Hindi Literature
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Sampoorna Baal Natak by Vishnu Prabhakar
विष्णु प्रभाकरजी ने बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी लगभग सभी विधाओं में साहित्य सृजन किया है। इनमें कहानी, नाटक, यात्रा-वृत्तांत, जीवनियाँ आदि सभी कुछ हैं। बच्चों के लिए लिखते समय उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि जो भी लिखा जाए, बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर लिखा जाए—जो रोचक भी लगे और शिक्षाप्रद भी हो। विष्णुजी ने अपने नाटकों में बच्चों को नई-से-नई बात बताने का प्रयास किया। उनका मानना था कि परी-कथाओं के कल्पित संसार में बच्चों को नहीं भटकना चाहिए। उन्हें विज्ञान की दुनिया में घुमाने पर हम पाएँगे कि वह बहुत रोचक और सुंदर है। साथ-साथ उनकी यह कोशिश रही कि बच्चों को आज के समाज और जीवन की बातें भी बताएँ। आम जीवन के रोचक प्रसंगों को लेकर नाटक की रचना इस प्रकार की जाए कि उसे पढ़ने में तो आनंद आए ही, साथ ही इसे मंच पर आसानी से खेला भी जा सके।
विष्णुजी के नाटकों की भाषा सरल है और संवाद संक्षिप्त व प्रभावी हैं। शिक्षा कहीं भी ऊपर से आरोपित नहीं लगती है, बल्कि वह सहज अभिनय और कथा के अंदर से स्वतः प्रस्फुटित होती है। मंच पर ज्यादा सजावट-बनावट का चक्कर भी नहीं है। बच्चे स्वयं ही सरलता से अभिनय कर सकते हैं।
बालमन को प्रेरित-संस्कारित करनेवाले अभिनेय बाल नाटकों का अनुपम संग्रह।
Sampoorna Laghu Kathayen by Vishnu Prabhakar
संपूर्ण लघु कथाएँ—विष्णु प्रभाकर
उस दिन उनके घर में हर्षोल्लास का माहौल था। उन्होंने गत वर्ष जो मकान खरीदा था, उसको तोड़ने पर दीवारों में से अपार अनर्जित संपदा उन्हें प्राप्त हुई थी।
उस मकान का पूर्वकालिक स्वामी, कभी जिसके ऐश्वर्य और विलास की सीमा नहीं थी, सरकारी अस्तपाल के छोटे से कमरे में पड़ा था। वह अभी-अभी मृत्यु के मुँह से लौटा था। सभी मित्र-परिजन, यहाँ तक कि उसके पुत्र भी, उसे छोड़ गए थे। केवल उसकी पत्नी किसी स्कूल में पढ़ाकर किसी तरह उसकी देखभाल कर रही थी। घर लौटते समय उसने अपार संपदा पाए जाने का यह समाचार सुना और पति से कहा, “दीवारों में संपदा छिपी है—काश, यह बात हम जान पाते!”
पति ने धीरे से कहा, “अच्छा हुआ, जो मैं न जान पाया। मैं अब जान पाया हूँ कि मैंने मकान बेचकर सुख पाया है। उसने मकान खरीदकर सुख खोया है। पसीना बहाकर जो तुम कमाकर लाती हो, उसी ने मुझे जीवन दिया है। इससे बड़ा ऐश्वर्य कुछ हो सकता है, मैं नहीं जानता।”
मंद-मंद मुसकराते हुए पत्नी ने पति की आँखों में झाँका और उनका माथा सहलाते हुए प्यार भरे स्वर में कहा, “मैं यही सुनना चाहती थी।”
—इसी पुस्तक से
मसिजीवी रचनाकार विष्णु प्रभाकरजी ने कहानियाँ, उपन्यास, नाटक आदि ही नहीं लिखे, बल्कि विपुल मात्रा में लघुकथाएँ भी लिखी हैं। ‘देखन में छोटी लगें, घाव करें गंभीर’ को चरितार्थ करनेवाली ये लघु कथाएँ मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करती हैं और रोचक, मनोरंजक एवं शिक्षाप्रद हैं।
Sampoorna Sawasthya Ke Liye Yoga by Dr. Vinod Verma
‘योग’ इस युग में सबसे अधिक प्रयोग में लाया जानेवाला शब्द बन गया है। बीते पच्चीस वर्षों में इसका उपयोग विभिन्न विचारों और अर्थों को व्यक्त करने के लिए किया गया। उनमें से इसका सबसे अधिक प्रयोग शारीरिक व्यायाम के लिए किया गया है।
यौगिक अभ्यासों पर फिलहाल जितनी भी पुस्तकें हैं, वे योग को महज धीमे जिमनास्टिक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। योग पर कुछ और पुस्तकें भी हैं, जो इस विधा को पूरी तरह से हिंदू परंपरा में ढालती हैं, जिसे स्वीकार करना कई लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। उन्हें एक ओर यौगिक मुद्राओं को करने में शारीरिक कठिनाई आती है तो दूसरी ओर वे योग के दार्शनिक पहलू को नहीं समझ पाते।
इस पुस्तक में दिए गए यौगिक अभ्यास का कोर्स पूरी तरह मौलिक है। यही नहीं, इसे अच्छा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य देने के मूल उद्देश्य से तैयार किया गया है।
इस पुस्तक में, दैनिक जीवन के सभी पहलुओं, शरीर की दशाओं तथा हम सब के अस्तित्व से जुड़ी मानसिक स्थितियों का खयाल रखा गया है। यह पुस्तक किसी एक निश्चित आयु वर्ग को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई है, वरन् यह सबके लिए उपयोगी है।
स्वस्थ शरीर और मन के लिए योग का व्यावहारिक उपयोग बताती एक संपूर्ण पुस्तक।
Samrat Chandragupt by Deendayal Upadhyaya
प्रस्तुत पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्यों के ढाँचे पर अपनी भाषा का रंग चढ़ाकर चंद्रगुप्त का चरित्र लिखा गया है। नायक की एकध्येयनिष्ठा ने स्वयं ही उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की है। कुछ घटनाओं का वर्णन पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लिखे हुए इतिहास से मेल नहीं खाता है। प्रस्तुत यह वर्णन कल्पना के आधार पर न होते हुए अपने प्राचीन तथ्यों तथा भारतीय विद्वानों द्वारा दी हुई आधुनिक खोजों के आधार पर है। जिनके लिए यह पुस्तक लिखी गई है, उन्हें सब प्रकार के ऐतिहासिक तथ्यों के वन में भ्रमण कराने की आवश्यकता नहीं है। इतना जानना पर्याप्त है कि यूरोपियन विद्वानों द्वारा प्रयत्नपूर्वक एवं उनका अंधानुकरण करनेवाले भारतीय विद्वानों द्वारा अनजाने में फैलाए हुए अंधकार को नष्ट करनेवाले ऐतिहासिक शोध के सूर्यप्रकाश में देखी हुई ये सत्य घटनाएँ हैं।
—दीनदयाल उपाध्याय
Samudra Ki Gahari Hari Aatma by Acharya Janaki Vallabh Shastri
