Vedon Ki Kathayen by Harish Sharma

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वेदों की कथाएँ
कहते हैं धर्म वेदों में प्रतिपादित है। वेद साक्षात् परम नारायण है। वेद में जो अश्रद्धा रखते हैं, उनसे भगवान् बहुत दूर हैं। वेदों का अर्थ है—भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। वास्तव में जीवन को सुंदर व साधक बनानेवाला प्रत्येक विचार ही मानो वेद है। मैक्स म्यूलर का तो यहाँ तक कहना था कि वेद मानव जाति के पुस्तकालय में प्राचीनतम ग्रंथ हैं।
वेद संख्या में चार हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद। वेद का शाब्दिक अर्थ है ‘ज्ञान’ या ‘जानना’। ये हमारे ऋषि-तपस्वियों की निष्कपट, निश्छल भावना की अभिव्यक्ति हैं। इनमें जीवन को सद्मार्ग पर प्रशस्त करने का आह्वान है। इतना ही नहीं, वेदों में आत्मा-परमात्मा, देवी-देवता, प्रकृति, गृहस्थ-जीवन, सृष्टि, लोक-परलोक के साथ-साथ नाचने-गाने आदि की बातें भी निहित हैं। इन सबका एक ही उद्देश्य है—मानव-कल्याण।
एक ओर जहाँ वेदों में ईश-भक्ति और अध्यात्म की महिमा गाई गई है, वहीं दूसरी ओर कर्म को ही कल्याण का मार्ग कहा गया है।
वेद हमारे अलौकिक ज्ञान की अनुपम धरोहर हैं। अत: इनके प्रति जन-सामान्य की जिज्ञासा होना स्वाभाविक है, इसलिए वेदों के गूढ़ ज्ञान को हमने कथारूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। इन कथा-कहानियों के माध्यम से सुधी पाठक न केवल इन्हें पढ़-समझ सकते हैं, बल्कि पारंपरिक वैदिक ज्ञान को आत्मसात् कर लोक-परलोक भी सुधार सकते हैं।

Veer Savarkar by Kavita Garg

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Vinayak Damodar Savarkar was a brave and staunch patriot. He was born on 28th of May, 1883, in a village called Bhagoor near Nasik in Maharashtra. His parents were from a middle-class background. His mother, Radhabai was a religious lady. She was extremely kind and honest. His father, Pt. Damodar Pant was known far and wide for his knowledge.
As a child, Savarkar used to be called ‘Tatya’ by the family members. Mother Radhabai used to call her son ‘Vinayak’ with great affection. Vinayak, the little boy, was brought up with great love and care. Due to the religious environment at home, the child used to get a lot of opportunities to regularly listen to the chapters from the Ramayana and the Gita. This had a deep impact on his life.

Veer Shivaji by Kapil

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Veer Shivaji was born on April 16, 1627 in Shivneri Durg. His father was Shahji Bhonsle and his mother was Jija Bai.
During that time in India, there was the rule of Muslim Emperors. Hindu warriors were shedding the blood of their own kith and kin and were engaged in pleasing the Muslim kings. Hindu blood was shed and Muslims ruled over India.
At the time of the birth of Shivaji, his father Shahji Bhonsle went to the south to fight with his opponent, Mughal Knight Darya Khan Rohilla. Therefore he could not reach Shivneri to celebrate the birth of his son. After killing Rohilla he reached Shivneri to see his son. He was very pleased to see such a beautiful son. But he was not able to stay long with his son. He went towards south India at the invitation of the Mughal Emperor Shah Jahan.

Veer Usko Janiye by Navin Gulia

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वीर उसको जानिए

‘वीर उसको जानिए’ एक ऐसे असाधारण व्यक्‍ति की प्रेरणात्मक कथा है, जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। वह अपने जीवन में अगणित कठिनाइयों का सामना करता है, जिनका किसी व्यक्‍ति के लिए अनुमान लगा पाना भी कठिन है; किंतु वह व्यक्‍ति हतोत्साहित नहीं होता और हर कठिनाई का सामना मुस्तैदी से करते हुए अपनी राह पर बढ़ता रहता है।
इस पुस्तक का यही संदेश है कि हमें न सिर्फ खेल के मैदान में, अपितु अपने जीवन में भी एक खिलाड़ी ही होना चाहिए और एक खिलाड़ी की तरह ही कठिनाइयों का सामना साहस व उत्साह के साथ करते हुए अपने उद‍्देश्‍य की ओर बढ़ना चाहिए। एक खिलाड़ी अपने सामने किसी भी बाधा, कठिनाई अथवा चुनौती को देखकर हतोत्साहित नहीं होता; बल्कि वे कठिनाइयाँ, बाधाएँ और चुनौतियाँ उसे प्रेरित करती हैं।
यह पुस्तक मात्र विद्यार्थियों को ही नहीं, जीवन में कुछ कर गुजरने की इच्छा रखनेवाले पुरुषार्थी लोगों के लिए भी प्रेरणादायी है।

