Hindi Literature
Showing 2201–2250 of 6561 results
Shramana Shabari Ke Ram by Mahakavi Avadhesh
जब न बेर कुछ बचे राम ने लखा निकट का कोना,
देखा क्षत-विक्षत बेरों का पड़ा दूसरा दोना।
बोले वह भी लाओ भद्रे! वे क्यों वहाँ छिपाए,
होंगे और अधिक मीठे वे लगते शुक के खाए।
उठा लिया था स्वयं राम ने अपना हाथ बढ़ाकर,
तभी राम का कर पकड़ा था श्रमणा ने अकुलाकर।
प्रभु! अनर्थ मत करो, लीक संस्कृति की मिट जाएगी,
जूठे बेर भीलनी के खाए, दुनिया गाएगी।
हुआ महा अघ यह मैंने ही चख-चखकर छोड़े थे,
जिस तरु के अति मधुर बेर थे, वही अलग जोड़े थे।
किंतु किसे था भान, प्रेम से तन-मन सभी रचा था,
कहते-कहते बेर राम के, मुख में जा पहुँचा था।
छुड़ा रही थी श्रमणा, दोना राम न छोड़ रहे थे,
हर्ष विभोर सारिका शुक ने तब यों वचन कहे थे।
जय हो प्रेम मूर्ति परमेश्वर, प्रेम बिहारी जय हो,
परम भाग्य शीला श्रमणा भगवती तुम्हारी जय हो।
—इसी महाकाव्य से
——1——
रामायण में प्रभु की भक्त-वत्सलता और भक्त की भक्ति की मार्मिक कथा की नायिका श्रमणा पर भावपूर्ण महाकाव्य।
Shravan Kumar Ki Prerak Kathayen by Kumar Praphull
प्रस्तुत पुस्तक माता-पिता के अनन्य भक्त श्रवण कुमार के जीवन पर आधारित है। श्रवण के जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी िशक्षाप्रद कहानियों में एक श्रेष्ठ, होनहार, कर्तव्यनिष्ठ तथा धर्मपालक पुत्र की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। श्रवण कुमार केवल मातृ-पितृभक्त ही नहीं अपितु एक संस्कारी, ज्ञानी, निष्ठावान, साधु, संत एवं गुरुओं का आदर-सत्कार करने में भी आगे रहता था। दयालुता तथा सेवा की भावना उसके मन में कूट-कूटकर भरी थी। अतः पुस्तक में ऐसी अनेक कहानियों को सरल भाषा एवं चित्रों के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, जो एक बालक को संस्कारी, निष्ठावान, दयालु, माता-पिता तथा गुरुओं की सेवा के लिए प्रेरक रहेंगी।
Shreshtha Bal Kahaniyan by Sudha Murthy
बच्चों का मस्तिष्क कोरी स्लेट की तरह होता है। यह कहानियाँ उन बच्चों को लक्ष्य पर लिखी गयी हैं, जो अबोध आयु को पार कर किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे है। प्रस्त्तुत संकलन में संकलित कहानियाँ मानवीय स्वभाव के सदगुणों-अवगुणों और भावनाओं, जैसे – ईर्ष्या, छल, दूसरों की सहायता, कंजूसी आदि पर आधारित है।
Shreshtha Hasya Vyangya Geet by Prem Kishore ‘Patakha’
श्रेष्ïठ हास्य-व्यंग्य गीत
आज परिवार में, समाज में, देश में, विश्व में—अर्थात् हर तरफ इतनी विसंगतियाँ व विडंबनाएँ बिखरी हुई हैं कि मनुष्य का हँसना दूभर हो गया है। नाना प्रकार के तनाव, चिंताएँ आज इनसान को घेरे हुए हैं। अजीब भाग-दौड़ हो रही है। विकट आपा-धापी मची हुई है। सबकुछ बाजार हुआ जाता है। ऐसे माहौल में गीत में यह सामर्थ्य है कि वह उदास चेहरों पर ठहाकों के फूल खिला दे। और कटाक्ष करने पर उतरे तो क्या नाते-रिश्तेदार, क्या नेता-अभिनेता, क्या कर्मचारी-अधिकारी—यानी परिवार-समाज, देश-विश्व का कोई ऐसा सदस्य नहीं, जो गीत के व्यंग्य-बाणों से बच सके। बुराइयों पर बड़े सलीके से वार करते हैं ये श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत।
Shreshthata Ki Ore Bharat by Nimisha Gaur
मेरा देश बदल रहा है भारत वर्ष के युगांतकारी परिवर्तनों से ओतप्रोत ज्वलंत मुद्दों का संकलन है, जिसमें भारत के सर्वसमावेशी विकास की समकालीन परिस्थितियों का तथ्यात्मक विश्लेषण किया गया है। दुनिया के विशालतम लोकतंत्र में मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित शोषित गरीब-मध्यम वर्ग कृषि प्रधान देश और लोकतंत्र में हावी तंत्र से पीडि़त देश को 30 वर्षों बाद 2014 में संपूर्ण बहुमत मिला। आजादी के सात दशकों बाद वर्तमान सरकार ने सबको साथ लेकर चलनेवाली विकास की मूल भावना से ‘सबका साथ सबका विकास’ को धरातल पर चरितार्थ किया है।
गाँवों के देश भारत के पुनर्निर्माण में अंत्योदय की आवाज का महत्त्व बिना ऊँच-नीच के भेदभाव से किया जाने लगा है, जिसमें सामाजिक न्याय व आर्थिक मापदंडों को सार्थक करते हुए योग्यता के आधार पर शिक्षा और रोजगार के अवसर हर जन को उपलब्ध कराए गए। उक्त पुस्तक में विभिन्न विषयों पर लिखे गए लेख यू.पी.ए. के 55 वर्ष के शासनकाल का एन.डी.ए. के 5 वर्ष के शासनकाल में लिये गए मजबूत निर्णयों के परिणामों का विश्लेषण है।
आज देशवासियों की लोकतंत्र के प्रति आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने में विकासशील से विकसित भारत के निर्माण की यात्रा में महत्त्वपूर्ण पड़ाव पर हम पहुँच चुके हैं, जिसमें एन.डी.ए. के शासनकाल में डिजिटल अभियान को सामाजिक आंदोलन बनाने से गरीबी उन्मूलन के निर्णायक दौर पर करोड़ों भारतीयों के गरीबी में जीवन व्यतीत करना अब अंतिम पड़ाव की ओर है।
Shri Guru Nanak Devji by Dr. Kuldeep Chand Agnihotri