कथा साहित्य के अंतर्गत कानन, अपर्णा, लीला कमल, बाँसों का झुरमुट तथा नाट्य-साहित्य के अंतर्गत अशोक वन, सत्यकाम, जिंदगी, आदमी, प्रतिध्वनि, देवी, नील झील आदि कृतियाँ जानकीवल्लभ शास्त्री के रचनाकार के उस प्रबुद्ध-सिद्ध गद्यकार पक्ष को उजागर करती है, जो अनेक कवियों के लिए एक कसौटी है। शास्त्रीजी का संस्मरण-साहित्य हिंदी साहित्य की वह अमूल्य निधि है, जिसके बीच से नहीं गुजरना एक सहज-सरल सारगर्भित भाव-निधि से वंचित रह जाना है। स्मृति के वातायन, निराला के पत्र, नाट्य-सम्राट् श्री पृथ्वीराज कपूर, हंसबलाका, कमर्क्षेत्रे: मरुक्षेत्रे, एक असाहित्यिक की डायरी और अष्टपदी आदि संस्मरण-साहित्य शास्त्रीजी का वैयक्तिक राग नहीं, जीवन का विराट् संदर्भ तथा चिंतन-मनन का संवेदनात्मक वह आरोह-अवरोह है, जिसमें पाठक स्वयं को आंतरिक और बाह्य रूपों में देख-समझ और जान सकता है। वैयक्तिक संदर्भों तथा अनुभूतियों को भी शास्त्रीजी ने जिस कुशलता से साहित्य बना दिया है, यह उनके चिंतनशील, मननशील एवं संवेदनशील सर्जक व्यक्तित्व की अन्यतम उपलब्धि है।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री एक सजग, अनुरागी, पारदर्शी और सूक्ष्मदर्शी विश्लेषक-आलोचक भी हैं। इनके समीक्षा-साहित्य रचनात्मक, क्रियाशील और मूल्यांकनपरक विद्वान् आचार्य का साक्षात्कार कराता है। वैसे इनकी आलोचना महज आलोचना नहीं, रचनात्मक-आलोचना है।
Samudri Jaiv-Proudhyogiki by Dr. D.D. Ozha , Dr. R. Kripakaran
वर्तमान युग में जैव प्रौद्योगिकी, नैनो-प्रौद्योगिकी तथा बायो-नैनोटेक्नोलॉजी बहुआयामी तथा बहूपयोगी तकनीकें हैं, जिनका सदुपयोग मानव कल्याण एवं संधारणीय विकास के लिए देश-विदेश में हो रहा है। यह सर्वविदित तथ्य है कि समुद्र हमारे बहुत ही महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं, जो चिरकाल तक हमें अनेकानेक वस्तुओं के प्रदाता रहेंगे। वस्तुतः जैव प्रौद्योगिकी की अनेक शाखाएँ हैं, जो भविष्य में एक विज्ञान का रूप लेंगी, जिसमें समुद्री जैव प्रौद्योगिकी भी एक प्रमुख शाखा है, जिसका उद्भव लगभग दो दशक पूर्व ही हुआ है और इस विषय पर हिंदी में पुस्तक का नितांत अभाव है; इस पुस्तक के माध्यम से उस अभाव की पूर्ति करने का प्रामाणिक प्रयास किया है।
समुद्री जैव प्रौद्योगिकी शीर्षक पुस्तक में जैव प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता, समुद्री संसाधन से औषधियाँ, रसायन, समुद्री शैवाल एवं उनकी विभिन्न क्षेत्रों में उपादेयता, जलकृषि, पर्यावरणीय जैव प्रौद्योगिकी, एन.आई.ओ.टी. में समुद्री जैव प्रौद्योगिकी विषयक जनोपयोगी शोधकार्य तथा महासागरीय शोधक्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगठन आदि के बारे में सरल एवं बोधगम्य भाषा में जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में वर्णित सारणियों, श्वेत-श्याम एवं रंगीन चित्रों से विषय को समझने में आसान बना दिया है। विद्यार्थी, शोधार्थी, वैज्ञानिक ही नहीं, सामान्य पाठकों के लिए भी एक जानकारीपरक उपयोगी पुस्तक।
Samund Samave Bund Mein by Nitu, M. Dhinakaran And Amit
‘समुंद समावे बुंद में’ केरिपुबल के शूरवीरों केअदम्य साहस और बहादुरी की कथा है जिन्होंने एक पल में नियति अपने नाम कर, भविष्य की लहरों से लड़कर, प्रारब्ध का प्रारूप बदल दिया। यह गाथा केरिपुबल के रणबाँकुरों की वीरता और नेतृत्व क्षमता को बयाँ करती है।
‘‘आँधियों ने गोद में
हमको खिलाया है न भूलो,
कंटको ने सर हमें
सादर झुकाया है न भूलो,
सिंधु का मथ कर कलेजा हम सुधा भी शोध लाए
और हमारे तेज से
सूरज लजाया है न भूलो।’’
Sanatan Sanskriti Ka Mahaparva Simhastha by Siddhartha Shankar Gautam
आधुनिक कुंभ पर्व का धार्मिक रूप से प्रचार-प्रसार आदिगुरु शंकराचार्य ने किया था। उन्होंने पर्व की शुरुआत धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा देने और हिंदुओं को अपनी सनातन संस्कृति की पहचान दिलाने के उद्देश्य से की थी। आज भी कुंभ पर्व मुख्यतः साधु-संत समाज का ही पर्व माना जाता है। वस्तुतः कुंभ पर्व सनातन है। अग्नि पुराण, गरुड़ पुराण, वराह पुराण, कूर्म पुराण, वामन पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्म पुराण, शिव पुराण, विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, लिंग पुराण, हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, वाल्मीकि रामायण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों, जैसे ऋग्वेद, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण में वर्णित आख्यानों से कुंभ पर्व की प्राचीनता का अनुमान लगाया जा सकता है। गौतम बुद्ध ने नदियों के तट पर आयोजित कुंभ पर्व को ‘नदी पर्व’ कहा है।
विष्णु पुराण के अनुसार—‘‘हजारों स्नान कार्तिक में, सैकड़ों स्नान माघ मास में किए हों तथा करोड़ों बार वैशाख में नर्मदा स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य एक बार कुंभ पर्व में स्नान करने से प्राप्त होता है।’’
—इसी पुस्तक से
Sangh Aur Swaraj by Ratan Sharda
