Pitamaha Bhishma by Pt. Vijay Shankar Mehta

यह नाटक ‘महाभारत’ या भीष्म पर आधारित ऐतिहासिक कथा-चिंतन ही नहीं, वरन् भीष्म के माध्यम से हमारे स्वविवेक, उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सीधे जीवन व चिंतन पर पड़नेवाले प्रभाव की व्याख्या है। वहीं सृष्टि के आरंभ से अब तक के सबसे जटिल मानवीय संबंध ‘स्त्री-पुरुष’ के संदर्भ में इस नाटक को मिथकीय रूपाकारों के माध्यम से आधुनिक चेतना-बोध एवं प्रश्नों को जोड़ने का यत्न है।
इस नाटक में भीष्म को दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है—देह और अंतर्मन। इसलिए प्रस्तुति में देह कभी अंतर्मन हो सकता है तो अंतर्मन कभी देहाकार हो सकता है।
इस नाटक के पात्रों में कहीं-न-कहीं हम अपने आप को पा सकते हैं। कुछ घटनाएँ हमारे जीवन से होकर भी इसी रूप में गुजरती हैं। पढ़ें तो विचार है, निहारें तो नाटक है और देखें तो दर्पण।

Language

Hindi

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