का व्यापक विश्लेषण है।
इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत की भूमिका का परिदृश्य है। यह भारत के 1966, 1981 और 1991 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कार्यक्रमों, 2010 में आई.एम.एफ. से भारत द्वारा स्वर्ण क्रय, जी20 के उदय और विश्व में तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के उद्भव के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। वी. श्रीनिवास ने अंतिम ऋणदाता के रूप में आई.एम.एफ. की भूमिका, सदस्य देशों के साथ निपटने में असीमित शक्ति की एक संस्था के रूप में आई.एम.एफ. 2008 के बाद वैश्विक वित्तीय संकट में आई.एम.एफ. की वृहत्तर भूमिका और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में चीन के उदय पर अंतर्दृष्टि प्रदान की है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंध के परिप्रेक्ष्य में पहले 25 वर्षों पर व्यापक शोध है, जिसके बारे में गहन अध्ययन और शोध करके समस्त जानकारियाँ संकलित की गई हैं, जिन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
Antarrashtriya Sangathan by Anish Bhasin
अंतरराष्ट्रीय संगठन ऐसे संगठन होते हैं, जो एकांतिक रूप से किसी विशेष राष्ट्र या राज्य के न होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ, उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो), दक्षेस/सार्क, आसियान, एपेक, यूरोपीय संघ, राष्ट्रमंडल, अरब लीग, अफ्रीकी संघ, ओपेक, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन इत्यादि।
विगत दशक में अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर अनेक ग्रंथ अंग्रेजी में प्रकाशित हुए हैं, किंतु हिंदी में इस विषय पर एक संपूर्ण पुस्तक का सर्वथा अभाव रहा है। अत: इसी अभाव की पूर्ति हेतु इस ग्रंथ ‘अंतरराष्ट्रीय संगठन विश्वकोश’ का सृजन किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक में सौ से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सांगोपांग वर्णन है। प्रत्येक संगठन के अंत में उससे संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्यों को कोष्ठक में दिया गया है। पुस्तक की विषयवस्तु को उपयोगी बनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय संगठनों से संबंधित कई पुस्तकों से संदर्भ भी लिये गए हैं।
आशा है, यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के परीक्षार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
Antim Satya Tatha Anya Kahaniyan by Himanshu Joshi
प्रसिद्ध कथाकार हिमांशु जोशी की इन कहानियों में वैविध्य देखने को मिलता है। अचरज होता है-इतना वैविध्य एक ही व्यक्ति की रचनाओं में एक साथ कैसे संभव हो सकता है? छह दशक से अधिक के अपने कहानी लेखन में हिमांशु जोशी ने लगभग दो सौ कहानियाँ लिखीं। कई स्तरों को छूती आम आदमी की इन कहानियों में अदृश्य आग है, तपिश है, पीड़ा है, छटपटाहट है, और घुटन भी है। दर्द की ये तसवीरें मनुष्य-मन की व्यथा ही नहीं, आज के जी रहे मानव के अंतहीन अंतर्विरोधों को भी उजागार करती हैं।
कहानी मात्र कहानी न रहकर एक यथार्थ भी बन जाए, यह स्वयं में कम बड़ी उपलब्धि नहीं। जिए हुए यथार्थ की ये कहानियाँ कहानियाँ ही नहीं, दस्तावेज भी हैं–विसंगतियों से जूझ रहे अभिशप्त आदमियों के लिए। कहानी शुरू तो कहीं से भी हो सकती है यहाँ, लेकिन प्रायः इन कहानियों का अंत मास्टर स्ट्रोक के साथ होता है।
सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर ने हिमांशु जोशी के विषय में लिखा है कि ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी को हिमांशु जोशी की कहानियों के बगैर पहचाना नहीं जा सकता। हिंदी कहानी ने जितनी भी रचनात्मक मंजिलें तय की हैं, उन रचनायात्राओं और मंजिलों पर हिमांशु जोशी की कोई-न-कोई कहानी साथ चलती या मंजिल पर मौजूद मिलती है।’