प्रस्तुत पुस्तक में दशगुरु परंपरा के प्रथम गुरु श्री नानक देवजी के बहुपक्षीय व्यक्तित्व का सारगर्भित अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। नानक देवजी की कर्मसाधना, भक्तिसाधना और ज्ञानसाधना का फलक अत्यंत विशाल है। नानक को जानने के लिए, नानक को अपने भीतर अनुभव करना होगा। उन वीरान बियावानों की मानसिक यात्रा करनी होगी जिनकी नानक देवजी ने यथार्थ में यात्रा की थी। सुदूर दक्षिण में धनुषकोटि के किनारे विशाल सागर की उत्ताल लहरों को देखते हुए, उनमें श्रीलंका को जा रहे नानक देव की छवि को अपने मुँदे नेत्रों से देखना होगा। नानक को जानने का यही अमर नानक-मार्ग है। इस पुस्तक में लेखक ने यही करने का प्रयास किया है। नानक देवजी को समझने-बूझने के लिए, उस कालखंड की सभी परतों को उन्होंने एक-एक कर अनावृत्त किया है। यह पुस्तक किसी एक ढर्रे से बँधी हुई नहीं है, बल्कि नानक देवजी के विविधपक्षीय जीवन के ताजा स्नैप्स हैं। इसलिए इस अध्ययन में एक ताजगी है; ताजा हवा के एक झोंके का अहसास। गुरु नानक देवजी से शुरू हुई इस यात्रा के अंतिम अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते, रास्ते के सभी पड़ावों की अविछिन्नता एवं वैचारिक निरंतरता को पुस्तक के अंतिम अध्याय में इंगित किया गया है। पुस्तक की उपादेयता विविध प्रसंगों की नवीन युगानुकूल व्याख्या में है।
Shri Guruji : Prerak Vichar by Sandeep Dev
विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ आध्यात्मिक विभूति थे।
सन् 1940 से 1973 तक करीब 33 वर्ष संघ प्रमुख होने के नाते उन्होंने न केवल संघ को वैचारिक आधार प्रदान किया, उसके संविधान का निर्माण कराया, उसका देश भर में विस्तार किया, पूरे देश में संघ की शाखाओं को फैलाया। इस दौरान देश-विभाजन, भारत की आजादी, गांधी-हत्या, भारत व पाकिस्तान के बीच तीन-तीन युद्ध (कश्मीर सहित) एवं चीन का भारत पर आक्रमण जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के भी साक्षी बने और उस इतिहास-निर्माण में लगातार हस्तक्षेप भी किया।
श्रीगुरुजी सही मायने में न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सारथि थे, बल्कि बँटवारे के समय वे पाकिस्तानी हिस्से के उस हिंदू समाज के उद्घाटक की भूमिका में भी थे, जिसे बँटवारे से उपजे सांप्रदायिक उन्माद से जूझने के लिए तत्कालीन सरकार ने बेबस छोड़ दिया था।
यह पुस्तक श्रीगुरुजी के त्यागपूर्ण प्रेरणाप्रद जीवनी के साथ ही उनके ओजस्वी विचारों का नवनीत भी है।
Shri Nanda Devi Rajjat by Kanti Ballabh Kuniyal
कान्ति बल्लम कुनियाल
जन्म : 7 जनवरी, 1964 को ग्राम -मल्ला, पो. ऑ. -ल्वाणी वाया देवाल तहसील- थराली, जिला-चमोली ( उत्तराखण्ड) में ।
कृतित्व : उत्तराखण्ड शोध संस्थान, दिल्ली इकाई के संयोजक ( अवैतनिक); शोध एवं पटकथा पर वृत्तचित्र ‘ उत्तराखण्ड का जनान्दोलन ‘ का निर्माण; हिमालयी संस्कृति एवं पर्यावरण के उन्नयन संवर्द्धन एवं संरक्षण के लिए निरन्तर प्रयत्नशील । ट्रेकिंग एवं प्रकृति भ्रमण को बढ़ावा देने के लिए रूपकुण्ड गाइड एवं पोर्टर्स सोसाइटी, लोहाजंग (चमोली) के अवैतनिक सचिव के रूप में सक्रिय । हिन्दी, संस्कृत, गढ़वाली, कुमाऊँनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए संघर्षरत ।
सम्मान : 1997 में ‘ आगे बढ़ो-रेल जवान ‘ ( कविता) के लिए क्षेत्रीय प्रशिक्षण केन्द्र चन्दौसी द्वारा प्रशस्ति पत्र; साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए सन् 2006 में ‘ हिमालय और हिन्दुस्तान अवार्ड ‘ । उत्तराखण्ड आन्दोलन पर पहले वृत्तचित्र उत्कृष्ट शोध एवं लेखन के लिए सम्मानित ।
सम्प्रति : भारतीय रेलवे में सेवारत ।
Shriguruji Kavyanjali by Shri Yogesh Chandra Verma ‘Yogi’
‘श्रीगुरुजी-काव्यामृत’ विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचलित नाम ‘आर.एस.एस.’, लघु नाम ‘संघ’ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य ‘श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर’ उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवनवृत्त को खंडकाव्य में वर्णित करने का एक लघु प्रयास है।
संघ की स्थापना परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सन् 1925 में नागपुर प्रांत में की थी। सन् 1940 में प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के देहावसान के पश्चात् श्रीगुरुजी द्वितीय सर संघचालक बने।
संघ के अंकुरित पौधे को अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व की खाद-पानी देकर उसे वटवृक्ष के समान उसकी जड़ों और शाखाओं का विस्तार करनेवाले महनीय ‘श्रीगुरुजी’ ही थे। सरसंघचालक का दायित्व ग्रहण करने से लेकर जून 1973 में मृत्युपर्यंत उन्होंने संघ में अनेक सोपान जोड़े। आधुनिक भारत के इतिहास में यह कालखंड निर्णायक रहा है, जब बँटवारे की विभीषिका के बीच सन् 1947 में यह देश स्वतंत्र हुआ, किंतु कुछ समय पश्चात् ही गांधी-हत्या का जघन्य अपराध भी हो गया। इसके पश्चात् संघ को बलि का बकरा बनाते हुए प्रतिबंधित कर कुचलने का प्रयास भी किया गया। परंतु जिस प्रकार संघ को इस भीषण कुठाराघात व घृणित दोषारोपण से निकालते हुए ‘श्रीगुरुजी’ ने समाज के विविध क्षेत्रों में अपने अनेक आनुषांगिक संगठन खड़े किए, वह उनकी अद्भुत अद्वितीय संगठन क्षमता को प्रकट करता है। ऐसे विराट् संगठनकर्ता के व्यक्तित्व व कृतित्व का वर्णन सरल, सुगम्य, सुबोध खंडकाव्य में कर पाने जैसे दुष्कर कार्य में रचयिता कितना सफल हुआ है, इसकी समीक्षा आप सुधी पाठकों को करनी है।
Shuddha Jeevan Jeene Ke Mantra by Brahma Kumaris