पिछले कुछ समय से राजनीतिक मजबूरियों के कारण वामपंथी और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका के विषय में दुष्प्रचार कर रहे हैं और जनसेवा में इसके बेहतरीन रिकॉर्ड पर कीचड़ उछाल रहे हैं। यह पुस्तक हमें बताती है कि संघ अपने जन्म से ही स्वराज के प्रति समर्पित था। डॉ. हेडगेवार का जीवन और वह शपथ, जो स्वयंसेवक लेते थे, स्वतंत्रता संग्राम के प्रति समर्पण को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं। इस स्वतंत्रता को स्वराज में बदलने के लिए भारत को अनुशासित और साहस रखनेवाले युवाओं की आवश्यकता थी, जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हों। ब्रिटिश दस्तावेज स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि वे स्वतंत्रता संग्राम में संघ की बढ़ती ताकत को लेकर सतर्क थे। स्वतंत्रता का आंदोलन 15 अगस्त, 1947 को ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ (भाग्य के साथ मुलाकात) से समाप्त नहीं हुआ, बल्कि शुरू हुआ अंतहीन अँधेरी रातों का भयावह सिलसिला, जब सुरक्षाबलों के अतिरिक्त सबसे संगठित बल के रूप में संघ के कार्यकर्ताओं ने तबाह हुई लाखों लोगों की जिंदगी से जो कुछ बचा सकते थे, उसके लिए अपने प्राणों को खतरे में डाला। यह फैसला भारत के लोगों और इतिहास को करना है कि साहस की ऐसी काररवाई देशभक्ति थी या सांप्रदायिक। लेखक अन्य तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं, जिनके कारण हमें स्वतंत्रता मिली और यह रेखांकित करते हैं कि स्वाधीनता किसी एक आंदोलन या काररवाई का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक लहर के साथ धीरे-धीरे बढ़ी, जिसका निर्माण भारत के महान् आध्यात्मिक गुरुओं के कारण शुरू हुए सांस्कृतिक पुनर्जागरण से हुआ था।
Sangharsh (Krishna Ki Atmakatha-Vii) by Manu Sharma
नियति ने हमेशा मुझपर युद्ध थोपा—जन्म से लेकर जीवन के अंत तक। यद्यपि मेरी मानसिकता सदा युद्ध-विरोधी रही; फिर भी मैंने उन युद्धों का स्वागत किया। उनसे घृणा करते हुए भी मैंने उन्हें गले लगाया। मूलतः मैं युद्धवादी नहीं था।
जब से मनुष्य पैदा हुआ तब से युद्ध पैदा हुआ—और शांति की ललक भी। यह ललक ही उसके जीवन का सहारा बनी। इस शांति की ललक की हरियाली के गर्भ में सोए हुए ज्वालामुखी की तरह युद्ध सुलगता रहा और बीच-बीच में भड़कता रहा। यही मानव सभ्यता के विकास की नियति बन गया।
लोगों ने मेरे युद्धवादी होने का प्रचार भी किया; पर मैंने कोई परवाह नहीं की, क्योंकि मेरी धारणा थी—और है कि मानव का एक वर्ग वह, जो वैमनस्य एवं ईर्ष्या-द्वेष के वशीभूत होकर घृणा और हिंसा का जाल बुनता रहा—युद्धक है वह, युद्धवादी है वह । पर जो उस जाल को छिन्न-भिन्न करने के लिए तलवार उठाता रहा, वह कदापि युद्धवादी नहीं है, युद्धक नहीं है। और यही जीवन भर मैं करता रहा।
कृष्ण के अनगिनत आयाम हैं। दूसरे उपन्यासों में कृष्ण के किसी विशिष्ट आयाम को लिया गया है। किंतु आठ खंडों में विभक्त इस औपन्यासिक श्रृंखला ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में उकेरने का सफल प्रयास किया गया है। किसी भी भाषा में कृष्णचरित को लेकर इतने विशाल और प्रशस्त कैनवस का प्रयोग नहीं किया है।
यथार्थ कहा जाए तो ‘कृष्ण की आत्मकथा’ एक उपनिषदीय कृति है।
‘कृष्ण की आत्मकथा श्रृंखला के आठों ग्रंथ’
नारद की भविष्यवाणी
दुरभिसंधि
द्वारका की स्थापना
लाक्षागृह
खांडव दाह
राजसूय यज्ञ
संघर्ष
प्रलय
Sangharsh Ki Virasat Aung San Suu Kyi by Shashidhar Khan
म्याँमार में लोकतंत्र बहाली के लिए अथक संघर्ष करनेवाली आंग सान सू की म्याँमार में ही नहीं बल्कि विश्व भर में लोकप्रिय व चर्चित हैं। वर्ष 1991 में जेल में रहते हुए ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ समेत विश्व के लगभग सभी प्रमुख पुरस्कार प्राप्त कर चुकी सू की ने बचपन से लेकर 66 वर्ष की उम्र प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए गुजारी है। आज उन्होंने म्याँमार को इस स्थिति में ला दिया है कि सैनिक शासक लोकतंत्र बहाली के उपाय धीरे-धीरे अपनाने को विवश है।
म्याँमार के राष्ट्रपिता आंग सान का नाम लोग आज सू की के माध्यम से जानते हैं; लेकिन सू की ने सही मायने में राष्ट्रपुत्री बनकर गौरव प्राप्त किया है।
सू की के पिता देश को आजाद कराने और आजादी मिलने के बाद हुए आंतरिक संघर्ष से जूझे, जिनमें उन्हें अपनी जान तक गँवानी पड़ी। लेकिन सू की ने घृणा का जवाब प्रेम से और गोली का जवाब बोली से देकर सैनिक शासकों को इस स्थिति में ला दिया कि वे इस अद्भुत जीवटवाली आदर्श महिला के जज्बे के आगे झुकने को विवश हो गए।
सन् 1980 के दशक से सू की ने लोकतंत्र बहाली हेतु किए जा रहे संघर्ष की कमान थाम रखी है। आज दुनिया भर के देशों के लिए वे शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतंत्र समर्थकों की प्रेरणास्रोत बन गई हैं।
Sangram by Premchand
प्रेमचंद आधुनिक हिंदी साहित्य के कालजयी कथाकार हैं। कथा-कुल की सभी विधाओं—कहानी, उपन्यास, लघुकथा आदि सभी में उन्होंने लिखा और अपनी लगभग पैंतीस वर्ष की साहित्य-साधना तथा लगभग चौदह उपन्यासों एवं तीन सौ कहानियों की रचना करके ‘प्रेमचंद युग’ के रूप में स्वीकृत होकर सदैव के लिए अमर हो गए।
प्रेमचंद का ‘सेवासदन’ उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि वह हिंदी का बेहतरीन उपन्यास माना गया। ‘सेवासदन’ में वेश्या-समस्या और उसके समाधान का चित्रण है, जो हिंदी मानस के लिए नई विषयवस्तु थी। ‘प्रेमाश्रम’ में जमींदार-किसान के संबंधों तथा पश्चिमी सभ्यता के पड़ते प्रभाव का उद्घाटन है। ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्यम से गांधी के स्वाधीनता संग्राम का बड़ा व्यापक चित्रण है। ‘कायाकल्प’ में शारीरिक एवं मानसिक कायाकल्प की कथा है। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा तथा बेमेल-विवाह के दुष्परिणामों की कथा है। ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास में पुनः ‘प्रेमा’ की कथा को कुछ परिवर्तन के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘गबन’ में युवा पीढ़ी की पतन-गाथा है और ‘कर्मभूमि’ में देश के राजनीति संघर्ष को रेखांकित किया गया है। ‘गोदान’ में कृषक और कृषि-जीवन के विध्वंस की त्रासद कहानी है।