Veeron Ke Veer by Kittu Reddy

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यह पुस्तक भारतीय सेना के वीरों की गाथा है । बहुत खेद की बात है कि इनमें से अधिकांश पराक्रमी वीरों, जिनमें से कुछ ने तो देश के लिए अपने जीवन का बलिदान भी दिया है, के बारे में सेना में भी कोई खास जानकारी नहीं है और सामान्य जनता में तो शायद ही कोई जानता होगा ।विश्‍वास है कि इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय सेना के इन वीरों और शहीदों को सही पहचान मिल पाएगी; और यह पहचान भारतीय सेना के अफसरों एवं जवानों को प्रेरणा भी देगी । साथ ही यह भी आशा की जाती है कि राष्‍ट्र के लिए इन वीरों ने जो महान् कार्य किया है, उससे सेना की नई पीढ़ी में एक नया विश्‍वास पैदा होगा ।यह पुस्तक मुख्य रूप से युवा अफसरों और सिपाहियों के लिए लिखी गई है । यह इन्हें हमारी सैन्य संस्कृति की परंपराओं की याद दिलाएगी । साथ ही आम पाठकों में भी वीरोचित एवं साहसिक कार्यों के लिए यह प्रेरणा- दायक सिद्ध होगी, ऐसा विश्‍वास है ।

Vein of Iron by Ellen Glasgow

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Published in 1935, Ellen Glasgow’s novel ‘Vein of Iron’ is considered to be one of her best. The story opens in the years just before the first World War and laid in the Valley of Virginia. The book traces the experience of a family with four generations of strong women. Faced with a crisis when the bread-winner, a philosopher-minister, is defrocked for his unorthodox views, the women provide the “vein of iron” which carries the family through removal to Queensboro, through war and depression until the final return to the mountains.

Venus in Furs by Ritter von Leopold Sacher-Masoch

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Venus in Furs’ is a novella by the Austrian author Leopold von Sacher-Masoch. It was first published in 1870. The novel draws themes, like female dominance and sadomasochism, and character inspiration heavily from Sacher-Masoch’s own life. Wanda von Dunajew is the novel’s central female character, was modelled after Fanny Pistor, who was an emerging literary writer. The two met when Pistor contacted Sacher-Masoch, under assumed name and fictitious title of Baroness Bogdanoff, for suggestions on improving her writing to make it suitable for publication.

Vibhajan Ki Trasadi by Munish Tripathi

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आजादी का जश्न अभी क्षितिज तक भी न चढ़ सका था कि मुल्क के दो फाड़ होने का बिगुल बज गया और सांप्रदायिक सद्भाव तार-तार हो गया, जिसके साथ ही दोनों तरफ की बेकसूर आवाम के खून का एक दरिया बह निकला। लाखों लोग मारे गए। करोड़ों बेघर हुए। लगभग एक लाख महिलाओं, युवतियों का अपहरण हुआ। यही बँटवारा इस पुस्तक का मुख्य मुद्दा है, जो लेखक की कड़ी मेहनत और बरसों की शोध का नतीजा है। बँटवारे में मरनेवालों का सरकारी आँकड़ा केवल छह लाख दर्ज है, लेकिन इस संदर्भ में अगर तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी मोसले पर गौर करें तो वह गैरसरकारी आँकड़ा दस लाख दरशाता है, यानी कि बँटवारे में छह लाख नहीं, बल्कि दस लाख लोग मारे गए। गौरतलब है कि न पहले और न ही बाद में, इतना बड़ा खून-खराबा और बर्बरता दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुई।
अब एक बड़ा सवाल उठता है कि देश का विभाजन आखिर सुनिश्चित कैसे हुआ? क्या जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद इसके लिए जिम्मेदार था या फिर अंग्रेजों की कुटिल नीति? क्या गांधी और कांग्रेस के खून में बुनियादी रूप से मुसलिम तुष्टीकरण का बीज विद्यमान था, जिसने अंततः बँटवारे का एक खूनी वटवृक्ष तैयार किया और जिसकी तपिश आज भी ठंडी नहीं हो पाई है।
विभाजन की त्रासदी और विभीषिका का वर्णन करती पुस्तक, जो पाठक को उद्वेलित कर देगी।

Vicharakon Ki Drishti Mein Ekatma Manavvad by Prabhat Jha

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पंडित दीनदयालजी ने भारतीय जीवन दर्शन का गहन अध्ययन कर ‘एकात्म मानववाद’ प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने पाश्चात्य से मानववाद और भारतीय संस्कृति से एकात्मता ग्रहण किया। अतः कहा जा सकता है कि पाश्चात्य मानववाद के भारतीयकरण की प्रक्रिया की फलश्रुति एकात्म मानववाद है।
भारतीय संस्कृति समाजवादी नहीं है। वह किसी व्यक्ति या पुरुष को अंतिम प्रमाण नहीं मानती। इसका वैशिष्ट्य है वादे वादे जायते तत्त्वबोधः। तत्त्व का बोध विचारविमर्श से होता है। इसीलिए भारतीय परंपरा उपनिषदों और दर्शनों की परंपरा है। भारतीय संस्कृति पर-मत सत्कारवादी है। दूसरे के मत के प्रति असहिष्णुता अमरप्रियता है। भारत का विचार है एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति अर्थात् एक ही सत्य को विद्वान् लोग अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संस्कृति की अवधारणा चिति मूलक है। भारतीय संस्कृति जीवन का केंद्र राज्य को नहीं धर्म व संस्कृति को मानती है। भारतीय संस्कृति विश्ववादी, समन्वयवादी और संस्कारवादी है। भारतीय संस्कृति यज्ञामयी है, यज्ञ का भाव है।
एकात्म मानववाद समग्रता में सभी चीजों का विचार करता है। एकात्म मानववाद को सरल और सहज भाषा में इस विचार के अनेक पोषकों ने अपने शब्दों में इस पुस्तक में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। एकात्म मानववाद को संपूर्णता में, भारतीय संस्कृति में, अपने जीवनदर्शन में, समन्वय और सुगमता के साथ पूरकता में समझाने का प्रयास लेखकों द्वारा किया गया है। यह कृति एकात्म मानववाद को आमजन के लिए सरल और सुबोध प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है।