आध्यात्मिक मूल्यों से रहित जीवन कुछ ऐसा ही है, मानो हम कोई अनाथ बालक हों; हम स्वयं को असुरक्षित, प्रेम से रहित तथा अवांछित मान बैठते हैं। मूल्य हमारे ‘माता-पिता’ हैं। मनुष्य की आत्मा इसके द्वारा पोषित मूल्यों से सिंचित होती है। जब हम अपने मूल्यों के अनुसार जीते हैं तो इससे एक सुरक्षा व सहजता का भाव उपस्थित होता है। मूल्य हमें स्वतंत्रता और आजादी देते हैं, आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्रदान करते हुए बाहरी प्रभावों से मुक्त करते हैं। आत्मा के भीतर सत्य को जानने तथा सत्य के पथ का अनुसरण करने की योग्यता विकसित होती है।
मूल्य व्यक्ति के हृदय के बंद द्वार खोलकर मनुष्य की प्रकृति को रूपांतरित कर देते हैं, ताकि उसका जीवन करुणा एवं विनय से ओत-प्रोत हो जाए।
जब व्यक्ति अपने भीतर मूल्यों को विकसित कर लेता है तो अपने आसपास के संसारों में भी उन मूल्यों की महक फैला देता है, ताकि सभी एक बेहतर जगत् की ओर आगे बढ़ सकें। शुद्ध-सात्विक भाव से जनकल्याण एवं मानवहितार्थ सेवारत ब्रह्माकुमारियों के प्रेरक जीवन से उपजे ‘शुद्ध जीवन जीने के मंत्र’ जो हर पाठक के हृदय को आध्यात्मिक आनंद से समृद्ध कर देंगे।
Shukriya by Sanjay Sinha
संजय सिन्हा की पुस्तक बहुत से लोगों की ज़िंदगी में उजाला भर सकती है। छोटे-छोटे प्रसंगों से बड़ी गहरी बातें संजय ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट की हैं। आज व्यक्ति संवेदना शून्य हो चुका है क्योंकि वो रिश्ते भूल गया है। रिश्ते नहीं हैं तो ज़िंदगी कैसे जी पाएँगे? इसलिए समय की कीमत पहचानिए और दिलों में उम्मीद का दीपक जलाइए।
—इंडिया टुडे
ये दास्तानें हैं हमारी-आपकी ज़िंदगी की, कुछ खट्टी, कुछ मीठी, तो कुछ हैरान-परेशान कर देने वाली। पर हैं सच। ऐसे ही सच से आपको रूबरू कराया है लेखक ने। आपसी रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने को उजागर करती ये दास्तानें काफी दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गई हैं और इनमें पाठकों को हद दर्जे का अपनापन नज़र आता है।
—नवभारत टाइम्स
अपनी पुस्तक में संजय सिन्हा ने तमाम अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने रिश्तों की कई कहानयों को अपनी किताब में बहुत बारीक निगाहों से तराशा है। संजय ने अपने अनुभव की कहानियों को बहुत ही दिलचस्प अंदाज़ में लिखा है। कई मायनों में इनकी पुस्तक एक प्रयोग की तरह है।
—जनसत्ता
Shwet Patra by Viveki Rai
श्वेत पत्र’ सन् 1942 के जनांदोलन और बलियागाजीपुर जनपद तथा बिहार के सीमावर्ती भोजपुरी अंचल के तत्कालीन गुप्त आंदोलन के प्रामाणिक इतिहास पर आधारित, उद्वेलित मानसिकता की संपूर्ण पकड़ से परिपूर्ण ऐसी कलाकृति है, जिसमें व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन और गाँवों में फैले क्षेत्रीय आंदोलन का कहीं अभिन्न और कहीं समानांतर चित्रण है।
तत्कालीन स्थिति के कुछ सर्वथा नए तथ्यों को उजागर करता ‘श्वेतपत्र’ अर्थात् आजादी का ऐतिहासिक दस्तावेज प्रस्तुत करता है। जयप्रकाश, लोहिया आदि के उन महत्त्वपूर्ण, प्रामाणिक बुलेटिनों, पैंफलेटों, पर्चों और गुप्त पत्रों को, जिनको सही मायने में अस्त्र बनाकर जनता स्वयं अपनी लड़ाई लड़ती है, गाँव के किसानमजदूर, अध्यापकविद्यार्थी और किसानसरदार लड़ते हैं।
लेखक का दावा है—उन पैंफलेटों आदि का मूल रूप उसके पास सुरक्षित है और इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम का एक सहीसही तथा रचनात्मक रूप उभर आता है ‘श्वेतपत्र’ में। अत्यंत रोचक, सनसनीखेज, प्रभावशाली, प्रेरणाप्रद और आज की राष्ट्रीय स्थितियों के पुनर्मूल्यांकन योग्य अनेक अछूते आयामों से परिपूर्ण।
Shyam Ki Maa by Sane Guruji
वर्ष 195060 के दशक में भारत की जिस पीढ़ी ने अपनी उम्र का पहला डेढ़ दशक पूरा किया था, उनमें से आज का कोई वरिष्ठ नागरिक ऐसा नहीं होगा, जिसने बचपन में साने गुरुजी की मराठी में लिखी ‘श्यामची आई’ पुस्तक पढ़ी नहीं होगी। साने गुरुजी के ‘श्यामची आई’और ‘मीरी’ जैसे मराठी में लिखे उपन्यास पढ़कर जिसकी आँखें नम न हुई हों, ऐसे व्यक्ति कम ही होंगे। बेहद सरल, मार्मिक, दिल को छू लेनेवाली भाषा साने गुरुजी की विशेषता है।
कहा जा सकता है कि माँ की प्रेममय और महान् सीख का सरल, सहज और सुंदर शब्दों में किया गया चित्रण, हमारी संस्कृति का एक अनुपमेय कथात्मक चित्र, एक कारुणिक कथावस्तु यानी ‘श्याम की माँ’! खुद गुरुजी कहते हैं कि मन का पूरा अपनापन मैंने इस कथा में उडे़ला है। ये कहानियाँ लिखते हुए सौ बार मेरी आँखें नम हुईं। दिल भर आया। मेरे हृदय में माँ के बारे में जो अपार प्रेम, भक्ति और कृतज्ञता का भाव है, वह ‘श्याम की माँ’ पढ़कर अगर पाठकों के मन में भी उत्पन्न हो तो कहा जा सकता है कि यह कृति लिखना सार्थक हुआ।
अपने बच्चों से अपार प्रेम करनेवाली, वे सुंसस्कारी बनें, इसलिए जीजान से कोशिश करनेवाली, लेकिन संस्कारों की अमिट छाप उपदेश रूपी दवा की खुराक के रूप में नहीं, बल्कि अपने बरताव से और रोजमर्रा के छोटेछोटे प्रसंगों के जरिए बच्चों के मन पर छोड़नेवाली, अनुशासन का महत्त्च बताते हुए प्रसंगानुसार कठोर बननेवाली यह आदर्श माँ आज की उदयोन्मुख पीढ़ी के लिए ही नहीं, वरन् उनके मातापिता के लिए भी निश्चित रूप से प्रेरक साबित होगी।
Shyam, Phir Ek Bar Tum Mil Jate! by Dinkar Joshi
दौड़कर उसने कृष्ण के पाँव से तीर खींचने के लिए हाथ बढ़ाया । कृष्ण उसकी व्यग्रता को निमिष- भर ताकते रहे, फिर निषेध में दाहिना हाथ उठाया ।
जरा ठिठक गया- ” क्यों, नाथ, क्यों?”
