Badlav Ke Bol by Kailash Satyarthi

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विचार ही वह बीज है, जिससे बदलाव के वृक्ष उगते हैं। देश-दुनिया में जितनी क्रांतियाँ हुई हैं, उनकी कोंपलें विचारों से ही फूटी हैं। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी के क्रांतिकारी विचारों ने समाज के हाशिए पर खड़े और विकास की परिधि से बाहर उन करोड़ों उपेक्षित बच्चों को आज दुनिया के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से उनकी आजादी और मुसकराहट का रास्ता खुलता है। श्री सत्यार्थी केवल एक बाल अधिकार कार्यकर्ता भर नहीं हैं, वे एक विचारक और दार्शनिक भी हैं। यह पुस्तक उनके ऐसे ही क्रांतिकारी विचारों और बदलाव के बोलों का संग्रह है।

Badlav Ke Real Hero by N. Raghuraman

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किसी भी अच्छी पहल को बस शुरू करने की जरूरत होती है। कुछ समय बाद उससे जुड़ी चीजें अपने आप अपनी जगह लेने लगती हैं और पहल को आगे ले जाती हैं, क्योंकि ऐसी पहल का मूल चरित्र होता है ‘अच्छाई’।
आपके पास जो कभी था ही नहीं, उसे बनाने के लिए आप में जुनून होना आवश्यक है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए आप में प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए।
यदि आप अपने बच्चों को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ तोहफा देना चाहते हैं तो उन्हें समझाइए कि पर्यावरण और इसकी प्रजातियों की रक्षा करें। एक थीम आत्मसात् कर लें—‘गो वाइल्ड फॉर लाइफ’, यानी जिंदगी के लिए वन्य जीवन को बढ़ावा दें। अगली पीढ़ी निश्चय ही आपके इस बेशकीमती तोहफे की कद्र करेगी।
बदलाव के लिए उम्र, शिक्षा और स्थान बाधा नहीं होते। बुरे हालातों में किसी समस्या को सुलझाने के लिए मदद का इंतजार करने से बेहतर है कि बदलाव लाया जाए।
अगली पीढ़ी में धरती को बचाने और खुद को शिक्षित करने जैसी एकदम नई संस्कृति विकसित करना भी दान उत्सव का हिस्सा है।
—इसी पुस्तक से
—1—
ये सूत्र हैं ऐसे 75 रियल हीरोज के प्रेरणाप्रद जीवन का निचोड़, जिन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ समाज को दिया। अपने कर्तृत्व में दूसरों को दिशा दी और सफलता का मार्ग प्रशस्त किया।
आज के निराशा भरे समय में पथ-प्रदर्शक नायकों की प्रेरणाप्रद कहानियाँ।

Bahaav by Himanshu Dwivedi

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बहाव

वे दिन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, जब किसी अगस्त्य को अपने विचार और वाणी को दिक्दिगंत तक फैलाने के लिए पूरा-का-पूरा समुद्र पी जाना पड़ता था। फाह्यान या अलबरूनी की तरह अब यात्राएँ करने और उन्हें लिपि में सँजोने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती। आप देख रहे हैं कि यह धरती एक ग्लोबल विलेज में तब्दील होती जा रही है और देशों की दूरियाँ हवाईजहाजों में सिमटकर रह गई हैं। ऐसे बहुत से लोग दिखाई पड़ते हैं, जो सुबह का नाश्ता एक देश में करते हैं और रात का भोजन दूसरे देश में। फिर भी यात्राओं ने अपना रोमांच नहीं खोया है और घुमक्कड़ी की इनसानी प्रवृत्ति कुछ नया देखने के लिए बेताब रहती है। युवा संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के यात्रा-संस्मरणों की यह पुस्तक ‘बहाव’ इसका जीता-जगता उदाहरण है।
इस पुस्तक में जापान, थाईलैंड, अमरीका, पाकिस्तान, ग्रीस, दक्षिण कोरिया, पोलैंड, जर्मनी, ब्राजील जैसे देशों की यात्रा के अनुभव हैं। इस पुस्तक की खास बात यह है कि इसमें हिमांशु की आँखों से देखी हुई दुनिया के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के दो राजनेताओं की विदेश यात्राओं के अनुभव भी हैं। राजनेताओं ने जिस तरह अपनी विदेश यात्राओं का जिक्र हिमांशु से किया, उसे उन्होंने अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत किया। इस पुस्तक में ये दोनों अनुभव गुँथे हुए हैं।
यह पुस्तक सुधी पाठकों को दुनिया को देखने का एक नया नजरिया, दुनिया के तमाम देशों के साथ भारत के रिश्तों को समझने की समझ तो देगी, साथ ही अपनी जीवंत भाषाशैली के कारण उन्हें उस देश में ही पहुँचा देगी।