Victor Ollnee’s Discipline by Hamlin Garland

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Saturday had been a strenuous day for the baseball team of Winona University, and Victor Ollnee, its redoubtable catcher, slept late. Breakfast at the Beta Kappa Fraternity House on Sunday started without him, and Gilbert Frenson, who never played ball or tennis, and Arnold Macey, who was too effeminate to swing a bat, divided the Sunday morning Star between them.

Victorian Short Stories of Troubled Marriages

A delightful collection of short stories by some of the luminary authors of the Victorian era. These stories explore the truth behind the Victorian marriage. – Summary by Gina Belmonde

Victorian Short Stories of Troubled Marriages The Bronckhorst Divorce-Case by Rudyard Kipling, Ella D’Arcy, Arthur Morrison, Arthur Conan Doyle, and George Gissing

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Bronckhorst was not nice in any way. He had no respect for the pretty public and private lies that make life a little less nasty than it is. His manner towards his wife was coarse. There are many things—including actual assault with the clenched fist—that a wife will endure; but seldom a wife can bear—as Mrs. Bronckhorst bore—with a long course of brutal, hard chaff, making light of her weaknesses, her headaches, her small fits of gaiety, her dresses, her queer little attempts to make herself attractive to her husband when she knows that she is not what she has been, and—worst of all—the love that she spends on her children. That particular sort of heavy-handed jest was specially dear to Bronckhorst. I suppose that he had first slipped into it, meaning no harm, in the honeymoon, when folk find their ordinary stock of endearments run short, and so go to the other extreme to express their feelings. A similar impulse makes a man say, ‘Hutt, you old beast!’ when a favourite horse nuzzles his coat-front. Unluckily, when the reaction of marriage sets in, the form of speech remains, and, the tenderness having died out, hurts the wife more than she cares to say. But Mrs. Bronckhorst was devoted to her ‘Teddy’ as she called him. Perhaps that was why he objected to her. Perhaps—this is only a theory to account for his infamous behaviour later on—he gave way to the queer, savage feeling that sometimes takes by the throat a husband twenty years married, when he sees, across the table, the same, same face of his wedded wife, and knows that, as he has sat facing it, so must he continue to sit until the day of its death or his own. Most men and all women know the spasm. It only lasts for three breaths as a rule, must be a ‘throw-back’ to times when men and women were rather worse than they are now, and is too unpleasant to be discussed.

Victorian Short Stories: Stories of Successful Marriages by Walter Besant et al.

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Mr and Mrs Openshaw came from Manchester to settle in London. He had been, what is called in Lancashire, a salesman for a large manufacturing firm, who were extending their business, and opening a warehouse in the city; where Mr Openshaw was now to superintend their affairs. He rather enjoyed the change; having a kind of curiosity about London, which he had never yet been able to gratify in his brief visits to the metropolis. At the same time, he had an odd, shrewd contempt for the inhabitants, whom he always pictured to himself as fine, lazy people, caring nothing but for fashion and aristocracy, and lounging away their days in Bond Street, and such places; ruining good English, and ready in their turn to despise him as a provincial. The hours that the men of business kept in the city scandalized him too, accustomed as he was to the early dinners of Manchester folk and the consequently far longer evenings. Still, he was pleased to go to London, though he would not for the world have confessed it, even to himself, and always spoke of the step to his friends as one demanded of him by the interests of his employers, and sweetened to him by a considerable increase of salary.
—from this book

Vidhya Vindu Singh Ki Lokpriya Kahaniyan by Vidhya Vindu Singh

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लोक संस्कृति में रची-बसी भारतीय संस्कृति को पहचान देने में निरंतर साधना करनेवाली विद्या विंदु सिंह की कहानियाँ गाँव की संस्कृति बाँचती हैं। उनके कथा साहित्य में नारी विमर्श का एक नया रूप प्रस्तुत होता है। उनके पात्र संघर्षों से जूझते हैं, आग में तपकर स्वयं को सोने सा निखारते हैं। वे केवल अपने लिए नहीं जीते, समाज का ऋण चुकाते हुए जीते हैं और स्वयं को एक ऐसी आभा देते हैं कि उनके आलोक में लोग मार्ग पा सकें।
यह उत्सर्ग भाव स्वयं को मिटाने के लिए नहीं, स्वयं को पहचान देने का है, जीवन की सार्थकता पाने का है। ये पात्र सिद्ध करते हैं कि स्त्री दया या करुणा की पात्र नहीं, सबके प्रति ममत्व बिखेरने वाली शक्ति है।
गाँव की जमीन से जुड़ी ये कहानियाँ आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति के पीछे भागते हुए अशांत मन को विश्राम देने का आमंत्रण देती हैं। टूटते परिवारों के बीच उठती दीवारों को पारदर्शी बनाकर रूठों को मनाने का न्योता देती हैं।
इन कहानियों को पढ़कर मन में आश्वस्ति जगती है कि अवध की लोक संस्कृति में रचा-बसा मन आज भी सीता-राम की संस्कृति का संवाहक है। इन कहानियों में शहर में रहते हुए भी गाँव की जोड़ने वाली संस्कृति का रस है, वापस जमीन से जुड़ने का चाव है। इसमें वरिष्ठ नागरिकों का दर्द है, उपेक्षित कन्या के महत्त्वपूर्ण अस्तित्व की पहचान है। अबला कही जाने वाली नारी का पुरुषार्थ और पराक्रम है, जो सहारा पाने से अधिक, सहारा देने में विश्वास रखती है।