” रहने दो, भाई! माता गांधारी के वचन में व्यवधान बनने का व्यर्थ प्रयत्न मत करो!” बड़ी धीरता से वे बोले ।
” मैंने महापातक किया है! मुझे क्षमा करो, नाथ! मैंने.. .मैंने आपको जंगली प्राणी समझकर आप पर तीर चलाया । यह मैंने क्या किया, नाथ!” जरा भूमि पर लोटकर करुण क्रंदन करने लगा ।
” उठो वत्स!” करुणार्द्र स्वर में कृष्ण बोले, ” तुम्हारा नाम क्या है?”
” मेरा नाम ?. .जरा ! ”
” जरा !. .ठीक!” कृष्ण का मधुर हास्य छलका । तलवे से बहकर रक्तधारा भूमि पर काफी दूर चली गई थी । ” जरा, तुम्हारा नाम सार्थक है, तात ! ‘ जरा ‘ कभी किसीको नहीं छोड़ती ! अमरत्व के अभिशाप ने जिसे घेरा हो, उसे भी महाकाल जरा समेट ही लेता है न! जरा, तू तो निमित्त मात्र है, वत्स!”
– इसी उपन्यास से
कोई भी भारतीय भाषा ऐसी नहीं है जिसमें श्रीकृष्ण को केंद्र में रखकर काव्य, कहानी, उपन्यास. नाटक, संदर्भ-ग्रंथ आदि साहित्य का सर्जन न किया गया हो । ‘ श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते ‘ (मूल गुजराती में लिखा) उपन्यास इन सबसे अनूठा इसलिए है कि यह सिर्फ उपन्यास नहीं है-यह तो उपनिषद् है! यथार्थ कहा जाए तो यह उपनिषदीय उपन्यास है ।
तत्कालीन आर्यावर्त्त में श्रीकृष्ण एक विराट् व्यक्तित्व था । जब यह व्यक्तित्व अनंत में विलीन हो गया तो जो सन्नाटा छा गया, उस सन्नाटे के चीत्कार का यह आलेखन है जब श्रीकृष्ण सम्मुख थे तब बात और थी जब वे विलीन हो गए तब वसुदेव-देवकी से लेकर अर्जुन, द्रौपदी, अश्वत्थामा, अक्रूर उद्धव और राधा पर्यंत पात्रों की संभ्रमिद मनोदशा को एक अनूठी ऊँचाई के ऊपर ले जाता है यह उपन्यास ।
Siddha Sant Aur Yogi by Shambhuratna Tripathi
इतिहास पर दृष्टि डालने पर कुछ शक्तियाँ सहज ही लक्ष्य की जा सकती हैं। यथा, सामरिक शक्ति, आर्थिक शक्ति, जनसमूह के संगठन की शक्ति, लेकिन जो शक्तियाँ वस्तुतः पृथ्वी को धारण करती हैं, वे साधारणतः प्रत्यक्षगोचर नहीं होती हैं। परंतु ऐसा भी नहीं है कि वे कभी हमारे सामने आती ही नहीं हैं। करुणावश, वे हमारे क्रियाकलाप में इस प्रकार हस्तक्षेप करती हैं कि हम उनको इस धरातल पर देख सकें। तोटकाचार्य अपने स्तोत्र में लिखते हैं—जगतीमवितुं कलिताकृतयो विचरन्ति महामहसश्छलतः। जगती की रक्षा करने हेतु महान् विभूतियाँ छद्म-शरीर धारण करके विचरण करती हैं। इन विभूतियाँ का संपर्क, इनके स्पर्श, इनकी वाणी, व इनके कटाक्ष सभी अभ्युदय हेतु होते हैं।
‘सिद्ध संत और योगी’ ऐसी विभूतियों के चिंतन व जीवनचरित का परिचय प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक एक संकलन के रूप में जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत रोचक है, पर दूसरी ओर इसमें चर्चित अधिकांश महात्माओं की जीवंत शिष्य-परंपराएँ विद्यमान हैं, जहाँ आर्त्त व जिज्ञासु आश्रय अथवा मार्गदर्शन हेतु जा सकते हैं। आसन्न संकटों से निबटने के लिए मानवजाति के सम्मुख चेतना के उन्नयन के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं है; इस पुस्तक में संकलित लेख कदाचित् इसी आशय से लिखे गए थे।
Sikandar Mahan by Rasik Bihari
अलेक्जेंडर थर्ड ऑफ मकदूनिया को अलेक्जेंडर द ग्रेट या सिकंदर महान् के नाम से जाना जाता है। उसने दस साल के अंदर दुनिया का नक्शा बदलकर रख दिया और यूनान से एशिया तक के एक बडे़ भू-भाग का राजा बन गया।
जुलाई 356 ईसा पूर्व में जनमे सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय मकदूनिया के राजा थे। 336 ईसा पूर्व में फिलिप की हत्या के बाद 20 साल के सिकंदर को एक अशांत राज्य वसीयत में मिला। उसने जल्दी ही अपने सभी दुश्मनों को ठिकाने लगा दिया और ग्रीस में अपना एक प्रभुतासंपन्न राज्य स्थापित किया। इसके बाद उसकी राज्य-विस्तार की भूख बढ़ गई।
अगले आठ सालों में सिकंदर ने 11,000 मील आगे तक अपनी सेना का नेतृत्व किया और 70 बडे़ शहरों और तीन महाद्वीपों को पार करते हुए उत्तर भारत में पंजाब तक आ पहुँचा।
अरस्तू का यह महान् शिष्य तूफान की तरह बड़ी-से-बड़ी बाधा को पार करता रहा, लेकिन मामूली से बुखार से पार नहीं पा सका और इसने बेबीलोन में 323 ईसा पूर्व में उसकी जान ले ली। अपने 33 साल के जीवन में सिकंदर ने कभी आराम नहीं किया। आराम और सुस्ती उसके शब्दकोश में नहीं थे। शूरवीर और नीतिज्ञ सिकंदर महान् का जीवन सदा कर्मकरने की प्रेरणा देता है।
Sikh Guru Gatha by Jagjeet Singh
भारत की सामाजिक एकता, उत्थान तथा राष्ट्रीय निर्माण में सिख गुरुओं का अमूल्य योगदान रहा है। प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव से लेकर दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह तक सभी दस गुरुओं का जीवनकाल कुल 239 वर्षों का रहा। इस दौरान सिख गुरुओं ने पंजाब तथा पंजाब से बाहर व्यापक भ्रमण किया और अपने उपदेश तथा व्यावहारिक जीवन द्वारा समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर उसकी दशा और दिशा ही बदल दी। आधुनिक युग का कोई भी ऐसा ज्वलंत मुद्दा नहीं, जिस पर सिख गुरुओं ने मानवमात्र को संदेश अथवा उपदेश न दिया हो। पंजाब में नए शहरों तथा जलस्रोतों आदि का निर्माण करके गुरुओं ने धर्म को विकास के साथ जोड़ा। राष्ट्र के गौरव और धर्म की रक्षा का प्रश्न आया तो छठे एवं दसवें गुरुओं ने न केवल शस्त्र धारण किए और अत्याचारी हुकूमत के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़े बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे।