उपन्यासकार के रूप में प्रेमचंद का महान् योगदान है। उन्होंने हिंदी उपन्यास को भारतीय मुहावरा दिया और उसे समाज और संस्कृति से जोड़ा तथा साधारण व्यक्ति को नायक बनाकर नया आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी भाषा को मानक रूप दिया और देश-विदेश में हिंदी उपन्यास को भारतीय रूप देकर सदैव के लिए अमर बना दिया।
—डॉ. कमल किशोर गोयनका
Sanjay-Dhritrashtra Samvad by Pramod Kumar Agrawal
भगवद्गीता मानव जाति की धरोहर है, जीवन के सद्निर्माण की पथ-प्रदर्शिका है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का उपाख्यान संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया। उसे सुनकर धृतराष्ट्र ने जगह-जगह पर संशय व्यक्त किए, जिनका समाधान संजय ने अपनी बुद्धि के अनुसार किया, पर धृतराष्ट्र मोह, लोभ एवं अहं से संतृप्त होने के कारण संजय के कथन को पूर्णरूप से ग्रहण नहीं कर सके।
धृतराष्ट्र के समय के परिवेश तथा वर्तमान परिवेश में कई समानताएँ हैं। आजकल के मनुष्य के मन एवं बुद्धि में गीता पढ़ते समय उसी प्रकार के प्रश्न उठते हैं। इस कृति के माध्यम से मनुष्य के उन सभी संभावित प्रश्नों, संशयों को गीता के सूत्रों की पृष्ठभूमि में स्पष्ट किया गया है।
आशा है, यह कृति इस सरलीकृत रूप में गीता के मूल सिद्धांतों को हृदयंगम करने में सहायक होगी।
Sanjeevani by Dr. Ravindra Shukla ‘Ravi’
लीलाभूमिरियं विभोः भगवतो यद् दृश्यरूपं जगद्,
यस्मिन्नाप्तसुधीभिरार्षभुवनेविज्ञाननीतिप्रियैः।
सिद्धान्ताः नियमास्तथा च कृतयो
निर्धारिताश्श्रयसे,
श्रेष्ठान् तान् कवितायतिः मुनिनिभः प्रस्तौति भूयो ‘रविः’।।
यह दृश्यमान संसार व्यापक परमात्मा का क्रीड़ास्थल है। ऋषियों की इस भूमि में विज्ञान एवं नीति?विद्या के विशेषज्ञ पवित्र मनीषियों ने मानव-कल्याण के लिए जिन सिद्धांतों एवं नियमों का प्रवर्तन किया था, उन्हीं श्रेष्ठ आदर्श सिद्धांतों को मुनितुल्य कविश्रेष्ठ डॉ. रवीन्द्र शुक्ल ‘रवि’ ने पुनः राष्ट्र भाषा में प्रस्तुत किया है। जो स्तुत्य है।
उनकी प्रसिद्ध कविता—
‘कोई चलता पगचिह्नों पर, कोई पग चिह्न बनाता है।
पगचिह्न बनाने वाला ही दुनिया में पूजा जाता है।’
वास्तव में उन्होंने हर क्षेत्र में पगचिह्न ही बनाए हैं। प्रस्तुत ‘संजीवनी’ ग्रंथ भी दरकते मानव मूल्यों को पुनः स्थापित और संपोषित करके, पगचिह्न बनाने का काम करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। दरकते मानव-मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास निश्चित रूप से वंदनीय और प्रशंसनीय है।
Sankalp Ki Sanjeevani Lekar by Anand Aadeesh
इस संसार में कोई जीवन ऐसा नहीं, जहाँ सिर्फ पाना ही पाना हो, खोना हो ही नहीं। कुछ खो जाए तो तकलीफ तो बेशक होती है, पर हम हारें नहीं, यही संदेश ये कविताएँ प्रवाहित कर रही हैं। साथ ही बता रही हैं कि प्रेम का बल ही, प्रेम यानी पवित्रता का बल ही हमें पराजयबोध से दूर रखकर जीवन से जोड़े रख सकता है।
—सूर्यकान्त बाली
Sankramak Beemariyon Se Kaise Bachen by Dr Premchandra Swarnakar
क्या आपको पता है, विभिन्न संक्रमणों के कारण एवं उलटी-दस्त और पानी की कमी से दुनिया में प्रतिदिन 4 हजार बच्चे मौत के मुँह में चले जाते हैं? हमारे देश में प्रतिवर्ष 15 लाख रोगी आंत्रशोथ, हैजा और भोजन विषाक्तता जैसे संक्रामक रोगों से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसी तरह क्षय रोग, डेंगू, मस्तिष्क ज्वर, रूमेटिक ज्वर, मलेरिया एवं श्वसन संस्थानों के संक्रमणों से भी लाखों बच्चे और वयस्क असमय काल का ग्रास बन जाते हैं।
देश की लगभग आधी आबादी निरक्षर होने के कारण लोगों में इन रोगों से बचाव के प्रति जागरूकता का भी अभाव है। हमारे प्रचार माध्यम एक सीमा तक लोगों को जागरूक तो कर रहे हैं, परंतु संक्रामक रोगों की सही और वास्तविक जानकारियाँ उन्हें नहीं मिल पा रही हैं। अतः इन बीमारियों पर विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा लिखित पुस्तकों का महत्त्व अभी भी बरकरार है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञ डॉ. प्रेमचंद्र स्वर्णकार द्वारा संक्रामक रोगों के बारे में प्रायः समस्त बातें बतलाते हुए इस पुस्तक की रचना की गई है।
विश्वास है, सुधी पाठक पुस्तक का अध्ययन-मनन कर संक्रामक रोगों से बचाव करने में सक्षम होंगे।
Sansad Mein Aamjan Ki Baat by Hukmdev Narayan Yadav
लोकप्रिय राजनेता हुक्मदेव नारायण यादव के सोलहवीं लोकसभा में दिए गए भाषण ‘संसद् में आमजन की बात’ इस पुस्तक रूप में प्रकाशित हुए हैं। इससे पहले 15वीं लोकसभा के भाषणों का संसद् में गाँव गरीब की किसान की बात के रूप में प्रकाशन हुआ था।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा एकात्म मानवदर्शन के साथ-साथ समाजवाद का समन्वय उनके जीवन का आदर्श रहा। आध्यात्मिकता के बिना दृष्टि और दिशा नहीं बन सकती है। समय आ गया है एकात्म मानववाद के आध्यात्मिक दर्शन और समाजवाद के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रवादी चिंतन का समन्वय किया जाए। श्री नरेंद्र मोदी सत्ता, शासन और राष्ट्र को सम्यक् भाव से एकरूप कराने में लगे हुए हैं। निर्धन, निर्बल, उपेक्षित, उपहासित, पीडि़त, प्रताडि़त और वंचित समाज को समतामूलक, समाज के आधार पर संपन्न, समृद्ध और सबल बनाने के लिए समय सीमाबद्ध कार्यक्रम को सही दिशा दे रहे हैं।
करोड़ों का सपना साकार होते दिख रहा है। ऐसी स्थिति में इस पुस्तक का महत्त्वपूर्ण योगदान रहेगा। यह आमजन की बात है। इसमें भावना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भाषा भी आमजन की है।
आशा है, राजनीति में दिलचस्पी रखनेवाले तथा राजनीति को गहराई से समझने की चाह रखनेवाले पाठकों को यह अवश्य पसंद आएगी।
Sansad Mein Gaon, Gareeb, Kisaan Ki Baat by Hukmadev Narayan Yadav