Vidhyarthiyon Ke Liye Gita by Acharya Mayaram ‘Patang’

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‘गीता’ कालजयी ग्रंथ है। यह भक्ति के साथ-साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करती है। अपने कर्तव्य-पथ से भटक रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर ही कर्म-पथ पर प्रवृत्त किया। इसलिए हमारे जीवन में गीता का बहुत व्यावहारिक उपयोग है, महती योगदान है।
विद्यार्थी काल में ही गीता का भाव समझ गए तो यह जीवन में पग-पग पर काम आएगा। जीने की कला आ जाएगी। आपत्तियों तथा कष्टकर परिस्थितियों में निराशा नहीं घेरेगी। अपने-पराए और मित्र-शत्रु के मोह से मुक्त होने का ज्ञान हो जाएगा। अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर गीता पढ़ते हैं। जब सारा जीवन मोह, लोभ, काम, क्रोध और अहंकार की भेंट चढ़ गया, दुःख और संतापों का ताप सह लिया, तिल-तिल कर मरते रहे, फिर गीता पढ़ी तो क्या लाभ हुआ? पाप और पुण्य कर्मों का फल तो भोगना निश्चित ही हो गया!
इस पुस्तक को विशेष रूप से छात्रों-विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गीता के हर अध्याय में जो महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं, जिन्हें स्मरण किया जा सके, गाया जा सके, उन्हें संकलित किया गया है। स्पष्ट है कि यह संपूर्ण गीता नहीं है, बल्कि मात्र प्रेरणा है। इसे पढ़कर छात्र सन्मति पाएँ, नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचें, यही इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य है।
विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण तथा कर्तव्य-पथ पर सतत चलने की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम पुस्तक।

Vidrohi Sannyasi by Rajeev Sharma

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श्री नगर से कामरूप-कामाख्या और कलकत्ता से कोच्चि तक आदिशंकर के नाम की पारसमणि हमारा मार्ग प्रदीप्त करती गई। उस महान् यात्री के पदचिह्न खोजते हुए अनायास ही भारत भर की प्रदक्षिणा कब संपन्न हो गई पता नहीं चला।
हर सुधार कालांतर में स्वयं रूढि़ बन जाता है, हर क्रांति को पोंगापंथी बनते हुए और मुक्ति-योद्धाओं को तानाशाह बनते देखना इतिहास की आदत है। वे विद्रोही थे, उन्होंने मानव बलि समेत तत्समय के ढोंग, पाखंड, वामाचार का प्राणपण से विरोध किया। संन्यासी होते हुए उनमें यह कहने का साहस था कि मैं न मूर्ति हूँ, न पूजा हूँ, न पुजारी हूँ, न धर्म हूँ, न जाति हूँ।
आदिशंकराचार्य के पास आज के युवाओं के सभी प्रश्नों का उत्तर है, उनकी जिज्ञासाओं और कुंठाओं के भी। उनसे बड़ा प्रबंधन गुरु कौन होगा, जिसने शताब्दियों पहले केरल के गाँव से यात्रा प्रारंभ कर संपूर्ण राष्ट्र की चेतना और जीवन-पद्धति को बदल दिया।
जो संन्यासी संसार के सारे अनुशासनों से परे हुआ करते थे, उन्हें अखाड़ों और आश्रमों में संगठित कर अनुशासित और नियमबद्ध कर दिया। बौद्धों और हिंदुओं के संघर्ष को शांत कर दिया। शैवों, वैष्णवों, शाक्तों, गाणपत्यों, सभी को एक सूत्र में पिरो दिया।
उस अद्भुत तेजस्वी बालक, चमत्कारी किशोर और सम्मोहक युवा शंकर की यह कथा आपको उनके विख्यात जीवन के अज्ञात प्रसंगों का दिग्दर्शन करा पाएगी, यह इस पुस्तक का विनम्र उद्देश्य है।