प्रस्तुत कृति ‘सिख गुरु गाथा’ सिख गुरुओं के त्याग-तपस्यामय, बलिदानी, आदर्श व प्रेरक जीवन पर प्रकाश डालने के साथ ही उनका संपूर्ण जीवन-वृत्त प्रस्तुत करती है।
Sim Card by Usha Verma
एक हफ्ते बाद रात आठ बजे होंगे कि टेलीफोन की घंटी बजी, ‘‘क्या मैं मिसेज नारायन से बात कर सकती हूँ।’’ ‘‘जी हाँ, मैं मिसेज नारायन बोल रही हूँ। आप कौन हैं?’’ ‘‘मैं पुलिस स्टेशन से बोल रही हूँ। आप वसुधा खन्ना को जानती हैं। वह कह रही है कि वह आपके पास रह सकती है।’’ ‘‘जी हाँ, क्या बात है?’’ ‘‘वह अपने घर में नहीं रह सकती, उसे या तो पुलिस के किए इंतजाम में रहना होगा या वह आप के पास रह सकती है।’’ मैंने कहा, ‘‘मेरे पास रह सकती है, आप ले आइए।’’ वसुधा के आने के बाद पुलिस वुमन ने बताया कि वसुधा ने आज करीब तीन बजे सौरभ के एक-एक कपड़े, कमीज, पैंट, टाई, कैमरा, लैपटॉप, फोटो अलबम, तमाम सीडी, वीडियो, घड़ी, मोबाइल फोन सब कुछ गार्डन में फेंक दिए और सब में आग लगा दी।
—इसी संग्रह से
मानवीय संवेदना और सरोकारों के ताने-बाने में बुनी ये मर्मस्पर्शी कहानियाँ पाठकों को झकझोरेंगी और उन्हें ये अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं-पात्रों का सहसा स्मरण करा देंगी।
Simmi Harshita Ki Lokpriya Kahaniyan by Simmi Harshita
‘तुम्हारी भाषा अद्भुत है। तुम्हारी शैली अद्भुत है।’
—मन्नू भंडारी
सिम्मी हर्षिता की हर कहानी अपने आप में संपूर्णता का एहसास लेकर आती है। सुधी पाठक केवल कहानी पढ़ता ही नहीं है, उसकी हर स्थिति के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। सिम्मी हर्षिता की कहानी पढ़ना ऐसा है, जैसे ठंडे शर्बत को एक-एक घूँट पीना और हर घूँट के साथ उसका स्वाद लेना।
—डॉ. महीप सिंह
‘बनजारन हवा’ कहानी में तुमने भाषा का बहुत ही प्रभावी रूप प्रयोग किया है।
—राजेंद्र यादव
सिम्मी हर्षिता की कहानियाँ कथ्य की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण हैं ही किंतु वे कथन-भंगिमा की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण और आकर्षक हैं। वे इस कौशल से कहानी कहती हैं कि कहीं भी अति नहीं होती। इन कहानियों को उनकी कथन-भंगिमा और अच्छे गद्य के लिए भी पढ़ा जा सकता है। अच्छा गद्य लिखना आसान काम नहीं है। इसलिए तो ‘गद्यं कवीना निकषं’ कहा गया है। उनके गद्य में काव्यात्मकता है और यहाँ से वहाँ तक प्रसृत वाग्वैदग्ध्य है, जिसमें परिहास भी है और व्यंग्य भी। उनके गद्य में एक क्रीडा-भाव सर्वत्र विद्यमान है। यह क्रीडा-भाव कहानियों के पात्रों के प्रति भी है और भाषा के प्रति भी।
—डॉ. हरदयाल
Sitamarhi Charit by Shri Lallan Prasad Sinha
सीतामढ़ी की वास्तविक उपलब्धि उसके आध्यात्मिक चिंतन में देखी जा सकती है, किंतु संस्कृत और मिथिलाक्षर में लिखित एतत्संबंधी ग्रंथ इधर-उधर बिखरे हैं और दीमकों का भोजन बन रहे हैं। इन पुस्तकों को ढूँढ़ निकालना और सामने लाना कठिन, पर महत्त्वपूर्ण काम है। अगर वह सारी सामग्री प्रकाशित हो जाए तो सीतामढ़ी के वैभव का सच्चा साक्षात्कार हो सकता है। इस दिशा में पहल जब तक नहीं होगी, तब तक सीतामढ़ी की खोज अधूरी ही रहेगी।
सीतामढ़ी का विकास वास्तव में अधूरा और अटपटा है। बाढ़ और अकाल इस क्षेत्र की पुरानी समस्याएँ है। भूकंप के पश्चात् जल के जमाव से मच्छरों के प्रकोप से नई-नई बीमारियाँ सामने आई हैं। बढ़ती जनसंख्या का बोझ दुर्वह है। लोक बेकारी से बेचैन हैं। विकास की गति कुंठित है। भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला है।
यह ग्रंथ सीतामढ़ी जिले के प्रथम ‘प्रैक्टिकल गजेटियर’ के रूप में समझा जा सकता है। सीतामढ़ी पहले मुजफ्फरपुर जिले का एक अनुमंडल था। मुजफ्फरपुर जिले का पहला ‘गजेटियर’ एक अंग्रेज आई.सी.एस. अधिकारी श्री एल.एस.एस.ओ. मेली ने 1907 ई. में प्रकाशित कराया था। तब यह जिला बंगाल प्रांत का हिस्सा था। अर्धशताब्दी बीत जाने के बाद सन् 1958 में श्री पी.सी. रायचौधरी ने मुजफ्फरपुर जिले का संशोधित ‘गजेटियर’ प्रस्तुत किया था। ये दोनों ही काम सरकारी स्तर पर हुए थे। गैर-सरकारी स्तर पर नव सृजित जिले सीतामढ़ी के संबंध में ‘गजेटियर’ जैसी ही कोई चीज प्रस्तुत करने का यह पहला प्रयास है, जो सीतामढ़ी के गौरवशाली अतीत और समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का दिग्दर्शन कराता है।
Sitara by Sanjay Sinha
मैं माँ से पूछता था, मैं बड़ा होकर क्या बनूँगा?