Bahar Main Main Andar by Shri Amit Srivastava

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अमित इधर कविता के इलाके में कदम रखनेवाले प्रतिभावान युवा हैं। ‘बाहर मैं…मैं अंदर…’ उनका पहला संग्रह है। दो हिस्से हैं इसके, जिसमें ‘मैं अंदर’ की शीर्षकविहीन कविताएँ हैं, वह कवि का आत्म है, उसका व्यक्तित्व ही उन कविताओं का शीर्षक हो सकता था। इस ‘अंदर’ में छटपटाहट बाहर के दबावों की भी है। इस अंदर में वह खुद अपना ईश्वर है। हमारे भीतर के कई हमों को व्यक्त करती ये कविताएँ सामाजिक बयानों से उतनी दूर भी नहीं, जितना कवि ने अपने आमुख में बताया है। वहाँ उसे हिचकियाँ आती हैं, वहाँ फूटती बिवाइयों को बिना किसी दया के आग्रह के वह न सिर्फ एक नमकीन निराशा के साथ रहने देना चाहता है, बल्कि चाकू लेकर छीलने भी बैठ जाता है।
‘बाहर’ की कविता में अमरीका की दादागिरी के नाम एक क्षोभ पत्र है। कश्मीर से एक हालिया मुलाकात का ब्योरा है, जिसमें कश्मीरियों की गरीबी, झील की झल्लाहट और उस सुंदर प्रकृति की बेबसी के कई दुःखद बिंब हैं—यहाँ कश्मीर एक बेवा है, जो पानी के पन्ने पर तारीखें काढ़ा करती है और एक नाव वाला पूछता है कि अपने बच्चों को खाना किसे अच्छा लगता है…संग्रह में ऐसी और कितनी ही कविताएँ हैं, जो बताती हैं कि कवि जब बाहर होता है तो उसका तआल्लुक वैचारिक संघर्ष के किस संसार से है—पाठक स्वयं उनमें
प्रवेश करेंगे।
अमित की कविताओं में दर्ज अनुभव और विचार भरोसा दिलाते हैं कि यह युवा लंबे सफर पर निकला है। अमित की कविता कहीं से भी समतल में चलने की हामी नहीं लगती, वह भरपूर जोखिम उठाती है।
—शिरीष कुमार मौर्य

Bahata Pani by Aabid Surti

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मुसलमान पछता रहे थे। गुमनाम अजनबी बेगम शबाना की खोज होते हुए भी काफिरों ने उस पर हिंदू नाम थोप अपना अधिकार जता दिया था। क्या कोई ऐसी तरकीब नहीं सोची जा सकती कि आनंदीलाल अवतार घोषित हो, उससे पहले मोमिन घोषित हो जाए? गाँव के पुरोहित माखनलाल ने जरी के किनारेवाली धोती के पल्लू से चेहरे को हवा देते हुए सोचा, अब अधिक देर भली नहीं। यही अवसर है उसे कृष्णावतार घोषित कर बरगद तले के जमघट से उड़ा ले जाने का, मगर उनकी मुराद उनके मन में ही जलभुनकर राख हो गई। स्याह चोगे पर सुनहरी हरी पगड़ी बाँधे मुसलमानों के रहबर जनाब रब्बानी ‘मुल्ला’ ने ऐसी टाँग अड़ा दी कि चौराहेचौपाल पर फुसफुसाहट शुरू हो गई—‘मूलत : आनंदीलाल मुसलमान है।’ अब करो तहकीकात और उतारो ससुरे का पायजामा!
वह कुलियों और रिक्शा चालकों की मंडली में बैठ चरसगाँजे के दम लगाता था, शराब के नशे में धुत् होकर शोरशराबा करता, ऊधम मचाता और पिटता था। उसने एक साल की सजा भी काटी थी। ये सब जानकर यकीनन आपके मनमस्तिष्क में किसी लुच्चेलफंगे, आवारा, भ्रष्ट, पाखंडी शख्स की छवि उभरी होगी। क्षमा करें, वह इस दौर का मसीहा है। उसका नाम है आनंदीलाल ‘मौजूद’। ‘बहता पानी’ उसी रमता जोगी के रंगीन जीवन की दास्तान है।

Bahuaayami Jeevan Ke Dhani : Pt. Gopal Prasad Vyas by Dr. Santosh Matta

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स्वनिर्मित व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी पंडित गोपाल प्रसाद सच्चे अर्थों में हिंदीसेवी थे। व्यासजी महात्मा गांधी के आदेश से ही स्वाधीनता आंदोलन में न कूदकर ‘कलम के धनी’ बने और दिल्ली में ‘हिंदी भवन’ निर्माण के लिए राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडनजी से की गई प्रतिज्ञा को पूर्णता तक पहुँचाया।
ब्रजभाषा के सीमित प्रदेश से निकल खड़ी बोली में भी गद्य और पद्य विधाओं में सिद्धहस्त व्यासजी ने खूब लिखा। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा, साहित्य, समस्त भारतीय भाषाओं तथा शिक्षासंस्कृति के बहुआयामी विकास हेतु साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों के कार्यान्वयन हेतु विशाल सभागार तथा साहित्यकार सदन का सपना साकार कर ‘हिंदी भवन’ निर्माण के केंद्रबिंदु बने। राजधानी दिल्ली में हिंदी की पताका फहरानेवाले वे हिंदीभवन की नींव बन सर्वदा के लिए हिंदी का पथ प्रशस्त कर गए। सच ही तो है—‘जयन्ति ते सुकृतिनः येषां यशःकाये जरामरणजं भयं नास्ति’। निश्चित ही उनकी यशकाया सभी भारतीय भाषाओं को उन्नति के शिखर पर पहुँचाती रहेगी।
सच्चे देशभक्त, कलम के सिपाही, निस्स्वार्थी, दृढ़संकल्प के धनी, प्रतिभासंपन्न और मनीषी पंडित गोपाल प्रसादजी का जीवनचरित इस लघु पुस्तक के माध्यम से सदैव गतिशील रहने की प्रेरणा देता है।