श्री हुक्मदेव नारायण यादव एक संघर्षशील, संवेदनशील राजनेता, विचारप्रवण एवं गंभीर सांसद हैं। बिहार में विधानसभा और भारतीय संसद्, दोनों ही में उन्होंने अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ी है।
‘संसद् में गाँव, गरीब, किसान की बात’ पुस्तक उनके विविध विषयों पर दिए गए उद्बोधनों का संकलन है। संसद् के साथसाथ संसदीय समितियों में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण विचार रखे हैं। संसद् के शून्यकाल में भी उन्होंने लोकमहत्त्व के विविध विषयों पर बोलते हुए सरकार एवं देश के समक्ष रचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया तथा राष्ट्रहित एवं जनहित की दृष्टि से कठोर आलोचना भी की।
हुक्मदेव बाबू के वक्तव्यों में जहाँ डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों की गहरी छाप है, वहीं एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी के सिद्धांतों के सामाजिकआर्थिक पक्ष का भी प्रतिबिंबन होता है। जहाँ वे पिछड़े और दलितों के उत्थान एवं अधिकारों के लिए बड़े आग्रह के साथ बोलते हैं तो वहीं वे दीनदयालजी के समरस समाज के निर्माण का भी पुरजोर समर्थन करते हैं। एक ओर जब वे बाढ़ और सुखाड़ की त्रासदी से पीडि़त जनसमूह के लिए दर्द भरी आवाज उठाते हैं तो दूसरी ओर वे हिमालय की रक्षा के संकल्प का भी भरपूर समर्थन करते हैं। उनके संसदीय वक्तव्यों का पाठन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
Sansad Mein Nitin Gadkari (2017-2019) by Rakesh Shukla
मैं पहली बार 2014 में नागपुर से लोकसभा सांसद चुना गया। इससे पहले मैं महाराष्ट्र विधान परिषद् में 1989 से लगातार 20 वर्ष तक सदस्य रहा हूँ। वर्ष 1995 में 1999 तक मैंने महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री का कार्यभार भी सँभाला है। विधायिका और प्रशासन में काम करने का लंबा अवसर मिला। लोकसभा सदस्य के नाते एवं केंद्रीय मंत्री के रूप में मैंने संसदीय कार्य में अपना भरपूर योगदान देने का प्रयास किया है। पिछले पाँच साल में कई महत्त्वपूर्ण विधेयक मेरे द्वारा संसद् में प्रस्तुत किए गए। कई महत्त्वपूर्ण विधेयक पारित भी हुए हैं। दोनों सदनों में प्रश्नोत्तरकाल में मैंने विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों की ओर से उठाई गई समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया है। इसी दृष्टिकोण के साथ मैंने सभी दल के सांसदों की क्षेत्रीय समस्याओं को गंभीरता से लेकर उसे सुलझाने का प्रयास किया। इस पाँच साल की अवधि में मुझे नमामि गंगा, जल संसाधन और ग्रामीण विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी भी अल्पावधि के लिए मिली थी। मेरी कोशिश रही कि इन सभी मंत्रालयों के कामकाज की सही जानकारी से प्रत्येक सदस्य अवगत रहे। यह पुस्तक संसद् में मेरे द्वारा किए गए प्रयासों का संकलन है। संकलन का कार्य दो भागों में किया गया है। 2014 से 2016 तक का पहला खंड आ चुका है। इस खंड में 2017 से 2019 तक के संसदीय कार्यों का ब्यौरा है। मैं समझता हूँ कि इस संकलन से मुझे भविष्य में प्रेरणा मिलती रहेगी। इस प्रयास के लिए संपादक एवं प्रकाशक को मेरी हार्दिक शुभेच्छाएँ।
यह केंद्रीय मंत्री श्री नितिन गडकरीजी के संसदीय कामकाज का संकलन है। पिछले पाँच सालों में सड़क परिवहन, पोत परिवहन, जल संसाधन और नमामि गंगा मंत्रालय में कई महत्त्वपूर्ण काम हुए हैं। उनके काम करने के तरीके में रचनात्मक सोच तथा नए तकनीकी प्रयोग के बेजोड़ उदाहरण सामने आए हैं, जिन्हें सँजोना आवश्यक लगा। देश ने पाँच वर्ष में एक्सप्रेस-वे और जलमार्ग से यात्रा की परिकल्पना को साकार होते देखा है। यह संकलन इस उद्देश्य से किया गया है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सक्षम एवं समृद्धशाली भारत बनाने की दिशा में किए गए सतत प्रयासों में ये तथ्य साक्ष्य के रूप में कारगर भूमिका निभाएँगे। संसद् में सड़क परिवहन और जल परिवहन से संबंधित कई विधेयक प्रस्तुत किए गए। इनमें विकास व रोजगार के साथ-साथ मानवीय पक्ष भी रहा है, जैसे मोटर व्हीकल एक्ट (संशोधन) विधेयक लाने के पीछे उद्देश्य देश में हर साल होनेवाली पाँच लाख से ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं को कम करना है; वाराणसी से हल्दिया (कोलकाता) तक जलमार्ग को मूर्त रूप देना। 2014 से 2019 के बीच श्री गडकरी ने संसद् में जो कहा, उसे पूरा करने का हरसंभव प्रयास किया। कुंभ-2019 के पहले उनकी तरफ से गंगा जल की निर्मलता के लिए किया गया अथक प्रयास सार्थक साबित हुआ। पिछले पाँच साल में गडकरीजी ने राष्ट्र विकास के विजन को जिस मिशन के तहत किया है, वह देश की उन्नति के लिए मील का पत्थर बनेगा।
—राकेश शुक्ला
Sansad Mein Nitin Gadkari by Rakesh Shukla
मैं पहली बार 2014 में नागपुर से लोकसभा सांसद चुना गया। इससे पूर्व मैं महाराष्ट्र विधान परिषद् में 1989 से लगातार 20 वर्ष तक सदस्य रहा हूँ। वर्ष 1995 से 1999 तक मैंने महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री का कार्यभार भी सँभाला। विधायिका और प्रशासन में काम करने का लंबा अवसर मिला। लोकसभा सदस्य के नाते एवं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, पोत परिवहन मंत्री के रूप में मैंने संसदीय कार्य में अपना योगदान देने का भरपूर प्रयास किया है। इस अल्पकाल में कई महत्त्वपूर्ण विधेयक मेरे द्वारा संसद् में प्रस्तुत किए गए। कुछ पारित भी हुए हैं। दोनों सदनों में प्रश्नोत्तरकाल में भी मैंने विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों द्वारा उठाई गई समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया है। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। कुछ महत्त्वपूर्ण विधेयक अभी भी संसद् में विचाराधीन हैं। मुझे विश्वास है कि उन्हें जल्द पारित किया जाएगा, ताकि मेरे मंत्रालयों से संबंधित परियोजनाओं को गति प्रदान की जा सके। यह पुस्तक संसद् में किए गए प्रयासों का एक संकलन है। मैं समझता हूँ कि इस संकलन से मुझे संसदीय कार्यों में और भी महत्त्वपूर्णयोगदान करने की प्रेरणा मिलेगी। इस प्रयास के लिए संपादक एवं प्रकाशक को मेरी शुभेच्छा।