Vidur Neeti by Satyaketu

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महाभारत हिंदू सभ्यता और संस्कृति का एक पावन धर्मग्रंथ है। इसका आधार अधर्म के साथ धर्म की लड़ाई पर टिका है। इसे पाँचवाँ वेद भी कहा जाता है। महाभारत में ही समाहित ‘श्रीमद‍्भगवद‍्गीता’ एवं ‘व‌िदुर नीति’ इसके दो आधार-स्तंभ हैं। एक में भगवान् श्रीकृष्ण अधर्म के विरुद्ध अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं तो दूसरे में महात्मा विदुर युद्ध टालने के लिए धृतराष्‍ट्र को अधर्म (दुर्योधन) का साथ छोड़ने के लिए उपदेश करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण तो अपने उद‍्देश्‍य में सफल हो जाते हैं, लेकिन विदुर के उपदेश धृतराष्‍ट्र का हृदय-परिवर्तन नहीं कर पाते, जिसका परिणाम महाभारत के युद्ध के रूप में सामने आता है। लेकिन इसके लिए हम विदुरजी की नीति को विफल नहीं ठहरा सकते। उनका प्रत्येक उपदेश अनुभूत है और काल की कसौटी पर भलीभाँति जाँचा-परखा है; जैसे कि ‘पाँच लोग छाया की तरह सदा आपके पीछे लगे रहते हैं। ये पाँच लोग हैं-म‌ित्र, शत्रु, उदासीन, शरण देने वाले और शरणार्थी।’
द्वापर युग की देन ‘व‌िदुर नीति’ आज कलियुग में कहीं अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आज दुनिया में दुर्योधनों की बाढ़ सी आ गई है। अत: इसके उपदेशों से शिक्षा लेकर व्यक्‍ति, समाज, राज्य और देश को सुखी तथा कल्याणकारी बनाया जा सकता है।

Vidyalaya Utsav by Mayaram Patang

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‘उत्सव’ जीवन में उत्साह का संचार करते हैं। जिस समाज में उत्सव जितने जोश और आनंद से मनाए जाते हैं, वह समाज उतना ही जीवंत माना जाता है। भारतवर्ष अत्यंत प्राचीन देश है। यहाँ अवतारों, वीरों, धर्मगुरुओं की संख्या सहस्रों तक जाती है। विद्यालयों में सभी की जयंती मनाना संभव नहीं है। अनेक पर्व ऋतु-परिवर्तन से जुड़े हैं, अनेक पर्व किसी के बलिदान या महान् घटनाओं से जुड़े हैं। सच तो यह है कि हर तिथि और हर दिन का कुछ-न-कुछ महत्त्व है।
हमारे विद्यालयों में अधिकांश शिक्षक अनेक उत्सवों की जानकारी से ही अनभिज्ञ होते हैं। कुछ जानकारी होते हुए भी बोलने में संकोच करते हैं। कई नए शिक्षक बोलना चाहते हैं, परंतु उन्हें तत्संबंधी विषय की जानकारी उपलब्ध नहीं होती। इन सब कारणों पर विचार करके यह आवश्यकता अनुभव हो रही थी कि एक ऐसी पुस्तक होनी चाहिए, जो वर्ष भर में मनाए जानेवाले प्रमुख त्योहारों की जानकारी शिक्षकों तथा छात्रों को उपलब्ध करा सके। विविध कक्षाओं के स्तर के अनुसार शिक्षक इस पुस्तक की सहायता से छात्रों को लिखवाकर या याद करवाकर सभा में बोलने के लिए तैयारी करवा सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि ये उत्सव वे नहीं हैं, जो विद्यालयों में मनाए जाते हैं, बल्कि ये ऐसे उत्सव हैं, जो मनाए जाने चाहिए। आप अपने स्थान, स्तर, विश्‍वास तथा अनुकूलता के आधार पर जो मनाना चाहें, मना सकते हैं। इस कार्य में पुस्तक आपकी सहायता करेगी। आशा है, शिक्षक एवं छात्र इससे लाभान्वित होंगे।

Vidyalayon Mein Swasthya Shikshan by M.I. Rajaswi

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स्वास्थ्यशिक्षा शिक्षा का वह महत्त्वपूर्ण अंग है, जो मानव जाति को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए प्रेरित करता है। स्वास्थ्यशिक्षा किशोर वर्ग के लिए अत्यंत उपयोगी है। विद्वानों का मानना है कि छात्र देश का भविष्य होते हैं। अतः छात्रों का अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है। जब उनका स्वास्थ्य अच्छा होगा, तभी वे अपने अध्ययन कार्य में सफलता अर्जित कर सकेंगे।
प्रस्तुत पुस्तक में छात्रोपयोगी स्वास्थ्य से संबंधित सभी आवश्यक सामग्री प्रस्तुत की गई है। आशा है, यह पुस्तक छात्रअध्यापकों को ही नहीं, सभी वर्गों के पाठकों को समान रूप से पसंद आएगी।

Vidyarthiyon Hetu Vaidik Ganit by Rajesh Kumar Thakur

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गणित तमाम वैज्ञानिक और तार्किक सोच का आधार है। वैश्वीकरण और तकनीक की क्रांति के इस युग में गणित के आधार वाले युवाओं की आवश्यकता है।
वैदिक गणित युवा मस्तिष्क के विकास के साथ अंकगणितीय गणना चुटकियों में करने का प्रशिक्षण देता है। यह प्रतियोगिता का युग है और इस युग में टिके रहने तथा प्रतियोगिता में सफल होने के लिए ऐसी तकनीक को सीखना पड़ता है, जो कम समय में गणना करना सिखाती हो। वैदिक गणित गणना के समय को पारंपरिक विधि के मुकाबले लगभग 1/10 गुणा तक कम कर देता है। इसमें परिभाषित प्रमेय और फॉर्मूले सीखकर कोई भी बड़ी-से-बड़ी गणितीय पहेली/सवाल को सरलता से हल कर पाएगा।
समृद्ध भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के प्रयास की एक विनम्र प्रस्तुति है यह रोचक पुस्तक।

