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Aiims Mein Ek Jung Ladte Huye by Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’
कोरोना
‘‘हार कहाँ मानी है मैंने
रार कहाँ ठानी है
संघर्षों की गाथाएँ गायी है मैंने
मुझे आज भी गानी है।
मैं तो अपने पथ-संघर्षों का
पालन करते आया हूँ।
फिर कैसे पीछे हट जाऊँ मैं
सौगंध धरा की खाया हूँ।
क्यों आए तुम कोरोना मुझ तक
अब तुमको तो बैरंग जाना है
पूछ सको तो पूछो मुझको
मैंने मन में क्या ठाना है।
तुम्हें पता है मैं संघर्षों का
दीप जलाने आया हूँ।
फिर कैसे पीछे हट जाऊँ मैं
सौगंध धरा की खाया हूँ।
हार कहाँ मानी है मैंने
रार कहाँ ठानी है।
मैं तिल-तिल जल
मिटा तिमिर को
आशाओं को बोऊँगा,
नहीं आज तक सोया हूँ
अब कहाँ मैं सोऊँगा!
देखो, इस घनघोर तिमिर में,
मैं जीवन-दीप जलाया हूँ।
फिर कैसे पीछे हट जाऊँ मैं
सौगंध धरा की खाया हूँ।
हार कहाँ मानी है मैंने
रार कहाँ ठानी है
संघर्षों की गाथाएँ गायी
मुझे आज भी गानी है।’’
—रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
6 मई, 2021, दिल्ली, एम्स
कक्ष-704, प्रातः 7:00 बजे
Aise Hua Hool by R Carstairs
ऐसे हुआ हूल—आर.कार्सटेयर्स/शिशिर टुडे
रॉबर्ट कार्सटेयर्स, आइसीएस लिखित उपन्यास ‘हाड़माज विलेज’ का प्रकाशन 1935 में हुआ था। वर्तमान झारखंड के संताल परगना प्रमंडल अंतर्गत आमड़ापाड़ा और लिटिपाड़ा प्रखंडों के वास्तविक गाँवों के वास्तविक पात्रों को लेकर रचा गया यह उपन्यास 1855 में हुए ‘हूल’ का आँखों देखा हाल वर्णन करता प्रतीत होता है। उपन्यास में वर्णित गाँव आज भी अस्तित्व में हैं और समुदाय के उन नायकों को अब भी श्रद्धा से याद किया जाता है, जिन्होंने स्वाधीनता के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। कार्सटेयर्स 1885 से 1898 तक संताल परगना जिला के डिप्टी कमिश्नर के रूप में लगभग 13 वर्षों तक दुमका में पदस्थापित रहे। आर.आर.के. किस्कू रापाज द्वारा रोमन लिपि संताली में अनूदित इस महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी उपन्यास का प्रकाशन 1946 में ‘हाड़मावाक् आतो’ नाम से हुआ था। इसी संताली संस्करण का हिंदी अनुवाद है—’ऐसे हुआ हूल’ ।
वस्तुत: कार्सटेयर्स ने यह उपन्यास लिखा ही इसलिए होगा, ताकि वह अपने कार्य-स्थल की वास्तविक स्थितियों से अपने देशवासियों तथा अंग्रेजी के वैसे भारतीय पाठकों को परिचित करा सके, जो आदिवासियों, विशेषकर संताल आदिवासियों की जीवन-शैली, उनके आचार-व्यवहार, रीति-रिवाज और स्वाधीनता प्रेमी चरित्र के प्रति अनभिज्ञ थे।
Ajey Bharat by Prof. Bhagwati Prakash Sharma
हमारे प्राचीन शास्त्रों में वर्णित हमारी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत और उनमें उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान के विविध विवरणों की प्रामाणिकता व वैज्ञानिकता की आज के पुरातात्त्विक व वैज्ञानिक अन्वेषणों द्वारा उत्तरोत्तर पुष्टि की जा रही है। इन सभी अन्वेषणों का क्रमबद्ध संकलन, आज की अत्यंत महती आवश्यकता है। विगत 50 वर्षों में कोडूमनाल (तमिलनाडु) सहित 100 से अधिक स्थानों पर हुए पुरातात्त्विक उत्खनन प्रागैतिहासिक काल में रही, भारतीय संस्कृति की अत्यंत उन्नत अवस्था व अति उन्नत प्रौद्योगिकी व ज्ञान-विज्ञान को परिलक्षित करते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में हमारी प्राचीन समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमारी उन्नत विरासत, स्वाधीनता के उपरांत हुई हमारी प्रमुख त्रुटियों और अब देश की पुनः द्रुत आर्थिक प्रगति व समावेशी विकास के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उपयुक्त रीति-नीति की रूपरेखा के प्रमुख बिंदुओं का संक्षिप्त विवेचन करने का प्रयास किया गया है। आज हम उच्च आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा की अभिव्यक्ति के रूप में आर्थिक राष्ट्रवाद, तकनीकी राष्ट्रवाद, उन्नत प्रौद्योगिकी विकास हेतु उद्योग सहायता संघों के सूत्रपात, कृषि, सहकारिता, सामाजिक समरसता, स्वदेशी व पर्यावरण संरक्षण आदि के क्षेत्र में एकात्म मानव- दर्शन का अनुसरण कर धारणक्षम एवं समावेशी विकास के पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो सकते हैं। इस पुस्तक में इन्हीं सभी विषयों की संक्षिप्त समीक्षा की गई है।
इन विषयों पर समाज में विमर्श और देश अपने प्राचीन परम वैभव को प्राप्त कर पुनः विश्व मंगल का प्रणेता बने, तो इस पुस्तक का लेखन-प्रकाशन सफल होगा।
Ajibogarib Tathya
“The book contains a total of 501 facts which make the reader wonder about our strange but truly fascinating world.