Sansad Mein Vikas Ki Baaten by Narendra Pathak
श्री नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के उन विरले लोगों में शामिल हैं, जिनकी राजनीति सत्ता के निष्ठुर धरातल से बहुत दूर मानवीय जीवन की संवेदनाओं पर टिकी है। हृदय से निकली उनकी बातें मौलिक और दूरगामी चिंतन से ओत-प्रोत होती हैं। उनकी स्वाभाविक शैली उन्हें Politician से अलग एक Statesman की श्रेणी में शुमार करती है।
शराब को दैनिक जीवन का हिस्सा बना चुके लोगों के शराब पीने, शराब बनाने और बेचने पर पाबंदी लगाकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अंधी सुरंग में समाई जिंदगी को नया बिहान दिया, नई रोशनी दी।
इस संकलन का उद्देश्य यह प्रकाश में लाना है कि आज के परिवेश में एक नेता अपने संसदीय काल के विमर्शों में जिन विषयों को उठाता है, शासन से माँग करता है, शासन के प्रतिनिधि के रूप में आश्वस्त करता है, और जब वह स्वयं शासन का सूत्रधार बनता है, तब उन विषयों का समाधान करने में कैसे जुट जाता है।
संसदीय राजनीति के इस पक्ष से नई पीढ़ी को अवगत कराना और उसे प्रेरित करना कि राजनीति सर्वदा एक Positive Aspect है, उसका काम हर क्षेत्र में सकारात्मकता को मजबूत करना और विध्वंसक तथा नकारात्मक प्रकृतियों को जड़ से नष्ट करना है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में नीतीश कुमार जैसे राजनेता को समझने में यह वादवृत्त कितना लाभकर होगा, यह अध्येता तय करेंगे, पर इतना तो तय है कि कथनी-करनी में एक होने के प्रमाण की आवश्यकता होगी तो भारतीय राजनीति के मूर्धन्य राजनेताओं में नीतीश कुमार की भी गणना होगी।
Sanskrit Aur Sanskriti by Rajendra Prasad
संस्कृत और संस्कृति
संस्कृत विद्या की महिमा हम भारतवासी पूरी तरह नहीं जानते। उसके अमर रत्न ऐसे नहीं हैं, जो केवल दिखावे के लिए आभूषण-मात्र का ही काम देते हों, जिनमें शोभा तो कुछ बढ़ती हो, पर मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सकती हो। उनमें वह संजीवनी-शक्ति भी है, जो मृतप्राय शरीर में भी जान डाल सकती है; पर वह शक्ति तभी उपयोग में लाई जा सकती है, जब उनको ठीक उसी तरह शोध और साध लिया जाए, जिस तरह मोती, पन्ना, हीरा और दूसरे जवाहरात को शोध-साधकर ही चतुर वैद्य औषध के रूप में उपयोग करता है और अश्रुत फल दिखलाता है। हमारे पूर्वज ऋषियों और तपस्वियों के अथक-अनवरत परिश्रम एवं खोज का ही फल संस्कृत साहित्य के भांडार में पड़ा है और यदि हम उसके महत्त्व को समझते तथा उसमें लगे रहते तो आज भी हम किसी से पीछे न रहते। आज हमको अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच में लिखे ग्रंथों पर निर्भर होने की जरूरत न पड़ती।
—इसी पुस्तक से
विश्व की प्राचीनतम सुसंपन्न भाषा संस्कृत और प्राचीनतम भारतीय संस्कृति पर देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के विद्वत्तापूर्ण आलेखों और व्याख्यानों का सर्वोपयोगी संकलन संस्कृत और संस्कृति।
Sanskriti Ki Satta by Dr. Dayanidhi Misra
न संस्कृति कोई भौतिक वस्तु है; न समाज; न इतिहास प्रदत्त। किसी विशिष्ट मानव समुदाय की सांस्कृतिक विशेषता उसके प्राणिक भौतिक रूप से अथवा व्यावहारिक संबंधों की रचना से निर्गलित होती है। वस्तुतः मानव समाज की रचना के सूत्र भी जिस विधि-विधान में संगृहीत होते हैं, उसका आधार मूल्यचेतना ही होती है। मूल्यचेतना निरपेक्षविधि यांत्रिक और अमानवीय होगी। इस मूल्यचेतना में ही संस्कृति का उत्स है। इस तरह संस्कृति अपने मूल रूप में ऐसी चेतना है, जो अनित्य व्यक्ति-सत्ता और ऐतिहासिक-सामाजिक सत्ता का अतिक्रमण करती है, किंतु जिसकी अभिदृष्टि से सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन मूल्यवान होते हैं। रचनानुभूति और अंतरंगसाधना से उच्छलित हो, संस्कृति एक संदेश के रूप में प्रवाहित होती है।
—इसी पुस्तक से
Sanskritik Rashtravaad by Prabhat Jha
हमारे देश की एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति है। यही कारण है कि हमारे देश के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ही संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार शरीर बिना आत्मा के निरर्थक है, उसी प्रकार संस्कृति से रहित देश निष्प्राण हो जाता है। भारत देश मूलतः संस्कृति प्रधान देश है। हमारे यहाँ जीवन मूल्यों का महत्त्व है, हमारे राष्ट्र का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अजर-अमर है।
हमारे राष्ट्र की मूल अवधारणा का केंद्र-बिंदु ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। हमारी संस्कृति विश्व को जोड़ने का कार्य करती है। भारतीय आत्मा की सृजनात्मक अभिव्यक्ति सबसे पहले दर्शन, धर्म व संस्कृति के क्षेत्रों में हुई।
भारत को ‘भारतमाता’ कहना ही हमारे ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के संस्कार को दरशाता है। हमारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ही यह देन है कि हम अपने देश में पत्थर, नदियाँ, पहाड़, पेड़-पौधे, पक्षी और संस्कृति पोषक को सदैव पूजते हैं। हमारी उदारता, संवदेनशीलता, मानवता के साथ-साथ सहिष्णुता का मूल कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत ही है।