Vidyarthiyon Ke Liye Time Management by Mamta Mahrotra

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अपने मिनटों का ध्यान रखो, घंटे अपनी परवाह खुद कर लेंगे। हर काम को स्फूर्ति से निपटाएँ। टाल-मटोल न करें। अवसर को हाथ से न जाने दें। समय की कमी का रोना रोने की बजाय उसकी खेती करें, जो समय का ज्यादा दुरुपयोग करते हैं, वे ही समय की कमी की सबसे ज्यादा शिकायत करते हैं। यानी अपने 24 घंटे को किस तरह से 48 घंटे में बदल सकते हैं, वह करें। स्वेट मार्डेन का कहना है, ‘‘ईश्वर एक बार एक ही क्षण देता है और दूसरा क्षण देने के पूर्व उस क्षण को ले लेता है।’’ समय यानी टाइम का महत्त्व बताकर इसकी बखूबी मैनेजमेंट करना सिखानेवाली यह पुस्तक विद्यार्थियों को न केवल परीक्षाओं अपितु जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के मूलमंत्र बताती है।

Vidyarthiyon Mein Avishkarak Soch by Lakshman Prasad

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विद्यार्थियों में आविष्कारक सोच विकसित करना अत्यंत आवश्यक है ताकि वे किसी भी बात को स्वीकार करने से पहले उसका तर्कसंगत संज्ञान लें। इस दृष्टि से हिंदी में लिखी गई संभवतया एकमात्र और पहली पुस्तक है।
इसमें छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टि से सुसंपन्न करने और ‘नवाचार’ करने के लिए प्रेरित किया गया है। इसको प्रश्नोत्तर के रूप में लिखने का प्रयास किया गया है। छात्रों द्वारा उठाए गए सभी प्रश्नों के उत्तर बहुत ही सरलता से समझाने की कोशिश की गई है, जिससे वे आसानी से उनको आत्मसात् कर लें।
‘नवाचार’ शब्द को बहुत ही स्पष्ट और सरलता से पारिभाषित किया गया है। ‘खोज’ एवं ‘आविष्कार’ किस प्रकार से नवाचार से भिन्न होते हैं, उस पर भी प्रकाश डाला गया है।
पुस्तक में ‘नवाचार’ से संबंधित सभी पहलुओं जैसे—सृजनशीलता एवं नवाचार, शिक्षा एवं नवाचार, नवाचार का क्षेत्र, नवाचार की प्रक्रिया, नवाचार उत्पाद का नामकरण, नवाचार के लिए कार्यशाला, नवाचार पर आधारित उत्पाद का निर्माण, पेटेंट संबंधी जानकारी, नवाचार से लाभ, मान-सम्मान एवं पुरस्कार आदि पर प्रकाश डाला गया है, जिससे नवाचारी को नवाचार प्रक्रिया की जटिलता का आसानी से बोध हो सके।
पुस्तक में कुछ ऐसे सफल नवाचारियों के विषय में वर्णन किया गया है, जिन्होंने राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। इसके अलावा कुछ ऐसे नवाचारियों के बारे में भी उल्लेख किया गया है, जो करोड़पति के साथ-साथ लोकोपकारी भी बने और शिक्षण, सामाजिक संस्थान आदि की स्थापना भी की। आशा है कि ऐसे नवाचारियों के विषय में जानकर पाठकगण प्रेरित होंगे।

Vigyan Fantasi Kathayein by Prakash Manu

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किस्सेकहानियों की तरह विज्ञान की दुनिया भी कम अचरज से भरी नहीं है।
विज्ञान फंतासी कथाएँ प्रकाश मनु की विज्ञान कथाओं का ताजा संग्रह है, जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों के साथ ही खेल और कल्पना का भी वितान तना हुआ है और हर क्षण कुछ नया घटित हो रहा है, जो परीकथाओं की दुनिया से कहीं अधिक चित्ताकर्षक और जादुई है। मनुजी की विज्ञान कथाओं में कहीं उड़ते हुए रोबोटनुमा पेड़ की कल्पना है तो कहीं मन को नियंत्रित करनेवाले हाइटेक सुपर कंप्यूटर की। कहीं कोई रोबोट गिलगिल सेवन चौकीदार बनकर अपने रहस्यपूर्ण कारनामे से सबको अचंभित कर डालता है तो कहीं वह अनोखी चिडि़या शिंगाई फू शुम्मा के रूप में एक छोटे बच्चे को लंबी अंतरिक्ष यात्रा पर ले चलता है। ‘मंगल ग्रह की लाल चिडि़या’ और ‘चंद्रलोक की अदृश्य दुनिया’ सरीखी कहानियाँ चाँद और मंगल ग्रह पर मनुष्य अस्तित्व की संभावना की कुछ अधिक कल्पनाशीलता के साथ पड़ताल करती हैं। ‘गोपी की फिरोजी टोपी’ और ‘पप्पू की रिमझिम छतरी’ में कंप्यूटर और लेजर किरणों की दुनिया का एक आश्चर्यलोक है, जो आज भले ही खेल की तरह लग रहा हो, पर कल हकीकत में बदल सकता है। पुस्तक में ‘दुनिया का सबसे अनोखा सुपर हाइटेक चोर’ जैसी रोमांचक कहानियाँ हैं तो ‘प्रोफेसर जोशी बादलों के देश में’ जैसी अद्भुत कथाएँ भी, जो परीकथाओं के समांतर उड़ती हुई अपनी राह बनाती हैं।