The success of this book underlines the growing realisation that books now are no longer looked upon something as having necessarily a direct link to classroom and examination—and in consequence, to be shelved when the need is over. With exciting facts from different fields the book stimulates young reader’s interest in the world around him-thus inspiring him to pursue knowledge purely for the sake of it. In turn it also helps to develop logical thinking and a scientific temperament.
Ajneya : Swatantraya Ki Khoj by Krishan Dutt Paliwal
सप्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल की यह पुस्तक अज्ञेय के रचनाकर्म का विभिन्न कोणों से विवेचन-विश्लेषण करते हुए स्थापित करती है कि अज्ञेय की दृष्टि में सर्वोपरि मूल्य है स्वातंत्र्य। उनके उपन्यास, डायरी, कविता और साहित्य-चिंतन की गहन जाँच-पड़ताल करते हुए प्रोफेसर पालीवाल ने पाया है कि भारतीयता, सामाजिकता और आधुनिकता तीनों को विलक्षण ढंग से साधनेवाले अज्ञेय पाठक की स्वाधीन चेतना और आत्म-बोध जगाने का निरंतर प्रयास करते हैं। उनके बहुलतावादी चिंतन-सृजन की केंद्रीय समस्या है—‘आत्म’ और ‘अन्य’ के रिश्ते की समस्या। मैं और वह, मम और ममेतर के बीच रिश्ते की समस्या, शब्द के सार्थक प्रयोग की समस्या ही अज्ञेय के संपूर्ण सृजनात्मक पुरुषार्थ की आत्मा है, जिसमें हर कोण से स्वाधीनता के न जाने कितने प्रश्न उठते हैं। उनके लिए स्वाधीन चिंतन अथवा स्वाधीन विवेक राजनीतिक स्वातंत्र्य से कहीं बड़ा है।
अज्ञेय पर लगे तमाम आक्षेपों और भर्त्सना के पीछे के सच को सामने लाकर यह पुस्तक ठोस प्रमाणों के आधार पर यह भी उजागर करती है कि उन पर लगाए गए आक्षेप कितने निराधार और पूर्वग्रह प्रेरित हैं। अज्ञेय के सृजन के अनेक ऐसे पक्षों को यह पुस्तक प्रकाश में लाती है, जिनकी हिंदी आलोचना में प्रायः अनदेखी होते रहने के कारण पाठक दिग्भ्रमित हुआ है।
अज्ञेय साहित्य के पाठकों के लिए एक पठनीय पुस्तक।
Ajneya Ke Samajik-Sanskritik Sarokar by Krishan Dutt Paliwal
सप्रसिद्ध आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की नई पुस्तक के आलोचनात्मक निबंधों में अज्ञेय के रचनाकर्म को लेकर हिंदी आलोचना में हुई तमाम साहित्यिक, गैर-साहित्यिक बहसों और साहित्य की, राजनीति की चर्चा करते हुए उस पर तर्कसंगत प्रश्न उठाए गए हैं। अज्ञेय के साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान को उद्घाटित करते हुए स्थापित किया गया है कि अज्ञेय के सृजन-चिंतन से किस तरह हिंदी आलोचना में बहसों की शुरुआत हुई तथा समकालीन साहित्य-संवेदना और साहित्यिक परंपरा के अध्ययन-मूल्यांकन की नई आलोचना-संस्कृति का विकास हुआ।
अज्ञेय के निबंधों, भूमिकाओं, स्मरण-लेखों, यात्रा-साहित्य तथा उनके द्वारा आयोजित व्याख्यानमालाओं और यात्रा शिविरों में लेखकों, विद्वानों, कला-मर्मज्ञों के व्याख्यानों का अंतर्पाठ करते हुए इस पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार उन्होंने भारतीय समाज, हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को औपनिवेशिक आधुनिकता से मुक्त कराने और भारतीय आधुनिकता को दिशा प्रदान करने का प्रयास किया।
अज्ञेय-साहित्य के अध्येताओं के लिए एक पठनीय पुस्तक।
Ajneya Ki Lokpriya Kahaniyan by Ajneya
स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(1911-1987)
स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(1911-1987)
कुशीनगर (देवरिया) में सन् 1911 में जन्म। पहले बारह वर्ष की शिक्षा पिता (डॉ. हीरानंद शास्त्री) की देख-रेख में घर ही पर। आगे की पढ़ाई मद्रास और लाहौर में। एम.ए. अंग्रेजी में प्रवेश, किंतु तभी देश की आजादी के लिए एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल होना। शिक्षा में बाधा तथा सन् ’30 में बम बनाने के आरोप में गिरफ्तारी। जेल में रहकर ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना। क्रमशः सन् ’36-37 में ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’ का संपादन। सन् ’43 से ’46 तक ब्रिटिश सेना में भर्ती। सन् ’47-50 तक ऑल इंडिया रेडियो में काम। सन् ’43 में ‘तार सप्तक’ का प्रवर्तन और संपादन। क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे सप्तक का संपादन। ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘वाक्’, ‘एवरीमैन’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से पत्रकारिता में नए प्रतिमानों की सृष्टि।
देश-विदेश की अनेक यात्राएँ, जिनसे भारतीय सभ्यता की सूक्ष्म पहचान और पकड़, विदेश में भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्यापन। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, जिनमें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ सन् ’79, यूगोस्लाविया का अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान ‘गोल्डन रीथ’ सन् ’83 भी शामिल। सन् ’80 से वत्सल निधि के संस्थापन और संचालन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के बोध निर्माण में कई नए प्रयोग।
अज्ञेय का संपूर्ण रचना-संसार डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में प्रकाशित है।