माँ कहती, मेरा बेटा आदमी बनेगा। एक अच्छा आदमी।
Sitesh Alok Ki Lokpriya Kahaniyan by Sitesh Alok
चर्चा में बने रहने के लिए लोग आजकल क्या नहीं करते! दूसरी ओर, चर्चा का अपना कोई सुनिश्चित चरित्र नहीं होता…मरीचिकाओं में भटकते-भटकते चर्चा स्वयं एक मरीचिका का रूप ग्र्रहण कर लेती है।
साहित्य भी दुर्भाग्यवश इस मरीचिका से नहीं बच पाया। साहित्य में अनेकानेक गढ़ बनते-बिगड़ते रहे और उसमें राजनीति भी चोरी-छिपे पैर पसारती रही। अपवादस्वरूप, कुछ ही लेखक हैं, जो साहित्य में उपजे वादों-विवादों से बचते हुए अपनी साधना में तल्लीन रह सके।
ऐसे ही स्वनामधन्य साहित्यकारों में एक हैं डॉ. सीतेश आलोक, जिन्हें साहित्य न तो विरासत में मिला और न किसी मठ अथवा मंच से। आत्मसम्मान के धनी डॉ. आलोक ने अपनी शर्तों पर चलते-जूझते हुए स्वयं अपनी राह बनाई और कला की अनेक विधाओं में साधानारत रहते हुए अपनी रचनाओं को मर्मस्पर्शी अनुभवों से समृद्ध किया।
वैसे तो डॉ. आलोक ने लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, किंतु कहानी के क्षेत्र में उनकी अपनी अनूठी शैली है। जीवन के प्रति अपनी मौलिक दृष्टि के कारण उनके कथानक पाठकों के मन में निरंतर एक जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। पाठक उनके चरित्रों में कभी स्वयं अपने आप को पाता है तो कभी अपने संबंधियों अथवा पड़ोसियों को। संभवतः एक कारण यह भी है कि उनकी कहानियाँ चर्चा का विषय बनकर पाठकों के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं।
Smaran Shakti by pk Arya
स्मरण-शक्ति
अगर आप यह समझते हैं कि रटने से स्मरण-शक्ति बढ़ती है तो आप गलत समझते हैं। दरअसल, किसी विषय-वस्तु को हम जितनी सरलता से और दिमाग पर जोर डाले बिना देखते, सुनते या पढ़ते हैं, वह उतनी ही सहजता से हमारे दिमाग में स्थायी रूप से दर्ज हो जाती है। मिसाल के तौर पर किसी फिल्म को एक बार देखकर या उसके गीत सुनकर वे हमें सहज ही याद हो जाते हैं। अकसर हम किसी बात को याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालते हैं और वह हमें याद नहीं आती। थोड़ी देर बाद एकाएक वह हमें याद आ जाती है—इसे क्या कहेंगे?
दरअसल, स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए सरल सा नियम है—सरलता से उस विषय का दोहराव किया जाता रहे, फिर वह विषय स्थायी रूप से हमारे स्मृति-पटल पर दर्ज हो जाता है। दिन भर की घटनाएँ और पाठ हम रात्रि को दोहरा लें तो हमारी स्मरण-शक्ति अक्षुण्ण बनी रहती है।
स्मरण-शक्ति विकसित करने की बेजोड़ पुस्तक आपके व्यक्तित्व का एक अनूठा पहलू है, इसलिए इसका विकास करिए, यह पुस्तक सचमुच इसमें आपकी मदद करेगी।
Smart Banane Ke Funde by N. Raghuraman
स्मार्ट बनने के फंडे
आज सूचनाक्रांति के युग में जब हमें अनेक स्रोतों से हर क्षण सूचनाएँ और नई-नई जानकारियाँ मिल रही हैं तो ऐसे में जरूरत है कि हम इन जानकारियों में से सबसे श्रेष्ठ को चुनकर अपनी सफलता के लिए उपयोग करें।
ईश्वर ने केवल मनुष्य को बुद्धि के रूप में दुर्लभ वस्तु प्रदान की है। जरूरत है कि हम इस बुद्धि का अच्छा और सकारात्मक उपयोग कर अपने जीवन में प्रगति के पथ पर अग्रसर हों।
प्रस्तुत पुस्तक में ऐसी अनेक प्रेरणादायी कहानियाँ संकलित हैं, जिससे आप औरों से हटकर, अपने काम को स्मार्ट तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं। इसलिए सचेत रहिए, होशियार बनिए और जानकारियों के रथ पर सवार होकर सफल बनिए।
इस पुस्तक में बताए कुछ फंडे हैं—
अच्छी सलाह आपको अपने किसी ऐसे पड़ोसी से भी मिले, जिसके प्रति आप अलग राय रखते हों, लेकिन इसे लेने में हर्ज नहीं है, क्योंकि यह अपनी जिंदगी में अहिंसा को अपनाने जैसा है।
अगले कुछ सालों में दुनिया समेत आपके जीवन में आमूलचूल बदलाव होने जा रहे हैं। इन बदलवों के बारे में जानकारी रखना जरूरी है। भले ही इन तकनीकी विकासों का उपभोग आप न करें, लेकिन इनके बारे में जानकारी आपको समाज में आगे रखेगी।
उत्तेजित होने के बजाय एक शांत दिमाग बेहतर सोच सकता है। अपने मस्तिष्क को हर दिन कुछ मिनट के लिए पूरी तरह शांत छोड़ दीजिए और फिर देखिए कि यह आपको आपकी इच्छाओं के अनुरूप जिंदगी जीने में कितनी मदद करता है।
Smart Phone Ka Smart Istemal by Sushrut Kulkarni
श्री मान और श्रीमती देशमुख ने अपने बेटे की जिद की खातिर स्मार्ट फोन ले तो लिया, पर वे इसका पूरा उपयोग इस डर से नहीं कर पा रहे थे कि कहीं उनका फोन खराब न हो जाए। लेकिन थोड़े ही दिनों में श्रीमती और श्री देशमुख न केवल स्मार्ट फोन चलाने में माहिर हो गए, बल्कि आत्मविश्वास के साथ फोटो खींचकर वाट्सअप भी करने लगे। और तो और, मनचाहे गेम्स, ऐप्स भी डाउनलोड करने लगे। दोस्तो, यह कमाल कर दिखाया ‘स्मार्ट फोन का स्मार्ट इस्तेमाल’ पुस्तक ने! इस पुस्तक ने उन्हें नीचे दी हुई जानकारियाँ सचित्र समझाईं—
• बॉक्स में मिला हुआ नया स्मार्ट फोन कैसे चालू करें?
• कॉण्टेक्ट कैसे सेव करें और ग्रुप कैसे बनाएँ?
• एस.एम.एस., ग्रुप एस.एम.एस. कैसे किए जाएँ?
• किसी कार्यक्रम को देखने से पूर्व फोन सायलेंट कैसे करें?
• इ-मेल कैसे भेजें? उससे फाइल कैसे जोड़ी जाए?
• वीडियो या फोटो कैसे खींचें, और शेयर कैसे करें?
• वॉलपेपर, थीम्स कैसे बदलें?
• ऑनलाइन शॉपिंग कैसे करें? और भी बहुत कुछ…
इस पुस्तक में दी हुई छोटी-छोटी पर महत्त्वपूर्ण बातें सीख-जानकर देशमुख दंपती बेझिझक अपने स्मार्ट फोन की सारी सुविधाओं का उपयोग करने लगे।
तो आइए, आप भी उनके जैसे ही ‘स्मार्ट फोन का स्मार्ट इस्तेमाल’ की उँगली पकड़कर स्मार्ट बनिए!