राष्ट्रवादी विचारधारा ने अपनी सैद्धांतिक निष्ठाओं में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को महत्त्वपूर्ण क्यों माना है। किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के क्या मायने? क्या संस्कृति से कटकर कोई राष्ट्र प्रगति कर सकता है? ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का यह सही स्वरूप जन-जन तक पहुँचे, इसी दृष्टि से इस पुस्तक का संयोजन किया गया है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ विषय को राष्ट्रवादी विचारधारा के शीर्ष नेतृत्व एवं कुछ प्रसिद्ध लेखकों के विचारों और लेखों के माध्यम से रखने का प्रयत्न किया है।
Sanskritik Utthan Ka Marg by Ram Sahay
आज समाज में जीवन-मूल्य, नैतिकता, पारस्परिकता, परोपकार आदि लुप्तप्राय हो रहे हैं। समसामयिक विषयों पर लिखे गए ये लेख-घटनाएँ-प्रसंग ज्ञानवर्धक हैं। यह सामग्री पाठकों को संस्कारित करेगी और उनमें समाज के प्रति कर्तव्यभाव जाग्रत् करेगी, ऐसा विश्वास है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’, ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का मूलमंत्र हृदयंगम कर अगर हर भारतीय अपना सकारात्मक योगदान करेगा तो निश्चित रूप से भारत पुनः शीर्ष पर पहुँच सकेगा, यह पुस्तक इसी संदेश को प्रसारित करने का उपक्रम है। समाज-जागृति की दिशा में यह सामग्री अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है और सामाजिक क्षेत्र में यह भावी पीढि़यों के लिए एक दर्पण का काम करेगी।
आज की प्रजातंत्रीय व्यवस्था में व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परम आवश्यक है। ये लेख इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होंगे। इस पुस्तक में महापुरुषों के जीवन से जुड़ी जिन घटनाओं का उल्लेख है, वे पाठक के लिए पथ-प्रदर्शक के रूप में अपना विशेष महत्त्व रखती हैं। इसकी विषयवस्तु पाठकों में अध्ययन के प्रति उत्कंठा पैदा करेगी। इन लेखों का प्रकाशन लोगों में पठन के प्रति रुचि जाग्रत् करेगा और उन्हें सुसंस्कृत बनाएगा।
Sanskrti Ek : Naam Roop Anek by Devendra Swaroop
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘पश्चिम के प्राण यदि पाउंड, शिलिंग, पेंस में बसते हैं तो भारत के प्राण धर्म में बसते हैं। भारत धर्म में जीता है। धर्म के लिए जीता है। धर्म ही भारत की आत्मा है।’ भारत का यह मूल तत्त्व उसकी सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह विभिन्न रूपों में सर्वत्र व्याप्त है। आज भी बदरीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ, वैष्णो देवी और कैलास मानसरोवर तक की दुर्गम यात्रा-मार्ग पर भक्ति-गीत गाते युवाओं की टोली उस धर्म-युग का प्रकटीकरण ही तो है। ज्ञान-विज्ञान की आधुनिकता के साथ कुंभ मेले में करोड़ों जन का उमड़ आना भी यही दरशाता है। धर्म-अध्यात्म की कथा के वाचकों-उपदेशकों के आयोजनों में समृद्ध, संभ्रांत और शिक्षित वर्ग भी खिंचा चला आता है। स्वाध्याय परिवार, गायत्री परिवार, स्वामीनारायण संप्रदाय, राधास्वामी, निरंकारी समागम के समारोहों में लाखों की संख्या में लोग सम्मिलित होते हैं। इसका कारण यह है कि हमने धर्म को सर्वोपरि माना, उपासना पद्धति की एकरूपता का आग्रह कभी नहीं रखा; उपासना की विविधता को शिरोधार्य किया। भारतीय समाज जीवन में कभी कोई एक मजहबी केंद्र या चर्च नहीं रहा। ऐसा वैविध्यपूर्ण समाज 1300 वर्ष तक इसलाम व ईसाइयत की एकरूपतावादी विचारधारा से जूझता रहा है। इसके बावजूद उसने अपना मूल चरित्र बनाए रखा है।
भारतीय संस्कृति का माहात्म्य स्थापित करनेवाली चिंतनपरक पुस्तक।
Sanskrtik Virasat Ke Dhani : Bharat Aur Japan by Shila Jhunjhunwala
जापान में भी ईश्वर की पूजा-अर्चना, सेवा, देवों का आह्वान करने की रीतियाँ भारतीय जीवन से बहुत कुछ मिलती-जुलती हैं। भारत की तरह जापान में भी मकान बनाने से पहले भूमि-पूजन करते हैं। परिवार के मंगल के लिए पितरों से आशीर्वाद लेते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा का दर्शन वहाँ भी होता है।
जापान की पौराणिक कहानियों में पत्थर में परिवर्तित हुई लड़की अपने श्रीरामचरितमानस की अहल्या जैसी ही लगती है और जापान की सूर्य उपासना की पद्धति भारत के सूर्य नमस्कार के जैसी ही है। जिस प्रकार हिंदू कोई धर्म नहीं है, एक जीवन पद्धति है, उसी प्रकार शिंतो भी प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य की जीवन पद्धति है, जिसका किसी दर्शन, धर्म, ग्रंथ अथवा उपदेश से साम्य नहीं है, बस वह रहन-सहन का एक तरीका भर है।
जापान में भी दीपावली की तरह जगमगाहट है; होली की तरह रंगों की फुहार है; पतंगों के उत्सव में भिन्न-भिन्न प्रकार के पतंगों से रँगा हुआ पूरा आसमान है; शादी-विवाह के मौकों पर संगीत से सजी हुई महफिलें हैं तो साकुरा के बागों तले फूलों की अल्हड़ बरसात है; कठपुतलियों के नृत्य हैं। काबुकी के रंग-मंच में अभिनय के रंगों में रँगी हुई कोमल भावनाएँ हैं और भारत से मिलता-जुलता हर जगह बहुत कुछ है।
यह पुस्तक इन्हीं अनुभवों पर आधारित एक प्रतिबिंब है, जिसमें जापान के अनेक रंगों को समेटने का प्रयास किया गया है।
Sant Kathayen Marg Dikhayen by Renu Saini
समाज में व्यभिचार, हिंसा, ईर्ष्या बढ़ती ही जा रही है। ऐसा नहीं है कि मनुष्यों के अंदर पलनेवाले इन दुर्भावों को नहीं रोका जा सकता, अवश्य रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए आवश्यकता है ऐसी कथाओं की, जो व्यक्तियों को कम समय में एक बड़ी शिक्षा दें और उन्हें भँवर से बाहर निकालें।