Vijaydan Detha Ki Lokpriya Kahaniyan by Vijaydan Detha

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झोला की तीमारदारी में बहू और ग्यारह बरस का पोता भी लोगों के कहे-कहे जीप में बैठ गए।…और पीछे रह गई हञ्जा-माऊ—निपट अकेली! इतनी लंबी-लड़ाक जिंदगी में वह कभी अकेली नहीं रही। और न सपने में भी उसे अकेलेपन का कभी एहसास हुआ। घरवालों के बीच वह हरदम ऐसी आश्वस्त रहती थी, मानो सार-सँभाल के वज्र-कुठले में नितांत सुरक्षित हो! उसकी निर्बाध कुशलक्षेम में कहीं कोई कसर नहीं थी। और आज अकेली होते ही उसके अटूट विश्वास की नींव मानो अतल गहराई में धँस गई! बड़ी मुश्किल से पाँव घसीट-घसीटकर वह अस्पताल से अपने घर पहुँची।

वक्त तो कयामत की भी परवाह नहीं करता, फिर उस बामन की क्या औकात! रात-दिन का चक्र अपनी रफ्तार से चलता रहा और अपनी बारी से अमावस भी आ गई। इधर देवी परेशान थी। आखिर इस बखेडि़ये को यह क्या बेजा सूझी! अगर एक दफा लोगों के मन से देवी-देवताओं की आस्था उठ गई तो फिर कोई उनका नाम लेवा भी नहीं मिलेगा। दूसरे जीवों को तो अपने जीवन से परे कोई ध्यान ही नहीं। उनकी बला से भगवान् कल मरे या आज।
—इसी संग्रह से
भारतीय लोक संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं को नए प्रतिमान देनेवाले विजयदान देथा उपाख्य ‘बिज्जी’ ने अपनी प्रभावी लेखनी के माध्यम से शोषित, उपेक्षित और पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने का पुरजोर आग्रह किया। सामाजिक चेतना जाग्रत् करनेवाली उनकी प्रभावी लोकप्रिय कहानियों का पठनीय संकलन।

Vijayi Bhav by Dr.A.P.J. Abdul Kalam/Arun Tiwari

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विजयी भव
हम भारतीयों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी जरूरी संसाधन पर्याप्‍त मात्रा में देश में उपलब्ध हैं। हमारे यहाँ बहुत सी नीतियाँ और संस्थाएँ हैं। चुनौती है तो बस शिक्षकों, विद्यार्थियों और तकनीक-विज्ञान को एक सूत्र में पिरोकर एक दिशा में चिंतन करने की।
प्रस्तुत पुस्तक राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्य में चिंतन के विविध आयामों को खोलती है, अनेक व्यावहारिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है और कई महत्त्वपूर्ण प्रश्‍न पाठकों के सामने रखती है। डॉ. कलाम देश के छात्र व युवा-शक्‍ति को भावनात्मक, नैतिक एवं बौद्धिक विकास की ओर प्रवृत्त होने का संदेश देते हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी खोजों को सही ढंग से मनुष्य के विकास में उपयोग करने के विचार को बल देते हैं।
विजयी भव डॉ. कलाम के भारत को महाशक्‍ति बनाने के स्वप्न को दिशा देनेवाली कृति है। इसमें शिक्षा व शिक्षण की पृष्‍ठभूमि, मानव जीवन-चक्र, परिवारों के सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध, कार्य की उपयोगिता, नेतृत्व के गुण, विज्ञान की प्रकृति, अध्यात्म तथा नैतिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।
यह कृति डॉ. कलाम की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की श्रृंखला की महत्त्वपूर्ण कड़ी है, जो हमें सामाजिक एवं राष्‍ट्रीय जीवन में अपनी प्रवीणताओं और कुशलताओं के साथ विजयी होने की प्रेरणा देती है।

Vikas Ka Garh Chhattisgarh by Dr. Raman Singh

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छत्तीसगढ़ शताब्दियों से समन्वय, सद्भाव तथा श्रेष्ठ संस्कारों का क्षेत्र रहा है। माता कौसल्या की जन्मभूमि और श्रीराम के ननिहाल इस प्राचीन दक्षिण कोसल में भारतीय संस्कृति का धवल चरित्र विकसित हुआ। सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) में ताजा उत्खनन में प्राप्त छठवीं से आठवीं शताब्दी तक के पुरा-अवशेषों से पता चलता है कि यहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध और जैन उपासना पद्धतियों का अद्भुत सह-अस्तित्व रहा है। ऋषि-संस्कृति, अरण्य-संस्कृति, कृषि-संस्कृति और नागर सभ्यता यहाँ साथ-साथ पल्लवित होती रहीं। लंबी राजनीतिक उपेक्षा और अमानवीय शोषण के कारण प्रचुर नैसर्गिक संपदा का धनी यह अंचल पिछड़ेपन का शिकार बन गया। सही अर्थों में रत्नगर्भा इस धरती के निवासी घोर आर्थिक विपन्नता में जीवन व्यतीत करते रहे। भूख से अकाल मौतों का यहाँ कम-से-कम डेढ़ सौ वर्षों का काला इतिहास रहा। अन्याय का प्रतिकार करनेवाली जनता पर आजादी सत्ता द्वारा इसी क्षेत्र के राजनांदगाँव में किया गया था।
इसकी गणना देश के बीमारू प्रदेशों में होती रही। यहाँ के सहज और सरल निवासी निरंतर ठगे जाते रहे। परंतु एक दशक पूर्व छत्तीसगढ़ ने एक नई करवट बदली। इस दौरान इसने सबसे तेजी से बहुमुखी विकास कर रहे राज्य की पहचान बनाई है। इसकी खाद्य सुरक्षा गारंटी एक राष्ट्रीय मॉडल बन गई। महिला सशक्तीकरण में इस राज्य ने गत चार-पाँच वर्षों में एक लंबी छलाँग लगाई है। डॉ. रमन सिंह के संवेदनशील नेतृत्व में छत्तीसगढ़ देश के सिरमौर राज्य के रूप में उभर रहा है।