स्टीफन नैप एक साहित्यकार, लेखक, दार्शनिक, अध्यात्मविद्, देशाटन-प्रेमी, फोटोग्राफर और लेक्चरर हैं। उन्होंने वैदिक दर्शन के गहन और सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करने के लिए निरंतर रूप से कार्य किया है। उनके कार्यों का मुख्य उद्देश्य भारत के आध्यात्मिक दर्शन और वैदिक संस्कृति के उत्कृष्ट ज्ञान को सरल और सटीक तरीके से समझाकर उनकी व्याख्या उपलब्ध कराना है, जिसके पास मानवता को देने के लिए बहुत कुछ है। अपने इस इरादे में वह अब तक सफल दिख रहे हैं। अनेक पाठकों ने इस बात के लिए उनकी प्रशंसा कि है कि जो बात समझ से परे और असीम लगती है, उनकी जटिलताओं को वह बड़ी सरलता से समझा देते हैं।
Smritiyan by Garima Sanjay
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएट, पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा सहित प्रसिद्ध फिल्मकार कृष्णा शाह की फिल्म निर्माण की कार्यशाला में दक्षता प्राप्त। अब तक अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए कार्य, जैसे फिल्म्स डिवीजन, एन.एफ.डी.सी., दूरदर्शन, गृह मंत्रालय, यू.एन.डी.पी., यू.एन.ऐड्स, डिस्कवरी चैनल, उपभोक्ता एवं खाद्य मंत्रालय, इग्नू, स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग आदि। बी.बी.सी., ट्रांसटेल, डिस्कवरी चैनल आदि के लिए विविध डॉक्यूमेंटरी फिल्मों के हिंदी अनुवाद एवं डबिंग के कार्य। यूनिसेफ के लिए मिडिटेक के टेलीविजन सीरियल ‘क्योंकि जीना इसी का नाम है’ के अनुवाद एवं सब-टाइटल का कार्यभार भी सँभाला। अनेक रेडियो प्रोग्राम का लेखन जिनमें शामिल हैं—उपभोक्ता एवं खाद्य मंत्रालय की रेडियो श्रृंखला ‘जागो ग्राहक जागो’, आकाशवाणी एवं विज्ञान प्रसार के लिए विविध रेडियो सीरीज। विविध प्रकाशकों एवं संस्थाओं के लिए लेखन एवं अनुवाद कार्य।
संप्रति नई दिल्ली में लेखिका, पटकथा लेखिका, अनुवादिका और वृत्तचित्र निमाता/निर्देशिका।
Soch Badi Kamyabi Badi by Dale Carnegie
दुनिया के सबसे महानतम स्वयं-सहायता गुरुओं में से एक से उत्कृष्टता के सबक
2 ऐसा कॅरियर चुनें, जो आपको सबसे ज्यादा अनुकूल हो।
2 पब्लिक स्पीकिंग के गुण सीखें, जो आपको एक प्रभावी कम्यूनिकेटर बनाएगा।
2 काम की चार अच्छी आदतों को अपनाकर तनाव और थकान को दूर करें।
2 अपने जीवन में वित्तीय योजना के ग्यारह मौलिक सिद्धांतों को लागू करें।
अत्यंत सफल लेखक और प्रेरक वक्ता डेल कारनेगी ने दुनिया भर में लाखों लोगों को अपने जीवन और कॅरियर में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा दी। डेल कारनेगी की शिक्षा के जरूरी सिद्धांतों का संग्रह ‘सोच बड़ी, कामयाबी बड़ी’ एक ऐसी मूल्यवान पुस्तक है, जो आपके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में आपकी मदद करेगी। प्रत्येक सिद्धांत को सफल कारोबारियों और कॉरपोरेट जगत् की हस्तियों के साथ ही इतिहास की महान् राजनीतिक विभूतियों की जीवन-घटनाओं वाक्यों और कहानियों से समझाया गया है। इसमें डेल कारनेगी तथा उन विचारकों और कामयाब लोगों की प्रेरक उक्तियों का एक संग्रह भी है, जिनकी वह सबसे अधिक प्रशंसा करते थे, जैसे कि रॉल्फ वाल्डो इमर्सन, थॉमस ए एडिसन, हेनरी फोर्ड और कई अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति।
Socrates by Arun Tiwari
सुकरात
दुनिया भर के दार्शनिकों में सुकरात का विशिष्ट स्थान है। उनमें सोचने-समझने की क्षमता थी और वह सत्य एवं न्याय की खोज के प्रति दृढ़-संकल्प थे। वह मानते थे कि एक बेहतर विश्व की कल्पना तभी साकार हो सकती है, जब लोग समझदार एवं बुद्धिमान हों। हमें किसी दूसरे के विचारों को यूँ ही स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि उनको आलोचनात्मक तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए।
सुकरात के विचारों का अध्ययन आज अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक हो गया है। सुकरात की कही हुई बहुत सी बातों को बड़ी प्रसिद्धि मिली। उन्हीं में से एक है—‘बिना जाँचा-परखा जीवन जीने योग्य नहीं होता है।’
उनके प्रिय शिष्य प्लेटो ने कहा था, “उनके समय के जितने भी लोगों को हम जानते हैं, उनमें से वे सर्वश्रेष्ठ और सबसे बुद्धिमान तथा अत्यंत न्यायसंगत व्यक्ति थे।”
विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों को सदाचारी बनने में सहायक होगी और वे सुकरात के विचारों से सीख लेकर अपने जीवन की विषम परिस्थितियों का सामना कुशलता से कर सकेंगे।
Solaha Kahaniyan by Harish Pathak
सोलह कहानियाँ—हरीश पाठक
विचारधारा और प्रतिबद्धता सरीखी फैशनेबल बाधा-दौड़ों पर खरा उतरने की आकांक्षा ने हिंदी कहानी को लंबे समय से असरग्रस्त रखा है। समकालीन हिंदी कहानी में इस मद में कुछ और जुमले भी तैनात हो गए हैं, जो कहानी में विन्यस्त विमर्श को कहानीपन से ज्यादा अहम और दीगर घोषित करने पर तुले रहते हैं।
अरसे से कथा साहित्य में उपस्थित हरीश पाठक की कहानियों का मुख्य आकर्षण अपने समय-संदर्भों की पड़ताल है। संघर्ष, त्रास, प्रेम, आकांक्षा, उत्पीडऩ, अपराध और प्रतिशोध उनकी कहानियों में कभी समष्टिगत फलक पर अपना तांडव करते हैं तो कभी व्यक्ति-परिवार के स्तर पर। एक कहानी में तो दोनों का बेहद मार्मिक विलय ही हो जाता है। मगर कहना होगा कि अपनी कहानी कला को पैनाने के लिए हरीश व्यक्ति परिवार या कहें आम जन-जिंदगी पर ज्यादा केंद्रित रहते हैं।
अपने समय-समाज के अलग-अलग और कदाचित् अनछुए पहलुओं को एक विनम्र पठनीयता से समृद्ध करती ये कहानियाँ इस अर्थ में एक-दूसरे की पूरक सी भी लगती हैं।
हरीश पाठक की इन कहानियों में ग्रामीण जीवन की वंचना, विस्थापन, गरीबी तथा विकास के कारण आए संत्रास की कचोट और महानगरीय जीवन की दैनंदिनी में भस्म होते चरित्रों की ऊहापोह और मजबूरियाँ बड़ी निर्विकार प्रामाणिकता से दर्ज हुई हैं। पाठक के भीतर जरूरी टीस जगाने के बाद इनका वजूद खत्म नहीं होता है, वे जैसे पुनर्पाठ के लिए उकसाती हैं।
—ओमा शर्मा
Sone Ka Nevla by Sudha Murti
अर्जुन के कितने नाम थे?