संत हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, वे हमें सही राह दिखाते हैं। इस पुस्तक में अनेक संतों की ऐसी कथाएँ हैं, जो व्यक्ति को न सिर्फ प्रभावित करेंगी, बल्कि उसके कदम गलत मार्ग पर पड़ने से भी बचाएँगी। कई व्यक्तियों के पास इतना समय नहीं होता कि वे पुस्तकों के बड़े अध्याय या कहानियों को पढ़ पाएँ, इसलिए इस पुस्तक में सरल भाषा में हर कहानी को केवल एक पृष्ठ तक ही समेटने का प्रयास किया गया है। जीवन में सद्गुणों का विकास करने का मार्ग दिखाती संत कथाएँ।
Sant Ravidas Ratnawali by Mamta Jha
संत रविदास रत्नावली
संत रविदास का जन्म वाराणसी के निकट मंडूर नामक गाँव में संवत् 1433 को माघ पूर्णिमा के दिन माना जाता है। उनके विभिन्न नाम हैं—रविदास, रैदास, रादास, रुद्रदास, सईदास, रयिदास, रोहीदास, रोहिदास, रूहदास, रमादास, रामदास, हरिदास। इनमें से रविदास तथा रैदास दो नाम तो ऐसे हैं, जो दोनों ही उनकी रचनाओं में उपलब्ध होते हैं।
बचपन से ही उनकी रुचि प्रभु-भक्ति और साधु-संतों की ओर हो गई थी। बड़ा होने पर उन्होंने चर्मकार का अपना पैतृक काम अपना लिया। जूता गाँठते हुए वे प्रभु भजन में लीन हो जाते। जो कुछ कमाते, उसे साधु-संतों पर खर्च कर देते।
रविदास ने उस समय के प्रसिद्ध भक्त गुरु रामानंद से दीक्षा ली। उन्होंने ऊँच-नीच के मत का खंडन किया। वे अत्यंत विनीत और उदार विचारों के थे। उनकी भक्ति उच्च दर्जे की थी। वे कठौती में ही गंगाजी के दर्शन कर लिया करते थे।
‘संत रैदास की वाणी’ में 87 पद तथा 3 साखियों का संकलन ‘रैदास’ के नाम से हुआ है, जिनमें से लगभग सभी में ‘रैदास’ नाम की छाप भी मिलती है। प्रस्तुत पुस्तक में संत रविदास के आध्यात्मिक जीवन, उनकी रचनाओं, उनके जप-तप और समाज-उद्धार के लिए किए गए कार्यों का सीधी-सरल भाषा में विवेचन किया गया है।
Santon Ke Prerak Prasang by Surendra Singh Negi
हमारा देश संतमहात्माओं एवं ऋषिमुनियों का देश है। उनकी सांसारिक पदार्थों में आसक्ति नहीं होती। वे सिर्फ जीने भर के लिए जरूरी चीजों का सीमित मात्रा में उपभोग करते हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ से संत का कोई प्रयोजन नहीं है। ऐसा सात्त्विक तपस्वी जीवन सबके लिए अनुकरणीय होता है।
संत का जीवन जीना साधारण मानव के बस की बात नहीं है। संतजीवन में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जो लोग आदर्श गृहस्थ धर्म को निभाते हैं, वे धन्य हैं। जो लोग मेहनत से, उचित साधनों से आजीविका अर्जित करते हैं, व्यवहारकुशल हैं, परहितकारी हैं, खुद जीते हैं और दूसरों को जीने देते हैं, ऐसे मानव भी किसी संत से कम नहीं हैं।
प्रस्तुत पुस्तक का प्रत्येक दृष्टांत जीवन के बारे में स्पष्ट दृष्टि देता हुआ अमूल्य संदेश देता है। इस आपाधापी भरे युग में जो व्यक्ति सत्संगों का लाभ नहीं उठा पाते, उन्हें इस पुस्तक के द्वारा बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
संतों के प्रेरणाप्रद जीवन का सार यदि हम जीवन में उतारें तो सुखसंतोष से परिपूर्ण होगा हमारा जीवन।
Santosh Goyal Ki Lokpriya Kahaniya by Santosh Goyal
विष्णु प्रभाकर
संतोष गोयल अपनी कहानियों में परंपरागत साँचे की चिंता नहीं करती। इन कहानियों में न आदी है, न अंत। वह सहज-सरल भाषा में वातावरण निर्माण करती है।
डॉ. नामवर सिंह
संतोष की कहानियाँ परंपरागत कथानक की अवधारणा को तोड़कर निकली हैं। ये सच्चे अनुभवों की जीवंत व प्रभावशाली कहानियाँ हैं, जो पाठक को सोचने को विवश करती हैं।
डॉ. निर्मला जैन
संतोष की कहानियों की सहज पठनीयता व आभासहीनता उन्हें विशिष्ट बनाती है। प्रत्येक कहानी एक-दूसरे से भिन्न है। वस्तुतः ये कहानियाँ जीवन यात्राएँ हैं। कथ्य का वैविध्य संतोष की विशिष्ट उपलब्धि है।
श्रवण कुमार
संतोष की कहानियाँ अपनी तरह की विशिष्ट हैं, जिनकी बनावट बहुत महीन है; वे मन के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म तार पकड़ती हैं। ये कहानियाँ सरल रेखीय नहीं है। जटिल से जटिलतर समस्याओं से दो चार होती हैं, फिर भी सहज व सरल होती हैं।
चंद्रकांता
आज दोराहे पर खड़ी तनावग्रस्त स्त्री की वेदना को व्यक्त करती ये कहानियाँ संतोष को विशिष्ट कहानीकार बनाती हैं। मानव मन के विभिन्न अध्यायों का इतना बारीक व महीन अध्ययन और चित्रण संतोष की अतिरिक्त विशेषता है।
Sapanon Bhare Din by Ramdarash Mishra
रामदरश मिश्र के कथा-साहित्य में से किशोर चरित्रों और उनके परिवेश के इर्द-गिर्द सृजित कहानियों का यह महत्त्वपूर्ण संकलन है। किशोर सुलभ रोचक प्रसंगों से भरपूर इनको पढ़ने का एक अलग ही आनंद है। इसमें पंद्रह कहानियों के साथ चार उपन्यासों से चयनित अंश और उनकी डायरी का एक अंश शामिल है। लेखक द्वारा गढ़े गए किशोर चरित्रों की जीवंतता की व्यापकता हास्य, व्यंग्य, करुणा, वात्सल्य आदि रस-रंग से सराबोर है। कहानियों में अनेक ऐसे प्रसंग भी हैं, जो मात्र किशोरवय को ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को समग्रता के साथ प्रस्तुत करते हैं और किशोरों को स्वयं को समझने तथा सँवारने की नई दृष्टि प्रदान करते हैं। जिए हुए जीवन से उत्पन्न लेखक की गहन अनुभूतियाँ इन कहानियों को पाठक के लिए सहज संप्रेष्य बनाती हैं।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े मनीषियों के लिए कुछ नवीन आयामों को उजागर करने में यह संकलन सहायक सिद्ध होगा। साथ ही भारतीय बाल-साहित्य के विशेष संदर्भ में इनका पठन-पाठन अध्येताओं के लिए भी उपयोगी है।
कहानियों की भाषा-शैली भी परिवेशगत सहजता से ओतप्रोत है। जहाँ शहरी या कस्बाई वातावरण में शब्दों का सौंदर्य है तो वहीं ग्रामीण परिवेश में देशज शब्दों की मिठास है। कथ्य और अभिव्यक्ति दोनों ही दृष्टियों से यह संग्रह पठनीय व किशोरोपयोगी है।