Vikas Ka Vishwas by Mridula Sinha

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विकास का विश्‍वास—मृदुला सिन्हा

समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप जो कल्याणकारी या विकासात्मक योजनाएँ बनती हैं, वे जरूरतमंदों तक पहुँच नहीं पातीं। माध्यम बने सरकारी तंत्र या स्वैच्छिक क्षेत्र अपनी विश्‍वसनीयता बनाने में अक्षम रहे हैं, इसलिए अरबों रुपया पानी की तरह बहाकर भी सरकार और जनता के बीच विश्‍वसनीयता का संकट गहरा रहा है। कल्याणकारी योजनाओं की राशि या तो सरकारी तिजोरी में धरी रह जाती है या गलत हाथों में पड़ती है, मानो नालों में बह जाती है।
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किसी भी गाँव के विकास में गाँव, सरकार (पंचायत, राज्य और केंद्र), स्वैच्छिक क्षेत्र, धार्मिक संगठन और कॉरपोरेट जगत् की सामूहिक भागीदारी होनी आवश्यक है। पिछली दस पंचवर्षीय योजनाओं में विकास का सारा दारोमदार सरकारी संगठनों पर ही छोड़ दिया गया। पंथिक संगठन और उद्योग जगत् तो दूर, स्वैच्छिक संगठनों और गाँववालों की भी भागीदारी नहीं ली गई। विश्‍वसनीय विकास हो तो कैसे?
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जिस समाज में संवेदना विलुप्‍त हो जाती है, ममता की धारा सूख जाती है, वहाँ लाख प्रयत्‍न करने के बावजूद समता नहीं लाई जा सकती। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का आदर्श भी पूरा नहीं हो सकता। अपार धन कमाने की ओर भाग रहे समाज को ममता की धारा में ही डुबोने की आवश्यकता है, ताकि एक-एक व्यक्‍ति के द्वारा कमाया धन-अंश दूसरों के सुख के लिए भी खर्च हो। सरकारी योजनाकारों और लागू करनेवाली एजेंसियों का संवेदनशील होना निहायत जरूरी है।
—इसी पुस्तक से

Vikas Ki Rajneeti by Vinay Sahasrabuddhe

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भारतीय जनता पार्टी देश की एक और राजनीतिक पार्टी भर नहीं है। अपने निर्माण व विकास के वर्षों में भाजपा खुद को पार्टी विद डिफरेंस (भिन्न किस्म का दल) के रूप में वर्णित कर गर्व महसूस करती
रही है।
एक के बाद एक आई दोनों वाजपेयी सरकारों ने यह प्रभावी तरीके से स्थापित कर दिया कि गठबंधन सरकारें टिकाऊ साबित हो सकती हैं, गैर-कांग्रेस सरकारें सफलतापूर्वक चल सकती हैं और इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसी सरकारें शासन में महत्त्वपूर्ण ढंग से योगदान दे सकती हैं, गवर्नेन्स का मूल्यवर्धन कर सकती हैं। किसी प्रकार के प्रच्छन्न या गोपनीय गैर-इरादों से मुक्त होने के कारण अपने राष्ट्रीय एजेंडे में भाजपा विकास का केंद्रीय महत्त्व सुनिश्चित कर सकी, जिसके मूल में मजबूत अर्थव्यवस्था थी। केंद्र और विभिन्न प्रदेशों में भाजपा सरकारों का प्रदर्शन साफ तौर पर अन्य राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों से निर्विवाद कहीं अधिक बेहतर रहा है।
यह पुस्तक उस मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) का निचोड़ है, जो भाजपा ने भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में अपूर्व योगदान द्वारा किया है। भाजपा ने परिश्रमपूर्वक और पूरी दक्षता से भारतीयों के जीवन में गुणात्मक रूपांतरण करने का काम किया है। भारतीय राजनीतिक विमर्श में ‘विकास की राजनीति’ यह शब्दावली केवल स्थापित करने का ही नहीं, बल्कि उसे पूरी प्रामाणिकता से जमीन पर उतारने का श्रेय भी भाजपा को जाता है। प्रामाणिक इरादे, सोच-समझकर बनाई नीतियाँ और कार्यान्वयन के प्रभावी तौर-तरीके इन तीन मुद्दों के आधार पर इस ‘विकास की राजनीति’ को अपनाया गया है।

Viking Tales by Jennie Hall

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So the best skalds traveled much and visited many people. Their songs made them welcome everywhere. They were always honored with good seats at a feast. They were given many rich gifts. Even the King of Norway would sometimes send across the water to Iceland, saying to some famous skald:
“Come and visit me. You shall not go away empty-handed. Men say that the sweetest songs are in Iceland. I wish to hear them.”