यम को शाप क्यों मिला?
एक नन्हे नेवले ने युधिष्ठिर को क्या पाठ पढ़ाया?
कुरुक्षेत्र का युद्ध, जिसने देवों को भी पक्ष लेने पर विवश कर दिया, भले ही आप सब जानते हों; परंतु इसके पहले, इसके बाद और इसके दौरान भी ऐसी असंख्य कथाएँ हैं, जो महाभारत को विविध रूप और छटा प्रदान करती हैं।
इस संग्रह में प्रख्यात लेखिका सुधा मूर्ति इन अल्पज्ञात और असाधारण कथाओं के माध्यम से भारत के महानतम महाकाव्य के रोचक जगत् से नए सिरे से परिचय करवा रही हैं, जिनमें से प्रत्येक कथा आपको विस्मित और मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखती है।
समृद्ध भारतीय वाङ्मय के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की लोकप्रिय पठनीय कथाओं का अद्भुत संकलन।
Sookar Utpadan Evam Prabandhan by Dr. Sant Kumar Singh , Dr. Virendra Prasad Yadav , Dr. Archana Kumari , Dr. Hemant Kumar , Dr. Basant Kumar
सूकर पालन हमारे देश में मुख्य व्यवसाय के रूप में उभर रहा है, जिसकी लोकप्रियता दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है, परंतु सूकर पालन विज्ञान पर हिंदी में प्रामाणिक पुस्तकों का बहुत अभाव है। इस अभाव को देखते हुए यह पाठ्य-पुस्तक पशु विज्ञान के स्नातक, स्नातकोत्तर एवं पी-एच.डी. छात्रों के साथ-साथ शोधकर्ता, पशु चिकित्सक एवं प्रगतिशील सूकर पालकों के लिए लिखी गई है। पुस्तक लिखने के क्रम में यह महसूस किया गया कि बहुत से हिंदी के तकनीकी शब्द कठिन हैं। इसलिए जगह-जगह पर कोष्ठक में अंग्रेजी शब्दों का व्यवहार किया गया है। इसके साथ ही अंत में चुने हुए तकनीकी हिंदी शब्दों के अंग्रेजी शब्द भी दिए गए हैं।
पुस्तक में सूकर पालन विज्ञान का परिचय एवं उनकी विकास-यात्रा के साथ-साथ उनकी जातियों, प्रजनन, आवास व्यवस्था, पोषण के मूल सिद्धांत, बीमारियाँ, कृत्रिम गर्भाधान प्रणाली, वैज्ञानिक रख-रखाव, सूकर उत्पाद का विपणन इत्यादि का सरल भाषा में विवेचन किया गया है।
छात्रों, शिक्षकों एवं वैज्ञानिकों के साथ-साथ पशु-चिकित्सक, पैरा पशु चिकित्सक, विस्तार-कार्यकर्ता, परामर्शदाता, स्वयंसेवी संस्था, सूकर विकास से जुड़े अन्य पदाधिकारीगण इत्यादि के लिए भी पठनीय एवं अत्यंत उपयोगी पुस्तक।
Spain Ki Shreshtha Kahaniyan by Bhadra Sen Puri
विश्व में सबसे अधिक बोली जानेवाली पाँच-छह भाषाओं में से एक स्पेनिश भाषा का भी कथा-साहित्य काफी समृद्ध माना जाता है; लेकिन हिंदी में इस भाषा के साहित्य का अनुवाद बहुत कम हुआ है-पुस्तकाकार में तो नहीं के बराबर ।
इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से विदेशी कथा अनुवाद श्रृंखला के अंतर्गत इस पुस्तक में स्पेनिश भाषा के शीर्षस्थ और दिग्गज कहानीकारों की चुनिंदा कहानियाँ अनूदित करके प्रस्तुत की गई हैं । इनमें ‘ नंगा राजा ‘ और ‘ भिखारी ने मुख्य पादरी की कृपा को उत्तेजित कैसे किया?’ शीर्षक कहानियाँ तो क्रमश : छह सौ और चार सौ वर्षों से भी अधिक प्राचीन हैं । कल्पना की जा सकती है कि इन्हें ढूँढने और तराशने में कितना सघन प्रयास किया गया होगा । शेष कहानियाँ भी लगभग एक सौ पचास वर्ष पुरानी हैं । इनके माध्यम से न सिर्फ स्पेनिश साहित्य क्रा स्तराकलन करने बल्कि पिछले छह सौ वर्षों की (वहाँ की) सभ्यता, संस्कृति तथा जीवन-शैली को समझने में भी साहित्य-प्रेमियों, प्राध्यापकों, छात्रों तथा शोधकर्ताओं को काफी सहायता मिलेगी ।
Spoken English Digest by Rashmeet Kaur
भाषा संवाद का माध्यम है। बोलियाँ क्षेत्र-विशेष तक सीमित रहती हैं, वहीं भाषाएँ बढ़ते संचार माध्यम के सहारे अपनी क्षेत्रीय सीमाएँ तोड़कर प्रांतीय, देशीय और अंतरराष्ट्रीय बन जाती हैं। आज अंग्रेजी भाषा को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यह न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को परस्पर जोड़ रहीं है, बल्कि बैंक, अस्पताल, स्कूल, कोर्ट, हवाईअड्डों इत्यादि स्थानों पर संचार और संवाद की प्रमुख भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है।
इतना ही नहीं अंग्रेजी आज रोजगार की भी प्रमुख भाषा बन गई है। अच्छी अंग्रेजी के ज्ञान के लिए अंग्रेजी बोलने की शुरुआत अपने घर से ही की जाए तो सबसे बढ़िया है, क्योंकि यहाँ बोलचाल का अभ्यास बेझिझक किया जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक में इसी तरह के अभ्यास से अंग्रेजी सिखाने की शुरुआत की गई है, जो बोलने, सीखने और व्यवहार में बेहद सरल है। छोटे-छोटे सरल वाक्यों द्वारा बैंक, घर, अस्पताल, रेलवे पूछताछ, हवाई अड्डों, दुकानों आदि पर किए जानेवाले संवाद को अंग्रेजी के सरल वार्त्तालाप द्वारा समझाया गया है। इसके नियमित अभ्यास से आप कुछ ही दिनों में ही अंग्रेजी बोलने में सक्षम हो सकते हैं।